स्वाती - राजुल

स्वाती - राजुल

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meenu yatin

14 Aug 20262 min read

Published in poetrylatest

स्वाती की बूंद सी  वो
मिलती कहां हर किसी को
किसी की सारी मुश्किलों का हल वो
खुद में जैसे सवाल सी है
यूं तो हर रूप में अलग है वो
मगर बहन की  वो एक मिसाल सी है।

भाई में जान उसकी इस तरह से बसती
भाई की लाडली वो हर बात उससे कहती।
बचपन का वो साथी अपने साए की तरह
जिसके रहते इसे कोई कुछ  न कह सका।

भाई जहां जीने का हर हुनर सिखा गया
बाद उसके रहेगी कैसे बस ये न बता गया
बच्चों के जैसे प्यार से संभाले रखा
भाई को उसने हर हाल में संभाले रखा

हंसती खेलती जिंदगी पे
जब काले साए  मंडराने लगे।
एक रेत की ऐसी आंधी चली
सारे फूल  कुंभलाने लगे।

उसने न हौसला छोड़ा
न छोड़ा दामन आस का
कस कर हाथ थामा भाई का
धागा बांधा विश्वास का।

वो साथ भाई के आखिरी पल तक
किस्मत से लड़ती रही।
कुछ भी न और चाहिए बस ये न लो
की मिन्नते रब से वो करती रही।

फिर एक दिन हाथ की
पकड़ से हाथ छूट गया
इस ओर खड़ी रह गई बहन
भाई से ये जग छूट गया।

एक ऐसा पल जिसको मेरी कलम
लिखने से इंकार करे
झर झर बह आए अश्रु
कोई कैसे  ये सच स्वीकार करे।

हर एक निगाह बहन पे के
उसको कौन सम्हाल पाए
बहन के मन में भाई  ऐसे
की कोई न निकल पाए ।

हर बात उसी ने सिखलाई
हर गुण में माहिर कर डाला
एक चुप सी लगा ली थी उसने
और सब को उसने  ही संभाला ।

इतनी हिम्मत, हौसला इतना
ये सब इतना आसान नहीं
एक दर्द जो हर पल रिसता है
उसको सहना आसान नहीं ।

कई रिश्तों को करीब से देखा है
कई लोगों के जीवन से सीखा है
पर ऐसी बहन न देखी है
न ऐसा भाई देखा है।

मीनू यतिन

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स्वाती की बूंद सी  वो
मिलती कहां हर किसी को
किसी की सारी मुश्किलों का हल वो
खुद में जैसे सवाल सी है
यूं तो हर रूप में अलग है वो
मगर बहन की  वो एक मिसाल सी है।

भाई में जान उसकी इस तरह से बसती
भाई की लाडली वो हर बात उससे कहती।
बचपन का वो साथी अपने साए की तरह
जिसके रहते इसे कोई कुछ  न कह सका।

भाई जहां जीने का हर हुनर सिखा गया
बाद उसके रहेगी कैसे बस ये न बता गया
बच्चों के जैसे प्यार से संभाले रखा
भाई को उसने हर हाल में संभाले रखा

हंसती खेलती जिंदगी पे
जब काले साए  मंडराने लगे।
एक रेत की ऐसी आंधी चली
सारे फूल  कुंभलाने लगे।

उसने न हौसला छोड़ा
न छोड़ा दामन आस का
कस कर हाथ थामा भाई का
धागा बांधा विश्वास का।

वो साथ भाई के आखिरी पल तक
किस्मत से लड़ती रही।
कुछ भी न और चाहिए बस ये न लो
की मिन्नते रब से वो करती रही।

फिर एक दिन हाथ की
पकड़ से हाथ छूट गया
इस ओर खड़ी रह गई बहन
भाई से ये जग छूट गया।

एक ऐसा पल जिसको मेरी कलम
लिखने से इंकार करे
झर झर बह आए अश्रु
कोई कैसे  ये सच स्वीकार करे।

हर एक निगाह बहन पे के
उसको कौन सम्हाल पाए
बहन के मन में भाई  ऐसे
की कोई न निकल पाए ।

हर बात उसी ने सिखलाई
हर गुण में माहिर कर डाला
एक चुप सी लगा ली थी उसने
और सब को उसने  ही संभाला ।

इतनी हिम्मत, हौसला इतना
ये सब इतना आसान नहीं
एक दर्द जो हर पल रिसता है
उसको सहना आसान नहीं ।

कई रिश्तों को करीब से देखा है
कई लोगों के जीवन से सीखा है
पर ऐसी बहन न देखी है
न ऐसा भाई देखा है।

मीनू यतिन

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