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यलगार हो
ये कहानी है शौर्य की। बचपन से ही उसे कुछ ऐसा करने की ललक थी, जिसे याद रखा जाए। उसने सैकड़ों वीरगाथाएँ पढ़ी थीं और देश के लिए कुछ कर गुजरने का जुनून उसके भीतर बहुत पहले जन्म ले चुका था।
एक बार की घटना है—
शौर्य करीब पंद्रह-सोलह वर्ष का होगा। उसे नीतिशास्त्र की किताबें पढ़ने का शौक था।
वो काफी बीमार था। उसके पिता उसे अपने साथ एक सरकारी अस्पताल ले गए थे। लंबी कतार लगी थी। उसके पिता ने एक कंपाउंडर को पास बुलाकर पचास रुपये का नोट उसकी ऊपर वाली जेब में डाल ही रहे थे कि शौर्य ने देख लिया। उसने अपने पिता की कलाई पकड़ ली।
“पापा, आप पैसे क्यों दे रहे हैं? इतने लोग लाइन में खड़े हैं। उनका नंबर भी तो आएगा।”
फिर उसने कंपाउंडर की ओर देखा। “तुम कौड़ियों के भाव अपना ईमान बेच रहे हो। क्या इसी के लिए तुम्हें देश सेवा के लिए रखा गया था?”
उस घटना के बाद उसके पिता ने कभी कोई छोटा-मोटा घूस या चाय किसी बाबू को शौर्य के सामने नहीं पिलाई।
शौर्य बड़ा होकर आर्मी ऑफिसर बनकर देश की रक्षा करना चाहता था। पर शायद किस्मत को कुछ और मंजूर था। स्कूल जाते समय एक कार दुर्घटना में उसका एक पैर चोटिल हो गया। उस चोट ने उसके पैर का संतुलन बिगाड़ दिया था| पैर थोडा-सा टेढ़ा हो गया था और चलते वक्त उसका कदम सामान्य नहीं पड़ता था| दौड़ना तो लगभग नामुमकिन ही था| वह जानता था कि इसी पैर की वजह से अब वह सेना की वर्दी नहीं पहन सकेगा- जिसका सपना उसने बचपन से देखा था| पर उसका हौसला नहीं टूटा। उसने जी-तोड़ पढ़ाई की और प्रथम प्रयास में ही राज्य सरकार की सहकारी सेवा में लेखापरीक्षक के पद पर उसका चयन हो गया। उसका काम सहकारी समितियों के दस्तावेजों की जाँच करना और उनमें व्याप्त भ्रष्टाचार से राज्य सरकार को अवगत कराना था।
नौकरी में योगदान देने का दिन था। शौर्य सुबह पाँच बजे से ही तैयारी में लगा हुआ था। उसने अपनी नई फॉर्मल कमीज़ और पैंट इस्त्री कर ली थी, जूते पॉलिश कर लिए थे और बालों को बार-बार सँवार रहा था। वह चाहता था कि कार्यालय में उसके आने से यह साफ दिखे कि कोई सभ्य और अपने काम के प्रति निष्ठावान अधिकारी आया है।
उसने किताबों में पढ़ा था कि अधिकारी अपने अधीनस्थ कर्मचारियों पर धौंस जमाते हैं और अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल करते हैं। शौर्य ऐसा अधिकारी नहीं बनना चाहता था।
पूछते-पाछते शौर्य अपने कार्यालय के दरवाजे तक पहुँच चुका था। लेकिन वहाँ का नज़ारा देखकर उसका उत्साह थोड़ा कम हो गया।
कार्यालय की दीवारें टूटी-फूटी थीं। रंगाई-पुताई मानो वर्षों से नहीं हुई थी। लॉबी में घास दीवारों से भी ऊँची हो चली थी।
शौर्य इधर-उधर देख ही रहा था कि कार्यालय के भीतर से एक भारी-भरकम आवाज़ गरजी—
“ए कौन है जी? काहे इधर ताका-झाँकी कर रहा है? सरकारी कार्यालय में ताका-झाँकी करने पर जेल जाने का इरादा है क्या?”
