रुकना नहीं

रुकना नहीं

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ashish kumar tripathi

29 Jul 20242 min read

Published in poetry

रुकना नहीं

 

रुकना नहीं, रुकना नहीं, है राह कठिन पर झुकना नहीं।
हैं कंटक पत्थर राहों में, पर समय है यह, रुकना नहीं।

अपने रूठे, साथी छूटे, प्रकृति है यह, झुकना नहीं।
दर्द अधिक है, किन्तु क्षणिक है, सहनशक्ति तू, टूटना नहीं।

तिनका तिनका बना घरौंदा, टूट गया खग में खग का,
पर नहीं है टूटा हौंसला उसका, बढा रुधिर रग में खग का।

बाधाएँ बहुत हैं पार की तुमने, एक नहीं कई बार की तुमने।
अब थक कर हो ठूंठ खड़े क्यों? उठ बैठो, अब मूक पड़े क्यों?

बाँह पसारे सोच रहे क्या, उठ कर बैठो शोक रहे क्या?
रचा है रिपु ने अब व्यूह ऐसा, शूल नहीं, ना भाल हो जैसा।
सत्य मार्ग ही एक अस्त्र है, हरि विश्वास ही साथ शस्त्र है।
अस्त्र साथ है, शस्त्र साथ है, अब फिर आगे रुकना कैसा?
शत्रु चपल है, अखंड घमंड है, किन्तु ना है साहस तुझ सा।

मन में प्रचण्ड विश्वास प्रचुर है, किंचित संशय अब करना नहीं।
दूर नहीं क्षितिज अब तुमसे, हाथ बढ़ा, अब रुकना नहीं।

रुकना नहीं, रुकना नहीं, है राह कठिन पर झुकना नहीं।

 

रचयिता
आशीष कुमार त्रिपाठी “अलबेला”

 

Photo by Gurkamal Teja: https://www.pexels.com/photo/man-standing-on-mountain-1331395/

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रुकना नहीं, रुकना नहीं, है राह कठिन पर झुकना नहीं।
हैं कंटक पत्थर राहों में, पर समय है यह, रुकना नहीं।

अपने रूठे, साथी छूटे, प्रकृति है यह, झुकना नहीं।
दर्द अधिक है, किन्तु क्षणिक है, सहनशक्ति तू, टूटना नहीं।

तिनका तिनका बना घरौंदा, टूट गया खग में खग का,
पर नहीं है टूटा हौंसला उसका, बढा रुधिर रग में खग का।

बाधाएँ बहुत हैं पार की तुमने, एक नहीं कई बार की तुमने।
अब थक कर हो ठूंठ खड़े क्यों? उठ बैठो, अब मूक पड़े क्यों?

बाँह पसारे सोच रहे क्या, उठ कर बैठो शोक रहे क्या?
रचा है रिपु ने अब व्यूह ऐसा, शूल नहीं, ना भाल हो जैसा।
सत्य मार्ग ही एक अस्त्र है, हरि विश्वास ही साथ शस्त्र है।
अस्त्र साथ है, शस्त्र साथ है, अब फिर आगे रुकना कैसा?
शत्रु चपल है, अखंड घमंड है, किन्तु ना है साहस तुझ सा।

मन में प्रचण्ड विश्वास प्रचुर है, किंचित संशय अब करना नहीं।
दूर नहीं क्षितिज अब तुमसे, हाथ बढ़ा, अब रुकना नहीं।

रुकना नहीं, रुकना नहीं, है राह कठिन पर झुकना नहीं।

 

रचयिता
आशीष कुमार त्रिपाठी “अलबेला”

 

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