आज्ञा चक्र ही आत्मधाम

आज्ञा चक्र ही आत्मधाम

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23 Jul 20248 min read

Published in spiritualism

||श्री सद्गुरवे नमः||

 

आज्ञा चक्र ही आत्मधाम

 

पहले ऋषिगण अपने शिष्यों का आज्ञा चक्र खोलने पर ही ज्यादा ध्यान देते थे। कुछ ऋषि जैसे अत्रि, विश्वमित्र, याज्ञवल्क्यादि बिना आज्ञा चक्र खुले अपने शिष्य को गृहस्थ जीवन में प्रवेश का ओदश ही नहीं देते हैं। वे ही ऋषि शादी के समय वर-वधु को लाल चंदन का टीका लगाने का आदेश दिए। जो कालान्तर में रूढ़ हो गया। औरतों का आज्ञा चक्र कमजोर होता है। यही कारण है कि वे सदा परावलम्बी बनी रहीं। वे सदा किसी पुरुष का आश्रय ग्रहण कीं। लाल चंदन एक तरफ उसके तृतीय नेत्र को खोलने में मदद करता है। दूसरी तरफ पति के लिए वह टीका करतीं जिसे सुहाग का प्रतीक कहा गया। पति, पत्नी के लिए टीका करता। सबसे पहले एक दूसरे का चेहरा देखते अर्थात् टीका ही देखते जिससे उन्हें ज्ञात होता कि हम लोगों का शारीरिक प्रेम ही नहीं है। शारीरिक आकर्षण क्षणिक है। इससे अच्छा तो मानसिक प्रेम है। पिता-पुत्र-पुत्री में मानसिक प्रेम होता; पति-पत्नी में होता। यह प्रेम भी स्थायी नहीं है। मन की तरह डांवांडोल है। तीसरा प्रेम तीसरे नेत्र का अर्थात् आज्ञा चक्र का अर्थात् आत्मा का प्रेम ही आत्मिक प्रेम कहलाता है। आत्मा शाश्वत है। यह प्रेम भी शाश्वत है। पति-पत्नी एक दूसरे से जन्मों जन्म आबद्ध हो जाते हैं।

आजकल औरतें प्लास्टिक की बिन्दी लगा रही हैं। वैज्ञानिक कहने लगे हैं कि वहाँ पिनियल ग्लेण्ड (Pineal gland) है। जो शरीर के लिए अति महत्त्वपूर्ण है। प्लास्टिक से वहां हवा तक नहीं जाती जिससे औरतों को कुष्ठ की बीमारी होने लगी है। दूसरी तरफ उनका चरित्र गिरने लगा है। लाल या सफेद चंदन आज्ञा चक्र को सक्रिय करता है जिससे आदमी या औरत स्वयं स्वावलम्बी, स्वतंत्र बनते हैं। बिन्दी औरतों को परतंत्र बनाने में सहायक हो रही है। उनका आत्मिक उत्थान की जगह पतन होने लगा है। जिससे वे नशा करने लगी हैं।

सृष्टि के सारे जीव का काम केन्द्र स्वतः सक्रिय हो जाता है। प्राणी को काम के सम्बन्ध में विचार उत्पन्न होता है मस्तिष्क में, एवं काम केन्द्र निम्नतम पर सक्रिय हो जाता है। उसे अलग से सक्रिय नहीं करना पड़ता है। साधक को ऐसा उपाय करना होगा कि काम का विचार ही मस्तिष्क में उत्पन्न न हो। विचार उत्पन्न हो आज्ञा चक्र को सक्रिय करने का। गुरु द्वारा प्रदत्त विधि से सदैव श्वास पर जाप का। बुद्धि से कुछ नहीं होता। बुद्धिवादी व्यक्ति जगत में सफल हो सकता है। वैज्ञानिक, वकील, डॉक्टर, अभिनेता के रूप में सफल हो सकता है। अध्यात्म में सफलता बिल्कुल असम्भव है। यहाँ बुद्धि हार जाएगी। जहाँ बुद्धि को कब्र में दफन कर देंगे। उसी कब्र से श्रद्धा का जन्म होगा। श्रद्धा से गुरु अनुकम्पा काम करेगी। आज्ञा, चक्र सक्रिय होगा। बुद्धिवादी दक्ष पुत्री को अपने शरीर के साथ बुद्धि को हवन कुण्ड में स्वाहा करना पड़ा। उसी राख पर उत्पन्न हो गई श्रद्धा की प्रतीक पार्वती। उनका आज्ञा चक्र खुल गया। अब वह स्वतंत्र हो गई।

