सफ़र, प्यार और एक अधूरी दास्ताँ (Part 3)

सफ़र, प्यार और एक अधूरी दास्ताँ (Part 3)

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sagar gupta

21 Jul 20248 min read

Published in series

सफ़र, प्यार और एक अधूरी दास्ताँ

कुछ कहानियों में अनेकों कहानियां छिपी होती। शायद मेरी कहानी भी इन्हीं में से एक है।

 

अब तक आपने पढ़ा कि कैसे वंशिका और अंशुमन, जो कुछ घंटे पहले तक एक-दूसरे से अपरिचित थे, अब धीरे-धीरे एक-दूसरे के करीब आ रहे थे। रात के लगभग 10 बज चुके थे और अब तक रेलगाड़ी आगे हुई दुर्घटना के कारण अब तक उसी सुनसान स्टेशन में रुकी हुई थी। अब पढ़ते है आगे…

 

अध्याय 3- ट्रैन का वाशरूम

 

“उफ़! हद हो गई। इतने देर से ट्रैन रुकी हुई है। ये लोग ट्रैक की मरम्मती कर भी रहे है, या फिर घोडा बेच कर सो रहे?” वंशिका खुद-ब-खुद बुदबुदाने लगी।

“रेल मंत्रालय के कर्मचारी घोड़ों की भी खरीद-बिक्री करते है। आज पता चला।“ अंशुमन ने उसकी चुटकी लेते हुए कहा।

वंशिका ने अपने भौं को सिकोरतें हुए उसे गुस्से से देखा।

अंशुमन जब तक कुछ कहता तब तक “सबसे घटिया चाय” बेचने वाले ने पूछ लिया, “सर, सबसे घटिया चाय पीजियेगा।”

अंशुमन का ध्यान वंशिका से हट कर उस चाय वाले की ओर चला गया।

एक हाथ में पुराने ज़माने से चली आ रही एलुमिनियम की बड़ी-सी केतली, जिसकी हत्थे में सफ़ेद रंग के कपड़े के टुकड़े को बार-बार लपेट कर मोटा किया गया था ताकि चाय को उड़ेलते समय हाथ न जले, और दूसरे हाथ में कुल्हड़ वाला कप लिए एक पतला-दुबला कम उम्र का लड़का अंशुमन की ओर एकटक देख रहा था।

“अच्छी चाय पिलाओगे तो बताओ।”

“साहब, हम सबसे घटिया चाय पिलाते। अच्छी चाय किसी और से पी लीजियेगा।”

ट्रैन और बस में सामान बेचने वालों की मार्केटिंग करने की टैलेंट ही अलग होती। अच्छे- अच्छे कॉलेज से किये MBA वाले भी उनके सामने पानी भरते। एक नकली सोने की चैन की विशेषता भी वो इतने बखूबी से बताते है कि आपको उसे खरीदने का मन कर जाता। ठीक वैसे ही ‘सबसे घटिया चाय’ बोल कर ये ट्रैन में चाय बेचने वाले सबका अपनी ओर आकर्षण पैदा कर देते कि आख़िर चाय सच में घटिया है या अच्छी है। मुख्यतः बच्चे ऐसे लोगों की बात सुनकर खूब खिलखिला कर हँसते और अपने माँ-बाप को चाय पिने को बोलते।

“बोलिए साहब। पीजिएगा घटिया चाय। एक बार पी कर देखिये, इससे खराब और घटिया चाय कहीं नहीं पिए होंगे आप।“ अंशुमन के कुछ न कहने पर उस चाय वाले ने दुबारा कहा।

“ठीक हैं भाई। अच्छी चाय अगली बार पी लेंगे। 2 घटिया चाय ही दे दो।” अंशुमन 20 रुपये का नोट पॉकेट से निकाल कर चाय वाले की ओर बढ़ाते हुए कहा।

चाय को न करना अंशुमन के बस की बात नहीं थी। वो बचपन से चाय प्रेमी था। उसकी सुबह चाय के साथ शुरू होती थी और रात चाय पीने के साथ ख़त्म। चाय की तलब ही अलग होती। चाय एक पेय पदार्थ नहीं, अपितु यह एक एहसास है। बच्चे, बूढ़े, अमीर, गरीब सारे चाय के शौक़ीन होते। चाहे कोई मेहमान आए या कोई गम हो, चाय हमेशा साथ देती। कॉफ़ी में तो दुनियादारी की रस्में ही निभाई जाती जनाब, असली रिश्ते तो आज भी चाय पर ही बनते है।

