अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 21 June, 2023 : करो योग रहो निरोग

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 21 June, 2023 : करो योग रहो निरोग

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धनेश परमार

2 Sept 20249 min read

Published in perspectives

विश्वभर में 21 जून के दिन अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाता है। इस दिन योग के विस्तृत महत्व को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने का कार्य किया जाता है। आइए जानते हैं योग का महत्व।

योग किसी धर्म-संप्रदाय से जुड़ा हुआ नहीं है। योग प्रेम, अहिंसा, करुणा और सबको साथ लेकर चलने की बात करता है। योग धर्म, जाति, वर्ण, क्षेत्र या भाषा के आधार पर जन्मे भेदभाव से परे है, इसलिए इसमें पूरी दुनिया को एक परिवार के तौर पर बांधने की क्षमता है। यह सभी धर्मों से पहले अस्तित्व में आया और इसने मानव के सामने संभावनाओं को खोलने का काम किया, जिससे इंसान प्रकृति द्वारा तय की गई सीमाओं से परे जा सके।

आंतरिक व आत्मिक विकास, मानव कल्याण व मुक्ति से जुड़ा यह विज्ञान भावी पीढ़ी के लिए एक महानतम उपहार है। आज योग विज्ञान जितना महत्वपूर्ण है, इससे पहले यह कभी इतना महत्वपूर्ण नहीं रहा। क्योंकि आज हमारे पास विज्ञान और तकनीक के तमाम साधन मौजूद हैं, जो इस दुनिया को बना और मिटा सकते हैं। ऐसे में यह बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है कि हमारे भीतर जीवन के प्रति जागरूकता और ऐसा भाव बना रहे कि हम हर दूसरे प्राणी को अपना ही अंश महसूस कर सकें, वरना अपने सुख और भलाई के पीछे की हमारी दौड़ सब कुछ बर्बाद कर देगी।

अगर दुनिया की कुछ आबादी भी योग और ध्यान के मार्ग पर चलने लगे तो निश्चित तौर पर दुनिया की गुणवत्ता और स्तर में सुधार आएगा। जीवन के प्रति अपने दृष्टिकोण में विस्तार व व्यापकता लाने में ही मानव-जाति की सभी समस्याओं का समाधान है। उसे निजता से सार्वभौमिकता या समग्रता की ओर चलना होगा। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के आयोजन की घोषणा इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो इस पूरी धरती पर एक लहर पैदा कर सकता है। योग के बारे में संक्षिप्त जानकारी निम्नानुसार है :

 

योग के आठ अंग माने गए हैं और इसे अष्टांग योग भी कहते हैं।

यम       – सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य आदि

नियम     – शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय आदि

आसन     – विभिन्न मुद्राएं/आसन

प्राणायाम   – श्वास और प्रश्वास की गति को रोकना प्राणायाम कहलाता है।

प्रत्याहार    – इंद्रियों का विषय से हटकर एकाग्र हुए चित्त के स्वरूप का अनुसरण करना  प्रत्याहार है।

धारणा     – मन को एकाग्रचित्त करके ध्येय विषय पर लगाना पड़ता है। किसी एक विषय को ध्यान में बनाए रखना।

ध्यान      – किसी एक स्थान पर या वस्तु पर निरन्तर मन स्थिर होना ही ध्यान है।

समाधि     – यह चित्त की अवस्था है जिसमें चित्त ध्येय वस्तु के चिंतन में पूरी तरह लीन हो जाता है।

 

सामान्य रूप से कम समय में निम्न आसन और प्राणायाम करने से सभी लोग अपने आपको रोगों से दूर रख सकते हैं।

 

ताड़ासन करने के लाभ शरीर में महसूस होने वाला भारीपन दूर होता है। यह शरीर को फिट रखने में भी फायदेमंद है। रीढ़ को सीधा करने में ये काफी मददगार है। ताड़ासन से पूरी बॉडी फ्लेक्सिबल बनती है। इसे करने से पाचन संबंधी समस्याएं भी दूर होती हैं। लंबाई बढ़ाने में भी ताड़ासन फायदेमंद होता है। यह आसन बॉडी में रक्त संचार (ब्लड फ्लो) को बेहतर बनाता है।

