जुदाई

जुदाई

Avatar
sagar gupta

29 Jul 20247 min read

Published in stories

जुदाई

 

‘ऐसे क्या देख रहे हो?’

‘तुम्हें देख रहा हूँ।’

‘पर मेरी जिंदगी से दूर चले जाने का फैसला तो तुम्हारा ही था।’

‘मेरे हाथ में कुछ नहीं था। ये तुम्हें भी पता है।’

‘ठीक है तो चले जाओ।’

‘अब जाने का मन नहीं हो रहा। कदम मानो एक जगह ठिठक गया हो।’

‘तो फिर रुक जाओ न।’

‘बताया न, मेरे हाथ में कुछ नहीं है। हमारा रिश्ता शायद यहीं तक था।’

‘हाँ, वैसे भी तुम्हें मेरे घर वालों से शुरू से समस्या थी।’

‘ऐसा कुछ न था, प्रिये।’

‘सुनो, मुझसे झूठ न बोलो। क्या तुम शुरू में अपने दोस्तों से मेरे घर वालों की शिकायत का एक भी मौका छोड़ते थे? हमेशा यहीं कह कर कोसते थे कि सब एक से बढ़कर एक लफंगे है। पता नहीं इनको नौकरी कोई दे भी कैसे देता है। बोलो, तुम ये नहीं कहते थे कि इनका बस चले तो पैसे के लिए अपना ईमान भी बेच दे। और भी पता नहीं, क्या-क्या अँग्रेजी में उन्हें गालियाँ देते रहते थे और कहते थे कि इन गँवार जाहिल पढ़े- लिखे लोग को मेरे ही पल्ले बांधना था, प्रभु। मैं हमेशा से ये सुनती थी, पर आज तक अपने दिल में ये बात दबा कर रखी, पर आज ये न जाने क्यों बयां हो गया? ‘

‘हाँ, मैंने शुरू में ऐसा कुछ कहा था। मुझे तुम्हारे घरवाले ठीक नहीं लगते थे। पर वो बिता हुआ कल है, प्रिये। आज देखो, मेरे अपने परिवार से ज्यादा उन्हें चाहता हूँ। उनके बिना एक दिन भी काटना मुश्किल भरा है। जब रविवार के दिन अपने घर चला जाता हूँ तो तुमसे तो बात नहीं हो पाती। पर तुम्हारे घर वालों को एक कॉल तो कर ही लेता था।’

उधर से इसका कोई जवाब नहीं आया। कुछ मिनटों तक चारों तरफ़ सन्नाटा बिखरा पड़ा रहा। तो अनिकेत ने दुबारा बात शुरू की।

‘कुछ तो बोलो प्रिये! ऐसे चुप न रहो।’

‘अब बोलने के लिए बाकी क्या रहा है? तुम परदेशी बाबू हो, जहाँ जाते हो, 3-4 साल तक किसी के जिंदगी के साथ खेलते हो और फिर अपना बोरियां- बिस्तर बाँध कर उसे अकेले छोड़ चले जाते हो और चेहरे में एक शिकन् भी न रहती। हमारा रिश्ता भी तो करीब 3 साल का रहा और अंत क्या हुआ? तुमने इतने सारे लम्हें साथ बिता कर मेरा अंगना सुना करके जा रहे हो, किसी और की जिंदगी के साथ खेलने’

‘क्या सिर्फ मेरी गलती है? क्या तुम्हें पता नहीं था कि 3-4 साल बाद हमें अलग होना ही है। क्या कोई हमारी जुदाई को रोक सकता है?’

‘कोई नहीं रोक सकता। ‘

‘तो फिर….. ”

‘तो कुछ नहीं। जाओ और दुबारा कभी मेरे से मिलने की कोई जरूरत नहीं है। दुबारा मैं तुम्हारी शक्ल नहीं देखना चाहती।’

‘ऐसे मत बोलो, प्रिये! मैं तुमसे और तुम्हारे घरवालों से मिलने जरूर आऊँगा। उन लम्हों को समेटने जो हम सबने साथ जिये थे।’

‘ ठीक है, मैं तुम्हें नहीं रोकूँगी।’