“लीजिए साहब।” अपने केतली के हाथी के सुढ़ जैसी नली से गर्म चाय को दो बड़ी-बड़ी कुल्हड़ वाली कप में उढ़ेल कर उस चाय वाले ने अंशुमन की ओर बढ़ा दिया।

अंशुमन ने एक कप वंशिका की ओर बढ़ा दिया।

“मुझे नहीं पीना है।“ वंशिका ने गुस्साते हुए कहा।

“अरे! अभी भी घोड़े वाली बात को लेकर बैठी हो। मजाक कर रहा था। चाय को भी कोई मना कर सकता है क्या भला?“ अंशुमन ने वंशिका के गुस्से को ठंडा करने के ख्याल से दुबारा चाय का कप उसकी ओर बढ़ा दिया।

“नहीं कहा न। नहीं पीना है मुझे।“ वंशिका ने चाय के कप को झटका देते हुए कहा।

झटका देने से चाय पूरी की पूरी अंशुमन के कपड़े में जा गिरी।

“माफ़ करना। गलती से गिर गया।“ वंशिका की आवाज़ की कठोरता गायब हो चुकी थी।

“कोई बात नहीं।“ अंशुमन अपने गुस्से को नियंत्रित करते हुए जवाब दिया।

“गलती मेरी है। मेरी वजह से ही तुम्हारी कमीज ख़राब हो गई। प्लीज, इससे पोछ लो।“ वंशिका अपने पर्स से रेशमी रुमाल निकाल कर अंशुमन की ओर बढ़ाते हुए कहा।

“कोई नहीं। मैं वाशरूम में कमीज साफ़ कर लेता हूँ।“

वाशरूम में जाकर अंशुमन अपना कमीज साफ़ करने लगा। अंशुमन को वंशिका का रवैया अजीब लगा। अभी थोड़े देर पहले तक तो सब सही था। चाय की बात से अचानक इतना गुस्सा हो जाना, उसे समझ नहीं आ रहा था। क्या वो इसलिए चाय नहीं पीना चाहती थी कि गलती से इस बहाने अंशुमन उसका चेहरा देख लेता? क्या वो कोई हीरोइन है या फिर उसका चेहरा इतना हसीन है कि वो किसी को दिखाना न चाहती हो। अंशुमन ये सब सोच ही रहा था कि उसकी नज़र वाशरूम के दरवाजे के अंदरी भाग पर पड़ी।

दरवाजे के भीतर वाले भाग में कुछ फ़ोन नंबर और अंग्रेजी में कुछ वाक्य लिखे हुए थे।

“रसीली बातें करने के लिए call करें”

“I am waiting for your call baby…love Sonam”

“मस्त बातें करने के लिए कॉल करे”

उसके बाद कुछ उटपुटांग अश्लील चित्र कलम से बनाएं हुए थे।

वैसे तो अंशुमन को बचपन से ऐसी बातें,  अश्लील चित्र  ट्रैन के टॉयलेट  में देखने को मिल जाती थी। पर उसकी कभी हिम्मत नहीं हुई कि उन नंबरों पर कॉल करके उन “हुस्न की मल्लिकाओं” से प्यार भरी बातें कर ले।

अंशुमन सोचने लगा कि अब वो बड़ा और matured हो गया है। क्यों न उनमें से एक नंबर पर कॉल करके कुछ हसीन बातें करके देखे। ये ख्याल उसे उस समय क्यों आया, वो उसे भी पता न था। शायद वंशिका के वर्ताव ने उसे ऐसा करने को विवश कर दिया था क्यूंकि जब आप किसी से प्यार चाहते और वो प्यार देने के बजाय नफरत देता तो आप प्यार को किसी और से उसी रूप में तलाशने लगते, शख्स तो अलग होता, पर उस शख्स के पीछे आप अपने प्रेमी या प्रेमिका को ही देख कर प्यार की तलाश में रहते।