वृक्षासन – वृक्षासन का मतलब है वृक्ष की मुद्रा में आसन करना। इस आसन को खड़े होकर किया जाता है। इसके अभ्यास से तनाव दूर होता है और पैरों एवं टखनों में लचीलापन आता है।

वज्रासन – वज्रासन बैठकर किए जाने वाला योग आसन है। ये आसन शरीर को सुडौल बनाने के लिए किया जाता है। अगर आपको पीठ और कमर दर्द की समस्या हो तो ये आसन काफी लाभदायक होगा।

भुजंग आसन – भुजंग आसन का रोज अभ्यास करने से कमर की परेशानियां दूर होती हैं। ये आसन पीठ और मेरूदंड के लिए लाभकारी होता है।

बालासन – बालासन आपके पूरे शरीर की थकान दूर करके आराम और ताजगी प्रदान करता है। बालासन पीठ दर्द और डिप्रेशन को दूर करता है। बालासन का अभ्यास मन को शांत करता है और तनाव कम करता है। बालासन का अभ्यास पाचनतंत्र को मजबूत करके पाचन शक्ति को बढ़ाता है। कूल्हे, जांघ और टख़ने का तनाव कम करता है। रीढ़ की हड्डी को मजबूत बनाता है। कब्ज की समस्या और गर्दन के दर्द को दूर करता है। बालासन के अभ्यास से आंतरिक अवयवों का मसाज होता है। 

अधोमुखी श्वान आसन – अधोमुखी का मतलब होता है नीचे की ओर सिर झुकाना। इस आसन में कुत्ते की तरह सिर को नीचे झुकाकर योग किया जाता है। इसलिए इसे अधोमुखी श्वान आसन कहा जाता है। आसन मुद्रा मेरूदंड को सीधा बनाए रखने में सहायक होता है। यह पैरों की मांसपेशियों के लिए अच्छा व्यायाम है।

शवासन – इस आसन को मृत शरीर जैसे निष्क्रिय होकर किया जाता है इसलिए इसे शवासन कहा जाता है। थकान एवं मानसिक परेशानी की स्थिति में यह आसन शरीर और मन को नई ऊर्जा देता है। ब्लड प्रेशर और ह्रदय रोग के दर्दियों के लिए शवासन करना काफी लाभदायक है। एवं मानसिक तनाव दूर करने के लिए भी यह आसन बहुत अच्छा होता है।

 

प्राणायाम

1. भस्त्रिका प्राणायाम : किसी भी आरामदायक आसन में बैठ जाएं। दोनों नॉस्ट्रिल्स से पूरी तेजी के साथ सांस अंदर लें। ऐसा महसूस हो जैसे फेफड़ों में सांस पूरा भर गया है। इसके फौरन बाद पूरी ताकत के साथ सांस को बाहर निकाल दें। भस्त्रिका प्राणायाम में सांस लेते हुए और निकालते हुए पूरी ताकत लगाना जरूरी है। बलपूर्वक सांस होना चाहिए। एक बार सांस भरना और निकालना, इस तरह के 20 राउंड लगातार लगाएं और उसके बाद कुछ देर आराम करें और फिर 20 राउंड का ही दूसरा सेट लगाएं। ऐसे तीन सेट लगा सकते हैं।

फायदे –  1. शरीर के टॉक्सिन को बाहर निकालने में मददगार है और सांस संबंधी बीमारियों को ठीक करता है। 2. शरीर में ऑक्सिजन की सप्लाई को बेहतर बनाता है और रक्त को शुद्ध करता है। कौन न करें – जिन लोगों को ह्रदय रोग हैं, हर्निया है और हाईबीपी है।

 

