विकल्प आख़िर पत्नी और बच्चे ही क्यों?

विकल्प आख़िर पत्नी और बच्चे ही क्यों?

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SWATI SAHU

1 Nov 2026•8 min read

Published in perspectiveslateststories

एक सवाल रिश्तों से, एक सवाल समाज से, और एक सवाल उस सोच से जो अपनों के बीच ही भेदभाव करती है।

— सामाजिक एवं विचारात्मक आलेख

खुशी है कि तुम्हारे किरदार से ज़्यादा तुम्हारी लिखी हुई बातें सच्ची हैं।

कभी-कभी इंसान के शब्द इतने खूबसूरत होते हैं कि उनके पीछे छिपे किरदार की सच्चाई देखने में देर हो जाती है। हम उन शब्दों पर विश्वास कर बैठते हैं, जो रिश्तों को निभाने की कसमें खाते हैं, लेकिन जब निभाने की बारी आती है, तो वही शब्द अपनी अहमियत खो देते हैं।

शायद इसीलिए अब इंसानों से ज़्यादा भरोसा उन बेज़ुबान पशु-पक्षियों पर होने लगा है, जिन्हें अपने प्रेम का प्रमाण देने के लिए शब्दों की ज़रूरत नहीं होती।

हर जीव स्वतंत्र है। पशु-पक्षी भी प्रेम करते हैं, अपने बच्चों को पालते हैं, उन्हें चलना और उड़ना सिखाते हैं। वे उन्हें जीवनभर अपने पास बाँधकर नहीं रखते, बल्कि अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाते हैं। उनके प्रेम में अधिकार से ज़्यादा देखभाल और बंधन से ज़्यादा स्वतंत्रता दिखाई देती है।

उन्हें अपने वादों से मुकरने के लिए शब्दों का सहारा नहीं लेना पड़ता। वे अपने स्वभाव और सहज व्यवहार से अपनी जिम्मेदारियाँ निभाते हैं। उनके जीवन में भी बिछड़ना होता है, लेकिन वे मनुष्यों की तरह अपने रिश्तों की परिभाषाएँ बदलकर किसी को गलत साबित करने के लिए तर्क नहीं गढ़ते।

फिर सवाल उठता है—क्या इंसान कहलाने वाला प्राणी रिश्तों को निभाने की सहजता भी खोता जा रहा है?


रिश्तों में विकल्प क्यों नहीं होते?

क्या कभी किसी ने अपनी माँ से कहा है कि अगर तुम मेरी अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरीं, तो मैं दूसरी माँ ले आऊँगा?

क्या किसी ने अपनी बहन या भाई से रिश्ता तोड़ते समय यह कहा है कि तुम्हारी जगह किसी दूसरे को रख लूँगा?

ऐसी बातें सुनने में असामान्य लगती हैं, क्योंकि हम जन्म से मिले रिश्तों को अपने जीवन का स्थायी हिस्सा मानकर चलते हैं। उन रिश्तों में मतभेद होते हैं, गलतियाँ होती हैं, नाराज़गी होती है, फिर भी उन्हें निभाने के लिए अक्सर समझौते और संवाद का रास्ता खोजा जाता है।

तो फिर विवाह के बाद बने रिश्ते इतने अस्थिर क्यों हो जाते हैं?

पत्नी खराब लगे तो दूसरी पत्नी ले आओ, बच्चे अपेक्षाओं पर खरे न उतरें तो उन्हें अपने जीवन से अलग कर दो—क्या रिश्तों को देखने का यह दृष्टिकोण उचित है?

जिस समाज में पत्नी और बच्चे भी परिवार का हिस्सा हैं, वहाँ उनके लिए विकल्प तलाशने की सोच इतनी आसानी से कैसे जन्म ले लेती है?

विवाह का अर्थ केवल किसी स्त्री को अपने जीवन में स्थान देना नहीं है। इसका अर्थ है उसे अपने जीवन में सम्मानजनक स्थान देना। संतान का जन्म केवल वंश को आगे बढ़ाना नहीं है, बल्कि एक नए जीवन के प्रति जिम्मेदारी स्वीकार करना भी है।

रिश्ता बनाना एक निर्णय हो सकता है, लेकिन उसे सम्मान के साथ निभाना एक जिम्मेदारी है।


क्या पत्नी और बच्चों के सम्मान की कोई कीमत नहीं?

