सफ़र, प्यार और एक अधूरी दास्ताँ (Part 4)

सफ़र, प्यार और एक अधूरी दास्ताँ (Part 4)

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sagar gupta

21 Jul 202413 min read

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सफ़र, प्यार और एक अधूरी दास्ताँ

कुछ कहानियों में अनेकों कहानियां छिपी होती। शायद मेरी कहानी भी इन्हीं में से एक है।

 

अब तक आपने पढ़ा कि वंशिका और अंशुमन ऐसा लग रहा था कि दोस्त बन गए है लेकिन चाय वाली घटना ने उनके बीच की दूरियां शायद फिर बढ़ा दी थी। वैसे तो इसमें अंशुमन की कोई गलती नहीं थी, वंशिका को किस बात का बुरा लगा, उसे अब तक समझ नहीं आ रहा था। अंशुमन जब ट्रैन के वाशरूम से निकला तो देखा कि वंशिका सो गई थी या शायद सोने का नाटक कर रही थी। अंशुमन गुस्से में था। इसलिए उसने भी कुछ नहीं कहा और सो गया।

लगभग रात के 1 बजे आगे का रास्ता साफ़ होने पर ट्रैन उस सुनसान स्टेशन से खुल गई। वंशिका और अंशुमन को नींद ने अपने आगोश में इतनी जोर से जकड़ा था कि उन्हें पता भी न चला कि ट्रैन खुल गई थी।

अब पढ़ते है आगे…

 

अध्याय 4- करामती रुमाल

भारत एक ऐसी जगह है, जहाँ कोई व्यक्ति किसी सीट पर रुमाल रख दे तो वो सीट उनकी हो जाती। ऐसा ही कुछ अगले दिन सुबह देखने को मिला।

ट्रैन की गति अभी कम हुई भी नहीं थी कि कुछ लोग अपने सामान को उठा कर ट्रैन के गेट के सामने खड़े होने लगे। हमारे यहाँ लोगों में डर बहुत है। उन्हें हर चीज़ की हड़बड़ाहट रहती। हर चीज़ की जल्दी रहती। स्टेशन से ट्रैन अगर 4 बजे खुलने का समय हो, तो वो 3 बजे ही स्टेशन पहुँच जाते, मानो अगर वो जल्दी न पहुँचे तो ट्रैन अपने तय समय से पहले ही निकल जाएगी। उसी तरह जब किसी स्टेशन में उतरना हो तो वो आधे घंटे पहले ही सारा साजो-सामान लेकर ट्रैन के गेट के सामने खड़े हो जाते।

कुछ मिनटों बाद ट्रैन स्टेशन में रुक चुकी थी। ट्रैन के गेट के बाहर लोगों की काफी भीड़ जुटी हुई थी। ट्रैन तो वैसे ही काफी देरी से  चल रही थी तो शायद पिछले दिन और उस दिन की यात्रा करने वाले यात्री भी इसी ट्रैन से अपने गंतव्य स्थान जाना चाहते थे। ट्रैन से उतरने वाले यात्री अभी उतरे भी नहीं थे कि कुछ लोग ट्रैन में चढ़ने लगे। जिसके कारण ट्रैन में कौताहल का माहौल बन गया और लोगों में धक्का-मुक्की प्रारंभ हो गयी। अब इन मासूम लोगों को कौन समझाए कि अगर वे शांति से ट्रेन से उतरने वाले लोगों को उतरने देते और फ़िर खुद चढ़ते तो काम भी आसान हो जाती और किसी प्रकार की धक्का-मुक्की भी नहीं होती। आजकल के लोगों के साथ यही समस्या है कि वो बात समझना नहीं चाहते और काम सरल होने के बाद भी काम को इतना जटिल बना कर उसी में उलझ कर अपने जीवन के उन क्षणों को बर्बाद कर देते,  जिसमें कोई नई कृति सृजित की जा सकती थी।

इस कौताहल भरे माहौल से वंशिका और अंशुमन दोनों की नींद खुल चुकी थी। उनदोनों ने एक-दूसरे को देखा, फिर दूसरी ओर देखने लगे। शायद पिछले दिन हुई घटना को वो दोनों अब तक भुला नहीं पाए थे।

जब अंशुमन और वंशिका, अन्य लोगों के साथ इन धक्का-मुक्की वाले दृश्यों का मज़ा ले रहे थे,  तभी किसी ने ट्रैन की खिड़की से अंशुमन के हाथों को हिला कर कहा,” अरे भाई! मेरी रुमाल को उस सीट में रख दो।”

अंशुमन और वंशिका की नज़र उस आदमी पर पड़ी। 30 वर्ष के लगभग की उम्र होगी उसकी। पतला-दुबला छरहरा शरीर, गले में लाल रंग का गमछा और मुँह में पान मसाला दबाए हुए वो ट्रैन के खिड़की के पास खड़ा अपना रुमाल अंशुमन की ओर बढ़ाये हुए था।