2. कपालभाति : सुखासन में बैठ जाएं और आंखें बंद कर लें। दोनों नॉस्ट्रिल से गहरी सांस भीतर लें। सीना फूलेगा। अब सांस को बलपूर्वक पूरी तरह से बाहर निकाल दें। सांस को बलपूर्वक बाहर निकालना है और पूरे आराम के साथ भीतर लेना है। इस तरह से 20 सांसें बिना रुके लेनी और निकालनी है। यह कपालभाति का एक राउंड हुआ। हर राउंड के बाद कुछ लंबे गहरे सांस लें और छोड़ें और उसके बाद दूसरे राउंड पर जाएं। ऐसे तीन राउंड कर सकते हैं।

फायदे 1. कफ संबंधी विकारों को दूर करने में बहुत सहायक है। 2. सर्दी, जुकाम, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस को ठीक करता है।

कौन न करें -जिन लोगों को ह्रदय रोग हैं, चक्कर आते हैं, वर्टिगो है, हाई बीपी रहता है, मिर्गी, माइग्रेन, हर्निया और गैस्ट्रिक अल्सर है, वे इसे न करें।

3. शीतली प्राणायाम : किसी भी आरामदायक आसन में बैठ जाएं। जीभ के टिप को नीचे वाले होंठ पर रख लें और उसे रोल करें। मुंह से सांस लें और सांस को रोककर रखें। अब मुंह को बंद कर लें और बाँए नाक से सांस बाहर निकाल दें। यह एक राउंड हुआ। शुरुआत में दो से तीन राउंड कर सकते हैं। बाद में इसे 15 तक बढ़ाया जा सकता है।

फायदे – 1. शरीर को ठंडा रखने में मददगार है। 2. एसिडिटी और हाइपरटेंशन को ठीक करता है।
कौन न करें – 1. सर्दी से पीड़ित लोगों को नहीं करना चाहिए। इस प्राणायाम को सर्दियों के मौसम में नहीं करना चाहिए।

4. अनुलोम विलोम (नाड़ी शोधन प्राणायाम) : अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधा और कंधों को ढीला छोडकर आराम से बैठें। एक कोमल मुस्कान अपने चेहरे पर रखें। अपने बाएँ हाथ को बाएँ घुटने पर रखें, हथेलीआकाश की ओर खुली या चिन मुद्रा में। (अंगूठा और तर्जनी हल्के छूते हूए)। तर्जनी और मध्यमा को दोनों भौहों के बीच में, अनामिका और छोटी उंगली को नाक के बाएँ नासिका पर और अंगूठे को दाहिनी नासिका पर रखें। बाएँ नासिका को खोलने और बंद करने के लिए हम अनामिका और छोटी उंगली का और दाएँ नासिका के लिए अंगूठे का उपयोग करेगें। अपने अंगूठे को दाईं नासिका पर धीरे से दबा कर बाईं नासिका से साँस बाहर निकालें। अब बाईं नासिका से साँस लीजिये और उसके बाद बाईं नासिका को अनामिका और छोटी उंगली के साथ धीरे से दबाएँ। दाहिने अंगूठे को दाईं नासिका से खोलकर दाईं नासिका से साँस बहार निकालें। दाईं नासिका से साँस लीजिये और बाईं ओर से साँस छोड़िए। अब आपने अनुलोम विलोम प्राणायाम का एक राउंड पूरा कर लिया है। एक के बाद एक नासिका से साँस लेना और छोड़ना जारी रखें। इस तरह बारी-बारी से दोनों नासिका के माध्यम से साँस लेते हुए 9 राउन्ड पूरा करें। हर साँस छोड़ने के बाद याद रखें कि उसी नासिका से साँस भरे जिस नासिका से साँस छोड़ी हो। अपनी आँखें पूर्णतः बंद रखें और किसी भी दबाव या प्रयास के बिना लंबी, गहरी और आरामदायक साँस लेना जारी रखें।

 