क्या किसी ने कभी सोचा है कि जिस स्त्री को विवाह के बाद अपना घर, अपना परिवेश और अपना जीवन बदलना पड़ता है, उसके लिए घर केवल चार दीवारों का नाम नहीं होता? वह वहाँ अपने सपने जोड़ती है, अपने समय का निवेश करती है और एक साझा भविष्य की कल्पना करती है।

वह केवल पत्नी नहीं होती। वह भी किसी की बेटी होती है, किसी की बहन होती है और अपनी स्वतंत्र पहचान रखने वाला एक संपूर्ण इंसान होती है।

फिर विवाह के बाद उसकी पहचान और उसके सम्मान को कमतर क्यों समझ लिया जाता है?

क्या उसे अपमानित करना उचित है—चाहे अकेले में या दूसरों के सामने?

क्या उसे घर से बेघर कर देना, आर्थिक रूप से असहाय छोड़ देना या समाज के सामने उसके चरित्र पर प्रश्न उठाना किसी विवाद को सुलझाने का सही तरीका है?

क्या बच्चों को माता-पिता के आपसी मतभेदों की कीमत चुकानी चाहिए?

और सबसे बड़ा सवाल—क्या किसी पुरुष के जीवित रहते हुए उसकी पत्नी को ऐसी परिस्थितियों में धकेल देना उचित है, जहाँ वह अपने ही वैवाहिक जीवन में अकेलेपन और असुरक्षा से जूझती रहे?

हर रिश्ते में विवाद हो सकते हैं। हर व्यक्ति सही नहीं होता और न ही हर परिस्थिति में एक ही पक्ष दोषी होता है। लेकिन किसी की गलती का निर्णय किए बिना उसे अपमानित करना या उसकी गरिमा छीन लेना किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता।

सम्मान किसी रिश्ते का पुरस्कार नहीं, बल्कि हर इंसान का अधिकार है।


भरोसा केवल पत्नी से ही क्यों माँगा जाता है?

रिश्तों की नींव भरोसे पर टिकी होती है। लेकिन भरोसा केवल माँगने से नहीं मिलता; उसे व्यवहार से अर्जित करना पड़ता है।

यदि पत्नी से विश्वास, समर्पण, त्याग और जिम्मेदारी की अपेक्षा की जाती है, तो क्या पति पर भी यही बातें लागू नहीं होतीं?

यदि पत्नी से घर और बच्चों के प्रति कर्तव्य निभाने की अपेक्षा है, तो क्या पति का कर्तव्य केवल आर्थिक जरूरतें पूरी करने तक सीमित हो सकता है?

यदि पत्नी से परिवार के लिए समझौते करने को कहा जाता है, तो क्या पति को भी अपने अहंकार, क्रोध और स्वार्थ से ऊपर उठना नहीं चाहिए?

रिश्ता किसी एक व्यक्ति के त्याग से नहीं, बल्कि दोनों की भागीदारी से मजबूत होता है।

पत्नी कोई ऐसी वस्तु नहीं, जिसे पसंद आने तक अपने पास रखा जाए। बच्चे कोई ऐसी जिम्मेदारी नहीं, जिसे परिस्थितियाँ कठिन होते ही छोड़ दिया जाए।

वे दोनों स्वतंत्र भावनाओं, जरूरतों और सम्मान वाले इंसान हैं।


प्यार, समय, साथ और सम्मान

प्यार के बाद समय चाहिए, समय के साथ अपनापन चाहिए, अपनापन बनाए रखने के लिए साथ चाहिए और साथ को सार्थक बनाने के लिए सम्मान चाहिए।

इनमें से किसी एक की कमी भी रिश्ते को भीतर से कमजोर कर सकती है।

किसी को समय पर साथ न मिले, तो बाद में दिया गया महँगा उपहार भी उस खालीपन को पूरी तरह नहीं भर सकता। किसी को आवश्यकता के समय सम्मान न मिले, तो वर्षों बाद कही गई प्रशंसा भी बीते हुए अपमान को मिटा नहीं सकती।

क्योंकि रिश्तों में हर चीज का मूल्य पैसों से नहीं आँका जा सकता।

कभी-कभी किसी की बात सुन लेना, उसके कठिन समय में उसके साथ खड़े रहना, उसकी भावनाओं को समझना और बिना अपमानित किए असहमति जताना ही सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है।

रिश्तों में देर से मिला उपहार, समय पर मिले साथ का विकल्प नहीं हो सकता।


समाज की सोच में यह अंतर क्यों?

