
सेवा-संकीर्तन
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सेवा-संकीर्तन
||श्री सद्गुरवे नमः||
प्रिय आत्मन!
हम लोग कुछ मकसद से मिले हैं आज। वैसे तो हम मिलते रहे हैं भूलते रहे हैं फिर-फिर मिलते हैं। इतिहास अपने को दुहराता है। पांच हजार वर्ष पर अपना वायदा पूरा करने हम मिलते हैं। अन्तराल के कारण हम भूल जाते हैं। फिर नया इतिहास रचते हैं। प्रभु-अनुकंपा वाले पूर्व वायदे को समझते हैं। गुरु की सेवा, सुमिरन, समर्पण को जुटते हैं।
शरीर की शुद्धि के लिए सेवा जरूरी है। ईसाईयत और भारत का सिक्ख धर्म केवल सेवा पर टिका है। यह विधि भगवान श्री कृष्ण की है। पांडवों के यज्ञ में कृष्ण मुख्य अतिथि थे। सबके कामों का बंटवारा हो गया था। कृष्ण ने पूछा युधिष्ठिर से-मेरे लायक कोई काम भी बचा है, जरा सेवा का ब्यौरा देखें। ब्यौरा देखकर जो काम छूटा था, कृष्ण ने अपने नाम पर अंकित कर दिया-काम था आने वाले का पैर पखारना, पीताम्बर से पोंछना और दूसरा काम था, भोजनोपरान्त अभ्यागतों का जूठा पत्तल उठाना। ये दोनों काम नौकरों के जिम्मे मान लिया गया था। युधिष्ठिर चौंक पड़े-पूछा- प्रभु! आप यह काम करेंगे- इस यज्ञ में आपकी अग्र-पूजा होने वाली है। लोग क्या कहेंगे?
परन्तु कृष्ण ने पूरे यज्ञ में यही किया। साधु महात्माओं के पैर धोए, पीतांबर से पैर पोछें, जूठे पत्तल उठाए। यह काम नौकरों पर ही छोड़ने लायक था, पर सेवाभाव से स्वयं किया। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में इस भक्ति भाव का अभाव है। सिक्खों में यह प्रथा है। सिक्ख अपने लंगर में हलवाई नहीं बुलाते। भाई, बहन खुद भोजन बनाते हैं। खुद जूठन उठाते हैं। वे कृष्ण के करीब हैं। हम लोग तो अतिथि की तरह सत्संग भंडारे में जाते हैं। बल्कि अपनी सुख-सुविधा की चिन्ता जताते हैं। सिक्खों में बहनें भोजन बनाती हैं। पुरुष आगंतुकों के जूते साफ करते हैं।
नानक जन्मे, उन्होंने कृष्ण का चतुश्लोकि गीता-श्लोक पढ़ा। वे सेवा का भाव लेकर चले। सेवा पर ही यह धर्म टिका है। यह पहले हिन्दू धर्म में भी था, अब लोप हो गया है। शरीर निरोग होता है सेवा से- जानकीदास। जानकीदास ने सेवा का अवसर उपलब्ध किया है।
वाणी शुद्ध होती है कीर्तन से। ‘श्री राम जयराम! जय जय राम ||’ गायन करो। जिसने भी पाया गा-गा कर पाया-कबीर, मीरा, नानक, चैतन्य सबने गाया।
हम जो समय व्यर्थ की बातों में खो देते हैं, निंदा और चुगली में बिता देते हैं, उसमें हम क्यों न संकीर्तन करें? तभी वाणी में शक्ति आएगी। विवेकानन्द के यहाँ एक युवक आया। विधि पूछी, मंत्र-उपासना की मन की शान्ति के लिए। उन्होंने कहा-मन की शान्ति के लिए अपने आस-पड़ोस की गंदगी साफ करो, दीन-दुखियों की सेवा करो। उद्धार होगा और उसका उद्धार हुआ। उसका मन शान्त हो गया, विक्षिप्तता चली गई।
