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नज़र आता है...

चांद क्यों आज बेज़ार नज़र आता है,
रात की चादर का तार तार नज़र आता है।
हर्फ़ की ये क्या महफिल सजी दिखती है,
हर कोई यहां सुखनवार नज़र आता है।
आ गया है त्योहारों का महीना शायद,
देर तलक रोशन बाज़ार नज़र आता है।
वो जो सादगी से ही क़त्ल करते हैं कितनों का,
सँवरके निकला तो कयामत का आसार नजर आता है।
गलती से गुम गया था उसके मोहल्ले में आज,
जहां हर जवाँ दिल इश्क़ का बीमार नज़र आता है।
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