गिलहरी

गिलहरी

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meenu yatin

30 Jul 20244 min read

Published in stories

गिलहरी

 

घर के काम समेट कर मै अपने कमरे में जा ही रही थी कि माँ ने पुकारा ,”बेटा जरा इधर आना” । माँ ने एक शादी का कार्ड देते हुए कहा, “छोटी मौसी की बेटी की शादी है, मैं तो जा नहीं पाऊगीं तुम और शिव हो आना।”

मौसी के घर पहुँच के हम तैयारी में व्यस्त हो गए। पूरा माहौल ही खुशनुमा था। तभी एक १८-१९ सालकी लड़की गुड़िया, बार बार आती कुछ भी बोलती और जोर से हँसती। वो शिव के मामा जी की बेटी थी।

जैसा नाम वैसा ही रुप, छोटा कद, गोल चेहरा, बोलती आँखो में शरारत, हसीं से भरे होंठ ,मानो अब हँसी छलक पडे़गी। छोटे बच्चे उसके आगे पीछे साथ ही रहते, बड़े बुर्जग जब उसे बुलाते ,वो खुशी से सबके काम सुनती। वो सब उसे दुलार करते। हँसती, तो इतना हँसती के गिर ही पड़ेगी।

मुझे पहले बड़ा अटपटा लगा। ऐसे कौन करता है!

मैं अपना ध्यान उससे हटा कर सब रस्मों में लग गयी। विदाई हो चुकी ,सब धीरे -धीरे अपने घर जाने की तैयारी करने लगे। पर वो मौसी के साथ रही, उनका ध्यान रखती। हम घर वापस आ गए। अपने रोजमर्रा के कामों में व्यस्त।

कुछ दिनों बाद मामी जी हमारे घर आईं, गुड़िया के साथ। वो आते ही माँ के साथ बातचीत में मशगूल हो गईं । गुड़िया रसोई के दरवाजे से झांक कर मुझे देख रही थी। मैने उसे मुस्कुरा कर देखा और अंदर बुलाया। वो इधर- उधर सब देखती रही। फिर मुझसे बातें करने लगी। कितने ही किस्से सुना डाले उसने, उन लोगो के, जिन्हें मैं जानती भी नहीं थी। पर उसकी बातों पर मैं बहुत हंसती, मेरी दिलचस्पी बढ़ रही थी। उसका बेवजह जोर से हंसना अब अटपटा नहीं लगता था। बल्कि वो मुझे अच्छा लगने लगा।

मामी जी चली गई पर माँ ने उसे कुछ दिनों के लिए रोक लिया। मेरे साथ रहती या माँ के पास, मेरे बेटे को गोद में लिए घूमती रहती ,उसके साथ खेलती। यहाँ- वहाँ खेलती फुदकती। वो दौड़ती -भागती अपने में ही मस्त। गिलहरी देखते ही हंसने लगती थी ।मैं उसे चिढा़ती, उसे गिलहरी कहकर बुलाती ।

उसके साथ दिन कैसे बीत गए पता ही नहीं चला। मामा जी उसे लेने आए। उसके जाने से घर सूना सा हो गया।

कुछ महीनों बाद सुना, उसकी शादी एक संयुक्त परिवार में कर दी गई। माँ की तबीयत बहुत खराब होने के नाते मैं उसकी शादी में शामिल न हो सकी। वो विदा होकर अपने परिवार के साथ दिल्ली चली गई।

अक्सर हम फोन किया करते ,हाल खबर मिलती रहती। उसका स्वभाव ही ऐसा था कि सब को अपना बना लेती थी। बड़ी बहू होने की जिम्मेदारी उसने बखूबी निभाई। वो खुश थी पर अब उसकी हसीं वैसे नहीं रही। धीमी आवाज में बात करती। अब अल्हड़पन की जगह परिपक्वता ने ले ली ।

शिव को आफ़िस के काम से दिल्ली जाना था, मैं भी गुड़िया को मिलना चाहती थी तो साथ चली गई।। वो मुझे देख कर दौड़ती हुई आई, मेरे गले लग गई। खुशी के मारे या स्नेह की अभिव्यक्ति, वो रोने लगी। काफी देर यूँ हीं ,मैं उसका सिर सहलाती, दुलार करती खडी़ रही। मैं उसके घर जितनी देर रही, वो मेरे पास बैठी रही ।वापस लौटने पर एक संतुष्टि थी कि परिवार अच्छा है।

बेटियाँ कितनी जल्दी बड़ी हो जाती हैं ।

मैं उसके बारे में सोचती रही। कितना कुछ बदल जाता है उम्र के साथ, रिश्तों के बीच ,समय के अनुसार। समझदारी से भरी उसकी बातें, और चीजों के प्रति उसका सकारात्मक सोच, उसका बदलाव दिखा रही थीं।

मेरी तंद्रा भंग हुई नीम के पेड़ पर से उतर कर मेरे कमरे की खिड़की पर झाँकती एक गिलहरी को देखकर।
मैं मुस्करा उठी। भले ही वो किसी के लिए कैसी भी हो। मेरे लिए, वो हमेशा मेरी प्यारी गिलहरी ही रहेगी।