रुमाल से सीट हड़पने की प्रथा का ज्ञान अंशुमन को पहले से था क्योंकि उसने भी ये उपाय  बहुत बार आजमाया था और हमेशा ये कारगर सिद्ध हुआ था। लेकिन जो बात उस लड़के को पता नहीं थी, वो बात बतलाने के लिए अंशुमन कहना शुरू ही करने वाला था कि उस लड़के ने अंशुमन को बात कहने का मौका नहीं दिया और जोर से गरजा, “अबे! तुम्हें समझ नहीं आ रही क्या मेरी बात? रुमाल रख उस सीट पर..नहीं तो कोई दूसरा रुमाल रख देगा।”

“लेकिन महाराज, पहले मेरी बात समझने की कोशिश तो कीजिये..” अंशुमन बड़े अदब के साथ उसे कहने की कोशिश कर ही रहा था कि उसने फिर उसकी बात बीच में काट दी।

“अबे ओए! ज्यादा ज्ञान मत पेलो। जो कह रहा वो कर।” उस लड़के ने अपने मुँह से “लाल रंग के द्रव” को  प्लेट्फार्म में थूकते हुए कहा।

“पर… ये बोगी… ” अंशुमन ने इतना कहा ही था कि वो बरस पड़ा उस पर।

“क्या बे? पहचान रहे हो मुझे? क्या पर-पर लगा रखा है? तुमको समझ नहीं आ रही क्या मेरी बात? रुमाल रख वहाँ, नहीं तो पेले जाओगे।” उसने इस बार अपनी एक ऊँगली अंशुमन की ओर बढ़ाते हुए कर्कश आवाज़ में बहुत गुस्से से कहा।

उसकी बात से अंशुमन सहम गया और बिना कुछ कहे उसकी रुमाल को उस सीट में रख दिया, जहाँ उसने कहा था।

कुछ मिनटों बाद बॉगी के गेट पर हो रही धक्का-मुक्की खत्म हो चुकी थी और आगे जाने वाले लोग, ट्रैन में लगभग चढ़ चुके थे। बस वो लड़का अब भी ट्रैन के बाहर खड़ा था। अंशुमन डरे-सहमे हुए उस लड़के के क्रियाकलापों को बीच-बीच में देख रहा था। उस लड़के ने अपने पॉकेट से पान मसाला और जर्दा का नया चमचमाता हुआ पैकेट (जिसमें साफ़-साफ़ लिखा हुआ था कि सावधान! तम्बाकू खाने से कैंसर होता है) निकाला, दोनों के ऊपरी भाग को एक साथ रख कर फाड़ा और फिर जर्दा वाले पैकेट के अंदर के माल को उसने पान मसाला के पैकेट में डाल दिया और उस पान मसाला के पैकेट के ऊपरी छोर को अपनी उंगलियों से दबा कर, उसे ऊपर-नीचे हिलाने लगा ताकि पान मसाला और जर्दा एक-दूसरे के आलिंगन पाश में समा जाए। वंशिका भी उस लड़के के इस कला को बड़ी गौर से देख रही थी। उसने उस पान मसाला का सारा माल अपने मुहँ में उड़ेल दिया और उसके पाउडर  को मुँह से हवा में उड़ा दिया।

अब तक ट्रैन भी खुलने के लिए अपनी पहली सिटी बजा कर संकेत दे चुकी थी। तभी अचानक एक यात्री जो अभी बस ट्रैन में चढ़ा ही था, उसने उस लड़के के रुमाल को नीचे गिरा कर उस सीट में बैठ गया। जैसे ही बाहर खड़े उस लड़के की नज़र उसके रुमाल रखे सीट पर पड़ी और उसने वहाँ अपना रुमाल की जगह किसी आदमी को बैठे देखा तो वो तिलमिला कर तुरंत ट्रैन में चढ़ गया और उस सीट में बैठे व्यक्ति के ऊपर चिल्लाने लगा, “अबे भूतनी के! साले! मेरी सीट में कैसे बैठ गया बे तू? साले, तुम्हें दिखा नहीं कि मैंने अपना रुमाल रखा है उस सीट पर। उस हिसाब से मेरा सीट है वो।”

“अबे ओ भाई साहब! घनचक्कर हो क्या? रुमाल रख दिया तो वो चीज़ तुम्हारी हो गई? ये कहाँ का हिसाब है बे?” उस सीट पर बैठे यात्री ने जवाब दिया।

“तुम कहाँ के रईश हो बे, भूतनी के? विलायत से आए हो क्या? तुम्हें पता नहीं है क्या कि जो पहले सीट में रुमाल रखता है, वो उसकी हो जाती।” उस लड़के ने दांत पिसते हुए जवाब दिया।

 

“वाह भाई वाह! गज़ब बात कर रहे हो बे। उस हिसाब से तो ये रुमाल, जिसके ऊपर रखी जाए, वो तुम्हारी हो जाएगी।” इतना कह कर उस यात्री ने वो रुमाल जमीन से उठा कर बगल में बैठी नव-ब्याही लड़की के सर पड़ रख दिया।

“लो भूतनी के! ये रुमाल अब इस लड़की के सर पर रख दिया। तुम्हारे हिसाब से तो अब ये तुम्हारी हो गयी। ले जाओ इसे अब अपने साथ। ये तेरी है अब।” उस यात्री ने गुस्साते हुए कहा।