फायदे 1. तनाव और चिंता को कम करता है और प्राण शक्ति को बढ़ाता है। 2. कफ से संबंधित गड़बड़ियों को दूर करता है। 3. चित्त को शांत करता है और एकाग्रता को बढ़ाता है। 4. दिल को स्वस्थ रखता है, ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर करता है, फेफड़ों को ठीक रखता है और पाचन क्रिया को दुरुस्त करता है। कौन न करें – इसे सभी लोग कर सकते हैं।

 

5. भ्रामरी प्राणायाम : प्राणायाम शुरू करने से पहले शांतिपूर्ण, आरामदायक जगह पर कमल मुद्रा या आसान मुद्रा में बैठें। यदि आप बैठने में असहज महसूस करते है तो कुर्सी का इस्तेमाल कर सकते है। रीढ़ को पूरी तरह से सीधा रखे और आंखे बंद करें। नाक से गहरा सांस अंदर लें। दोनों हाथों के अंगूठों को कान के भीतर डालें। और हाथों कि पहली दोनों उंगलियों (तर्जनी) को माथे पर रखे और अन्य उंगलियों को बंद आंखों पर रखें। मुंह को बंद रखते हुई, सांस को बाहर निकलते हुए ओम का उच्चारण करें जिसे हममममम ध्वनि उत्पन्न होगी। 11 से ले कर 21 बार इसका अभ्यास कर सकते है। दिन के किसी भी समय, खाली पेट इसका अभ्यास किया सकता हैं।

फायदे – गुस्सा और बेचैनी को कम करता है और तनाव से छुटकारा दिलाता है। मन शांत हो जाता है। कौन न करें – जिन लोगों को नाक या कान का इंफेक्शन है।

ये सारे प्राणायाम आप 10 मिनट में भी कर सकतें हैं। यहां आप 1 मिनट डीप ब्रीदिंग (भस्त्रिका), 3 मिनट कपालभाति, 3 मिनट अनुलोम-विलोम-3 बार भ्रामरी और 3 बार उदगित (ओम उच्चारण) कर लें।

 

आप सभी को विश्व योग दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

करो योग रहो निरोग

 

धनेश परमार “परम”

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विश्वभर में 21 जून के दिन अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाता है। इस दिन योग के विस्तृत महत्व को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने का कार्य किया जाता है। आइए जानते हैं योग का महत्व।

योग किसी धर्म-संप्रदाय से जुड़ा हुआ नहीं है। योग प्रेम, अहिंसा, करुणा और सबको साथ लेकर चलने की बात करता है। योग धर्म, जाति, वर्ण, क्षेत्र या भाषा के आधार पर जन्मे भेदभाव से परे है, इसलिए इसमें पूरी दुनिया को एक परिवार के तौर पर बांधने की क्षमता है। यह सभी धर्मों से पहले अस्तित्व में आया और इसने मानव के सामने संभावनाओं को खोलने का काम किया, जिससे इंसान प्रकृति द्वारा तय की गई सीमाओं से परे जा सके।

आंतरिक व आत्मिक विकास, मानव कल्याण व मुक्ति से जुड़ा यह विज्ञान भावी पीढ़ी के लिए एक महानतम उपहार है। आज योग विज्ञान जितना महत्वपूर्ण है, इससे पहले यह कभी इतना महत्वपूर्ण नहीं रहा। क्योंकि आज हमारे पास विज्ञान और तकनीक के तमाम साधन मौजूद हैं, जो इस दुनिया को बना और मिटा सकते हैं। ऐसे में यह बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है कि हमारे भीतर जीवन के प्रति जागरूकता और ऐसा भाव बना रहे कि हम हर दूसरे प्राणी को अपना ही अंश महसूस कर सकें, वरना अपने सुख और भलाई के पीछे की हमारी दौड़ सब कुछ बर्बाद कर देगी।