अवसर पाते ही सेवा करो, संकीर्तन करो। आँखें शुद्ध होती हैं प्रभु की मूर्ति, गुरु की मूर्ति पर त्राटक करने से गुरु की छवि का ध्यान करने से। जो जीव को त्रिकुटी पर पहुँचा देता है, जहाँ परम प्रकाश मिलता है अतः ‘ध्यान मूलं गुरुर्मूर्ति|’ धन पवित्र होता है, दान देने से। धन की तीन ही गति हैं-दान, भोग और नाश। अतः दान करें अन्यथा नाश हो जाएगा। धन से समाज की सेवा होती है। सम्यक् सद्विप्र समाज का गठन होता है। समाज में जाति-पाति का रोग बढ़ा है। हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई में भेद बढ़े हैं। आप घटते जा रहे हो। लोग ईसाई बनते जा रहे हैं। क्यों? उनमें सेवा भाव अधिक है। सिक्खों में सेवा-भाव अधिक है। आपको ऐसे रहना चाहिए, जैसे आप एक परिवार के हों। सबके कष्ट में जुट जाएँ, मुँह न फेरें। अकेले जीने की आदत छोड़ें। आप जुड़ें क्रमशः गाँव से, राज्य से, देश से, विदेशों से। मानवता की सेवा करें। भाई-बहन की तरह प्रेम रखें। जब भी जुटें शिकवा शिकायत छोड़ें। अकेले हों तो, सुमिरन करें। इससे मन की चंचलता जाती है।
आप सबको सद्विप्र के सूत्र में बंधना है। सभी परमात्मा की सन्तान हैं। कौन ऊंचा है? कौन नीचा है? महात्मा गांधी तेली थे, पर राष्ट्र पिता कहलाए। उनके दो ब्राह्मण शिष्य हुए-जवाहर लाल नेहरू और विनोबा भावे। एक राजनैतिक और दूसरे आध्यात्मिक शिष्य बने। वाल्मीकि भंगी थे-उलटा नाम जप करने वाले। गुणवत्ता की पूजा होती है। रावण तो ब्राह्मण था-उत्तम कुल पुलस्त का नाती है। राम किसे प्रणाम करते हैं- वशिष्ठ को या रावण को! दोनों ही तो ब्राह्मण थे। राम सद्विप्र है। रावण नकारात्मक है। कृष्ण और कंस एक ही परिवार के हैं। आप किसकी पूजा करते हैं? कर्म करके सद्विप्र बन सकते हो- ‘कर्म प्रधान विश्व करि राखा’ छीना-झपटी से नहीं। देखते नहीं हो? अखण्ड आर्यावर्त खंड-खंड हो गया है केवल छुआ-छूत की भावना के कारण। विश्वमित्र ने एकता का संदेश दिया। केवट को राम ने ‘भरत सम भाई’ कहकर गले लगाया। तुम राम की पूजा करते हो, जिसने सबर पुत्री शबरी के जूठे बेर खाए। जूठे बेर का अर्थ क्या है? शबरी गुरु भक्त थी। संत-परंपरा में संत को भोग लगाया जाता है। संत के दरबार में कोई खाली हाथ नहीं जाता। संभव है राम ही प्रसाद लेकर गए हों। उसने कुछ खाया और कुछ राम को खिलाया- वहाँ राम ने जाति नहीं पूछी। साधु की जाति नहीं पूछते, ज्ञान पूछते हैं।
सुनते हैं, लक्ष्मण ने बेर नहीं खाया फेंक दिया। उपेक्षा की प्रेम-भक्ति की। कालान्तर में वही बेर संजीवनी बूटी बनी, जो लक्ष्मण के प्राण बचाने में काम आई। भक्तों की बात भक्त ही समझता है। भक्ति के रस में जो डूबा होगा, गोता लगाने के लिए, वही उसका आनंद समझेगा। जो भी माँ बनेगी, वही प्रसव की पीड़ा को समझेगी। जो माँ नहीं बनेगी, वह कैसे समझेगी? भक्ति में जो डुबकी लगाएगा, समझेगा भक्त के समर्पण को। यह इतिहास है। 14 वर्ष मुकुट गेंद बना रह गया। राजा का पद एक मिनट के लिए खाली नहीं रहता है। यह भरत की श्रीराम के प्रति गुरु-भक्ति को ही दर्शाता है जिसका विस्तृत विवरण आगे दिया गया है।