 

मीनू यतिन

 

Photo by Jill Wellington: https://www.pexels.com/photo/woman-holding-brown-basket-with-yellow-flowers-413707/

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मौसी के घर पहुँच के हम तैयारी में व्यस्त हो गए। पूरा माहौल ही खुशनुमा था। तभी एक १८-१९ सालकी लड़की गुड़िया, बार बार आती कुछ भी बोलती और जोर से हँसती। वो शिव के मामा जी की बेटी थी।

जैसा नाम वैसा ही रुप, छोटा कद, गोल चेहरा, बोलती आँखो में शरारत, हसीं से भरे होंठ ,मानो अब हँसी छलक पडे़गी। छोटे बच्चे उसके आगे पीछे साथ ही रहते, बड़े बुर्जग जब उसे बुलाते ,वो खुशी से सबके काम सुनती। वो सब उसे दुलार करते। हँसती, तो इतना हँसती के गिर ही पड़ेगी।

मुझे पहले बड़ा अटपटा लगा। ऐसे कौन करता है!

मैं अपना ध्यान उससे हटा कर सब रस्मों में लग गयी। विदाई हो चुकी ,सब धीरे -धीरे अपने घर जाने की तैयारी करने लगे। पर वो मौसी के साथ रही, उनका ध्यान रखती। हम घर वापस आ गए। अपने रोजमर्रा के कामों में व्यस्त।

कुछ दिनों बाद मामी जी हमारे घर आईं, गुड़िया के साथ। वो आते ही माँ के साथ बातचीत में मशगूल हो गईं । गुड़िया रसोई के दरवाजे से झांक कर मुझे देख रही थी। मैने उसे मुस्कुरा कर देखा और अंदर बुलाया। वो इधर- उधर सब देखती रही। फिर मुझसे बातें करने लगी। कितने ही किस्से सुना डाले उसने, उन लोगो के, जिन्हें मैं जानती भी नहीं थी। पर उसकी बातों पर मैं बहुत हंसती, मेरी दिलचस्पी बढ़ रही थी। उसका बेवजह जोर से हंसना अब अटपटा नहीं लगता था। बल्कि वो मुझे अच्छा लगने लगा।

मामी जी चली गई पर माँ ने उसे कुछ दिनों के लिए रोक लिया। मेरे साथ रहती या माँ के पास, मेरे बेटे को गोद में लिए घूमती रहती ,उसके साथ खेलती। यहाँ- वहाँ खेलती फुदकती। वो दौड़ती -भागती अपने में ही मस्त। गिलहरी देखते ही हंसने लगती थी ।मैं उसे चिढा़ती, उसे गिलहरी कहकर बुलाती ।

उसके साथ दिन कैसे बीत गए पता ही नहीं चला। मामा जी उसे लेने आए। उसके जाने से घर सूना सा हो गया।

कुछ महीनों बाद सुना, उसकी शादी एक संयुक्त परिवार में कर दी गई। माँ की तबीयत बहुत खराब होने के नाते मैं उसकी शादी में शामिल न हो सकी। वो विदा होकर अपने परिवार के साथ दिल्ली चली गई।

अक्सर हम फोन किया करते ,हाल खबर मिलती रहती। उसका स्वभाव ही ऐसा था कि सब को अपना बना लेती थी। बड़ी बहू होने की जिम्मेदारी उसने बखूबी निभाई। वो खुश थी पर अब उसकी हसीं वैसे नहीं रही। धीमी आवाज में बात करती। अब अल्हड़पन की जगह परिपक्वता ने ले ली ।

शिव को आफ़िस के काम से दिल्ली जाना था, मैं भी गुड़िया को मिलना चाहती थी तो साथ चली गई।। वो मुझे देख कर दौड़ती हुई आई, मेरे गले लग गई। खुशी के मारे या स्नेह की अभिव्यक्ति, वो रोने लगी। काफी देर यूँ हीं ,मैं उसका सिर सहलाती, दुलार करती खडी़ रही। मैं उसके घर जितनी देर रही, वो मेरे पास बैठी रही ।वापस लौटने पर एक संतुष्टि थी कि परिवार अच्छा है।

बेटियाँ कितनी जल्दी बड़ी हो जाती हैं ।

मैं उसके बारे में सोचती रही। कितना कुछ बदल जाता है उम्र के साथ, रिश्तों के बीच ,समय के अनुसार। समझदारी से भरी उसकी बातें, और चीजों के प्रति उसका सकारात्मक सोच, उसका बदलाव दिखा रही थीं।

मेरी तंद्रा भंग हुई नीम के पेड़ पर से उतर कर मेरे कमरे की खिड़की पर झाँकती एक गिलहरी को देखकर।
मैं मुस्करा उठी। भले ही वो किसी के लिए कैसी भी हो। मेरे लिए, वो हमेशा मेरी प्यारी गिलहरी ही रहेगी।

 

मीनू यतिन

 

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