शौर्य सहम गया। उसने खुद को सँभालते हुए कहा, “मैं नौकरी ज्वॉइन करने आया हूँ।”
“वो, अच्छा! आइए सर, हम आते हैं।”
एक मोटा आदमी सामने आया। दाढ़ी के बाल पककर सफेद हो चुके थे और कमीज़ के भीतर का सफेद बनियान दो बटनों के बीच से इस तरह झाँक रहा था, मानो वह भी उस नए आदमी को देखने को बेचैन हो। उसने उसके टेढ़े पैर को देखा, पर कुछ कहा नहीं|
“आप बैठिए सर, हम बड़ा बाबू को बुला कर लाते है।"
शौर्य ने कमरे के चारों ओर देखा। खिड़की का एक पल्ला टूटा हुआ था। भीतर की छत जर्जर थी। लकड़ी की अलमारी के ऊपर लाल कपड़े में बँधी फाइलें धूल से सनी पड़ी थीं, मानो वर्षों से किसी ने उन्हें छुआ तक न हो। जिस कुर्सी पर वह बैठा था, उसके हत्थे पर उँगली फेरते ही उसकी उँगली पर मिट्टी की मोटी तह जम गई।
“प्रणाम सर। हम बड़ा बाबू हुए ऑफिस के।”
“मेरा कैबिन कहाँ है?” शौर्य ने पूछा।
“सर, जो है, यही है। एक रूम में हम और बाकी स्टॉफ बैठते हैं। एक रूम और है, जिसमें कबाड़ी का सामान भरा पड़ा है।”
बड़ा बाबू ने अपनी हथेली में मली हुई चीज़ शौर्य की ओर बढ़ाई।
“ये क्या है?” शौर्य ने असहज होकर पूछा।
“खैनी है सर। लीजिए।”
“मैं नहीं खाता हूँ।” शौर्य ने अपने क्रोध को दबाते हुए कहा।
“खैनी नहीं खाते हैं? ऊपर क्या जवाब दीजिएगा सर?” बड़ा बाबू हँसते हुए हाथ वापस खींच लिया।
शौर्य का क्रोध आँखों की नमी में बदल गया। पहले ही दिन उसे समझ आ गया था कि यहाँ मामला उसकी किताबों से अलग है।
उसने कार्यालय में कुछ बदलाव शुरू किए। सफाई के लिए जब उसने क्लर्क से पूछा तो जवाब मिला कि सरकार की ओर से कोई फंड उपलब्ध नहीं कराया जाता। शौर्य ने अपनी पहली तनख्वाह के कुछ हिस्से से पूरा कार्यालय साफ करवा दिया। लेकिन कर्मचारियों की प्रतिक्रिया देखकर उसे समझ आ गया कि पुरानी अव्यवस्था उनकी आदत बन चुकी थी।
जो पेडिंग पड़ी फाइलें धूल खा रही थी, उसका निबटारा उसने जल्दी- जल्दी करना शुरू किया। कार्यालय के बाबुओं ने उन्हें सलाह दी कि सर, अगर फाइलें बिना आदमी से मिले निबटा देंगे, तो वो आपको न तो भाव देगा और न ही मिलने आयेगा।
शौर्य ने कहा, “उसका मिलना जरूरी नहीं है। उसका काम होना जरूरी है।”
शायद बाबुओं का इशारा वह अभी पूरी तरह समझ नहीं पा रहा था।
एक दिन कार्यालय के दूसरे कमरे से एक तीव्र गंध शौर्य के नाक में गई। शौर्य ने घंटी बजा कर अपने चपरासी को बुलाना चाहा। पर ये रोज़ का था। घंटी बजती रहती, पर चपरासी 4-5 घंटी से पहले सुनते कहा थे। हालाँकि शौर्य को घंटी का होना भी ब्रिटिश हुकूमनामा द्वारा छोड़ी गई प्रथा का एक अंश प्रतीत होता था। वह इस प्रथा को भी हटाना चाहता था, पर वो इस बात से डरा हुआ था कि शुरू में ही बहुत छूट देना उसके लिए ही उल्टा न पड़ जाए।
आखिर शौर्य खुद दूसरे कमरे की ओर चल पड़ा। दरवाजा खुलते ही धुएँ का गुबार उसके चेहरे से टकराया। कमरे में बैठे कर्मचारी उसे देखते ही कागज़ के रोल पैर से बुझाने लगे।
अगले दिन शौर्य ने कार्यालय में मादक पदार्थों के प्रयोग पर रोक लगाते हुए प्रशासनिक कार्रवाई का आदेश जारी कर दिया।
इसके बाद उसने देर से आने वाले कर्मचारियों की छुट्टी काटनी शुरू कर दी। एक-दो कर्मचारियों को छोड़कर लगभग सबकी हाजिरी प्रभावित हो चुकी थी। अगले दिन एक कर्मचारी जो एक फ़ाइल को काफी दिनों से लटका कर रखे थे, उस पर शौर्य ने उसे खूब डाटा और उसे निलंबित करने की धमकी दे दी।
उसके इन कार्यों ने आग में घी का काम किया। कर्मचारीगण पहले शौर्य के कमरे में आए और खूब हंगामा किया और फिर कार्यालय के बाहर धरने पर बैठ गए।
कार्यालय के बाहर से कर्मचारियों का हो - हल्ला साफ़- साफ़ सुनाई दे रहा था।
“बड़े आए अधिकारी बनकर। चार दिन नौकरी का नहीं हुआ, इंग्लिश बतियाने लगे हैं।”
“पैर से टेढ़े तो है ही, लगता है अब दिमाग में भी हो गए है..”
