कहीं ऐसा न हो

कहीं ऐसा न हो

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meenu yatin

7 Oct 2026•1 min read

Published in poetrylatest

कुछ काम आ सकूं इंसानियत के मै भी
मैं बेकार था,  कहीं बेकार ही न रह जाऊं

एक नाम के एक मुकाम की  तलाश में हूं कबसे
मैं इसका बस  तलबगार ही न रह जाऊं

मेरे गुनाहो को माफ कर देना के मै भी इंसान हूँ
मैं किसी के आंसुओं का गुनाहगार भी न रह जाऊं ।

एक बेचैनी ताउम्र साथ चली है मेरे
मैं आज भी यूँ ही बेकरार ही न रह जाऊं

इंसाफ मेरे संग भी हो ए खुदा
रह न जाऊं कतार में

उसके इश्क पे पूरा  हक हो मेरा
मैं खाली एक हकदार ही न रह जाऊं ।

*

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कुछ काम आ सकूं इंसानियत के मै भी
मैं बेकार था,  कहीं बेकार ही न रह जाऊं

एक नाम के एक मुकाम की  तलाश में हूं कबसे
मैं इसका बस  तलबगार ही न रह जाऊं

मेरे गुनाहो को माफ कर देना के मै भी इंसान हूँ
मैं किसी के आंसुओं का गुनाहगार भी न रह जाऊं ।

एक बेचैनी ताउम्र साथ चली है मेरे
मैं आज भी यूँ ही बेकरार ही न रह जाऊं

इंसाफ मेरे संग भी हो ए खुदा
रह न जाऊं कतार में

उसके इश्क पे पूरा  हक हो मेरा
मैं खाली एक हकदार ही न रह जाऊं ।

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