हमारी किताबों, कहानियों और सामाजिक मान्यताओं में माँ के त्याग, बहन के स्नेह, भाई के साथ और बेटी की संवेदनाओं पर बहुत कुछ लिखा गया है। लेकिन पत्नी और बच्चों के अधिकारों, उनकी भावनाओं और उनके सम्मान को भी उतनी ही गंभीरता से समझना आवश्यक है।

आखिर पत्नी भी किसी की संतान है। बच्चे भी किसी परिवार की उम्मीद हैं। उनके जीवन की भावनात्मक जरूरतें किसी दूसरे रिश्ते से कम महत्वपूर्ण कैसे हो सकती हैं?

यह प्रश्न किसी एक पुरुष, किसी एक स्त्री या किसी एक परिवार पर आरोप लगाने के लिए नहीं है। यह उस मानसिकता पर विचार करने का निमंत्रण है, जो कुछ रिश्तों को जन्म से पवित्र मानती है, लेकिन विवाह से बने रिश्तों के प्रति अपने कर्तव्यों को कभी-कभी सुविधानुसार बदल देती है।

समाज तब अधिक न्यायपूर्ण होगा, जब रिश्तों की कीमत उनके नाम से नहीं, बल्कि उनमें मौजूद व्यवहार, जिम्मेदारी और सम्मान से तय की जाएगी।

माँ हो, पिता हो, भाई हो, बहन हो, पति हो, पत्नी हो या बच्चा—हर व्यक्ति को सुरक्षित, सम्मानजनक और संवेदनशील व्यवहार पाने का अधिकार है।

किसी रिश्ते को बचाने के नाम पर अन्याय सहना अनिवार्य नहीं है। लेकिन किसी रिश्ते से असहमति होने का अर्थ यह भी नहीं कि सामने वाले की गरिमा समाप्त हो जाती है।

रिश्ते निभाना और अन्याय सहना दो अलग बातें हैं।


अंत में बस , एक ही सवाल है मेरा ...

यह सब किसी किताब के पन्नों से उठाकर लिखे गए विचार नहीं, बल्कि रिश्तों और समाज को देखने, समझने और उन पर प्रश्न करने की कोशिश है।

हम अक्सर दूसरों को रिश्तों की अहमियत समझाते हैं, लेकिन कभी अपने व्यवहार में झाँककर नहीं देखते कि हम स्वयं उन रिश्तों के प्रति कितने जिम्मेदार हैं।

हम चाहते हैं कि कोई हमें समझे, हमारा साथ दे, हमारी गलतियों को माफ करे और हमारे कठिन समय में हमारा हाथ थामे। लेकिन क्या हम भी दूसरों के लिए वही करने को तैयार हैं?

अगर हर रिश्ता सम्मान, भरोसे, समय और साथ का हकदार है, तो पत्नी और बच्चे इससे अलग कैसे हो सकते हैं?

अगर परिवार का अर्थ केवल एक छत के नीचे रहना नहीं, बल्कि एक-दूसरे की जिम्मेदारी स्वीकार करना है, तो उस जिम्मेदारी से पीछे हटने से पहले हमें अपने भीतर झाँकना चाहिए।

क्योंकि पत्नी केवल किसी की पत्नी नहीं, एक संपूर्ण इंसान है। बच्चे केवल किसी की संतान नहीं, अपने सपनों और भावनाओं के साथ बढ़ते हुए जीवन हैं।

उनका सम्मान करना किसी पर एहसान करना नहीं है।


आखिर पत्नी और बच्चे ही क्यों?

क्यों उन्हीं से सबसे अधिक त्याग की अपेक्षा की जाती है?

क्यों उन्हीं के हिस्से में कभी-कभी सबसे अधिक इंतज़ार, अकेलापन और असुरक्षा आती है?

और क्यों रिश्तों की जिम्मेदारियों पर बात करते समय हम भूल जाते हैं कि जिस परिवार को हम अपना कहते हैं, उसमें पत्नी और बच्चे भी उतने ही अपने हैं?

शायद अब समय आ गया है कि हम रिश्तों को केवल नाम से नहीं, अपने व्यवहार से सच्चा साबित करें।

क्योंकि किरदार की सच्चाई शब्दों से नहीं, उस व्यवहार से पहचानी जाती है जो हम अपने सबसे करीब के लोगों के साथ करते हैं।

"भरोसा" समाज का सबसे बड़ा मिथ है

"भरोसा वही होता है जहां विकल्प नहीं होता

जहां विकल्प होता है वहां भरोसा नहीं होता"...

