पूर्णिमा-अमावस्या का महात्म्य

पूर्णिमा-अमावस्या का महात्म्य

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17 Jul 20248 min read

Published in spiritualism

सद्गुरु देव की अनमोल कृति ‘गुरु ही मुक्तिदाता’ से उद्धृत..

 

पूर्णिमा-अमावस्या का महात्म्य

 

प्रिय आत्मन्,

तुम भक्तों के मध्य अपने को पाकर मैं प्रसन्न होता हूँ। तुम लोगों से पूर्व में मैं बहुत बार तप-योग के महात्म्य पर चर्चा कर चुका हूँ | 

समय गतिशील है। समय के सद्गुरु काल, स्थान, अवस्था, साधक की स्थिति के अनुसार विधियाँ देते हैं। वही महत्त्वपूर्ण होता है। रविवार, मंगलवार, अमावस्या, चतुर्दशी, सह-पूर्णिमा को  विधि से हवन करें। यदि आपके नजदीक आश्रम नहीं है तब अपने आस-पास के यहाँ एकत्र होकर हवन करें। जिससे समग्र सांसारिक कष्ट दूर हो जाएं। बुराई-निन्दा से दूर रहें। अपने अन्दर बुराई देखने की कोशिश करें। अपने अन्दर स्थित एक-एक बुराई को गुरु को अर्पित करते जाएं।

 

वेद व्यास औैर पाण्डव   

महाभारत के वन पर्व में एक कथा आई है। पाण्डव लोग ग्यारह वर्ष बड़े कष्ट पूर्वक फल-मूल खाकर रहते थे। विषम परिस्थितियों में सम बना रहना ही तप है। वेद व्यास जी ने पाण्डवों के तपस्या रूपी कष्ट को सुना। एक दिन वे पाण्डवों को देखने वन में आ गए। धर्मराज युधिष्ठिर उन्हें आते देख दौड़कर आगे आए। साष्टांग प्रणाम कर बड़े सत्कार के साथ लिवा लाए। आदरपूर्वक एक उच्चासन पर बैठाया। उनका चरणामृत लेकर, विधिपूर्वक पूजन कर, श्रद्धापूर्वक सभी पाण्डव उनके चरणों में सिर झुका कर बैठ गए।

व्यास जी ने अपने पौत्रों को वनवास के कष्ट से दुर्बल और जंगली फल-मूल खाकर जीवन-निर्वाह करते देखा। व्यास जी की आंखों में आंसू भर आए।

वे गद्-गद् कण्ठ से बोले-‘हे महाबाहु युधिष्ठिर! संसार में तपस्या के बिना (कष्ट उठाए बिना) किसी को भी उच्च कोटि का सुख नहीं मिलता। तप से बढ़कर दूसरा कोई साधन नहीं है। तप से महत् पद की प्राप्ति होती है। ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो तपस्या से न मिल सके। इसलिए अपने शरीर को तप और नियमों के पालन में लगाना ही चाहिए। हे राजन! यदि कोई साधु, ब्राह्मण, अतिथि समय पर आ जाए तो प्रसन्न होकर अपनी शक्ति के अनुसार दान अवश्य दें तथा विधिवत् पूजा करके उसे प्रणाम करें। मन में द्वेष को कभी न आने दें। हर समय गुरु का ध्यान कर, उनके द्वारा प्रदत्त मंत्र का मन ही मन जाप करते रहें। इससे संसार का प्रत्येक कष्ट टल जाता है। वह व्यक्ति संसार में सफलता प्राप्त कर गुरु के आशीर्वाद की पात्रता पा लेता है।

युधिष्ठिर ने पूछा- हे महामुने! दान और तपस्या में किसका फल अधिक है ? और दोनों में कौन कठिन है?

