एक दिवाली ऐसी भी ….

एक दिवाली ऐसी भी ….

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namrata gupta

21 Oct 20253 min read

Published in storiesdiwali

एक दिवाली ऐसी भी ….

 

“बिरजू , तुम यहाँ क्या कर रहे हो?” रास्ते मे बैठे बिरजू पर नज़र पड़ते ही डाकिया ने पूछा |

“कुछ नहीं काका … बस ऐसे ही बैठा हूँ |”

“अरे ! आज तो दिवाली का दिन है तुम पटाखे नहीं फोड़ोगे? जाओ, घर जाओ… घर जाकर तैयार होकर दीये जलाओ , पटाखे फोड़ो |”

बिरजू पर डाकिये की बात का कुछ असर नहीं हुआ , वह बैठा ही रहा |

बिरजू, जो सात साल का बच्चा था , बचपन मे ही उसके माता – पिता का देहांत हो गया था | उसके जीने का एक मात्र सहारा उसकी बूढी दादी थी या फिर ऐसे भी कहना ठीक रहेगा की उसकी बूढी दादी के जीने का एकमात्र सहारा उनका पोता बिरजू था | दादी बहुत बूढी हो चुकी थी | दूसरों के घरों मे छोटे – मोटे काम करके अपना और बिरजू का पेट पालती थी

“बिरजू, घर जाओ… तुम्हारी दादी तुम्हारा इंतज़ार कर रही होगी |”

बिरजू अचानक से बोल पड़ा – “काका , आप तो सबकी चिट्ठियाँ लाते हो न ? आप मेरे माता – पिता की कोई भी चिठ्ठी क्यों नहीं लाते हो कभी? क्या कभी मेरे माता – पिता की चिट्ठी नहीं आएगी?”

सात साल का मासूम बिरजू शायद यह समझ ही नहीं पाया था की उसके माता – पिता उससे बहुत दूर जा चुके है , वहाँ से कोई भी चिट्ठी नहीं आ सकती |

बिरजू की बाते सुनकर डाकिये की आँखें भर आई | वह बिरजू को गोद में उठा लेता है फिर पूछता है, “क्या बात है बेटा आज माता – पिता की बहुत याद आ रही है क्या?”

“मेरे दोस्त लल्लन के माता – पिता उसके लिए नए कपडे लाये है , मिठाइयाँ और पटाके भी लाये है पर मेरे माता – पिता पता नहीं कहा है और दादी के पास इतने पैसे कहा की इन सब चीजों को खरीद सके।” बिरजू ने नाम आँखों से कहा।

इन सब बातों को सुनकर डाकिये की आँखें पूरी तरह से भीग जाती है। फिर वह बिरजू को लेकर बाज़ार जाता है और जिन पैसों से वह अपने बच्चो के लिए पटाखे और मिठाइयाँ लेन बाज़ार जा रहा था , उन पैसों से बिरजू के लिए पटाखे और मिठाइयाँ खरीद लेता है | इन सारी चीजों को पाकर बिरजू की आखें चमक उठती और वह अपने डाकिया काका को गले लगा लेता है|

बिरजू को ढूँढ़ते – ढूँढ़ते उसकी दादी भी वह पहुँच जाती है, फिर डाकिया मिठाई और पटाखे के डब्बे को दादी के हाथों में पकड़कर वापस घर जाने लगता है |

भले ही वह अपने बच्चों के लिए इस दिवाली पर पटाखे नहीं खरीद पाया, पर मासूम बिरजू के चेहरे पर पटाखे और मिठाई देखकर जो मुस्कान आई थी वह डाकिये के लिए बहुत अनमोल थी| डाकिया अपने घर की ओर बढ़ता जा रहा था, मासूम बिरजू के चेहरे पर आई मुस्कान को याद कर बहुत शांत भाव से मुस्कुरा रहा था|

 

“दिल और दिमाग मे यह बात याद रखिये
दूसरों की मदद करने के लिए जज़्बात रखिये” |

 

 

नम्रता गुप्ता

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एक दिवाली ऐसी भी ….