भक्ति देना जानती है, लोग लेना चाहते हैं। भक्ति हृदय से उठती है, विचार मस्तिष्क से। विज्ञान तोड़ता है। भक्ति जोड़ती है। भक्त सदैव परमात्मा का ही कार्य करता है। हनुमान सदा राम के ही कार्य में लगे रहते थे- ‘राम काज कीन्हे बिना, मोहि कहाँ विश्राम’| जिसका अपना कोई काम नहीं वह भक्त है। इसके विपरीत संसारी है। जानकी के पास हनुमान के लिए देने को कुछ नहीं था। भक्त बचाकर कुछ रखता नहीं। सीता ने आशीर्वाद दिया-अष्टसिद्धि नवनिधि की दुआ कर दी- प्रेरित कर दिया।
एक बार सीता और राम में बातें हो रही थीं। दोनों ने कहा कि हनुमान मेरा भक्त है-वो कहती मेरा भक्त है। परीक्षा के लिए राम ने पानी मांगा। उसी क्षण सीता ने पंखा मांगा। भक्ति कभी असफल नहीं होने देती-हनुमान जी पंखा, पानी दोनों साथ लाए| कहा-
‘राम के न सीता के, हम हैं सीताराम के’
भक्त देता है, मांगता नहीं। जब वह देता है, पूरी धरती की धुरी उत्सुक हो जाती है।
‘लागी से भागी, भागी से लगी रही’
अब धर्म उसके पीछे-पीछे दौड़ रहा है।
‘पीछे-पीछे हरि घूमे कहत कबीर-कबीर|’ भक्त भी वही बन जाता है। पूरी सृष्टि उसकी ओर मुखातिब हो जाती है। कबीर कुछ साधुओं को संग लिए चले। एक ब्राह्मण था (शबनम), उसने दंडवत किया। अपने आंसुओं से संत के पांव धोये। पत्नी से नाश्ते की बात कही। पत्नी सोई है, दुबक कर चिथड़ों में। पत्नी बड़ी परेशान होती है। चार दिन से घर में चूल्हा नहीं जला है। उसका चार साल का बच्चा शिवा भी भूखा है। वस्त्र नहीं है, भोजन नहीं है। शबनम पंडित रोने लगता है। तभी छोटा बेटा शिवा आ गया। पूछा-माँ! आज भी भोजन नहीं बनेगा? पिताजी! दरवाजे पर कई साधुजन बैठे हैं, कौन हैं वह? शबनम रोने लगता है-बच्चा भी भूखा है। पिता कहता है-बेटा, दरवाजे पर बैठे साधु हमारे आराध्य हैं। परमात्मा हैं। गुरु हैं। उनका स्वागत कैसे करें? बनिया भी उधार देने के लिए तैयार नहीं है। शबनम ने पुत्र शिवा के साथ किसी बनिए की दुकान में सेंध मारी। सात आदमी के लिए चावल आदि खाद्य निकाले। तभी सेठ जागा, हल्ला हुआ। शिवा पकड़ा गया। शिवा कहता है- पिताजी, तुम साधुओं की आव-भगत करना। मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो। शिवा की लोगों ने इतनी पिटाई की कि वह पीड़ा बर्दाश्त न कर सका, मर गया।
इधर शबनम ने भोजन तैयार किया। पत्नी पूछती है-शिवा कहाँ है? वह सारी बात बता देता है। कबीर साहब को प्रसाद पाने को कहता है। वे कहते हैं, शिवा को भी बुला| उसके बिना हम भोजन नहीं करेंगे। शबनम कैसे बताए कि शिवा अब नहीं रहा? वह शोक में डूबा, कबीर से प्रसाद पाने का अनुरोध करता है। कबीर साहब कहते हैं, तू सात थालियाँ लगा ला, हम सभी इकट्ठे भोजन करेंगे| और शिवा को आवाज दे| परीक्षा की घड़ी आ गई। भक्ति दाव पर लग जाने की चीज है। यह काम वीरों का है। अपनी तलवार अपने पर ही चलाने की कला है भक्ति। गुरु कहे हैं कि बच्चे को बुला, गुरु से कुछ छिपा नहीं है| तो वह दरवाजे पर जाकर पुकारता है। होश खोकर गिर जाता है| पर गुरु अनुकंपा से शिवा पहुँच जाता है। पिता को पानी के छींटे देकर होश में लाता है। सभी भोजन करते हैं।