उस नव-ब्याही लड़की के बगल में बैठा उसका पति ये देख हड़बड़ा गया औऱ अपनी पत्नी का हाथ जोर से पकड़ कर लगभग रोने-सा हो गया, “हमारा अभी ब्याह ही हुआ है। हम हनीमून में जा रहे। इसे छोड़ दो। ये मेरी है बस मेरी।”

 

अचानक हुए इस कृत्य और उस नव-विवाहित लडक़ी के पति का भोलापन देख  बॉगी के सभी लोग अपनी हँसी रोक नहीं पाए और जोर-जोर से हँसने लगे। वंशिका भी अंशुमन के हाथ के ऊपर, अपना हाथ रख कर खिलखिला कर हँसने लगी और अंशुमन के होंठ, सुहाना की हंसी सुन कर खुद-ब-खुद अपनी खुशी जाहिर करने लगे। कल का गुस्सा वंशिका के एक स्पर्श से ही जा चूका था। अंशुमन भी अब खिलखिला कर हँस रहा था।

दो लोगों के बीच शुरू हुई इस लड़ाई में अब एक आदर्श पति भी कूद पड़ा था और अब तीनों के बीच “तू-तू मैं-मैं” शुरू हो गई। अचानक रुमाल वाली सीट में बैठा आदमी आग-बबूला हो गया और उस रुमाल वाले लड़के के मुँह पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया। वो तमाचा इतना जोरदार था कि उस तमाचे की गूंज, वहाँ बैठे लोगों के कानों को कुछ सेकंड तक सुन्न कर दिया था। उस तमाचे की वेग से उस लड़के के मुँह में जो पान मसाला का लाल द्रव पूरा भरा हुआ था, वो बाहर निकल कर, सांप के मुंह से निकले जहर की भांति इधर-उधर छितरा गया, और उस जूठे लाल द्रव की असंख्य बूंदे, ट्रैन में बैठे कई लोगों के चेहरे, कपड़े और हाथों में जा गिरी। उसकी कुछ बूंदे अंशुमन के हाथों में भी पड़ी। पर अंशुमन ने कुछ न कहा क्यूंकि वो उन झंझट में पड़ना नहीं चाहता था।

जो युद्ध , तीन लोगों के बीच हो रहा था, उसने अब विश्व युद्ध का रूप ले लिया था। अब बात हाथापाई तक पहुंच चुकी थी। पूरे बॉगी में अलग प्रकार ही गर्मा-गर्मी हो रही थी। तभी एक-दो यात्रियों ने दूसरे बॉगी में जाकर उस बोगी में हो रहे इस विश्व युद्ध की सूचना RPF(रेलवे प्रोटेक्शन फ़ोर्स)  को दे दी। कुछ ही देर में 5-6 RPF उस बॉगी में आ चुके थे।

“ओए! तुमलोगों ने क्या भसड़ मचा रखी है? ” एक RPF के अधिकारी ने कहा।

“छोड़ो, तुमलोग एक-दूसरे को। सालो! ये युद्ध का अखाड़ा है क्या?” दूसरे RPF अधिकारी ने हाथापाई कर रहे रुमाल वाले लड़के का हाथ पकड़ते हुए कहा।

वो लड़का इतने गुस्से में था कि जिस RPF अधिकारी ने उसका हाथ पकड़ा था, उसके गाल में उसने एक ज़ोरदार तमाचा जर दिया।

“साले! एक सरकारी अधिकारी पर हाथ उठाया तुमने।“

फिर क्या था.. RPF अधिकारियों ने अपने लाठी-डंडे चलाना शुरू कर दिए। थोड़े ही देर में स्थिति नियंत्रण में आ चुकी थी। तब तक ट्रैन के मजिस्ट्रेट साहब भी आ चुके थे। मजिस्ट्रेट साहब ने उस रुमाल वाले और उस रुमाल वाली सीट पर बैठे लड़के को छोड़ अन्य लड़ रहे सभी यात्रियों को दोनों तरफ के सीट के बीचों-बीच, लगातार क्रम से खड़ा कर दिया और एक-एक करके उनसे मामले की पूछताछ करने लगे। यात्रियों ने सारा वृतांत मजिस्ट्रेट साहब को सुनाया। उनका चेहरा सारी बातों को सुनकर और लाल होते जा रहा था।

 

“अब सारा मामला समझ आ गया है। कौन-कौन वे दो महानुभव है, जो सीट के लिए लड़ाई कर रहे थे? महाशय, कृपया करके आपलोग सामने आने का कष्ट करेंगे।” मजिस्ट्रेट साहब ने बड़े प्यार से कहा।

“सर, एक मैं था। अब आप ही हमारी समस्या का समाधन कीजिये।” उस रुमाल वाले लड़के ने पान मसाला का नया पैकेट फाड़ कर मुँह में डालते हुए कहा।

“हाँ जी। हमलोग आपकी समस्या का समाधान करने ही आये है। बताइए, क्या हुआ था?” दूसरे RPF अधिकारी ने एक बड़ी मुस्कान के साथ कहा।

“सर, ये जो महाशय इस सीट पर बैठे हैं, इस पर हमने रुमाल पहले ही रख दी थी। उस हिसाब से ये सीट मेरी हुई न सर। लेकिन ये महाशय मुझसे झगड़ा करने लगे। गज़ब नालायक इंसान है ये।” उस लड़के ने सीट पर बैठे उस आदमी को इंगित करते हुए कहा।