बुद्धिवादी व्यक्ति बेचारा होता है। परतंत्र होता है। वह सुख-सुविधा बाहर खोजता है। श्रद्धावान व्यक्ति का आज्ञा चक्र खुल जाता है। शिव नेत्र खुल जाता है। अभी तक उसकी सारी इन्द्रियाँ सक्रिय थीं। सभी आदेश दे रही थीं। काम-केन्द्र काम के लिए, पेट भूख के लिए, जीभ स्वाद के लिए, आँख सुन्दरता के लिए, कान कर्ण प्रिय शब्द के लिए आदेश दे रहे हैं। बुद्धिवादी व्यक्ति इन्हें ही तृप्त करने में परेशान है। वह गुलाम है इन इन्द्रियों का।

आज्ञा चक्र सक्रिय होते ही ये इन्द्रियाँ बेचारी हो जाती हैं। गुलाम की तरह अपने-अपने केन्द्र में, घर में छिप जाती है। अब ये निरंतर अपने मालिक की तरफ मुखातिब हो जाती हैं। मालिक जो कहता है, उसे वे तत्क्षण क्रियान्वित कर देती हैं। इसी से इसका नाम है आज्ञा चक्र। अब मुख्यालय से आज्ञा दिया जाएगा। आज्ञा चक्र खुलते ही साधक परम स्वतंत्र हो जाता है। देवी-देवता भी उसके आदेश की कामना करते हैं।

जिसका आज्ञा चक्र सक्रिय है। चैतन्य है वह सृष्टि की किसी भी इकाई को आदेश दे सकता है। चाहे नदी हो, पर्वत हो, देवता हो, दानव हो। सभी को सहर्ष आज्ञा स्वीकार करनी ही पड़ती है। वही व्यक्ति महावीर है। स्वामी जी है।

आज्ञा चक्र खुलते ही समस्त मस्तिष्क तंतु खुल जाते हैं। जबकि बड़े-से-बड़े वैज्ञानिक का मस्तिष्क पचास प्रतिशत ही खुला रहता है। पचास प्रतिशत अक्रियाशील, शिथिल पड़ा रहता है। चूंकि उस पचास प्रतिशत का सम्बन्ध परलोक से है। आपके जन्मों जन्म का रिकॉर्ड भी वहीं है। उसका सीधा सम्बन्ध अलौकिक समस्त लोकों से है। आज्ञा चक्र खुलते ही समस्त लोकों से सीधा सम्पर्क स्थापित हो जाता है। सृष्टि का रहस्य स्वतः खुल जाता है।

आज्ञा चक्र का दो दल नीचे के लोकों से सम्बन्ध स्थापित करता है। उन्हें आदेश देता है। अपने नियंत्रण में रखता है। दोनों दल के मध्य का ज्योर्तिलिंग का सम्बन्ध विश्व ब्रह्माण्ड के हजारों लोक लोकान्तरों से है। वह एक तरह से सृष्टि का राजा है। दूसरी विचित्र स्थिति आती है कि इन इन्द्रियों की क्षमता अनन्त गुना बढ़ जाती है। साधक का वैचारिक एवं मानसिक सम्बन्ध सम्पूर्ण विश्व ब्रह्माण्ड में रहने वाली विभिन्न कोटि की वैदेही आत्माओं से अपने आप जुड़ जाता है। जैसे-आप मोबाइल में जैसे ही सिम कार्ड भरते हैं उसका सम्बन्ध सम्पूर्ण लौकिक जगत से स्वतः जुड़ जाता है। जिस देश में चाहे सीधे बात कर सकते हैं।