अंशुमन ने बिना सोचे-समझे दरवाजे में लिखे एक फ़ोन नंबर जिसमें ‘with love Sonam’ लिखा था, उस पर कॉल लगा दिया।

पहली रिंग पूरी होने के बावजूद भी किसी ने फ़ोन नहीं उठाया।

अंशुमन दुबारा दरवाजे में लिखे नंबर को अपने डायल किये नंबर से बोल-बोल कर मिलाने लगा।

7 2 0 1 9

जब उसने सारा डिजिट मिला लिया तो देखा कि वो सही नंबर पर ही कॉल कर रहा था। अंशुमन ने  सोचा कि सोनम जी शायद कहीं व्यस्त होगी,  इसलिए उसका फ़ोन  नहीं उठाई। उसने दुबारा उस नंबर पर फ़ोन लगाया। उसके दिल की धड़कने बढ़ते चली जा रही थी। सोनम की आवाज सुनने को अंशुमन बेताब था। इस बार किसी ने फोन उठा लिया। अंशुमन जोर से चहका।

“हैलो”

“हेल्लो”

पर ये किसी लड़की की आवाज नहीं थी। किसी 16-17 साल के लड़के की आवाज थी। अंशुमन को लगा कि सोनम का शायद छोटा भाई होगा, जिसने फ़ोन उठाया।

“छोटू, अपनी दीदी को फ़ोन देना।” अंशुमन ने पूरे बेफिक्री और विश्वास से कहा ताकि उस “छोटू” को लगे कि अंशुमन उसकी दीदी का कोई दोस्त बोल रहा है और वो अपनी दीदी के डर से फ़ोन उसे तुरंत दे दे।

पर वो “छोटू” डरने के जगह गुस्से से बोला, “कौन दीदी बे !”

अंशुमन ये सुन कर थोड़ा सकपका गया और फिर धीरे से प्यार से बोला, “सोनम दीदी से बात करवा दीजिये।”।

“कौन सोनम दीदी बे, चमन चूतिये। आज गा* मारने के लिए मैं ही मिला हूँ क्या?”

उस ‘छोटू’ के बर्ताव से अंशुमन आग-बबूला हो गया। उसने सोचा कि सच बता देता हूँ कि उसकी दीदी कहाँ-कहाँ नंबर बांटते चल रही।

“आपकी दीदी का नंबर टॉयलेट के दरवाजे के पीछे लिखा हुआ था तो सोचा कि बात कर लूं।” अंशुमन ने बिल्ली के डर से अपने बिल में छुपे हुए चूहे जैसी हालात में कहा।

“अच्छा, अब समझ आया कि आपको मेरी दीदी का नंबर कहाँ से मिला।“

“वैसे आपको उनसे क्या बात करना है?”

“मस्त-मस्त बातें।“ अंशुमन के अंदर तड़प रही इच्छा उसके मुहं से बाहर निकल आई। पहली बार अंशुमन को ये एहसास हुआ कि बान से छोरा हुआ तीर और गर्लफ्रेंड के फ़ोन में रिचार्ज किये हुए पैसे कभी वापिस नही लौटते।

“भोस* के। साले! तुम्हें मस्त-मस्त बातें करनी है। तो कर न मुझसे लौ*। वहाँ मैंने अपना नंबर तुम जैसे चमन *** का गा* मारने के लिए ही लिखा था। साले! लड़की से बात करेगा। तेरा हम गा* मार लेंगे और पता भी न चलेगा, भोस* के। “

उसके बाद भी वो “छोटू” रुका नहीं और इतने सारे नए-नए और स्वयं रचित इतनी  गालियां अंशुमन को  दी जिसे अगर किसी वेबसीरीज में डाल दिया जाए तो तहलका मच जाए। अंशुमन को वो बंदा गाली सृजित करने  में इतना माहिर लगा कि अंत में अंशुमन को फ़ोन काट कर उस नंबर को ब्लॉक करना पड़ा।

फोन काट कर अंशुमन ये समझ गया था कि वो matured उस समय तक ही था,  जब तक उसने उन नम्बरों पर कभी कॉल नहीं किया था। अब वो “चमन ***” की केटेगरी में प्रवेश कर चुका था।

xxxx

 

ऐसी क्या बात थी कि वंशिका अपने चेहरे को अब तक छुपाई हुई थी? क्या उसे हीरोइन जैसे दिखने का घमंड था या बात कुछ और थी… चलिए पढ़ते है अगले अध्याय में….

