पुराना शहर

पुराना शहर

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namrata gupta

26 Jul 20261 min read

Published in poetrylatest

छोड़ आई हूँ मैं उस पुराने शहर को…
छोड़ आई हूँ मैं उस पुराने शहर को।
वो शहर अब मेरे लिए पुराना बन गया।
जिस शहर में बीत रहे थे सुकून भरे पल,
वो शहर मेरे लिए अचानक से अंजाना बन गया।

आ गई हूँ इस नए शहर में,
पर न जाने क्यों उस पुराने शहर से जुड़ी हर बात पल-पल याद आती है।
वो दोस्तों के साथ "चाय" कल्चर में शामें बिताना,
घूमना-फिरना, इतराना, इठलाना—सब कुछ बहुत याद आता है।
पता नहीं क्यों, पर कुछ तो बात है उस शहर में।

पीली टैक्सी, हावड़ा ब्रिज, बारिश के समय धुली हुई पुरानी इमारतें—उफ़! सब कुछ बहुत याद आता है।
भूल नहीं सकती मैं पूजा के समय बाज़ार की वो रौनक।
हर जगह फैली रहती थी रजनीगंधा की महक।
“दुर्गा एलो, दुर्गा एलो” से गूँजता था पूरा वातावरण।

हर समय मन उल्लास से भरा रहता था।
फिर से जीना चाहती हूँ उन पलों को,
फिर से घूमना चाहती हूँ उन गलियों में दोस्तों के साथ।
ये दिल फिर से उस शहर की गलियों में वापस जाना चाहता है।
सच में, वो शहर बहुत-बहुत याद आता है।

नम्रता गुप्ता

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namrata gupta

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छोड़ आई हूँ मैं उस पुराने शहर को…
छोड़ आई हूँ मैं उस पुराने शहर को।
वो शहर अब मेरे लिए पुराना बन गया।
जिस शहर में बीत रहे थे सुकून भरे पल,
वो शहर मेरे लिए अचानक से अंजाना बन गया।

आ गई हूँ इस नए शहर में,
पर न जाने क्यों उस पुराने शहर से जुड़ी हर बात पल-पल याद आती है।
वो दोस्तों के साथ "चाय" कल्चर में शामें बिताना,
घूमना-फिरना, इतराना, इठलाना—सब कुछ बहुत याद आता है।
पता नहीं क्यों, पर कुछ तो बात है उस शहर में।

पीली टैक्सी, हावड़ा ब्रिज, बारिश के समय धुली हुई पुरानी इमारतें—उफ़! सब कुछ बहुत याद आता है।
भूल नहीं सकती मैं पूजा के समय बाज़ार की वो रौनक।
हर जगह फैली रहती थी रजनीगंधा की महक।
“दुर्गा एलो, दुर्गा एलो” से गूँजता था पूरा वातावरण।

हर समय मन उल्लास से भरा रहता था।
फिर से जीना चाहती हूँ उन पलों को,
फिर से घूमना चाहती हूँ उन गलियों में दोस्तों के साथ।
ये दिल फिर से उस शहर की गलियों में वापस जाना चाहता है।
सच में, वो शहर बहुत-बहुत याद आता है।

नम्रता गुप्ता

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