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दो कदम
दो कदम, मीलों का सफर तय कर जाती है,
दो कदम, अनगिनत संघर्ष सह जाती है ।
दो कदम, तरक्की का रास्ता तय कर आती है,
दो कदम, जिंदगी को रोशन कर देती है ।
दो कदम, खुद के लिए खड़े होने में साहस दे जाती है,
दो कदम, पुरानी सोच को नया रुख दे जाती है ।
दो कदम, दहलीज के पार रिश्ते तोड़ देती है,
दो कदम, खुद के नज़रों में गिरा देती है ।
जब सब कुछ उन दो कदमों ने किया है,
तो श्रेय भी उन दो कदमों को मिलना चाहिए...
ये लिखते-लिखते में अपने दो कदमों को देखने लगी,
जिसने मुझे चाहे-अनचाहे बहुत कुछ दिखाया...
ना चाहते हुए भी वहां पहुचाया गया,
और चाहते हुए भी कहीं जाने से रोक लिया गया,
दो कदम... बस ये दो कदम ।
स्वेता गुप्ता
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