*

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एक सवाल रिश्तों से, एक सवाल समाज से, और एक सवाल उस सोच से जो अपनों के बीच ही भेदभाव करती है।

— सामाजिक एवं विचारात्मक आलेख

खुशी है कि तुम्हारे किरदार से ज़्यादा तुम्हारी लिखी हुई बातें सच्ची हैं।

कभी-कभी इंसान के शब्द इतने खूबसूरत होते हैं कि उनके पीछे छिपे किरदार की सच्चाई देखने में देर हो जाती है। हम उन शब्दों पर विश्वास कर बैठते हैं, जो रिश्तों को निभाने की कसमें खाते हैं, लेकिन जब निभाने की बारी आती है, तो वही शब्द अपनी अहमियत खो देते हैं।

शायद इसीलिए अब इंसानों से ज़्यादा भरोसा उन बेज़ुबान पशु-पक्षियों पर होने लगा है, जिन्हें अपने प्रेम का प्रमाण देने के लिए शब्दों की ज़रूरत नहीं होती।

हर जीव स्वतंत्र है। पशु-पक्षी भी प्रेम करते हैं, अपने बच्चों को पालते हैं, उन्हें चलना और उड़ना सिखाते हैं। वे उन्हें जीवनभर अपने पास बाँधकर नहीं रखते, बल्कि अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाते हैं। उनके प्रेम में अधिकार से ज़्यादा देखभाल और बंधन से ज़्यादा स्वतंत्रता दिखाई देती है।

उन्हें अपने वादों से मुकरने के लिए शब्दों का सहारा नहीं लेना पड़ता। वे अपने स्वभाव और सहज व्यवहार से अपनी जिम्मेदारियाँ निभाते हैं। उनके जीवन में भी बिछड़ना होता है, लेकिन वे मनुष्यों की तरह अपने रिश्तों की परिभाषाएँ बदलकर किसी को गलत साबित करने के लिए तर्क नहीं गढ़ते।

फिर सवाल उठता है—क्या इंसान कहलाने वाला प्राणी रिश्तों को निभाने की सहजता भी खोता जा रहा है?


रिश्तों में विकल्प क्यों नहीं होते?

क्या कभी किसी ने अपनी माँ से कहा है कि अगर तुम मेरी अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरीं, तो मैं दूसरी माँ ले आऊँगा?

क्या किसी ने अपनी बहन या भाई से रिश्ता तोड़ते समय यह कहा है कि तुम्हारी जगह किसी दूसरे को रख लूँगा?

ऐसी बातें सुनने में असामान्य लगती हैं, क्योंकि हम जन्म से मिले रिश्तों को अपने जीवन का स्थायी हिस्सा मानकर चलते हैं। उन रिश्तों में मतभेद होते हैं, गलतियाँ होती हैं, नाराज़गी होती है, फिर भी उन्हें निभाने के लिए अक्सर समझौते और संवाद का रास्ता खोजा जाता है।

तो फिर विवाह के बाद बने रिश्ते इतने अस्थिर क्यों हो जाते हैं?

पत्नी खराब लगे तो दूसरी पत्नी ले आओ, बच्चे अपेक्षाओं पर खरे न उतरें तो उन्हें अपने जीवन से अलग कर दो—क्या रिश्तों को देखने का यह दृष्टिकोण उचित है?

जिस समाज में पत्नी और बच्चे भी परिवार का हिस्सा हैं, वहाँ उनके लिए विकल्प तलाशने की सोच इतनी आसानी से कैसे जन्म ले लेती है?

विवाह का अर्थ केवल किसी स्त्री को अपने जीवन में स्थान देना नहीं है। इसका अर्थ है उसे अपने जीवन में सम्मानजनक स्थान देना। संतान का जन्म केवल वंश को आगे बढ़ाना नहीं है, बल्कि एक नए जीवन के प्रति जिम्मेदारी स्वीकार करना भी है।

रिश्ता बनाना एक निर्णय हो सकता है, लेकिन उसे सम्मान के साथ निभाना एक जिम्मेदारी है।


क्या पत्नी और बच्चों के सम्मान की कोई कीमत नहीं?

