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ऑनलाइन ज़िंदगी
चश्मा साफ करते हुए वृद्ध ने मुस्कुराकर अपनी पत्नी से कहा, "हमारे ज़माने में मोबाइल नहीं हुआ करते थे...!"
पत्नी भी मुस्कुरा उठी और बोली, "हाँ... लेकिन रोज़ शाम ठीक पाँच बजकर पचपन मिनट पर मैं दरवाज़े पर पानी का गिलास लेकर तुम्हारा इंतज़ार करती थी... और तुम बिना बताए आ जाते थे।"
वृद्ध ने प्यार से कहा,"तीस साल नौकरी की, लेकिन आज तक समझ नहीं पाया कि मैं घर आता था इसलिए तुम पानी लेकर खड़ी रहती थीं, या तुम मेरा इंतज़ार करती थीं इसलिए मेरे कदम अपने-आप घर की ओर मुड़ जाते थे...!"
पत्नी पुरानी यादों में खो गई। "याद है... जब तुम्हें डायाबिटीज़ नहीं थी, तब मैं तुम्हारी पसंद की खीर बनाया करती थी?"
पति हँस पड़े। "और कमाल तो यह था कि दोपहर में ऑफिस में बैठा सोचता था— आज अगर खीर मिल जाए तो मज़ा आ जाए... और घर पहुँचता तो सचमुच खीर बनी होती थी। लगता था जैसे हमारे दिलों के बीच कोई अदृश्य डोर बँधी हो।"
पत्नी की आँखें नम हो गईं। "जब मैं पहली बार माँ बनने वाली थी और मायके में थी, तभी अचानक प्रसव पीड़ा शुरू हुई। उस समय बस एक ही ख़याल आया— काश, तुम मेरे पास होते..."
"और कुछ ही देर बाद तुम अचानक मेरे सामने खड़े थे। आज भी सोचती हूँ, यह संयोग था या हमारे दिलों का रिश्ता...?"
पति मुस्कुराए। "उस दिन पता नहीं क्यों मन बेचैन था। लगा, तुम्हें मेरी ज़रूरत है... बस चला आया।"
पत्नी बोली, "तुम मेरी आँखों में देखकर कविता सुनाया करते थे..."
पति ने हँसते हुए कहा, "और जब तुम शरमाकर नज़रें झुका लेती थीं, मैं उसे अपनी कविता का सबसे प्यारा 'लाइक' समझता था।"
पत्नी मुस्कुराई। "एक दिन चाय बनाते समय मेरा हाथ जल गया था। शाम को तुम जेब से बर्नोल निकालकर बोले— 'इसे संभालकर रख लो।' तब समझ आया कि प्यार सिर्फ़ शब्दों में नहीं, छोटी-छोटी परवाहों में भी होता है।"
फिर पत्नी बोली, "तुम अचानक कह देते— ऑफिस आ जाना, आज फ़िल्म देखेंगे, बाहर खाना खाएँगे..."
पति बोले, "और हैरानी की बात यह थी कि जिस साड़ी में तुम्हें देखने की कल्पना मैं ऑफिस में करता था, तुम अक्सर वही पहनकर आ जाती थीं।"
दोनों एक-दूसरे का हाथ थामे कुछ पल चुप रहे।
फिर पत्नी बोली, "सच... हमारे ज़माने में मोबाइल नहीं थे।"
पति ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, "हाँ... क्योंकि उस समय मोबाइल नहीं, हम एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।"
पत्नी ने गहरी साँस लेते हुए कहा, "आज बच्चे साथ बैठते हैं, लेकिन बातें कम और व्हाट्सऐप ज़्यादा करते हैं।"
"रिश्तों में अपनापन नहीं, सिर्फ़ टैग है। संवाद नहीं, सिर्फ़ कमेंट हैं। प्यार नहीं, सिर्फ़ लाइक हैं। छोटी-सी नाराज़गी भी अब 'अनफ्रेंड' बन जाती है। बच्चों के साथी अब खिलौने नहीं, बल्कि मोबाइल गेम्स बन गए हैं।"
पति मुस्कुराए और बोले, "चलो, अब इन बातों को छोड़ो। हम तो अब 'वाइब्रेंट मोड' में हैं... और हमारी ज़िंदगी की बैटरी भी शायद आख़िरी बार चार्ज हो रही है।"
थोड़ी देर बाद पत्नी उठी।
पति ने पूछा, "कहाँ जा रही हो?"
पत्नी बोली, "तुम्हारे लिए चाय बनाने।"
पति मुस्कुराए, "अरे... मैं तो अभी यही कहने वाला था।"
पत्नी ने स्नेह से कहा, "अभी भी मैं तुम्हारी 'कवरेज' में हूँ। तुम्हारे दिल का हर संदेश बिना मोबाइल के सुन लेती हूँ।"
दोनों खिलखिलाकर हँस पड़े और एक साथ बोले—
"हाँ... हमारे ज़माने में मोबाइल नहीं थे, लेकिन दिल हमेशा नेटवर्क में रहते थे।"
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