बौद्ध धर्म ने इस नेत्र पर बहुत काम किया है। लामा इस नेत्र को खोलने के लिए शल्य क्रिया करते हैं। मस्तक के मध्य में स्थित लगभग डेढ़ इंच भीतर उस बिन्दु को बाहर से काट देते हैं जिससे तीसरा नेत्र बाहर आ जाता है। इसमें उनको सफलता मिली है। फिर भी कोई बुद्ध नहीं बन सका। चूँकि साधना द्वारा भीतर से खोलना एवं शल्य क्रिया द्वारा बाहर से खोलने में बहुत अन्तर है। वह व्यक्ति साधारण हो सकता है। जैसे किसी को बिना डॉक्टर की पढ़ाई किए डॉक्टर की उपाधि दे दें एवं शल्य चिकित्सा हेतु उसके हाथ में छुरा पकड़ा दें।

वह व्यक्ति आज्ञा चक्र से कल्याणकारी आज्ञा कम दे सकता है। वह विध्वंसक, उपद्रवी आज्ञा देना प्रारम्भ कर देता है। सृष्टि के लिए खतरा उत्पन्न कर देता है। इतिहास में कई बार ऐसा हुआ है। रावण जैसे राक्षस ऐसे ही तांत्रिक क्रिया द्वारा अपना त्रिनेत्र खोल लिए थे।

आधुनिक युग में हिटलर (Hitler) के  साथ भी ऐसा ही हो गया था। जिससे ये लोग पूरे विश्व को अपने अधीनस्थ, वशीभूत करने लगते हैं। हिटलर का गुरु तंत्रवेत्ता डॉ. पोर्ग लाज था। 1909 में तांत्रिक अनुष्ठान से उसके आज्ञा चक्र की कुछ कोशिकाएँ टूट गई थीं जिससे उसका सम्बन्ध अपने आप कुछ पराशक्तियों से हो गया। 1930-32 से 1936 तक सक्रिय रहीं। वह रात्रि में पागल की तरह बोलता, शरीर ऐंठता रहा। पराशक्तियों से सामने वाले को वशीभूत कर उस पर अपना नियंत्रण करता परन्तु पराशक्तियों की या भूत-प्रेतात्माओं से लिए गए कार्य की कीमत चुकानी पड़ती है।

रावण की भी अपने पिताश्री विश्वश्रवा जी के द्वारा कराए गए अनुष्ठान से एवं ब्रह्मा जी की अनुकम्पा से आज्ञा चक्र की कुछ लाख कोशिकाएँ सक्रिय हो गई थीं। जिससे उनका सम्बन्ध ब्रह्माण्ड के क्रियाशील तामसिक पराशक्तियों से हो गया था। तंत्र की ऐसी बहुत क्रियाएं हैं जिससे आज्ञा चक्र का कुछ अंश विखण्डित हो जाता है। फिर तामसिक पराशक्तियों से सम्बन्ध स्वतः हो जाता है। रावण ने यही क्रिया अपने पुत्र मेघनाद पर भी की थी। पिता-पुत्र दोनों तामसिक प्रवृत्ति से दुनिया पर राज्य करना चाहते थे।

सदगुरु ऐसा कभी नहीं कर सकता है। वह खाली हाथ लौट सकता है लेकिन कुपात्र को अपनी विद्या कभी नहीं दे सकता है। वह पूरा जीवन प्रयासरत रहेगा कि हजारों में कोई एक शिष्य भी सुपात्र बन जाए। जिसे वह विद्या सौंप सके।