 

“बिरजू , तुम यहाँ क्या कर रहे हो?” रास्ते मे बैठे बिरजू पर नज़र पड़ते ही डाकिया ने पूछा |

“कुछ नहीं काका … बस ऐसे ही बैठा हूँ |”

“अरे ! आज तो दिवाली का दिन है तुम पटाखे नहीं फोड़ोगे? जाओ, घर जाओ… घर जाकर तैयार होकर दीये जलाओ , पटाखे फोड़ो |”

बिरजू पर डाकिये की बात का कुछ असर नहीं हुआ , वह बैठा ही रहा |

बिरजू, जो सात साल का बच्चा था , बचपन मे ही उसके माता – पिता का देहांत हो गया था | उसके जीने का एक मात्र सहारा उसकी बूढी दादी थी या फिर ऐसे भी कहना ठीक रहेगा की उसकी बूढी दादी के जीने का एकमात्र सहारा उनका पोता बिरजू था | दादी बहुत बूढी हो चुकी थी | दूसरों के घरों मे छोटे – मोटे काम करके अपना और बिरजू का पेट पालती थी

“बिरजू, घर जाओ… तुम्हारी दादी तुम्हारा इंतज़ार कर रही होगी |”

बिरजू अचानक से बोल पड़ा – “काका , आप तो सबकी चिट्ठियाँ लाते हो न ? आप मेरे माता – पिता की कोई भी चिठ्ठी क्यों नहीं लाते हो कभी? क्या कभी मेरे माता – पिता की चिट्ठी नहीं आएगी?”

सात साल का मासूम बिरजू शायद यह समझ ही नहीं पाया था की उसके माता – पिता उससे बहुत दूर जा चुके है , वहाँ से कोई भी चिट्ठी नहीं आ सकती |

बिरजू की बाते सुनकर डाकिये की आँखें भर आई | वह बिरजू को गोद में उठा लेता है फिर पूछता है, “क्या बात है बेटा आज माता – पिता की बहुत याद आ रही है क्या?”

“मेरे दोस्त लल्लन के माता – पिता उसके लिए नए कपडे लाये है , मिठाइयाँ और पटाके भी लाये है पर मेरे माता – पिता पता नहीं कहा है और दादी के पास इतने पैसे कहा की इन सब चीजों को खरीद सके।” बिरजू ने नाम आँखों से कहा।

इन सब बातों को सुनकर डाकिये की आँखें पूरी तरह से भीग जाती है। फिर वह बिरजू को लेकर बाज़ार जाता है और जिन पैसों से वह अपने बच्चो के लिए पटाखे और मिठाइयाँ लेन बाज़ार जा रहा था , उन पैसों से बिरजू के लिए पटाखे और मिठाइयाँ खरीद लेता है | इन सारी चीजों को पाकर बिरजू की आखें चमक उठती और वह अपने डाकिया काका को गले लगा लेता है|

बिरजू को ढूँढ़ते – ढूँढ़ते उसकी दादी भी वह पहुँच जाती है, फिर डाकिया मिठाई और पटाखे के डब्बे को दादी के हाथों में पकड़कर वापस घर जाने लगता है |

भले ही वह अपने बच्चों के लिए इस दिवाली पर पटाखे नहीं खरीद पाया, पर मासूम बिरजू के चेहरे पर पटाखे और मिठाई देखकर जो मुस्कान आई थी वह डाकिये के लिए बहुत अनमोल थी| डाकिया अपने घर की ओर बढ़ता जा रहा था, मासूम बिरजू के चेहरे पर आई मुस्कान को याद कर बहुत शांत भाव से मुस्कुरा रहा था|

 

“दिल और दिमाग मे यह बात याद रखिये
दूसरों की मदद करने के लिए जज़्बात रखिये” |

 

 

नम्रता गुप्ता

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