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शब्द-जाल

वो शब्दों का ही तो बस खेल था,
हुआ जो रिश्तों का, वो मज़ाक था।
हम समझ बैठे जिसे मोहब्बत की दास्ताँ,
वो किसी के स्वार्थ का बस हिसाब था।
वादों में अपनापन, बातों में सम्मान था,
हक़ीक़त में हर रिश्ता मगर बेनक़ाब था।
हम निभाते रहे रिश्ते इबादत की तरह,
उनके लिए तो सब वक़्त का हिसाब था।
हम ढूँढ़ते रहे जिनमें अपना वजूद,
उनकी नज़रों में हमारा होना भी सवाल था।
न शिकवा रहा, न कोई जवाब माँगा,
बस ख़ामोशियों में दफ़्न हर ख़्वाब था।
जिसे हम ज़िंदगी का सबसे पाक रिश्ता समझे,
वो शब्दों का खेल और भरोसे का मज़ाक था।
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