योगी आज्ञा चक्र के माध्यम से आत्म दर्शन करता है। सद्गुरु आज्ञा चक्र के माध्यम से शिष्य में शक्तिपात करता है। शक्तिपात शिष्य की योग्यता के अनुसार सद्गुरु विभिन्न चरणों में करता है। सद्गुरु शिष्य की क्षमता जन्मों जन्म की साधना, वैराग्यता, पात्रता देखकर ही निर्णय लेता है।

आज्ञा चक्र ही आत्म-धाम है। भगवान महावीर आत्मा को ही सब कुछ मान लिए थे। वे देवता-देवी सभी को नकार दिए। परमात्मा शब्द पर भी मौन हो गए। उनकी सोच उस समय के लिए उपयुक्त थी। जो साधक आत्म दर्शन कर लेगा, उससे फिर कुछ भी छिपा नहीं रहेगा। आज नहीं तो कल वह स्वयं परमात्मा को उपलब्ध हो जाएगा। आत्मा भी परमात्मा ही है। अतएव भगवान महावीर की सोच वैज्ञानिक थी। जिसकी बुद्धि, मन विभिन्न देवी-देवताओं में भ्रमण करती रही है, वह वैश्या की तरह खाली रह जाता है।

आत्मदर्शन ही परमात्म-दर्शन पूर्ण कराता है|

 

||हरि ॐ||

 

 

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‘समय के सदगुरु’ स्वामी  कृष्णानंद  जी महाराज

आप सद्विप्र समाज की रचना कर विश्व जनमानस को कल्याण मूलक सन्देश दे रहे हैं| सद्विप्र समाज सेवा एक आध्यात्मिक संस्था है, जो आपके निर्देशन में जीवन के सच्चे मर्म को उजागर कर शाश्वत शांति की ओर समाज को अग्रगति प्रदान करती है| आपने दिव्य गुप्त विज्ञान का अन्वेषण किया है, जिससे साधक शीघ्र ही साधना की ऊँचाई पर पहुँच सकता है| संसार की कठिनाई का सहजता से समाधान कर सकता है|

स्वामी जी के प्रवचन यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध हैं –

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पहले ऋषिगण अपने शिष्यों का आज्ञा चक्र खोलने पर ही ज्यादा ध्यान देते थे। कुछ ऋषि जैसे अत्रि, विश्वमित्र, याज्ञवल्क्यादि बिना आज्ञा चक्र खुले अपने शिष्य को गृहस्थ जीवन में प्रवेश का ओदश ही नहीं देते हैं। वे ही ऋषि शादी के समय वर-वधु को लाल चंदन का टीका लगाने का आदेश दिए। जो कालान्तर में रूढ़ हो गया। औरतों का आज्ञा चक्र कमजोर होता है। यही कारण है कि वे सदा परावलम्बी बनी रहीं। वे सदा किसी पुरुष का आश्रय ग्रहण कीं। लाल चंदन एक तरफ उसके तृतीय नेत्र को खोलने में मदद करता है। दूसरी तरफ पति के लिए वह टीका करतीं जिसे सुहाग का प्रतीक कहा गया। पति, पत्नी के लिए टीका करता। सबसे पहले एक दूसरे का चेहरा देखते अर्थात् टीका ही देखते जिससे उन्हें ज्ञात होता कि हम लोगों का शारीरिक प्रेम ही नहीं है। शारीरिक आकर्षण क्षणिक है। इससे अच्छा तो मानसिक प्रेम है। पिता-पुत्र-पुत्री में मानसिक प्रेम होता; पति-पत्नी में होता। यह प्रेम भी स्थायी नहीं है। मन की तरह डांवांडोल है। तीसरा प्रेम तीसरे नेत्र का अर्थात् आज्ञा चक्र का अर्थात् आत्मा का प्रेम ही आत्मिक प्रेम कहलाता है। आत्मा शाश्वत है। यह प्रेम भी शाश्वत है। पति-पत्नी एक दूसरे से जन्मों जन्म आबद्ध हो जाते हैं।