प्रातः गुरु प्रस्थान करने लगे पर कुछ आशीर्वाद नहीं दिया। शबनम गुरु को क्या दक्षिणा दे? कुछ तो नहीं है देने लायक। वह घर के बर्तन, वासन, खाट उठा लेता है कि सब कुछ गुरु की विदाई में समर्पित कर देगा। गुरु ने कहा-रुक जा। विदा करना जरूरी है! फिर सोचा, बेचारा जो दे रहा है, नहीं स्वीकारना भी तो पत्थर मारने जैसा होगा। शबनम गुरु के गंतव्य तक सामान पहुंचाकर घर लौटता है। आते ही सेठ उसके पीछे पड़ जाता है। सेठ अन्न-धन से शबनम का घर भर देता है। शबनम के नाम पर ही गांव बस जाता है। इतिहास बन जाता है। देर हमारी तरफ से है। परमात्मा की तरफ से देर नहीं है। नानक हों, दरिया हों, पलटू हों, रामानन्द हो-एक नाम ओंकार ही सतनाम है। गुरु की अनुकंपा से, प्रसाद से वह मिलता है। तेरे तप से नहीं मिलेगा। सभी राक्षस घोर तपस्वी थे। कुछ नहीं मिला। राम, कृष्ण को गुरु-प्रसाद से मिला, गुरु अनुकंपा से मिला।
‘संतों सहज समाधि भली’
गुरु-प्रसाद से यात्रा होती है। आप भक्ति में रहें। समर्पण करो, सेवा करो, सुमिरन करो-अपनी शर्त मत लगाओ गुरु को दोष-दृष्टि से मत देखो। हनुमान ने राम में कभी दोष नहीं देखा।
प्रेम शरीर से शुरु होता है। शरीर पर ठहर गया कि वासना में गया। मन को ध्यान में लगाओ। भावना तीव्र करो- भाव-समाधि लगेगी। तीसरा प्रेम आध्यात्मिक प्रेम है। राधा-कृष्ण का प्रेम। ध्यान में गुरु-शिष्य में संवाद होने लगता है।
‘मीरा भई री बावरी’
कबीर भी दीवाने हो गए, भावना की तीव्रता के कारण। प्रेम में, आनन्द में भोजन गौण हो जाता है। जिस दिन आनन्द भोजन बन जाएगा, हम उस दिन संत हुए। भावात्मक सम्बन्ध हो गया, भावना के प्रवाह में आनन्द भोजन बन जाता है।
आज बस इतना ही।
।। हरि ॐ।।
समय के सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज की अनमोल कृति ‘गुरु ही मुक्तिदाता’ से उद्धृत..
‘समय के सदगुरु’ स्वामी कृष्णानंद जी महाराज
आप सद्विप्र समाज की रचना कर विश्व जनमानस को कल्याण मूलक सन्देश दे रहे हैं| सद्विप्र समाज सेवा एक आध्यात्मिक संस्था है, जो आपके निर्देशन में जीवन के सच्चे मर्म को उजागर कर शाश्वत शांति की ओर समाज को अग्रगति प्रदान करती है| आपने दिव्य गुप्त विज्ञान का अन्वेषण किया है, जिससे साधक शीघ्र ही साधना की ऊँचाई पर पहुँच सकता है| संसार की कठिनाई का सहजता से समाधान कर सकता है|
स्वामी जी के प्रवचन यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध हैं –
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