शौर्य पहली बार सचमुच घबरा गया। किताबों में पढ़े नियमों से वह परिचित था; नियमों के खिलाफ खड़े लोगों से निपटने का अनुभव उसके पास नहीं था।
तभी बाहर एक गाड़ी रुकने की आवाज़ आई। कुछ ही क्षणों में सारे कर्मचारी चुपचाप अपने स्थानों पर लौट आए।
खादी के भूरे यूनिफॉर्म में एक आदमी शौर्य के पास आया।
उस आदमी ने अहंकार से भरे आवाज़ में बताया कि वो उपायुक्त (डीसी) का बाबू है और वो इलेक्शन ड्यूटी का तामिला लेकर आया है ।
उस आदमी की आवाज़ में ऐसा अधिकार था, मानो वह स्वयं उपायुक्त हो। उपायुक्त कार्यालय का एक बाबू भी खुद को डीसी से कम थोड़ी समझता है—यह बात शौर्य ने अब तक सुनी थी, अब देख भी ली थी।
तामिला पढ़ते ही शौर्य की आँखें चमक उठीं। उसकी चुनाव में बतौर लेखापरीक्षक ड्यूटी लग गई थी। उसका काम था चुनाव लड़ रही पार्टियों के खर्चों की जाँच करना और यह देखना कि कहीं वे निर्वाचन आयोग द्वारा तय सीमा से अधिक या अवैध रूप से खर्च तो नहीं कर रहीं।
शौर्य दो बातों से खुश था। पहली, कार्यालय के विवाद से कुछ दिन दूर रहने का मौका मिल गया था। दूसरी, जिस संविधान की उसने किताबों में पूजा की थी, उसी संविधान की व्यवस्था में जनता के प्रतिनिधि चुनने की प्रक्रिया का हिस्सा बनने का अवसर उसे मिला था।
अगले दिन वह समय पर जिला कार्यालय पहुँच गया। वहाँ अलग-अलग विभागों के तीन अधिकारियों को लेखापरीक्षक नियुक्त किया गया था और प्रत्येक के अधीन तीन बाबू लगाए गए थे।
पूरे कमरे में चुनाव की ही बातें थीं। 'लोकतंत्र के महापर्व' का हिस्सा बनकर शौर्य फिर उत्साहित था।
काम सुबह दस बजे से शाम छह बजे तक था, लेकिन अक्सर इससे आगे खिंच जाता। बीच में कार्यालय से बाहर जाने की अनुमति नहीं थी, इसलिए खाने और चाय-पानी का इंतजाम वहीं था।
पहले दिन करीब ढाई बजे खाने का समय हुआ। शौर्य ने अपने नए बने दोस्तों के साथ हॉल में बैठकर खाना खाया। भिंडी की भुजिया, मिक्स वेज, चावल, रोटी, धनिया की चटनी, सलाद और पापड़ देखकर सब खुश थे। खाना स्वादिष्ट था और सभी ने कैटरर की तारीफ की।
दिन बीतते गए। करीब एक सप्ताह बाद प्लेट से कुछ सब्जियाँ कम होने लगीं। सलाद अब माँगने पर मिलता था। धनिया की चटनी गायब हो गई। शायद धनिया का भाव इतना बढ़ गया था कि उसके लिए किसी अंतरराष्ट्रीय युद्ध को जिम्मेदार ठहराना ही आसान था। सब्जियों का स्वाद भी धीरे-धीरे कम होता गया।
शौर्य चुनाव के कार्य अच्छे से समझ कर करने लगा था। उसने बहुत सारी गलतियाँ पकड़ी। उसने ये देखा कि एक पार्टी चुनाव में बहुत अधिक खर्च कर रही थी। उसने उसके दस्तावेजों और विजिलेंस टीम से मिली रिपोर्ट की जाँच की और उसे पता चला कि चुनाव आयोग द्वारा खर्च की लिमिट के आस - पास खर्च पहुंच चुका था, जबकि चुनाव प्रचार अभी भी 15-20 दिनों का बाकी था। शौर्य ने साथ नियुक्त दूसरे लेखापरीक्षकों से इस बारे में बात की, जो की उसके उम्र से 15-20 साल के बड़े होंगे। उन्होंने कंधे उचकाकर कहा, “इतना नियम-कानून से काम नहीं चलता है। चुनाव है, खर्चा तो होगा ही।”