 

“हाँ। बात तो सही है। रुमाल रखे आप पहले, तो सीट आपकी ही होनी चाहिए। आपदोनों एक बार अपना-अपना टिकट दिखाने की कृपा करें।” मजिस्ट्रेट साहब ने बड़े अदब से कहा।

दोनों ने अपने-अपने टिकट दिखा दिए।

“अरे वाह! आपदोनों ने तो जनरल टिकट कटवाई है।” मजिस्ट्रेट साहब ने टिकट का निरीक्षण करते हुए कहा।

“जी सर, लेकिन ये केवल जनरल टिकट नहीं है। देखिए, सुपरफास्ट जनरल टिकट है। ये ट्रैन तो सुपरफास्ट है न सर, इसलिए मैंने थोड़ा और पैसे देकर सुपरफास्ट जनरल टिकट कटवाई। मैं नियम का पक्का हूँ सर।” उस लड़के ने पान के रस को ट्रैन की खिड़की से थूकते हुए कहा।

“बावड़ी पूंछ! जनरल टिकट कटवा कर रिजर्वेशन वाले बॉगी में चढ़े हो और सीट में रुमाल रखकर सबका जीना हराम कर दिया तुमदोनों ने।” मजिस्ट्रेट  साहब ने उसके गले में लिपटे लाल रंग के गमछे को खींचते हुए कहा।

 

अंशुमन से अब रहा नहीं गया। वो भी बहती गंगा में हाथ धो लेना चाहता था। उसने उस लड़के को कहना शुरू किया, ” महाराज, यही तो मैं आपको समझाने की कोशिश कर रहा था कि ये जनरल बॉगी नहीं, रिज़र्वेशन बॉगी है, जब आप रुमाल सीट में रखने के लिए बोल रहे थे। लेकिन उस समय तो आप मेरी बात बीच में काट कर कह रहे थे कि अपने बाप को मत समझाओ। अब भुगतिए।”

“बेटा, अब तुमलोग जाओगे भीतरे।“ RPF के एक अधिकारी ने कहा।

उस लड़के का चेहरा ये सब सुन पीला पड़ने लगा और उसके मुहं में भरा पान मसाला का रस खुद-ब-खुद गले से नीचे उतर रहा था।

वो मजिस्ट्रेट साहब के पैर पर गिर पड़ा,” माफ कर दो माई-बाप। गलती हो गयी। मुझे नहीं पता था कि ये रिजर्वेशन बॉगी है। माफ कर दो, साहेब।”

“बेटा, तुमदोनो को ऐसे नहीं छोड़ सकता। बहुत कांड कर दिए हो आज तुमदोनो ने। ऊपर से एक सरकारी अधिकारी के मुहं में तमाचा भी जड़े हो। लम्बा जाओगे अब। RPF साहब, पकड़ कर ले चलिए इन्हें।” मजिस्ट्रेट साहब ने RPF अधिकारी को आदेश दिया।

थोड़े देर बाद सारे यात्री अपने सीट पर जा चुके थे और हाथ-पाव जोड़ने के बाद भी उनदोनो को RPF अधिकारियों ने घसीट कर अपने साथ ले गए।

थोड़े देर तक पूरे बॉगी में शांति का माहौल था। अंशुमन ने वंशिका की ओर देखा। वो अपने हँसी को रोक नहीं पा रही थी और अंततः वो अपना पेट पकड़ कर जोर-जोर से हँसने लगीं। उसकी हँसी सुनकर सारे यात्री भी ठहाका मार कर हँसने लगे। अंशुमन को भी हँसी आ रही थी और उस बेचारे लड़के के लिए दुख, जिसकी नासमझी ने इतना बड़ा बखेड़ा खड़ा कर दिया था।

 

Xxxxxxxxxx

हम सबने इस करामती रुमाल की घटना कभी न कभी अपने जीवन में देखी जरुर होगी। पर हम पुरानी चीजों को भूल जाते है या फिर नजरअंदाज करने लगते है और नई चीजों को अंगीकार करने लगते। लेकिन जो ये भूली-बीसरी यादें है न, यही सच्चा खजाना है हमारा। अपने जीवन के अंतिम क्षणों में जब हम अंतिम सांस ले रहे होंगे, तब यही खट्टे-मिट्ठे अनुभव ही हमारे साथ रहेंगे और सुकून पहुंचाएंगे।

आपने देखा कि कैसे एक छोटी-सी रुमाल ने कितना बड़ा बखेड़ा खड़ा कर दिया। जैसे एक छोटे से बीज से विशाल वृक्ष का जन्म होता, वैसे ही एक छोटी-सी बात कब बड़ी हो जाती, पता भी न चलता। बीती रात अंशुमन और वंशिका के बीच जो मन-मुटाव था, वंशिका के हल्के से स्पर्श ने उसे तदक्षण ख़त्म कर दिया। हमें भी अपनी जिंदगी में छोटे-मोटे मन-मुटाव को भूल कर रिश्तों को अपने झोली में सहेज कर आगे बढ़ते रहना चाहिए, फिर देखिये! जिंदगी कितनी हसीन और खुबसूरत मालूम पड़ेगी। तो मिलते है अब अगले अध्याय में…