आजकल औरतें प्लास्टिक की बिन्दी लगा रही हैं। वैज्ञानिक कहने लगे हैं कि वहाँ पिनियल ग्लेण्ड (Pineal gland) है। जो शरीर के लिए अति महत्त्वपूर्ण है। प्लास्टिक से वहां हवा तक नहीं जाती जिससे औरतों को कुष्ठ की बीमारी होने लगी है। दूसरी तरफ उनका चरित्र गिरने लगा है। लाल या सफेद चंदन आज्ञा चक्र को सक्रिय करता है जिससे आदमी या औरत स्वयं स्वावलम्बी, स्वतंत्र बनते हैं। बिन्दी औरतों को परतंत्र बनाने में सहायक हो रही है। उनका आत्मिक उत्थान की जगह पतन होने लगा है। जिससे वे नशा करने लगी हैं।

सृष्टि के सारे जीव का काम केन्द्र स्वतः सक्रिय हो जाता है। प्राणी को काम के सम्बन्ध में विचार उत्पन्न होता है मस्तिष्क में, एवं काम केन्द्र निम्नतम पर सक्रिय हो जाता है। उसे अलग से सक्रिय नहीं करना पड़ता है। साधक को ऐसा उपाय करना होगा कि काम का विचार ही मस्तिष्क में उत्पन्न न हो। विचार उत्पन्न हो आज्ञा चक्र को सक्रिय करने का। गुरु द्वारा प्रदत्त विधि से सदैव श्वास पर जाप का। बुद्धि से कुछ नहीं होता। बुद्धिवादी व्यक्ति जगत में सफल हो सकता है। वैज्ञानिक, वकील, डॉक्टर, अभिनेता के रूप में सफल हो सकता है। अध्यात्म में सफलता बिल्कुल असम्भव है। यहाँ बुद्धि हार जाएगी। जहाँ बुद्धि को कब्र में दफन कर देंगे। उसी कब्र से श्रद्धा का जन्म होगा। श्रद्धा से गुरु अनुकम्पा काम करेगी। आज्ञा, चक्र सक्रिय होगा। बुद्धिवादी दक्ष पुत्री को अपने शरीर के साथ बुद्धि को हवन कुण्ड में स्वाहा करना पड़ा। उसी राख पर उत्पन्न हो गई श्रद्धा की प्रतीक पार्वती। उनका आज्ञा चक्र खुल गया। अब वह स्वतंत्र हो गई।

बुद्धिवादी व्यक्ति बेचारा होता है। परतंत्र होता है। वह सुख-सुविधा बाहर खोजता है। श्रद्धावान व्यक्ति का आज्ञा चक्र खुल जाता है। शिव नेत्र खुल जाता है। अभी तक उसकी सारी इन्द्रियाँ सक्रिय थीं। सभी आदेश दे रही थीं। काम-केन्द्र काम के लिए, पेट भूख के लिए, जीभ स्वाद के लिए, आँख सुन्दरता के लिए, कान कर्ण प्रिय शब्द के लिए आदेश दे रहे हैं। बुद्धिवादी व्यक्ति इन्हें ही तृप्त करने में परेशान है। वह गुलाम है इन इन्द्रियों का।

आज्ञा चक्र सक्रिय होते ही ये इन्द्रियाँ बेचारी हो जाती हैं। गुलाम की तरह अपने-अपने केन्द्र में, घर में छिप जाती है। अब ये निरंतर अपने मालिक की तरफ मुखातिब हो जाती हैं। मालिक जो कहता है, उसे वे तत्क्षण क्रियान्वित कर देती हैं। इसी से इसका नाम है आज्ञा चक्र। अब मुख्यालय से आज्ञा दिया जाएगा। आज्ञा चक्र खुलते ही साधक परम स्वतंत्र हो जाता है। देवी-देवता भी उसके आदेश की कामना करते हैं।