क्या किसी ने कभी सोचा है कि जिस स्त्री को विवाह के बाद अपना घर, अपना परिवेश और अपना जीवन बदलना पड़ता है, उसके लिए घर केवल चार दीवारों का नाम नहीं होता? वह वहाँ अपने सपने जोड़ती है, अपने समय का निवेश करती है और एक साझा भविष्य की कल्पना करती है।

वह केवल पत्नी नहीं होती। वह भी किसी की बेटी होती है, किसी की बहन होती है और अपनी स्वतंत्र पहचान रखने वाला एक संपूर्ण इंसान होती है।

फिर विवाह के बाद उसकी पहचान और उसके सम्मान को कमतर क्यों समझ लिया जाता है?

क्या उसे अपमानित करना उचित है—चाहे अकेले में या दूसरों के सामने?

क्या उसे घर से बेघर कर देना, आर्थिक रूप से असहाय छोड़ देना या समाज के सामने उसके चरित्र पर प्रश्न उठाना किसी विवाद को सुलझाने का सही तरीका है?

क्या बच्चों को माता-पिता के आपसी मतभेदों की कीमत चुकानी चाहिए?

और सबसे बड़ा सवाल—क्या किसी पुरुष के जीवित रहते हुए उसकी पत्नी को ऐसी परिस्थितियों में धकेल देना उचित है, जहाँ वह अपने ही वैवाहिक जीवन में अकेलेपन और असुरक्षा से जूझती रहे?

हर रिश्ते में विवाद हो सकते हैं। हर व्यक्ति सही नहीं होता और न ही हर परिस्थिति में एक ही पक्ष दोषी होता है। लेकिन किसी की गलती का निर्णय किए बिना उसे अपमानित करना या उसकी गरिमा छीन लेना किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता।

सम्मान किसी रिश्ते का पुरस्कार नहीं, बल्कि हर इंसान का अधिकार है।


भरोसा केवल पत्नी से ही क्यों माँगा जाता है?

रिश्तों की नींव भरोसे पर टिकी होती है। लेकिन भरोसा केवल माँगने से नहीं मिलता; उसे व्यवहार से अर्जित करना पड़ता है।

यदि पत्नी से विश्वास, समर्पण, त्याग और जिम्मेदारी की अपेक्षा की जाती है, तो क्या पति पर भी यही बातें लागू नहीं होतीं?

यदि पत्नी से घर और बच्चों के प्रति कर्तव्य निभाने की अपेक्षा है, तो क्या पति का कर्तव्य केवल आर्थिक जरूरतें पूरी करने तक सीमित हो सकता है?

यदि पत्नी से परिवार के लिए समझौते करने को कहा जाता है, तो क्या पति को भी अपने अहंकार, क्रोध और स्वार्थ से ऊपर उठना नहीं चाहिए?

रिश्ता किसी एक व्यक्ति के त्याग से नहीं, बल्कि दोनों की भागीदारी से मजबूत होता है।

पत्नी कोई ऐसी वस्तु नहीं, जिसे पसंद आने तक अपने पास रखा जाए। बच्चे कोई ऐसी जिम्मेदारी नहीं, जिसे परिस्थितियाँ कठिन होते ही छोड़ दिया जाए।

वे दोनों स्वतंत्र भावनाओं, जरूरतों और सम्मान वाले इंसान हैं।


प्यार, समय, साथ और सम्मान

प्यार के बाद समय चाहिए, समय के साथ अपनापन चाहिए, अपनापन बनाए रखने के लिए साथ चाहिए और साथ को सार्थक बनाने के लिए सम्मान चाहिए।

इनमें से किसी एक की कमी भी रिश्ते को भीतर से कमजोर कर सकती है।

किसी को समय पर साथ न मिले, तो बाद में दिया गया महँगा उपहार भी उस खालीपन को पूरी तरह नहीं भर सकता। किसी को आवश्यकता के समय सम्मान न मिले, तो वर्षों बाद कही गई प्रशंसा भी बीते हुए अपमान को मिटा नहीं सकती।

क्योंकि रिश्तों में हर चीज का मूल्य पैसों से नहीं आँका जा सकता।

कभी-कभी किसी की बात सुन लेना, उसके कठिन समय में उसके साथ खड़े रहना, उसकी भावनाओं को समझना और बिना अपमानित किए असहमति जताना ही सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है।

रिश्तों में देर से मिला उपहार, समय पर मिले साथ का विकल्प नहीं हो सकता।


समाज की सोच में यह अंतर क्यों?