 

सागर गुप्ता

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कुछ कहानियों में अनेकों कहानियां छिपी होती। शायद मेरी कहानी भी इन्हीं में से एक है।

 

अब तक आपने पढ़ा कि वंशिका और अंशुमन ऐसा लग रहा था कि दोस्त बन गए है लेकिन चाय वाली घटना ने उनके बीच की दूरियां शायद फिर बढ़ा दी थी। वैसे तो इसमें अंशुमन की कोई गलती नहीं थी, वंशिका को किस बात का बुरा लगा, उसे अब तक समझ नहीं आ रहा था। अंशुमन जब ट्रैन के वाशरूम से निकला तो देखा कि वंशिका सो गई थी या शायद सोने का नाटक कर रही थी। अंशुमन गुस्से में था। इसलिए उसने भी कुछ नहीं कहा और सो गया।

लगभग रात के 1 बजे आगे का रास्ता साफ़ होने पर ट्रैन उस सुनसान स्टेशन से खुल गई। वंशिका और अंशुमन को नींद ने अपने आगोश में इतनी जोर से जकड़ा था कि उन्हें पता भी न चला कि ट्रैन खुल गई थी।

अब पढ़ते है आगे…

 

अध्याय 4- करामती रुमाल

भारत एक ऐसी जगह है, जहाँ कोई व्यक्ति किसी सीट पर रुमाल रख दे तो वो सीट उनकी हो जाती। ऐसा ही कुछ अगले दिन सुबह देखने को मिला।

ट्रैन की गति अभी कम हुई भी नहीं थी कि कुछ लोग अपने सामान को उठा कर ट्रैन के गेट के सामने खड़े होने लगे। हमारे यहाँ लोगों में डर बहुत है। उन्हें हर चीज़ की हड़बड़ाहट रहती। हर चीज़ की जल्दी रहती। स्टेशन से ट्रैन अगर 4 बजे खुलने का समय हो, तो वो 3 बजे ही स्टेशन पहुँच जाते, मानो अगर वो जल्दी न पहुँचे तो ट्रैन अपने तय समय से पहले ही निकल जाएगी। उसी तरह जब किसी स्टेशन में उतरना हो तो वो आधे घंटे पहले ही सारा साजो-सामान लेकर ट्रैन के गेट के सामने खड़े हो जाते।

कुछ मिनटों बाद ट्रैन स्टेशन में रुक चुकी थी। ट्रैन के गेट के बाहर लोगों की काफी भीड़ जुटी हुई थी। ट्रैन तो वैसे ही काफी देरी से  चल रही थी तो शायद पिछले दिन और उस दिन की यात्रा करने वाले यात्री भी इसी ट्रैन से अपने गंतव्य स्थान जाना चाहते थे। ट्रैन से उतरने वाले यात्री अभी उतरे भी नहीं थे कि कुछ लोग ट्रैन में चढ़ने लगे। जिसके कारण ट्रैन में कौताहल का माहौल बन गया और लोगों में धक्का-मुक्की प्रारंभ हो गयी। अब इन मासूम लोगों को कौन समझाए कि अगर वे शांति से ट्रेन से उतरने वाले लोगों को उतरने देते और फ़िर खुद चढ़ते तो काम भी आसान हो जाती और किसी प्रकार की धक्का-मुक्की भी नहीं होती। आजकल के लोगों के साथ यही समस्या है कि वो बात समझना नहीं चाहते और काम सरल होने के बाद भी काम को इतना जटिल बना कर उसी में उलझ कर अपने जीवन के उन क्षणों को बर्बाद कर देते,  जिसमें कोई नई कृति सृजित की जा सकती थी।

इस कौताहल भरे माहौल से वंशिका और अंशुमन दोनों की नींद खुल चुकी थी। उनदोनों ने एक-दूसरे को देखा, फिर दूसरी ओर देखने लगे। शायद पिछले दिन हुई घटना को वो दोनों अब तक भुला नहीं पाए थे।

जब अंशुमन और वंशिका, अन्य लोगों के साथ इन धक्का-मुक्की वाले दृश्यों का मज़ा ले रहे थे,  तभी किसी ने ट्रैन की खिड़की से अंशुमन के हाथों को हिला कर कहा,” अरे भाई! मेरी रुमाल को उस सीट में रख दो।”

अंशुमन और वंशिका की नज़र उस आदमी पर पड़ी। 30 वर्ष के लगभग की उम्र होगी उसकी। पतला-दुबला छरहरा शरीर, गले में लाल रंग का गमछा और मुँह में पान मसाला दबाए हुए वो ट्रैन के खिड़की के पास खड़ा अपना रुमाल अंशुमन की ओर बढ़ाये हुए था।

रुमाल से सीट हड़पने की प्रथा का ज्ञान अंशुमन को पहले से था क्योंकि उसने भी ये उपाय  बहुत बार आजमाया था और हमेशा ये कारगर सिद्ध हुआ था। लेकिन जो बात उस लड़के को पता नहीं थी, वो बात बतलाने के लिए अंशुमन कहना शुरू ही करने वाला था कि उस लड़के ने अंशुमन को बात कहने का मौका नहीं दिया और जोर से गरजा, “अबे! तुम्हें समझ नहीं आ रही क्या मेरी बात? रुमाल रख उस सीट पर..नहीं तो कोई दूसरा रुमाल रख देगा।”