शौर्य सहमत नहीं था। उसके लिए लोकतंत्र का अर्थ था कि सबको बराबरी का मौका मिले। जो व्यक्ति धन के बल पर चुनाव का रुख मोड़ सकता है, वह उस व्यक्ति पर भारी नहीं पड़ना चाहिए जिसके पास केवल देश की सेवा करने का जज़्बा है।
जब दूसरे अधिकारी उसकी बात से सहमत नहीं हुए तो उसने अपने उच्चाधिकारी को इसकी जानकारी दी। उन्होंने उसकी बात सुनी, हामी भरी और उसके काम की सराहना की। शौर्य खुश था।
अगले ही दिन बहुत सारे लोग वहाँ आ धमके|
“का हो बाबू! हमनी नियर गरीब-गुरबा के सतावे में रउआ बड़ी आनंद मिलेला का? छोट लोग के तंग कइ के का साबित कइल चाहत बानी?”
शौर्य ने आधी-अधूरी बात समझते हुए कहा, “मैंने कहाँ किसी को सताया?”
“अरे वाह रे बाबू! अगर ई सतावल ना हऽ, तऽ हमार पार्टी के प्रतिनिधि के खरचा काहे आसमान छुअत बा हो? बाकी लोगन के खरचा कम, अउर हमनी के पाई-पाई के हिसाब दुगुना-तिगुना देखावल जा रहल बा!”
वो लोग काफ़ी हो - हंगामा करने लगे। शौर्य के साथ प्रतिनियुक्त अन्य लेखापरीक्षक और उनके बाबूओं के द्वारा उन्हें बहला - फुसला कर वहाँ से निकाला।
शौर्य समझ नहीं पा रहा था कि जो बातें कुछ ही लोगों को बताई गई थीं, वे पार्टी के लोगों तक कैसे पहुँचीं। पहली बार उसे अपने ही उच्चाधिकारी पर शक हुआ।
एक लेखापरीक्षक ने शौर्य के कंधे पर हाथ रखा। “देखा! बोला था न आपको कि इन पचड़ों में मत पड़िए। अगर आपके पीछे ये लोग पड़ गए तो चुनाव के बाद भी आपको नहीं छोड़ेंगे, ये मैं अपने अनुभवों से बता रहा हूँ।”
शौर्य चुप रहा। उसे पहली बार लगा कि नियमों की किताब और उन्हें लागू करने की दुनिया के बीच शायद बहुत लंबी दूरी है। उसे ये भी लगने लगा था कि जिन सहकर्मियों को वो निठल्ला और कामचोर समझ रहा था, शायद वो भी युवा अवस्था में उसके जैसे ही जोशीले होंगे|
कुछ दिनों बाद उसमें चिड़चिड़ापन आने लगा। नीतिशास्त्र के पन्नों को वास्तविक जीवन में निभाना उसे अब टेढ़ी खीर लगने लगा था। पर उसने इन चीजों को दिमाग से निकाल दिया|
जिला कार्यालय के खाने का स्वाद भी बद से बदतर होता जा रहा था। एक दिन उससे रहा नहीं गया। उसने चुनाव के उच्चाधिकारी को इसकी सूचना दी, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली।
शौर्य ने स्वतंत्रता सेनानियों को याद किया। उसने तय किया कि वह खराब खाने के लिए उपायुक्त को लिखित शिकायत करेगा। उसके लिए चुप रहना समस्या का समाधान नहीं था। उसने उद्घोषणा की कि बर्दाश्त करने से चीज़ें नहीं सुधरेगी, उसके लिए आवाज़ उठाना ही पड़ता है। हालाँकि वहाँ के खाने से सब स्तब्ध थे, पर किसी ने इसके लिए आवाज़ नहीं उठाई थी। शौर्य का भी आवाज़ उठाना उनलोगों को सही नहीं लग रहा था।
पर जब शिकायती चिट्ठी तैयार कर शौर्य ने सबको हस्ताक्षर करने को कहा तो सबने अनमने मन से हस्ताक्षर कर दिए। चिट्ठी तैयार थी और उसे उपायुक्त कार्यालय में भेज दिया गया।
