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"पेशा नहीं, एक भ्रम था" (एक विश्वास के टूटने की दास्ताँ)

"पेशा नहीं, एक भ्रम था"
(एक विश्वास के टूटने की दास्ताँ)
देखा था एक पेशा, जो सिर्फ़ पेशा नहीं था,
जिसमें प्यार था, सम्मान था,
अपनों से बढ़कर परायों का भी स्थान था।
सुना था, वहाँ रिश्तों की कीमत होती है,
दूर रहकर भी अपनों से नज़दीकियाँ होती हैं।
जहाँ फ़र्ज़ के आगे स्वार्थ नहीं होता,
जहाँ अपने-पराए में कोई भेद नहीं होता।
सोचा था, कितना पावन होगा वो संसार,
जहाँ त्याग ही पहचान है,
और वफ़ा ही आधार।
मगर कहाँ पता था—
ये सब किस्से-कहानियों में सजाए गए किरदार हैं,
असल ज़िंदगी में कुछ चेहरे
इन आदर्शों के बिल्कुल विपरीत संसार हैं।
जहाँ सच से ज़्यादा झूठ मिला,
विश्वास के बदले विश्वासघात मिला।
जहाँ सम्मान की उम्मीद रखी थी,
वहीं हर मोड़ पर अपमान मिला।
जहाँ साथ निभाने की कसमें थीं,
वहीं दूरियों के फ़रमान मिले।
जहाँ अपनेपन की आस लगाई,
वहीं अपने भी अनजान मिले।
जिस पेशे को समझा था
त्याग और समर्पण की मिसाल,
उसी की आड़ में कुछ चेहरों ने
रिश्तों को कर दिया बेहाल।
अब शिकायत उस पेशे से नहीं,
न उसके सम्मान पर कोई सवाल है।
बस जिसे उस पेशे का प्रतिबिंब समझा था,
उसी के चेहरे से उतरता हर नक़ाब है।
क्योंकि वर्दी, पद या पेशा,
किसी के चरित्र की पहचान नहीं होता।
सम्मान की वर्दी पहन लेने भर से,
हर शख़्स सम्मान का हक़दार नहीं होता।
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