“लेकिन महाराज, पहले मेरी बात समझने की कोशिश तो कीजिये..” अंशुमन बड़े अदब के साथ उसे कहने की कोशिश कर ही रहा था कि उसने फिर उसकी बात बीच में काट दी।

“अबे ओए! ज्यादा ज्ञान मत पेलो। जो कह रहा वो कर।” उस लड़के ने अपने मुँह से “लाल रंग के द्रव” को  प्लेट्फार्म में थूकते हुए कहा।

“पर… ये बोगी… ” अंशुमन ने इतना कहा ही था कि वो बरस पड़ा उस पर।

“क्या बे? पहचान रहे हो मुझे? क्या पर-पर लगा रखा है? तुमको समझ नहीं आ रही क्या मेरी बात? रुमाल रख वहाँ, नहीं तो पेले जाओगे।” उसने इस बार अपनी एक ऊँगली अंशुमन की ओर बढ़ाते हुए कर्कश आवाज़ में बहुत गुस्से से कहा।

उसकी बात से अंशुमन सहम गया और बिना कुछ कहे उसकी रुमाल को उस सीट में रख दिया, जहाँ उसने कहा था।

कुछ मिनटों बाद बॉगी के गेट पर हो रही धक्का-मुक्की खत्म हो चुकी थी और आगे जाने वाले लोग, ट्रैन में लगभग चढ़ चुके थे। बस वो लड़का अब भी ट्रैन के बाहर खड़ा था। अंशुमन डरे-सहमे हुए उस लड़के के क्रियाकलापों को बीच-बीच में देख रहा था। उस लड़के ने अपने पॉकेट से पान मसाला और जर्दा का नया चमचमाता हुआ पैकेट (जिसमें साफ़-साफ़ लिखा हुआ था कि सावधान! तम्बाकू खाने से कैंसर होता है) निकाला, दोनों के ऊपरी भाग को एक साथ रख कर फाड़ा और फिर जर्दा वाले पैकेट के अंदर के माल को उसने पान मसाला के पैकेट में डाल दिया और उस पान मसाला के पैकेट के ऊपरी छोर को अपनी उंगलियों से दबा कर, उसे ऊपर-नीचे हिलाने लगा ताकि पान मसाला और जर्दा एक-दूसरे के आलिंगन पाश में समा जाए। वंशिका भी उस लड़के के इस कला को बड़ी गौर से देख रही थी। उसने उस पान मसाला का सारा माल अपने मुहँ में उड़ेल दिया और उसके पाउडर  को मुँह से हवा में उड़ा दिया।

अब तक ट्रैन भी खुलने के लिए अपनी पहली सिटी बजा कर संकेत दे चुकी थी। तभी अचानक एक यात्री जो अभी बस ट्रैन में चढ़ा ही था, उसने उस लड़के के रुमाल को नीचे गिरा कर उस सीट में बैठ गया। जैसे ही बाहर खड़े उस लड़के की नज़र उसके रुमाल रखे सीट पर पड़ी और उसने वहाँ अपना रुमाल की जगह किसी आदमी को बैठे देखा तो वो तिलमिला कर तुरंत ट्रैन में चढ़ गया और उस सीट में बैठे व्यक्ति के ऊपर चिल्लाने लगा, “अबे भूतनी के! साले! मेरी सीट में कैसे बैठ गया बे तू? साले, तुम्हें दिखा नहीं कि मैंने अपना रुमाल रखा है उस सीट पर। उस हिसाब से मेरा सीट है वो।”

“अबे ओ भाई साहब! घनचक्कर हो क्या? रुमाल रख दिया तो वो चीज़ तुम्हारी हो गई? ये कहाँ का हिसाब है बे?” उस सीट पर बैठे यात्री ने जवाब दिया।

“तुम कहाँ के रईश हो बे, भूतनी के? विलायत से आए हो क्या? तुम्हें पता नहीं है क्या कि जो पहले सीट में रुमाल रखता है, वो उसकी हो जाती।” उस लड़के ने दांत पिसते हुए जवाब दिया।

 

“वाह भाई वाह! गज़ब बात कर रहे हो बे। उस हिसाब से तो ये रुमाल, जिसके ऊपर रखी जाए, वो तुम्हारी हो जाएगी।” इतना कह कर उस यात्री ने वो रुमाल जमीन से उठा कर बगल में बैठी नव-ब्याही लड़की के सर पड़ रख दिया।

“लो भूतनी के! ये रुमाल अब इस लड़की के सर पर रख दिया। तुम्हारे हिसाब से तो अब ये तुम्हारी हो गयी। ले जाओ इसे अब अपने साथ। ये तेरी है अब।” उस यात्री ने गुस्साते हुए कहा।

उस नव-ब्याही लड़की के बगल में बैठा उसका पति ये देख हड़बड़ा गया औऱ अपनी पत्नी का हाथ जोर से पकड़ कर लगभग रोने-सा हो गया, “हमारा अभी ब्याह ही हुआ है। हम हनीमून में जा रहे। इसे छोड़ दो। ये मेरी है बस मेरी।”