 

सागर गुप्ता

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कुछ कहानियों में अनेकों कहानियां छिपी होती। शायद मेरी कहानी भी इन्हीं में से एक है।

 

अब तक आपने पढ़ा कि कैसे वंशिका और अंशुमन, जो कुछ घंटे पहले तक एक-दूसरे से अपरिचित थे, अब धीरे-धीरे एक-दूसरे के करीब आ रहे थे। रात के लगभग 10 बज चुके थे और अब तक रेलगाड़ी आगे हुई दुर्घटना के कारण अब तक उसी सुनसान स्टेशन में रुकी हुई थी। अब पढ़ते है आगे…

 

अध्याय 3- ट्रैन का वाशरूम

 

“उफ़! हद हो गई। इतने देर से ट्रैन रुकी हुई है। ये लोग ट्रैक की मरम्मती कर भी रहे है, या फिर घोडा बेच कर सो रहे?” वंशिका खुद-ब-खुद बुदबुदाने लगी।

“रेल मंत्रालय के कर्मचारी घोड़ों की भी खरीद-बिक्री करते है। आज पता चला।“ अंशुमन ने उसकी चुटकी लेते हुए कहा।

वंशिका ने अपने भौं को सिकोरतें हुए उसे गुस्से से देखा।

अंशुमन जब तक कुछ कहता तब तक “सबसे घटिया चाय” बेचने वाले ने पूछ लिया, “सर, सबसे घटिया चाय पीजियेगा।”

अंशुमन का ध्यान वंशिका से हट कर उस चाय वाले की ओर चला गया।

एक हाथ में पुराने ज़माने से चली आ रही एलुमिनियम की बड़ी-सी केतली, जिसकी हत्थे में सफ़ेद रंग के कपड़े के टुकड़े को बार-बार लपेट कर मोटा किया गया था ताकि चाय को उड़ेलते समय हाथ न जले, और दूसरे हाथ में कुल्हड़ वाला कप लिए एक पतला-दुबला कम उम्र का लड़का अंशुमन की ओर एकटक देख रहा था।

“अच्छी चाय पिलाओगे तो बताओ।”

“साहब, हम सबसे घटिया चाय पिलाते। अच्छी चाय किसी और से पी लीजियेगा।”

ट्रैन और बस में सामान बेचने वालों की मार्केटिंग करने की टैलेंट ही अलग होती। अच्छे- अच्छे कॉलेज से किये MBA वाले भी उनके सामने पानी भरते। एक नकली सोने की चैन की विशेषता भी वो इतने बखूबी से बताते है कि आपको उसे खरीदने का मन कर जाता। ठीक वैसे ही ‘सबसे घटिया चाय’ बोल कर ये ट्रैन में चाय बेचने वाले सबका अपनी ओर आकर्षण पैदा कर देते कि आख़िर चाय सच में घटिया है या अच्छी है। मुख्यतः बच्चे ऐसे लोगों की बात सुनकर खूब खिलखिला कर हँसते और अपने माँ-बाप को चाय पिने को बोलते।

“बोलिए साहब। पीजिएगा घटिया चाय। एक बार पी कर देखिये, इससे खराब और घटिया चाय कहीं नहीं पिए होंगे आप।“ अंशुमन के कुछ न कहने पर उस चाय वाले ने दुबारा कहा।

“ठीक हैं भाई। अच्छी चाय अगली बार पी लेंगे। 2 घटिया चाय ही दे दो।” अंशुमन 20 रुपये का नोट पॉकेट से निकाल कर चाय वाले की ओर बढ़ाते हुए कहा।

चाय को न करना अंशुमन के बस की बात नहीं थी। वो बचपन से चाय प्रेमी था। उसकी सुबह चाय के साथ शुरू होती थी और रात चाय पीने के साथ ख़त्म। चाय की तलब ही अलग होती। चाय एक पेय पदार्थ नहीं, अपितु यह एक एहसास है। बच्चे, बूढ़े, अमीर, गरीब सारे चाय के शौक़ीन होते। चाहे कोई मेहमान आए या कोई गम हो, चाय हमेशा साथ देती। कॉफ़ी में तो दुनियादारी की रस्में ही निभाई जाती जनाब, असली रिश्ते तो आज भी चाय पर ही बनते है।