‘मैं कॉल करूँगा। ‘

‘कोई जरूरत नहीं है। वैसे भी तुम्हें भी पता है कि मैं फोन कॉल में बात नहीं कर सकती हूँ। हमारा मिलन तो तभी हो सकता है, जब तुम यहाँ मेरे पास आओगे। हमारा मिलन जिस्मानी ही संभव है, पर हाँ, हमारा रिश्ता जिस्म से परे है।

‘ठीक है। पर जब मैं तुम्हारे घरवालों को कॉल करूँगा तो छिप कर हमारी बातें सुनना, जैसा तुम हमेशा से करती आई हो। आखिर दीवारों के भी कान होते ही है।’

इतने देर में पहली बार अनिकेत को उसकी हँसी सुनाई दी और उस हँसी ने मानो उसके दिल के भार को काफी हल्का कर दिया था।

पर वो हँसी क्षणभंगुर थी, फिर से एक सन्नाटा पसर गया।

‘अब भी गुस्सा हो, प्रिये?’ अनिकेत ने उसके जिस्म में अपने हाथों को फेरते हुए कहा।

‘तुम्हें लगता है कि मैं तुमसे कभी खफा हो सकती हूँ? ‘

‘हाँ, वो अलग बात है कि शुरू में तुम मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं थे। तुम्हारा सबके ऊप्पर रौब झाड़ना और मेरे घरवालों के सामने मुझे कोसना कि कितनी गंदी दिखती हूँ मैं और धूल से सने मेरे जिस्म को कोसना, मुझे सब याद है। पर तुम्हारे कारण ही,परदेशी बाबू, मेरे घर वालों ने मेरा कायाकल्प करवाया। मुझे आज भी याद है, मंगलवार का दिन था वो। तुम काफी दिनों बाद छुट्टियों से मेरे घर आये थे और जैसे ही तुमने मेरा बदला हुआ रूप देखा, तुम इतने खुश हो गए, मानो कोई खजाना मिल गया हो। मेरे घर वालों के सामने तुमने जितना मुझे निहारा, मैं झेप गई थी और उसी दिन से मुझे तुमसे प्यार हो गया। एक आज का दिन है- हमारी जुदाई का।

‘कोई नहीं, प्रिये। मेरे बाद और भी परदेशी बाबू आयेंगे। मन बेहला लेना।’

‘तुमने मुझे समझ क्या रखा है, मिस्टर। मानती हूँ कि तुम्हारे जैसे मेरे भी जीवन में बहुत लोग आयें है और तुम्हारे जाने के बाद भी आयेंगे। लेकिन सच्चा प्यार तो तुमसे ही था और सबने तो मुझे कभी प्यार से निहारा तक नहीं। दुबारा ऐसा बोले तो मुँह तोड़ दूँगी।’

‘मेरा वो मतलब नहीं था, प्रिये। तुम गलत समझ रही हो। मेरे कहने का मतलब बस इतना था कि……… ‘

अनिकेत ने बस इतना कहा था कि किसी ने उसके कैबिन के दरवाजे में दस्तक दी।

 

‘सर, किससे बात कर रहे है आप? सब आपकी प्रतिक्षा कर रहे है हॉल में।

‘तुम्हें नहीं दिख रहा कि किससे बात कर रहा हूँ मैं, मयंक?’

‘यहाँ तो कोई नहीं है सिवाय मेरे और आपके, सर!’ मयंक ने चारों तरफ नज़र दौड़ाने के बाद कहा।

‘देख रही हो न प्रिये, मेरे जाते ही तुम्हारे घरवाले भी तुम्हें भूलने लगे है।’ अनिकेत ने उसके बदन को दुबारा प्यार से सहलाते हुए कहा।

‘सर, आप दीवार में अपना हाथ क्यों रगड़ रहे है? दीवार का चुना हाथ और कपड़ों में लग जायेगा।’ मयंक को लगने लगा था कि ट्रांसफर हो जाने के कारण अनिकेत का मानसिक संतुलन भी शायद बिगड़ गया है।

‘तुम नहीं समझोगे, मयंक। खैर! चलो अब! अब और प्रतिक्षा किसी को करवाना ठीक नहीं है।’ अनिकेत, मयंक के साथ हॉल चला गया, जहाँ उसके सारे स्टाफ़ उसे फेयरवेल देने के लिए उसकी प्रतिक्षा कर रहे थे।