हमारी किताबों, कहानियों और सामाजिक मान्यताओं में माँ के त्याग, बहन के स्नेह, भाई के साथ और बेटी की संवेदनाओं पर बहुत कुछ लिखा गया है। लेकिन पत्नी और बच्चों के अधिकारों, उनकी भावनाओं और उनके सम्मान को भी उतनी ही गंभीरता से समझना आवश्यक है।

आखिर पत्नी भी किसी की संतान है। बच्चे भी किसी परिवार की उम्मीद हैं। उनके जीवन की भावनात्मक जरूरतें किसी दूसरे रिश्ते से कम महत्वपूर्ण कैसे हो सकती हैं?

यह प्रश्न किसी एक पुरुष, किसी एक स्त्री या किसी एक परिवार पर आरोप लगाने के लिए नहीं है। यह उस मानसिकता पर विचार करने का निमंत्रण है, जो कुछ रिश्तों को जन्म से पवित्र मानती है, लेकिन विवाह से बने रिश्तों के प्रति अपने कर्तव्यों को कभी-कभी सुविधानुसार बदल देती है।

समाज तब अधिक न्यायपूर्ण होगा, जब रिश्तों की कीमत उनके नाम से नहीं, बल्कि उनमें मौजूद व्यवहार, जिम्मेदारी और सम्मान से तय की जाएगी।

माँ हो, पिता हो, भाई हो, बहन हो, पति हो, पत्नी हो या बच्चा—हर व्यक्ति को सुरक्षित, सम्मानजनक और संवेदनशील व्यवहार पाने का अधिकार है।

किसी रिश्ते को बचाने के नाम पर अन्याय सहना अनिवार्य नहीं है। लेकिन किसी रिश्ते से असहमति होने का अर्थ यह भी नहीं कि सामने वाले की गरिमा समाप्त हो जाती है।

रिश्ते निभाना और अन्याय सहना दो अलग बातें हैं।


अंत में बस , एक ही सवाल है मेरा ...

यह सब किसी किताब के पन्नों से उठाकर लिखे गए विचार नहीं, बल्कि रिश्तों और समाज को देखने, समझने और उन पर प्रश्न करने की कोशिश है।

हम अक्सर दूसरों को रिश्तों की अहमियत समझाते हैं, लेकिन कभी अपने व्यवहार में झाँककर नहीं देखते कि हम स्वयं उन रिश्तों के प्रति कितने जिम्मेदार हैं।

हम चाहते हैं कि कोई हमें समझे, हमारा साथ दे, हमारी गलतियों को माफ करे और हमारे कठिन समय में हमारा हाथ थामे। लेकिन क्या हम भी दूसरों के लिए वही करने को तैयार हैं?

अगर हर रिश्ता सम्मान, भरोसे, समय और साथ का हकदार है, तो पत्नी और बच्चे इससे अलग कैसे हो सकते हैं?

अगर परिवार का अर्थ केवल एक छत के नीचे रहना नहीं, बल्कि एक-दूसरे की जिम्मेदारी स्वीकार करना है, तो उस जिम्मेदारी से पीछे हटने से पहले हमें अपने भीतर झाँकना चाहिए।

क्योंकि पत्नी केवल किसी की पत्नी नहीं, एक संपूर्ण इंसान है। बच्चे केवल किसी की संतान नहीं, अपने सपनों और भावनाओं के साथ बढ़ते हुए जीवन हैं।

उनका सम्मान करना किसी पर एहसान करना नहीं है।


आखिर पत्नी और बच्चे ही क्यों?

क्यों उन्हीं से सबसे अधिक त्याग की अपेक्षा की जाती है?

क्यों उन्हीं के हिस्से में कभी-कभी सबसे अधिक इंतज़ार, अकेलापन और असुरक्षा आती है?

और क्यों रिश्तों की जिम्मेदारियों पर बात करते समय हम भूल जाते हैं कि जिस परिवार को हम अपना कहते हैं, उसमें पत्नी और बच्चे भी उतने ही अपने हैं?

शायद अब समय आ गया है कि हम रिश्तों को केवल नाम से नहीं, अपने व्यवहार से सच्चा साबित करें।

क्योंकि किरदार की सच्चाई शब्दों से नहीं, उस व्यवहार से पहचानी जाती है जो हम अपने सबसे करीब के लोगों के साथ करते हैं।

"भरोसा" समाज का सबसे बड़ा मिथ है

"भरोसा वही होता है जहां विकल्प नहीं होता

जहां विकल्प होता है वहां भरोसा नहीं होता"...

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