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आखिर चाहा क्या था?

आज ही के दिन... पहली बार बात हुई थी,
वो एक मासूम सा सिलसिला, जिसकी शुरुआत हुई थी।
दूजी मर्तबा मिले, तो न जाने कैसी बरसात हुई थी,
हम भीगते रहे वफ़ा की आस में, और जज्बातों की मात हुई थी।
तीजी बार जब आए वो, तो इस सूने घर में कुछ पल का साथ हुआ,
लगा मुकद्दर ने थाम लिया हाथ, पर वो तो बस छलावा एक रात हुआ।
चौथी दफ़ा मिलते ही... राहों में सिर्फ ठोकरों का सैलाब था,
टूट कर बिखर गया पल में, जो देखा आँखों ने ख्वाब था।
पांचवी बार भी... वही साज़िश, वही पुरानी घात हुई,
हम फिर अकेले रह गए, फिर वही तन्हा रात हुई।
वक्त की करवटों की तरह... हर बार उनकी जुबान पलटती रही,
मेरी सादगी उनके बदलते बयानों के आगे, बेबस घुटने टेकती रही।
सब कुछ गुज़र गया इस रिश्ते में... मगर,
लबों पर उनके ना आया, तो एक बार भी सच!
यह दिल आज भी ठहर कर पूछता है... आख़िर वो चाहते क्या थे?
क्या खुल के भी कभी बात हुई?
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