सारा खाना-पीना हो जाने के बाद अनिकेत ने सबके साथ एक सेल्फी खिंचवाई ताकि उन घरवालों के साथ उसकी जो यादें जुड़ी थी, किताब के उस पन्ने को वो कभी-कभार महसूस कर सके।

अंत में जाते- जाते अनिकेत की आँखों की नमी साफ-साफ नज़र आ रही थी।

 

उपसंहार-

कितना आसान होता है न ये कहना कि नौकरी कर रहे है जनाब, इनका ही ऐश है। पर कोई ये नहीं देखता कि नौकरी और घर वालों की जरूरत निभाते-निभाते नौकरीपेशा करने वाले लोग अपने ही घर से कितने दूर निकल आते है, जहाँ कोई नहीं होता ये कहने वाला कि अरे देखो, ये तो रमेश बाबू का लड़का है, कितना बड़ा हो गया है या फिर ये कहने वाला कोई नहीं होता कि अरे! ये अनिकेत है, इसका चक्कर रमेश जी की बेटी के साथ चल रहा है।

फिर अजनबियों के बीच हम अपना एक छोटा-सा  बसेरा बनाते है और धीरे-धीरे लोग आपसे जुड़ते जाते है और एक नया घर आपका बन कर तैयार हो जाता है। फिर पता चलता है कि वो घर भी आपका नहीं था। फिर चिड़ियाँ कहीं और किसी नई जगह अपना घोसला बनाने को निकल पड़ती है, बारिश- ठंड- गर्मी कुछ भी उसे रोक नहीं सकती। अंत तक आते- आते चिड़ियाँ अनेकों जगह अपना घोसला बनते-बिगड़ते देख लेती है और उसे ये एहसास होता है कि लोग सही कहते है कि हम सब परदेशी है इस दुनिया में……

 

सागर गुप्ता

 

 

Photo by Samarth Singhai: https://www.pexels.com/photo/woman-in-red-and-black-dress-posing-for-a-photo-1139450/

Comments (0)

Please login to share your comments.



Storyberrys — Discover & Share Creative Stories

Read short stories, poetry, art and more — from a community of storytellers, in English and Hindi.

© Copyright 2026 Storyberrys Digital Services LLP. All rights reserved.

जुदाई

जुदाई

Avatar
sagar gupta

29 Jul 20247 min read

Published in stories

जुदाई

 

‘ऐसे क्या देख रहे हो?’

‘तुम्हें देख रहा हूँ।’

‘पर मेरी जिंदगी से दूर चले जाने का फैसला तो तुम्हारा ही था।’

‘मेरे हाथ में कुछ नहीं था। ये तुम्हें भी पता है।’

‘ठीक है तो चले जाओ।’

‘अब जाने का मन नहीं हो रहा। कदम मानो एक जगह ठिठक गया हो।’

‘तो फिर रुक जाओ न।’

‘बताया न, मेरे हाथ में कुछ नहीं है। हमारा रिश्ता शायद यहीं तक था।’

‘हाँ, वैसे भी तुम्हें मेरे घर वालों से शुरू से समस्या थी।’

‘ऐसा कुछ न था, प्रिये।’

‘सुनो, मुझसे झूठ न बोलो। क्या तुम शुरू में अपने दोस्तों से मेरे घर वालों की शिकायत का एक भी मौका छोड़ते थे? हमेशा यहीं कह कर कोसते थे कि सब एक से बढ़कर एक लफंगे है। पता नहीं इनको नौकरी कोई दे भी कैसे देता है। बोलो, तुम ये नहीं कहते थे कि इनका बस चले तो पैसे के लिए अपना ईमान भी बेच दे। और भी पता नहीं, क्या-क्या अँग्रेजी में उन्हें गालियाँ देते रहते थे और कहते थे कि इन गँवार जाहिल पढ़े- लिखे लोग को मेरे ही पल्ले बांधना था, प्रभु। मैं हमेशा से ये सुनती थी, पर आज तक अपने दिल में ये बात दबा कर रखी, पर आज ये न जाने क्यों बयां हो गया? ‘

‘हाँ, मैंने शुरू में ऐसा कुछ कहा था। मुझे तुम्हारे घरवाले ठीक नहीं लगते थे। पर वो बिता हुआ कल है, प्रिये। आज देखो, मेरे अपने परिवार से ज्यादा उन्हें चाहता हूँ। उनके बिना एक दिन भी काटना मुश्किल भरा है। जब रविवार के दिन अपने घर चला जाता हूँ तो तुमसे तो बात नहीं हो पाती। पर तुम्हारे घर वालों को एक कॉल तो कर ही लेता था।’

