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ऐसा हूँ मैं

हुई हैं ग़लतियां बहुत
की हैं गुस्ताखियां बहुत
और उनसे बहुत सीखा हूँ मैं।
बहुत बिगड़ा, बहुत बिगड़ा
बहुत बिगड़ा हूँ
तब जाकर कहीं सुधरा हूँ मैं।
ये जो देख के मुझको लगता है ठीक हूँ
यकीं मानो बहुत टूटा,
बहुत बिखरा हूँ मैं।
तुम जो चाहे सोचो के बोलो मेरे बारे में
मुझे फर्क पड़ता है क्या
किसी के कहे में कहाँ चलता हूँ मैं।
वक़्त के साथ बदलती रही शख्सियत मेरी बेशक
मगर आज भी दिल का वही सच्चा हूं मैं।
मीनू यतिन
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