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मैं बेटा तुम सा चाहूंगी ।

दिली ख्वाहिश है ये मेरी, जो तुम पर ठहर जाए,
कि बेटा अपनी माँ की खातिर, हद से गुज़र जाए।
वो तर्क-ए-ताल्लुक करे बीवी-बच्चों से, भले वालिद को दुत्कारे,
पर अपनी माँ के ख़िलाफ़, वो एक लफ्ज़ ना उचारे।
जो इश्क़ बीवी बन ना मिला, वो माँ बनकर तो पाया है,
मैं बेटा तुम सा चाहूंगी, ये दिल में अरमान जगाया है।
मगर ऐ नूर-ए-नक्श! मैं वो माँ हरगिज़ ना बनूंगी,
जो ज़ंजीर-ए-अहसान बनकर, तेरी गृहस्थी उजाड़े।
की जो तेरी परवरिश मैंने, वो केवल मेरा फ़र्ज़ रहा,
तू हिस्सा है मेरी रूह का, तुझ पर ना कोई कर्ज़ रहा।
सफ़र-ए-ज़िंदगी के हर इक पड़ाव को, मैंने खुलकर जिया है,
तेरे हर एक मोड़ पर, मेरा हाथ तेरे संग रहना है।
मैं साया बनकर साथ रहूँ, बस एक उम्र की सीमा तक,
फिर सौंप दूँगी हाथ तेरा, तेरी अपनी हसीं दुनिया तक।
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