उधर से इसका कोई जवाब नहीं आया। कुछ मिनटों तक चारों तरफ़ सन्नाटा बिखरा पड़ा रहा। तो अनिकेत ने दुबारा बात शुरू की।

‘कुछ तो बोलो प्रिये! ऐसे चुप न रहो।’

‘अब बोलने के लिए बाकी क्या रहा है? तुम परदेशी बाबू हो, जहाँ जाते हो, 3-4 साल तक किसी के जिंदगी के साथ खेलते हो और फिर अपना बोरियां- बिस्तर बाँध कर उसे अकेले छोड़ चले जाते हो और चेहरे में एक शिकन् भी न रहती। हमारा रिश्ता भी तो करीब 3 साल का रहा और अंत क्या हुआ? तुमने इतने सारे लम्हें साथ बिता कर मेरा अंगना सुना करके जा रहे हो, किसी और की जिंदगी के साथ खेलने’

‘क्या सिर्फ मेरी गलती है? क्या तुम्हें पता नहीं था कि 3-4 साल बाद हमें अलग होना ही है। क्या कोई हमारी जुदाई को रोक सकता है?’

‘कोई नहीं रोक सकता। ‘

‘तो फिर….. ”

‘तो कुछ नहीं। जाओ और दुबारा कभी मेरे से मिलने की कोई जरूरत नहीं है। दुबारा मैं तुम्हारी शक्ल नहीं देखना चाहती।’

‘ऐसे मत बोलो, प्रिये! मैं तुमसे और तुम्हारे घरवालों से मिलने जरूर आऊँगा। उन लम्हों को समेटने जो हम सबने साथ जिये थे।’

‘ ठीक है, मैं तुम्हें नहीं रोकूँगी।’

‘मैं कॉल करूँगा। ‘

‘कोई जरूरत नहीं है। वैसे भी तुम्हें भी पता है कि मैं फोन कॉल में बात नहीं कर सकती हूँ। हमारा मिलन तो तभी हो सकता है, जब तुम यहाँ मेरे पास आओगे। हमारा मिलन जिस्मानी ही संभव है, पर हाँ, हमारा रिश्ता जिस्म से परे है।

‘ठीक है। पर जब मैं तुम्हारे घरवालों को कॉल करूँगा तो छिप कर हमारी बातें सुनना, जैसा तुम हमेशा से करती आई हो। आखिर दीवारों के भी कान होते ही है।’

इतने देर में पहली बार अनिकेत को उसकी हँसी सुनाई दी और उस हँसी ने मानो उसके दिल के भार को काफी हल्का कर दिया था।

पर वो हँसी क्षणभंगुर थी, फिर से एक सन्नाटा पसर गया।

‘अब भी गुस्सा हो, प्रिये?’ अनिकेत ने उसके जिस्म में अपने हाथों को फेरते हुए कहा।

‘तुम्हें लगता है कि मैं तुमसे कभी खफा हो सकती हूँ? ‘

‘हाँ, वो अलग बात है कि शुरू में तुम मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं थे। तुम्हारा सबके ऊप्पर रौब झाड़ना और मेरे घरवालों के सामने मुझे कोसना कि कितनी गंदी दिखती हूँ मैं और धूल से सने मेरे जिस्म को कोसना, मुझे सब याद है। पर तुम्हारे कारण ही,परदेशी बाबू, मेरे घर वालों ने मेरा कायाकल्प करवाया। मुझे आज भी याद है, मंगलवार का दिन था वो। तुम काफी दिनों बाद छुट्टियों से मेरे घर आये थे और जैसे ही तुमने मेरा बदला हुआ रूप देखा, तुम इतने खुश हो गए, मानो कोई खजाना मिल गया हो। मेरे घर वालों के सामने तुमने जितना मुझे निहारा, मैं झेप गई थी और उसी दिन से मुझे तुमसे प्यार हो गया। एक आज का दिन है- हमारी जुदाई का।

‘कोई नहीं, प्रिये। मेरे बाद और भी परदेशी बाबू आयेंगे। मन बेहला लेना।’