जिसका आज्ञा चक्र सक्रिय है। चैतन्य है वह सृष्टि की किसी भी इकाई को आदेश दे सकता है। चाहे नदी हो, पर्वत हो, देवता हो, दानव हो। सभी को सहर्ष आज्ञा स्वीकार करनी ही पड़ती है। वही व्यक्ति महावीर है। स्वामी जी है।

आज्ञा चक्र खुलते ही समस्त मस्तिष्क तंतु खुल जाते हैं। जबकि बड़े-से-बड़े वैज्ञानिक का मस्तिष्क पचास प्रतिशत ही खुला रहता है। पचास प्रतिशत अक्रियाशील, शिथिल पड़ा रहता है। चूंकि उस पचास प्रतिशत का सम्बन्ध परलोक से है। आपके जन्मों जन्म का रिकॉर्ड भी वहीं है। उसका सीधा सम्बन्ध अलौकिक समस्त लोकों से है। आज्ञा चक्र खुलते ही समस्त लोकों से सीधा सम्पर्क स्थापित हो जाता है। सृष्टि का रहस्य स्वतः खुल जाता है।

आज्ञा चक्र का दो दल नीचे के लोकों से सम्बन्ध स्थापित करता है। उन्हें आदेश देता है। अपने नियंत्रण में रखता है। दोनों दल के मध्य का ज्योर्तिलिंग का सम्बन्ध विश्व ब्रह्माण्ड के हजारों लोक लोकान्तरों से है। वह एक तरह से सृष्टि का राजा है। दूसरी विचित्र स्थिति आती है कि इन इन्द्रियों की क्षमता अनन्त गुना बढ़ जाती है। साधक का वैचारिक एवं मानसिक सम्बन्ध सम्पूर्ण विश्व ब्रह्माण्ड में रहने वाली विभिन्न कोटि की वैदेही आत्माओं से अपने आप जुड़ जाता है। जैसे-आप मोबाइल में जैसे ही सिम कार्ड भरते हैं उसका सम्बन्ध सम्पूर्ण लौकिक जगत से स्वतः जुड़ जाता है। जिस देश में चाहे सीधे बात कर सकते हैं।

बौद्ध धर्म ने इस नेत्र पर बहुत काम किया है। लामा इस नेत्र को खोलने के लिए शल्य क्रिया करते हैं। मस्तक के मध्य में स्थित लगभग डेढ़ इंच भीतर उस बिन्दु को बाहर से काट देते हैं जिससे तीसरा नेत्र बाहर आ जाता है। इसमें उनको सफलता मिली है। फिर भी कोई बुद्ध नहीं बन सका। चूँकि साधना द्वारा भीतर से खोलना एवं शल्य क्रिया द्वारा बाहर से खोलने में बहुत अन्तर है। वह व्यक्ति साधारण हो सकता है। जैसे किसी को बिना डॉक्टर की पढ़ाई किए डॉक्टर की उपाधि दे दें एवं शल्य चिकित्सा हेतु उसके हाथ में छुरा पकड़ा दें।

वह व्यक्ति आज्ञा चक्र से कल्याणकारी आज्ञा कम दे सकता है। वह विध्वंसक, उपद्रवी आज्ञा देना प्रारम्भ कर देता है। सृष्टि के लिए खतरा उत्पन्न कर देता है। इतिहास में कई बार ऐसा हुआ है। रावण जैसे राक्षस ऐसे ही तांत्रिक क्रिया द्वारा अपना त्रिनेत्र खोल लिए थे।