अगर दुनिया की कुछ आबादी भी योग और ध्यान के मार्ग पर चलने लगे तो निश्चित तौर पर दुनिया की गुणवत्ता और स्तर में सुधार आएगा। जीवन के प्रति अपने दृष्टिकोण में विस्तार व व्यापकता लाने में ही मानव-जाति की सभी समस्याओं का समाधान है। उसे निजता से सार्वभौमिकता या समग्रता की ओर चलना होगा। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के आयोजन की घोषणा इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो इस पूरी धरती पर एक लहर पैदा कर सकता है। योग के बारे में संक्षिप्त जानकारी निम्नानुसार है :

 

योग के आठ अंग माने गए हैं और इसे अष्टांग योग भी कहते हैं।

यम       – सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य आदि

नियम     – शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय आदि

आसन     – विभिन्न मुद्राएं/आसन

प्राणायाम   – श्वास और प्रश्वास की गति को रोकना प्राणायाम कहलाता है।

प्रत्याहार    – इंद्रियों का विषय से हटकर एकाग्र हुए चित्त के स्वरूप का अनुसरण करना  प्रत्याहार है।

धारणा     – मन को एकाग्रचित्त करके ध्येय विषय पर लगाना पड़ता है। किसी एक विषय को ध्यान में बनाए रखना।

ध्यान      – किसी एक स्थान पर या वस्तु पर निरन्तर मन स्थिर होना ही ध्यान है।

समाधि     – यह चित्त की अवस्था है जिसमें चित्त ध्येय वस्तु के चिंतन में पूरी तरह लीन हो जाता है।

 

सामान्य रूप से कम समय में निम्न आसन और प्राणायाम करने से सभी लोग अपने आपको रोगों से दूर रख सकते हैं।

 

ताड़ासन करने के लाभ शरीर में महसूस होने वाला भारीपन दूर होता है। यह शरीर को फिट रखने में भी फायदेमंद है। रीढ़ को सीधा करने में ये काफी मददगार है। ताड़ासन से पूरी बॉडी फ्लेक्सिबल बनती है। इसे करने से पाचन संबंधी समस्याएं भी दूर होती हैं। लंबाई बढ़ाने में भी ताड़ासन फायदेमंद होता है। यह आसन बॉडी में रक्त संचार (ब्लड फ्लो) को बेहतर बनाता है।

वृक्षासन – वृक्षासन का मतलब है वृक्ष की मुद्रा में आसन करना। इस आसन को खड़े होकर किया जाता है। इसके अभ्यास से तनाव दूर होता है और पैरों एवं टखनों में लचीलापन आता है।

वज्रासन – वज्रासन बैठकर किए जाने वाला योग आसन है। ये आसन शरीर को सुडौल बनाने के लिए किया जाता है। अगर आपको पीठ और कमर दर्द की समस्या हो तो ये आसन काफी लाभदायक होगा।

भुजंग आसन – भुजंग आसन का रोज अभ्यास करने से कमर की परेशानियां दूर होती हैं। ये आसन पीठ और मेरूदंड के लिए लाभकारी होता है।

बालासन – बालासन आपके पूरे शरीर की थकान दूर करके आराम और ताजगी प्रदान करता है। बालासन पीठ दर्द और डिप्रेशन को दूर करता है। बालासन का अभ्यास मन को शांत करता है और तनाव कम करता है। बालासन का अभ्यास पाचनतंत्र को मजबूत करके पाचन शक्ति को बढ़ाता है। कूल्हे, जांघ और टख़ने का तनाव कम करता है। रीढ़ की हड्डी को मजबूत बनाता है। कब्ज की समस्या और गर्दन के दर्द को दूर करता है। बालासन के अभ्यास से आंतरिक अवयवों का मसाज होता है। 

अधोमुखी श्वान आसन – अधोमुखी का मतलब होता है नीचे की ओर सिर झुकाना। इस आसन में कुत्ते की तरह सिर को नीचे झुकाकर योग किया जाता है। इसलिए इसे अधोमुखी श्वान आसन कहा जाता है। आसन मुद्रा मेरूदंड को सीधा बनाए रखने में सहायक होता है। यह पैरों की मांसपेशियों के लिए अच्छा व्यायाम है।

