तुम तो विश्वास की पहचान थे

तुम तो विश्वास की पहचान थे

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SWATI SAHU

28 Oct 2026•2 min read

Published in poetrylatest

आया था उस शाम एक फ़रमान,
किया था उसने रिश्ते का आग़ाज़।

हमने भी सुना दिया अपना पैग़ाम,
कि उन पर है हमें अटूट विश्वास।

कौन हो तुम, कैसी हो तुम,
हम तो बस उन्हें ही जानते हैं।

कर लो तुम जो करना है,
हम तो उन्हें अपना मानते हैं।

उनके लिए था रिश्तों का मज़ाक,
हमारे लिए हर शब्द एक घाव था।

तुम्हारी ज़ुबाँ पर था जो खेल महज़,
हमारे लिए विश्वास का सवाल था।

ज़िद हमारी थी, ज़ुबाँ तुम्हारी थी,
पर यक़ीन की डोर तो तुमसे बाँधी थी।

उनके हर लफ़्ज़ को झुठलाते रहे,
क्योंकि तुम पर अटूट विश्वास रखते रहे।

ये सिर्फ़ मेरा ही विश्वास था,
कि तुम हमारे हो, हमारे ही रहोगे।

हम अपने विश्वास पर अडिग रहे,
तुम अपनी ही ज़ुबाँ से मुकरते रहे।

उन्होंने तो सिर्फ़ शब्दों के घाव दिए,
तुमने उन घावों को नासूर बना दिया।

जिनसे उम्मीद थी मरहम की हमें,
उन्होंने ही दर्द को और बढ़ा दिया।

फिर सुना एक दिन पैग़ाम तुम्हारा,
कि अपना दर्द, अपना ही होता है।

अपना विश्वास, अपना ही होता है,
हर शख़्स अपना बोझ ख़ुद ढोता है।

तब समझ आया उस शाम का फ़रमान,
क्यों रिश्तों का हुआ था यूँ अपमान।

वो तो पराए थे, शब्दों से खेल गए,
तुम अपने होकर भी ज़ुबाँ से मुकर गए।

शिकायत उनसे नहीं, जिन्होंने घाव दिए,
सवाल तुमसे है, जिन्होंने उन्हें नासूर बना दिए।

वो तो हमारे विश्वास से अनजान थे,
मगर तुम तो उस विश्वास की पहचान थे।

*

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किया था उसने रिश्ते का आग़ाज़।

हमने भी सुना दिया अपना पैग़ाम,
कि उन पर है हमें अटूट विश्वास।

कौन हो तुम, कैसी हो तुम,
हम तो बस उन्हें ही जानते हैं।

कर लो तुम जो करना है,
हम तो उन्हें अपना मानते हैं।

उनके लिए था रिश्तों का मज़ाक,
हमारे लिए हर शब्द एक घाव था।

तुम्हारी ज़ुबाँ पर था जो खेल महज़,
हमारे लिए विश्वास का सवाल था।

ज़िद हमारी थी, ज़ुबाँ तुम्हारी थी,
पर यक़ीन की डोर तो तुमसे बाँधी थी।

उनके हर लफ़्ज़ को झुठलाते रहे,
क्योंकि तुम पर अटूट विश्वास रखते रहे।

ये सिर्फ़ मेरा ही विश्वास था,
कि तुम हमारे हो, हमारे ही रहोगे।

हम अपने विश्वास पर अडिग रहे,
तुम अपनी ही ज़ुबाँ से मुकरते रहे।

उन्होंने तो सिर्फ़ शब्दों के घाव दिए,
तुमने उन घावों को नासूर बना दिया।

जिनसे उम्मीद थी मरहम की हमें,
उन्होंने ही दर्द को और बढ़ा दिया।

फिर सुना एक दिन पैग़ाम तुम्हारा,
कि अपना दर्द, अपना ही होता है।

अपना विश्वास, अपना ही होता है,
हर शख़्स अपना बोझ ख़ुद ढोता है।

तब समझ आया उस शाम का फ़रमान,
क्यों रिश्तों का हुआ था यूँ अपमान।

वो तो पराए थे, शब्दों से खेल गए,
तुम अपने होकर भी ज़ुबाँ से मुकर गए।

शिकायत उनसे नहीं, जिन्होंने घाव दिए,
सवाल तुमसे है, जिन्होंने उन्हें नासूर बना दिए।

वो तो हमारे विश्वास से अनजान थे,
मगर तुम तो उस विश्वास की पहचान थे।

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