
मनचाहा खिलौना
एक दिन पिता ने अपने छोटे से बच्चे को कांधे पर बिठाया और मेला दिखाने ले गए। पिता ने उसे झुला झुलाया, भेल, कुल्फी, खट्टी मीठी तोफी भी दिलाई, पिता उसे गुब्बारे दिलाना चाहता था मगर बच्चे के मन को ना भया । जाने क्यूँ बच्चा बहुत खुश ना दिखा, ना जाने किस चीज़ की तलाश थी उसे, पिता ने अपने बच्चे को रंग-बिरंगे खिलौने दिखाए ।अपने कंधे पर बिठाकर कभी इस दुकान तो कभी उस दुकान ले जाते, पुरा मेला वो लग-भग देख चुके थे, पिता के मन में आया कि कुछ तो उसे पसंद आए...
तभी बच्चा अपने छोटे-छोटे हाथों से पिता का पीठ थपथपने लगा...उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, मानो इसी चीज़ की तलाश थी उसे, वो चहक उठा, ख़ुशी से ज़ोर-ज़ोर से पिता का पीठ थपथपाने लगा । मुड़कर देखने पर उसने एक खिलोने की तरफ इशारा किया.. पिता ने उस उत्पते खिलोने को देखा और मना कर दिया । वो उससे भी अच्छी चीज़ दिलाना चाहते थे.. उन्होंने कहा "ये खिलोना तुम्हारे लिए अभी सही नहीं है बच्चे"... बच्चा जिद करने लगा मगर पिता ने एक ना सुनी । बच्चा रोने लगा, बुदबुदाने लगा... पिता से बेरुखी से पेश आने लगा, उसने पिता के कंधे से झलांग लगाई और दौड़ कर उस उत्पते खिलोने को दिलाने की जिद करने लगा... बच्चा ज़मीन पर लोट-पोट होने लगा।
बहुत वक्त गुजर गया और फिर पिता को लगा कि बच्चा उससे भूल गया है, वो चंचल बच्चा शांत हो गया। फिर पिता को लगा की शायद अब उन्हें ये खिलोना दे देना चाहिए.. पिता ने उस खिलोने को एक दिन बच्चे के सामने रख दिया, बच्चा देखकर खुश हो गया मगर उस खिलोने को अपने बगल में रख दिया। ये देख पिता ने पूछा "क्या तुम इसे पाकर खुश नहीं हो बच्चे?" बच्चे ने बड़ी खूबसूरती से कहा "अब इसे पाने की इच्छा नहीं रही। मुझे बहुत बाद समझ आया शायद वो मेरे लिए ठीक नहीं था" ये समझदारी देख, पिता ने बच्चे को सीने से लगा लिया।
कभी-कभी हम उस ऊपर वाले से उन रिश्तों को मांग लेते हैं जो हमारे लिए बना ही नहीं है । हम अक्सर अपनी ज़िद में वही चाहते हैं जो हमें सही लगता है, लेकिन ईश्वर हमसे बेहतर जानते हैं कि हमारे लिए क्या उचित है। जब हम अहंकार और ज़िद छोड़कर समर्पण करते हैं, तभी जीवन में सही रास्ते और नई संभावनाएँ खुलती हैं।
किसी चीज़ का ना मिलना शायद हमारी हित में होता है और बहुत बाद में समझ आता है क्यों आपको वह नहीं मिला। आपकी क्या राय है?
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