‘तुमने मुझे समझ क्या रखा है, मिस्टर। मानती हूँ कि तुम्हारे जैसे मेरे भी जीवन में बहुत लोग आयें है और तुम्हारे जाने के बाद भी आयेंगे। लेकिन सच्चा प्यार तो तुमसे ही था और सबने तो मुझे कभी प्यार से निहारा तक नहीं। दुबारा ऐसा बोले तो मुँह तोड़ दूँगी।’

‘मेरा वो मतलब नहीं था, प्रिये। तुम गलत समझ रही हो। मेरे कहने का मतलब बस इतना था कि……… ‘

अनिकेत ने बस इतना कहा था कि किसी ने उसके कैबिन के दरवाजे में दस्तक दी।

 

‘सर, किससे बात कर रहे है आप? सब आपकी प्रतिक्षा कर रहे है हॉल में।

‘तुम्हें नहीं दिख रहा कि किससे बात कर रहा हूँ मैं, मयंक?’

‘यहाँ तो कोई नहीं है सिवाय मेरे और आपके, सर!’ मयंक ने चारों तरफ नज़र दौड़ाने के बाद कहा।

‘देख रही हो न प्रिये, मेरे जाते ही तुम्हारे घरवाले भी तुम्हें भूलने लगे है।’ अनिकेत ने उसके बदन को दुबारा प्यार से सहलाते हुए कहा।

‘सर, आप दीवार में अपना हाथ क्यों रगड़ रहे है? दीवार का चुना हाथ और कपड़ों में लग जायेगा।’ मयंक को लगने लगा था कि ट्रांसफर हो जाने के कारण अनिकेत का मानसिक संतुलन भी शायद बिगड़ गया है।

‘तुम नहीं समझोगे, मयंक। खैर! चलो अब! अब और प्रतिक्षा किसी को करवाना ठीक नहीं है।’ अनिकेत, मयंक के साथ हॉल चला गया, जहाँ उसके सारे स्टाफ़ उसे फेयरवेल देने के लिए उसकी प्रतिक्षा कर रहे थे।

सारा खाना-पीना हो जाने के बाद अनिकेत ने सबके साथ एक सेल्फी खिंचवाई ताकि उन घरवालों के साथ उसकी जो यादें जुड़ी थी, किताब के उस पन्ने को वो कभी-कभार महसूस कर सके।

अंत में जाते- जाते अनिकेत की आँखों की नमी साफ-साफ नज़र आ रही थी।

 

उपसंहार-

कितना आसान होता है न ये कहना कि नौकरी कर रहे है जनाब, इनका ही ऐश है। पर कोई ये नहीं देखता कि नौकरी और घर वालों की जरूरत निभाते-निभाते नौकरीपेशा करने वाले लोग अपने ही घर से कितने दूर निकल आते है, जहाँ कोई नहीं होता ये कहने वाला कि अरे देखो, ये तो रमेश बाबू का लड़का है, कितना बड़ा हो गया है या फिर ये कहने वाला कोई नहीं होता कि अरे! ये अनिकेत है, इसका चक्कर रमेश जी की बेटी के साथ चल रहा है।

फिर अजनबियों के बीच हम अपना एक छोटा-सा  बसेरा बनाते है और धीरे-धीरे लोग आपसे जुड़ते जाते है और एक नया घर आपका बन कर तैयार हो जाता है। फिर पता चलता है कि वो घर भी आपका नहीं था। फिर चिड़ियाँ कहीं और किसी नई जगह अपना घोसला बनाने को निकल पड़ती है, बारिश- ठंड- गर्मी कुछ भी उसे रोक नहीं सकती। अंत तक आते- आते चिड़ियाँ अनेकों जगह अपना घोसला बनते-बिगड़ते देख लेती है और उसे ये एहसास होता है कि लोग सही कहते है कि हम सब परदेशी है इस दुनिया में……

 

सागर गुप्ता

 

 

Photo by Samarth Singhai: https://www.pexels.com/photo/woman-in-red-and-black-dress-posing-for-a-photo-1139450/

Comments (0)

Please login to share your comments.



Storyberrys — Discover & Share Creative Stories

Read short stories, poetry, art and more — from a community of storytellers, in English and Hindi.

© Copyright 2026 Storyberrys Digital Services LLP.

All rights reserved.