आधुनिक युग में हिटलर (Hitler) के  साथ भी ऐसा ही हो गया था। जिससे ये लोग पूरे विश्व को अपने अधीनस्थ, वशीभूत करने लगते हैं। हिटलर का गुरु तंत्रवेत्ता डॉ. पोर्ग लाज था। 1909 में तांत्रिक अनुष्ठान से उसके आज्ञा चक्र की कुछ कोशिकाएँ टूट गई थीं जिससे उसका सम्बन्ध अपने आप कुछ पराशक्तियों से हो गया। 1930-32 से 1936 तक सक्रिय रहीं। वह रात्रि में पागल की तरह बोलता, शरीर ऐंठता रहा। पराशक्तियों से सामने वाले को वशीभूत कर उस पर अपना नियंत्रण करता परन्तु पराशक्तियों की या भूत-प्रेतात्माओं से लिए गए कार्य की कीमत चुकानी पड़ती है।

रावण की भी अपने पिताश्री विश्वश्रवा जी के द्वारा कराए गए अनुष्ठान से एवं ब्रह्मा जी की अनुकम्पा से आज्ञा चक्र की कुछ लाख कोशिकाएँ सक्रिय हो गई थीं। जिससे उनका सम्बन्ध ब्रह्माण्ड के क्रियाशील तामसिक पराशक्तियों से हो गया था। तंत्र की ऐसी बहुत क्रियाएं हैं जिससे आज्ञा चक्र का कुछ अंश विखण्डित हो जाता है। फिर तामसिक पराशक्तियों से सम्बन्ध स्वतः हो जाता है। रावण ने यही क्रिया अपने पुत्र मेघनाद पर भी की थी। पिता-पुत्र दोनों तामसिक प्रवृत्ति से दुनिया पर राज्य करना चाहते थे।

सदगुरु ऐसा कभी नहीं कर सकता है। वह खाली हाथ लौट सकता है लेकिन कुपात्र को अपनी विद्या कभी नहीं दे सकता है। वह पूरा जीवन प्रयासरत रहेगा कि हजारों में कोई एक शिष्य भी सुपात्र बन जाए। जिसे वह विद्या सौंप सके।

योगी आज्ञा चक्र के माध्यम से आत्म दर्शन करता है। सद्गुरु आज्ञा चक्र के माध्यम से शिष्य में शक्तिपात करता है। शक्तिपात शिष्य की योग्यता के अनुसार सद्गुरु विभिन्न चरणों में करता है। सद्गुरु शिष्य की क्षमता जन्मों जन्म की साधना, वैराग्यता, पात्रता देखकर ही निर्णय लेता है।

आज्ञा चक्र ही आत्म-धाम है। भगवान महावीर आत्मा को ही सब कुछ मान लिए थे। वे देवता-देवी सभी को नकार दिए। परमात्मा शब्द पर भी मौन हो गए। उनकी सोच उस समय के लिए उपयुक्त थी। जो साधक आत्म दर्शन कर लेगा, उससे फिर कुछ भी छिपा नहीं रहेगा। आज नहीं तो कल वह स्वयं परमात्मा को उपलब्ध हो जाएगा। आत्मा भी परमात्मा ही है। अतएव भगवान महावीर की सोच वैज्ञानिक थी। जिसकी बुद्धि, मन विभिन्न देवी-देवताओं में भ्रमण करती रही है, वह वैश्या की तरह खाली रह जाता है।

आत्मदर्शन ही परमात्म-दर्शन पूर्ण कराता है|

 

||हरि ॐ||

 

 

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‘समय के सदगुरु’ स्वामी  कृष्णानंद  जी महाराज

आप सद्विप्र समाज की रचना कर विश्व जनमानस को कल्याण मूलक सन्देश दे रहे हैं| सद्विप्र समाज सेवा एक आध्यात्मिक संस्था है, जो आपके निर्देशन में जीवन के सच्चे मर्म को उजागर कर शाश्वत शांति की ओर समाज को अग्रगति प्रदान करती है| आपने दिव्य गुप्त विज्ञान का अन्वेषण किया है, जिससे साधक शीघ्र ही साधना की ऊँचाई पर पहुँच सकता है| संसार की कठिनाई का सहजता से समाधान कर सकता है|

स्वामी जी के प्रवचन यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध हैं –

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