 

अचानक हुए इस कृत्य और उस नव-विवाहित लडक़ी के पति का भोलापन देख  बॉगी के सभी लोग अपनी हँसी रोक नहीं पाए और जोर-जोर से हँसने लगे। वंशिका भी अंशुमन के हाथ के ऊपर, अपना हाथ रख कर खिलखिला कर हँसने लगी और अंशुमन के होंठ, सुहाना की हंसी सुन कर खुद-ब-खुद अपनी खुशी जाहिर करने लगे। कल का गुस्सा वंशिका के एक स्पर्श से ही जा चूका था। अंशुमन भी अब खिलखिला कर हँस रहा था।

दो लोगों के बीच शुरू हुई इस लड़ाई में अब एक आदर्श पति भी कूद पड़ा था और अब तीनों के बीच “तू-तू मैं-मैं” शुरू हो गई। अचानक रुमाल वाली सीट में बैठा आदमी आग-बबूला हो गया और उस रुमाल वाले लड़के के मुँह पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया। वो तमाचा इतना जोरदार था कि उस तमाचे की गूंज, वहाँ बैठे लोगों के कानों को कुछ सेकंड तक सुन्न कर दिया था। उस तमाचे की वेग से उस लड़के के मुँह में जो पान मसाला का लाल द्रव पूरा भरा हुआ था, वो बाहर निकल कर, सांप के मुंह से निकले जहर की भांति इधर-उधर छितरा गया, और उस जूठे लाल द्रव की असंख्य बूंदे, ट्रैन में बैठे कई लोगों के चेहरे, कपड़े और हाथों में जा गिरी। उसकी कुछ बूंदे अंशुमन के हाथों में भी पड़ी। पर अंशुमन ने कुछ न कहा क्यूंकि वो उन झंझट में पड़ना नहीं चाहता था।

जो युद्ध , तीन लोगों के बीच हो रहा था, उसने अब विश्व युद्ध का रूप ले लिया था। अब बात हाथापाई तक पहुंच चुकी थी। पूरे बॉगी में अलग प्रकार ही गर्मा-गर्मी हो रही थी। तभी एक-दो यात्रियों ने दूसरे बॉगी में जाकर उस बोगी में हो रहे इस विश्व युद्ध की सूचना RPF(रेलवे प्रोटेक्शन फ़ोर्स)  को दे दी। कुछ ही देर में 5-6 RPF उस बॉगी में आ चुके थे।

“ओए! तुमलोगों ने क्या भसड़ मचा रखी है? ” एक RPF के अधिकारी ने कहा।

“छोड़ो, तुमलोग एक-दूसरे को। सालो! ये युद्ध का अखाड़ा है क्या?” दूसरे RPF अधिकारी ने हाथापाई कर रहे रुमाल वाले लड़के का हाथ पकड़ते हुए कहा।

वो लड़का इतने गुस्से में था कि जिस RPF अधिकारी ने उसका हाथ पकड़ा था, उसके गाल में उसने एक ज़ोरदार तमाचा जर दिया।

“साले! एक सरकारी अधिकारी पर हाथ उठाया तुमने।“

फिर क्या था.. RPF अधिकारियों ने अपने लाठी-डंडे चलाना शुरू कर दिए। थोड़े ही देर में स्थिति नियंत्रण में आ चुकी थी। तब तक ट्रैन के मजिस्ट्रेट साहब भी आ चुके थे। मजिस्ट्रेट साहब ने उस रुमाल वाले और उस रुमाल वाली सीट पर बैठे लड़के को छोड़ अन्य लड़ रहे सभी यात्रियों को दोनों तरफ के सीट के बीचों-बीच, लगातार क्रम से खड़ा कर दिया और एक-एक करके उनसे मामले की पूछताछ करने लगे। यात्रियों ने सारा वृतांत मजिस्ट्रेट साहब को सुनाया। उनका चेहरा सारी बातों को सुनकर और लाल होते जा रहा था।

 

“अब सारा मामला समझ आ गया है। कौन-कौन वे दो महानुभव है, जो सीट के लिए लड़ाई कर रहे थे? महाशय, कृपया करके आपलोग सामने आने का कष्ट करेंगे।” मजिस्ट्रेट साहब ने बड़े प्यार से कहा।

“सर, एक मैं था। अब आप ही हमारी समस्या का समाधन कीजिये।” उस रुमाल वाले लड़के ने पान मसाला का नया पैकेट फाड़ कर मुँह में डालते हुए कहा।

“हाँ जी। हमलोग आपकी समस्या का समाधान करने ही आये है। बताइए, क्या हुआ था?” दूसरे RPF अधिकारी ने एक बड़ी मुस्कान के साथ कहा।

“सर, ये जो महाशय इस सीट पर बैठे हैं, इस पर हमने रुमाल पहले ही रख दी थी। उस हिसाब से ये सीट मेरी हुई न सर। लेकिन ये महाशय मुझसे झगड़ा करने लगे। गज़ब नालायक इंसान है ये।” उस लड़के ने सीट पर बैठे उस आदमी को इंगित करते हुए कहा।