करीब एक सप्ताह बाद जब शौर्य सुबह जिला कार्यालय में पहुंचा तो देखा कि लोग उसे देखकर मुस्कुरा रहे है| तभी उसके सह नियुक्त लेखापरीक्षकों ने हाथ मिलाते हुए उसे बधाई देते हुए कहा, "आपने तो कमाल कर दिया। आपने वो कर दिखाया, जो आज तक किसी ने करने की सोची भी नहीं।"
उनलोगों ने बताया कि उपायुक्त ने पुराने कैटरर का कॉन्ट्रैक्ट निरस्त कर दिया था और दूसरे कैटरर को खाना बनाने का ठेका दे दिया था।
शौर्य की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उस कमरे में लोग उसे ‘नायक’ की तरह देख रहे थे। वह भी खुश था। उसे भरोसा हो गया था कि न्याय मिलने में समय लग सकता है, लेकिन न्याय का गला नहीं घोंटा जा सकता।
नया कैटरर दो दिन बाद से काम सँभालने वाला था।
इसी बीच पार्टियों के चुनावी खर्चों के लेखामिलान का समय आ गया। शौर्य की कई पार्टियों के प्रतिनिधियों से कहासुनी हुई।
तभी चुनाव आयोग द्वारा नियुक्त इलेक्शन ऑब्जर्वर भी पहुँच गए। शौर्य ने उन्हें एक पार्टी के अधिक खर्च की बात बेबाकी से बताई।
इलेक्शन आब्जर्वर ने चुनाव में प्रतिनियुक्त अधिकारियों को बुला कर पार्टी प्रतिनिधि को इसकी जानकारी देने की बात कहते हुए कहा, “उनको बोलिए खर्च कम करें और अपने विजिलेंट टीम को भी समझाइए कि उनके कुछ खर्चें कम दिखाएं। मैं नहीं चाहता हूँ कि खर्च ज्यादा दिखे और चुनाव के बाद भी लिखा - पढ़ी करने में हमें समस्या हो।“
शौर्य को उनकी बात अटपटी लगी। लेकिन अब उसे पैटर्न दिखाई देने लगा था। चुनाव हो या सरकारी काम—कोई किसी झमेले में नहीं पड़ना चाहता था। उसे अब अपनी अपंगता कम, और सिस्टम की अपंगता ज्यादा खल रही थी|
फिर भी शौर्य खुश था। उसे लगा कि खाने वाले मामले में उसने जो किया, उससे लोग दूसरी गलत बातों के खिलाफ भी आवाज़ उठाएँगे। सिस्टम एक दिन में चुस्त-दुरुस्त नहीं होता। छोटे-छोटे कदम उठाने पड़ते हैं।
दो दिन बाद सब उत्साह से खाने के लिए बढ़े। लेकिन गेट पर पहुँचते ही उन्हें रोक दिया गया। उनसे खाने का टोकन माँगा गया। आज तक टोकन की जरूरत नहीं पड़ी थी।
लोग उधेड़बुन में पड़ गए। वे जिला कार्यालय के बड़ा बाबू से मिलने गए। शौर्य उनके साथ नहीं गया। उसे किसी षड्यंत्र की बू आ रही थी।
कुछ देर बाद लौटे लोगों के मायूस चेहरों को देखकर शौर्य समझ गया कि मामला सचमुच गड़बड़ है।
उन्हें बताया गया कि उच्चाधिकारी ने खर्च को देखते हुए फैसला किया है—अब भोजन केवल फील्ड में जाने वाले कर्मचारियों को मिलेगा। जो लोग कार्यालय में बैठकर लेखा और विजिलेंस का काम कर रहे हैं, वे अपने घर से खाना लाएँगे। उन्हें कोई टोकन नहीं मिलेगा।
सारे लोग अपने 'नायक' की ओर आस लगाए देख रहे थे। शायद उन्हें उम्मीद थी कि वह कोई रास्ता निकालेगा।
‘नायक’ सिर्फ मुस्कुरा रहा था।
उसे अब किसी की आवाज़ सुनाई नहीं दे रही थी। न कोई नियम, न कोई नीतिशास्त्र।
धीरे-धीरे प्रकाश भी अंधेरे के साथ बेरंग हो चूका था...
सागर गुप्ता
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