“लीजिए साहब।” अपने केतली के हाथी के सुढ़ जैसी नली से गर्म चाय को दो बड़ी-बड़ी कुल्हड़ वाली कप में उढ़ेल कर उस चाय वाले ने अंशुमन की ओर बढ़ा दिया।

अंशुमन ने एक कप वंशिका की ओर बढ़ा दिया।

“मुझे नहीं पीना है।“ वंशिका ने गुस्साते हुए कहा।

“अरे! अभी भी घोड़े वाली बात को लेकर बैठी हो। मजाक कर रहा था। चाय को भी कोई मना कर सकता है क्या भला?“ अंशुमन ने वंशिका के गुस्से को ठंडा करने के ख्याल से दुबारा चाय का कप उसकी ओर बढ़ा दिया।

“नहीं कहा न। नहीं पीना है मुझे।“ वंशिका ने चाय के कप को झटका देते हुए कहा।

झटका देने से चाय पूरी की पूरी अंशुमन के कपड़े में जा गिरी।

“माफ़ करना। गलती से गिर गया।“ वंशिका की आवाज़ की कठोरता गायब हो चुकी थी।

“कोई बात नहीं।“ अंशुमन अपने गुस्से को नियंत्रित करते हुए जवाब दिया।

“गलती मेरी है। मेरी वजह से ही तुम्हारी कमीज ख़राब हो गई। प्लीज, इससे पोछ लो।“ वंशिका अपने पर्स से रेशमी रुमाल निकाल कर अंशुमन की ओर बढ़ाते हुए कहा।

“कोई नहीं। मैं वाशरूम में कमीज साफ़ कर लेता हूँ।“

वाशरूम में जाकर अंशुमन अपना कमीज साफ़ करने लगा। अंशुमन को वंशिका का रवैया अजीब लगा। अभी थोड़े देर पहले तक तो सब सही था। चाय की बात से अचानक इतना गुस्सा हो जाना, उसे समझ नहीं आ रहा था। क्या वो इसलिए चाय नहीं पीना चाहती थी कि गलती से इस बहाने अंशुमन उसका चेहरा देख लेता? क्या वो कोई हीरोइन है या फिर उसका चेहरा इतना हसीन है कि वो किसी को दिखाना न चाहती हो। अंशुमन ये सब सोच ही रहा था कि उसकी नज़र वाशरूम के दरवाजे के अंदरी भाग पर पड़ी।

दरवाजे के भीतर वाले भाग में कुछ फ़ोन नंबर और अंग्रेजी में कुछ वाक्य लिखे हुए थे।

“रसीली बातें करने के लिए call करें”

“I am waiting for your call baby…love Sonam”

“मस्त बातें करने के लिए कॉल करे”

उसके बाद कुछ उटपुटांग अश्लील चित्र कलम से बनाएं हुए थे।

वैसे तो अंशुमन को बचपन से ऐसी बातें,  अश्लील चित्र  ट्रैन के टॉयलेट  में देखने को मिल जाती थी। पर उसकी कभी हिम्मत नहीं हुई कि उन नंबरों पर कॉल करके उन “हुस्न की मल्लिकाओं” से प्यार भरी बातें कर ले।

अंशुमन सोचने लगा कि अब वो बड़ा और matured हो गया है। क्यों न उनमें से एक नंबर पर कॉल करके कुछ हसीन बातें करके देखे। ये ख्याल उसे उस समय क्यों आया, वो उसे भी पता न था। शायद वंशिका के वर्ताव ने उसे ऐसा करने को विवश कर दिया था क्यूंकि जब आप किसी से प्यार चाहते और वो प्यार देने के बजाय नफरत देता तो आप प्यार को किसी और से उसी रूप में तलाशने लगते, शख्स तो अलग होता, पर उस शख्स के पीछे आप अपने प्रेमी या प्रेमिका को ही देख कर प्यार की तलाश में रहते।

अंशुमन ने बिना सोचे-समझे दरवाजे में लिखे एक फ़ोन नंबर जिसमें ‘with love Sonam’ लिखा था, उस पर कॉल लगा दिया।

