माँ के अंश खुद का वंश (अपनों से बेगाने)

माँ के अंश खुद का वंश (अपनों से बेगाने)

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SWATI SAHU

3 Oct 2026•1 min read

Published in poetrylatest

माँ के अंश बड़े होकर भी, कभी बड़े ना हुए,
खुद के वंश के तो वो, जन्म से ही सगे ना हुए।

जिनकी आँखों में सजाई थी, कल की सुनहरी सुबह,
वही आज अपनों की राहों में, दीवार बनकर खड़े हुए।

माँ के दूध का कर्ज़, उनके अंशों में चुकाना है,
गैरों को सहलाना है, और अपनों को मिटाना है।

खुद को खुदा बनाकर बैठे हैं वो आज इस कदर,
कि न्याय की आड़ में, खुद के वंश को दबाना है।

माँ के अंशों को दी उन्होंने, विकास की नई पगडंडी,
पर अपने ही आँगन में छाई, उपेक्षा की धुंध ठंडी।

दूसरों के आँगन में जब वो, उजालों का बीज बो रहे थे,
तब उनके अपने ही लोग, कोने में बैठ रो रहे थे।

कैसा यह न्याय है, कैसी यह रीत निभाई है,
गैरों पर रहमत बरसी, अपनों के हिस्से तन्हाई है।

तरक्की की राहों में सबको, गले से लगाया उन्होंने,
पर जब बात अपनों की आई, तो सिर्फ पीठ दिखाई है।

भूल गए वो सारे वादे, भूल गए वो सारा साथ,
छोड़ दिया मंझधार में ही, अपने ही श्रेष्ठ वंश का हाथ।

जो चढ़ गए ऊँचाइयों पर, खुद को भगवान मानकर,
वे भूल गए अपनी ज़मीन को, एक झूठी शान तानकर।

स्वाति साहू

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माँ के अंश बड़े होकर भी, कभी बड़े ना हुए,
खुद के वंश के तो वो, जन्म से ही सगे ना हुए।

जिनकी आँखों में सजाई थी, कल की सुनहरी सुबह,
वही आज अपनों की राहों में, दीवार बनकर खड़े हुए।

माँ के दूध का कर्ज़, उनके अंशों में चुकाना है,
गैरों को सहलाना है, और अपनों को मिटाना है।

खुद को खुदा बनाकर बैठे हैं वो आज इस कदर,
कि न्याय की आड़ में, खुद के वंश को दबाना है।

माँ के अंशों को दी उन्होंने, विकास की नई पगडंडी,
पर अपने ही आँगन में छाई, उपेक्षा की धुंध ठंडी।

दूसरों के आँगन में जब वो, उजालों का बीज बो रहे थे,
तब उनके अपने ही लोग, कोने में बैठ रो रहे थे।

कैसा यह न्याय है, कैसी यह रीत निभाई है,
गैरों पर रहमत बरसी, अपनों के हिस्से तन्हाई है।

तरक्की की राहों में सबको, गले से लगाया उन्होंने,
पर जब बात अपनों की आई, तो सिर्फ पीठ दिखाई है।

भूल गए वो सारे वादे, भूल गए वो सारा साथ,
छोड़ दिया मंझधार में ही, अपने ही श्रेष्ठ वंश का हाथ।

जो चढ़ गए ऊँचाइयों पर, खुद को भगवान मानकर,
वे भूल गए अपनी ज़मीन को, एक झूठी शान तानकर।

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