शवासन – इस आसन को मृत शरीर जैसे निष्क्रिय होकर किया जाता है इसलिए इसे शवासन कहा जाता है। थकान एवं मानसिक परेशानी की स्थिति में यह आसन शरीर और मन को नई ऊर्जा देता है। ब्लड प्रेशर और ह्रदय रोग के दर्दियों के लिए शवासन करना काफी लाभदायक है। एवं मानसिक तनाव दूर करने के लिए भी यह आसन बहुत अच्छा होता है।

 

प्राणायाम

1. भस्त्रिका प्राणायाम : किसी भी आरामदायक आसन में बैठ जाएं। दोनों नॉस्ट्रिल्स से पूरी तेजी के साथ सांस अंदर लें। ऐसा महसूस हो जैसे फेफड़ों में सांस पूरा भर गया है। इसके फौरन बाद पूरी ताकत के साथ सांस को बाहर निकाल दें। भस्त्रिका प्राणायाम में सांस लेते हुए और निकालते हुए पूरी ताकत लगाना जरूरी है। बलपूर्वक सांस होना चाहिए। एक बार सांस भरना और निकालना, इस तरह के 20 राउंड लगातार लगाएं और उसके बाद कुछ देर आराम करें और फिर 20 राउंड का ही दूसरा सेट लगाएं। ऐसे तीन सेट लगा सकते हैं।

फायदे –  1. शरीर के टॉक्सिन को बाहर निकालने में मददगार है और सांस संबंधी बीमारियों को ठीक करता है। 2. शरीर में ऑक्सिजन की सप्लाई को बेहतर बनाता है और रक्त को शुद्ध करता है। कौन न करें – जिन लोगों को ह्रदय रोग हैं, हर्निया है और हाईबीपी है।

 

2. कपालभाति : सुखासन में बैठ जाएं और आंखें बंद कर लें। दोनों नॉस्ट्रिल से गहरी सांस भीतर लें। सीना फूलेगा। अब सांस को बलपूर्वक पूरी तरह से बाहर निकाल दें। सांस को बलपूर्वक बाहर निकालना है और पूरे आराम के साथ भीतर लेना है। इस तरह से 20 सांसें बिना रुके लेनी और निकालनी है। यह कपालभाति का एक राउंड हुआ। हर राउंड के बाद कुछ लंबे गहरे सांस लें और छोड़ें और उसके बाद दूसरे राउंड पर जाएं। ऐसे तीन राउंड कर सकते हैं।

फायदे 1. कफ संबंधी विकारों को दूर करने में बहुत सहायक है। 2. सर्दी, जुकाम, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस को ठीक करता है।

कौन न करें -जिन लोगों को ह्रदय रोग हैं, चक्कर आते हैं, वर्टिगो है, हाई बीपी रहता है, मिर्गी, माइग्रेन, हर्निया और गैस्ट्रिक अल्सर है, वे इसे न करें।

3. शीतली प्राणायाम : किसी भी आरामदायक आसन में बैठ जाएं। जीभ के टिप को नीचे वाले होंठ पर रख लें और उसे रोल करें। मुंह से सांस लें और सांस को रोककर रखें। अब मुंह को बंद कर लें और बाँए नाक से सांस बाहर निकाल दें। यह एक राउंड हुआ। शुरुआत में दो से तीन राउंड कर सकते हैं। बाद में इसे 15 तक बढ़ाया जा सकता है।

फायदे – 1. शरीर को ठंडा रखने में मददगार है। 2. एसिडिटी और हाइपरटेंशन को ठीक करता है।
कौन न करें – 1. सर्दी से पीड़ित लोगों को नहीं करना चाहिए। इस प्राणायाम को सर्दियों के मौसम में नहीं करना चाहिए।