पहली रिंग पूरी होने के बावजूद भी किसी ने फ़ोन नहीं उठाया।

अंशुमन दुबारा दरवाजे में लिखे नंबर को अपने डायल किये नंबर से बोल-बोल कर मिलाने लगा।

7 2 0 1 9

जब उसने सारा डिजिट मिला लिया तो देखा कि वो सही नंबर पर ही कॉल कर रहा था। अंशुमन ने  सोचा कि सोनम जी शायद कहीं व्यस्त होगी,  इसलिए उसका फ़ोन  नहीं उठाई। उसने दुबारा उस नंबर पर फ़ोन लगाया। उसके दिल की धड़कने बढ़ते चली जा रही थी। सोनम की आवाज सुनने को अंशुमन बेताब था। इस बार किसी ने फोन उठा लिया। अंशुमन जोर से चहका।

“हैलो”

“हेल्लो”

पर ये किसी लड़की की आवाज नहीं थी। किसी 16-17 साल के लड़के की आवाज थी। अंशुमन को लगा कि सोनम का शायद छोटा भाई होगा, जिसने फ़ोन उठाया।

“छोटू, अपनी दीदी को फ़ोन देना।” अंशुमन ने पूरे बेफिक्री और विश्वास से कहा ताकि उस “छोटू” को लगे कि अंशुमन उसकी दीदी का कोई दोस्त बोल रहा है और वो अपनी दीदी के डर से फ़ोन उसे तुरंत दे दे।

पर वो “छोटू” डरने के जगह गुस्से से बोला, “कौन दीदी बे !”

अंशुमन ये सुन कर थोड़ा सकपका गया और फिर धीरे से प्यार से बोला, “सोनम दीदी से बात करवा दीजिये।”।

“कौन सोनम दीदी बे, चमन चूतिये। आज गा* मारने के लिए मैं ही मिला हूँ क्या?”

उस ‘छोटू’ के बर्ताव से अंशुमन आग-बबूला हो गया। उसने सोचा कि सच बता देता हूँ कि उसकी दीदी कहाँ-कहाँ नंबर बांटते चल रही।

“आपकी दीदी का नंबर टॉयलेट के दरवाजे के पीछे लिखा हुआ था तो सोचा कि बात कर लूं।” अंशुमन ने बिल्ली के डर से अपने बिल में छुपे हुए चूहे जैसी हालात में कहा।

“अच्छा, अब समझ आया कि आपको मेरी दीदी का नंबर कहाँ से मिला।“

“वैसे आपको उनसे क्या बात करना है?”

“मस्त-मस्त बातें।“ अंशुमन के अंदर तड़प रही इच्छा उसके मुहं से बाहर निकल आई। पहली बार अंशुमन को ये एहसास हुआ कि बान से छोरा हुआ तीर और गर्लफ्रेंड के फ़ोन में रिचार्ज किये हुए पैसे कभी वापिस नही लौटते।

“भोस* के। साले! तुम्हें मस्त-मस्त बातें करनी है। तो कर न मुझसे लौ*। वहाँ मैंने अपना नंबर तुम जैसे चमन *** का गा* मारने के लिए ही लिखा था। साले! लड़की से बात करेगा। तेरा हम गा* मार लेंगे और पता भी न चलेगा, भोस* के। “

उसके बाद भी वो “छोटू” रुका नहीं और इतने सारे नए-नए और स्वयं रचित इतनी  गालियां अंशुमन को  दी जिसे अगर किसी वेबसीरीज में डाल दिया जाए तो तहलका मच जाए। अंशुमन को वो बंदा गाली सृजित करने  में इतना माहिर लगा कि अंत में अंशुमन को फ़ोन काट कर उस नंबर को ब्लॉक करना पड़ा।

फोन काट कर अंशुमन ये समझ गया था कि वो matured उस समय तक ही था,  जब तक उसने उन नम्बरों पर कभी कॉल नहीं किया था। अब वो “चमन ***” की केटेगरी में प्रवेश कर चुका था।

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ऐसी क्या बात थी कि वंशिका अपने चेहरे को अब तक छुपाई हुई थी? क्या उसे हीरोइन जैसे दिखने का घमंड था या बात कुछ और थी… चलिए पढ़ते है अगले अध्याय में….

 

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