 

“हाँ। बात तो सही है। रुमाल रखे आप पहले, तो सीट आपकी ही होनी चाहिए। आपदोनों एक बार अपना-अपना टिकट दिखाने की कृपा करें।” मजिस्ट्रेट साहब ने बड़े अदब से कहा।

दोनों ने अपने-अपने टिकट दिखा दिए।

“अरे वाह! आपदोनों ने तो जनरल टिकट कटवाई है।” मजिस्ट्रेट साहब ने टिकट का निरीक्षण करते हुए कहा।

“जी सर, लेकिन ये केवल जनरल टिकट नहीं है। देखिए, सुपरफास्ट जनरल टिकट है। ये ट्रैन तो सुपरफास्ट है न सर, इसलिए मैंने थोड़ा और पैसे देकर सुपरफास्ट जनरल टिकट कटवाई। मैं नियम का पक्का हूँ सर।” उस लड़के ने पान के रस को ट्रैन की खिड़की से थूकते हुए कहा।

“बावड़ी पूंछ! जनरल टिकट कटवा कर रिजर्वेशन वाले बॉगी में चढ़े हो और सीट में रुमाल रखकर सबका जीना हराम कर दिया तुमदोनों ने।” मजिस्ट्रेट  साहब ने उसके गले में लिपटे लाल रंग के गमछे को खींचते हुए कहा।

 

अंशुमन से अब रहा नहीं गया। वो भी बहती गंगा में हाथ धो लेना चाहता था। उसने उस लड़के को कहना शुरू किया, ” महाराज, यही तो मैं आपको समझाने की कोशिश कर रहा था कि ये जनरल बॉगी नहीं, रिज़र्वेशन बॉगी है, जब आप रुमाल सीट में रखने के लिए बोल रहे थे। लेकिन उस समय तो आप मेरी बात बीच में काट कर कह रहे थे कि अपने बाप को मत समझाओ। अब भुगतिए।”

“बेटा, अब तुमलोग जाओगे भीतरे।“ RPF के एक अधिकारी ने कहा।

उस लड़के का चेहरा ये सब सुन पीला पड़ने लगा और उसके मुहं में भरा पान मसाला का रस खुद-ब-खुद गले से नीचे उतर रहा था।

वो मजिस्ट्रेट साहब के पैर पर गिर पड़ा,” माफ कर दो माई-बाप। गलती हो गयी। मुझे नहीं पता था कि ये रिजर्वेशन बॉगी है। माफ कर दो, साहेब।”

“बेटा, तुमदोनो को ऐसे नहीं छोड़ सकता। बहुत कांड कर दिए हो आज तुमदोनो ने। ऊपर से एक सरकारी अधिकारी के मुहं में तमाचा भी जड़े हो। लम्बा जाओगे अब। RPF साहब, पकड़ कर ले चलिए इन्हें।” मजिस्ट्रेट साहब ने RPF अधिकारी को आदेश दिया।

थोड़े देर बाद सारे यात्री अपने सीट पर जा चुके थे और हाथ-पाव जोड़ने के बाद भी उनदोनो को RPF अधिकारियों ने घसीट कर अपने साथ ले गए।

थोड़े देर तक पूरे बॉगी में शांति का माहौल था। अंशुमन ने वंशिका की ओर देखा। वो अपने हँसी को रोक नहीं पा रही थी और अंततः वो अपना पेट पकड़ कर जोर-जोर से हँसने लगीं। उसकी हँसी सुनकर सारे यात्री भी ठहाका मार कर हँसने लगे। अंशुमन को भी हँसी आ रही थी और उस बेचारे लड़के के लिए दुख, जिसकी नासमझी ने इतना बड़ा बखेड़ा खड़ा कर दिया था।

 

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हम सबने इस करामती रुमाल की घटना कभी न कभी अपने जीवन में देखी जरुर होगी। पर हम पुरानी चीजों को भूल जाते है या फिर नजरअंदाज करने लगते है और नई चीजों को अंगीकार करने लगते। लेकिन जो ये भूली-बीसरी यादें है न, यही सच्चा खजाना है हमारा। अपने जीवन के अंतिम क्षणों में जब हम अंतिम सांस ले रहे होंगे, तब यही खट्टे-मिट्ठे अनुभव ही हमारे साथ रहेंगे और सुकून पहुंचाएंगे।

आपने देखा कि कैसे एक छोटी-सी रुमाल ने कितना बड़ा बखेड़ा खड़ा कर दिया। जैसे एक छोटे से बीज से विशाल वृक्ष का जन्म होता, वैसे ही एक छोटी-सी बात कब बड़ी हो जाती, पता भी न चलता। बीती रात अंशुमन और वंशिका के बीच जो मन-मुटाव था, वंशिका के हल्के से स्पर्श ने उसे तदक्षण ख़त्म कर दिया। हमें भी अपनी जिंदगी में छोटे-मोटे मन-मुटाव को भूल कर रिश्तों को अपने झोली में सहेज कर आगे बढ़ते रहना चाहिए, फिर देखिये! जिंदगी कितनी हसीन और खुबसूरत मालूम पड़ेगी। तो मिलते है अब अगले अध्याय में…

 

सागर गुप्ता

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