4. अनुलोम विलोम (नाड़ी शोधन प्राणायाम) : अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधा और कंधों को ढीला छोडकर आराम से बैठें। एक कोमल मुस्कान अपने चेहरे पर रखें। अपने बाएँ हाथ को बाएँ घुटने पर रखें, हथेलीआकाश की ओर खुली या चिन मुद्रा में। (अंगूठा और तर्जनी हल्के छूते हूए)। तर्जनी और मध्यमा को दोनों भौहों के बीच में, अनामिका और छोटी उंगली को नाक के बाएँ नासिका पर और अंगूठे को दाहिनी नासिका पर रखें। बाएँ नासिका को खोलने और बंद करने के लिए हम अनामिका और छोटी उंगली का और दाएँ नासिका के लिए अंगूठे का उपयोग करेगें। अपने अंगूठे को दाईं नासिका पर धीरे से दबा कर बाईं नासिका से साँस बाहर निकालें। अब बाईं नासिका से साँस लीजिये और उसके बाद बाईं नासिका को अनामिका और छोटी उंगली के साथ धीरे से दबाएँ। दाहिने अंगूठे को दाईं नासिका से खोलकर दाईं नासिका से साँस बहार निकालें। दाईं नासिका से साँस लीजिये और बाईं ओर से साँस छोड़िए। अब आपने अनुलोम विलोम प्राणायाम का एक राउंड पूरा कर लिया है। एक के बाद एक नासिका से साँस लेना और छोड़ना जारी रखें। इस तरह बारी-बारी से दोनों नासिका के माध्यम से साँस लेते हुए 9 राउन्ड पूरा करें। हर साँस छोड़ने के बाद याद रखें कि उसी नासिका से साँस भरे जिस नासिका से साँस छोड़ी हो। अपनी आँखें पूर्णतः बंद रखें और किसी भी दबाव या प्रयास के बिना लंबी, गहरी और आरामदायक साँस लेना जारी रखें।

 

फायदे 1. तनाव और चिंता को कम करता है और प्राण शक्ति को बढ़ाता है। 2. कफ से संबंधित गड़बड़ियों को दूर करता है। 3. चित्त को शांत करता है और एकाग्रता को बढ़ाता है। 4. दिल को स्वस्थ रखता है, ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर करता है, फेफड़ों को ठीक रखता है और पाचन क्रिया को दुरुस्त करता है। कौन न करें – इसे सभी लोग कर सकते हैं।

 

5. भ्रामरी प्राणायाम : प्राणायाम शुरू करने से पहले शांतिपूर्ण, आरामदायक जगह पर कमल मुद्रा या आसान मुद्रा में बैठें। यदि आप बैठने में असहज महसूस करते है तो कुर्सी का इस्तेमाल कर सकते है। रीढ़ को पूरी तरह से सीधा रखे और आंखे बंद करें। नाक से गहरा सांस अंदर लें। दोनों हाथों के अंगूठों को कान के भीतर डालें। और हाथों कि पहली दोनों उंगलियों (तर्जनी) को माथे पर रखे और अन्य उंगलियों को बंद आंखों पर रखें। मुंह को बंद रखते हुई, सांस को बाहर निकलते हुए ओम का उच्चारण करें जिसे हममममम ध्वनि उत्पन्न होगी। 11 से ले कर 21 बार इसका अभ्यास कर सकते है। दिन के किसी भी समय, खाली पेट इसका अभ्यास किया सकता हैं।

फायदे – गुस्सा और बेचैनी को कम करता है और तनाव से छुटकारा दिलाता है। मन शांत हो जाता है। कौन न करें – जिन लोगों को नाक या कान का इंफेक्शन है।

ये सारे प्राणायाम आप 10 मिनट में भी कर सकतें हैं। यहां आप 1 मिनट डीप ब्रीदिंग (भस्त्रिका), 3 मिनट कपालभाति, 3 मिनट अनुलोम-विलोम-3 बार भ्रामरी और 3 बार उदगित (ओम उच्चारण) कर लें।

 

आप सभी को विश्व योग दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

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