मुद्गल ऋषि की कथा

व्यास जी ने कहा- हे युधिष्ठिर! दान से बढ़कर कठिन तप इस पृथ्वी पर दूसरा कोई नहीं है। लोगों को धन का लोभ विशेष होता है, धन बड़े ही कष्ट से प्राप्त होता है। उत्साही मनुष्य ध्यान के लिए अपने प्यारे प्राणों का भी मोह छोड़कर जंगलों में भटकते हैं, समुद्र में गोते लगाते हैं। कई खेती करते हैं और कई गौएं पालते हैं। कई लोग तो ध्यान की इच्छा से दूसरों की दासता भी स्वीकार कर लेते हैं। इस प्रकार कष्ट सहकर कमाए हुए धन का त्याग करना बड़ा ही कठिन है | दान से दुष्कर कोई कार्य नहीं है | इसीलिए मैं दान को सर्वश्रेष्ठ मानता हूँ। उसमें भी यदि धन न्याय से कमाया गया हो और उत्तम देश, काल तथा पात्र का विचार करके दान किया जाए तो इसका महत्त्व और अधिक बढ़ जाता है। यदि अच्छे समय पर शुद्ध भाव से सत्पात्र को थोड़ा ही दान दिया जाए तो परलोक में उसका अनन्त फल होता है। बहुत लोग अच्छे-अच्छे भाषण दे लेते हैं, शरीर से सेवा भी कर देते हैं, परन्तु दान देने में प्राण निकल जाता है। कृपण व्यक्ति को मृत ही समझना चाहिए। कृपण व्यक्ति का स्वर्ग में प्रवेश करना असम्भव है। जबकि सुई की छेद में ऊँट का प्रवेश करना सम्भव हो सकता है।

हे राजन! कुरुक्षेत्र में एक मुद्गल नामक ऋषि रहते थे। वे बड़े सत्यवादी, धर्मनिष्ठ, कर्मनिष्ठ और तपस्वी महात्मा थे। जब कृषक धान की फसल काट लेते थे तब मुद्गल ऋषि उससे धान चुन लेते थे। उसका भी आधा भाग कृषक के लिए छोड़ देते थे। इस तरह पंद्रह दिन में पंद्रह सेर धान इकठ्ठा कर लेते थे। इसी से ‘इष्टीकृत’ नामक यज्ञ करते थे अर्थात् हर अमावस्या और पूर्णिमा को दर्श-पौर्णमास यज्ञ किया करते थे। यज्ञों में देवता और अतिथियों को देने से जो अन्न बचता, उसी से परिवार का निर्वाह करते थे। घर में स्त्री, पुत्रादि थे। इस तरह तीनों एक पक्ष में एक ही दिन भोजन करते थे। उनके यज्ञ रूपी तप का प्रभाव ऐसा बढ़ा कि प्रत्येक पर्व के दिन देवराज इन्द्रादि देवता रूप बदल कर उपस्थित होने लगे। धीरे-धीरे उनका पंद्रह सेर अन्न घटने के बजाए बढ़ने लगा। सभी भोजन करके जय-जयकार करते हुए जाते।

मुनि के इस व्रत की ख्याति दूर-दूर तक फ़ैल गई। एक दिन दुर्वासा मुनि ने भी सुना तथा वे नंग-धड़ंग पागलों-सा वेष बनाए, मूंड़-मुड़ाए, कटु वचन कहते हुए वहाँ आ पहुँचे। आते ही बोले विप्रवर! आपको मालूम होना चाहिए कि मैं भोजन की इच्छा से यहाँ आया हूँ। मुद्गल ने उनको पाद्य, अर्ध्य, आचमनीय आदि पूजन की सामग्री भेंट की तथा ऋषि से भोजन परोस कर दिया। मुनि भूखे थे | ऋषि से प्राप्त अन्न अति स्वादिष्ट लगा। अतः वे सब अन्न खा गए। अन्त में जब उठने लगे तो कुछ जूठा अन्न बचा था, उसे अपने शरीर में लपेट लिया और वे जिधर से आए थे उधर ही निकल गए। दुर्वासा जी इस तरह हर अमावस्या और पूर्णिमा पर आने लगे। खाकर चले जाते, मुनि सपरिवार उपवास रह जाते। उन्हें किंचित भी दुःख नहीं होता। वे छह माह तक प्रत्येक पर्व पर आते रहे। हर बार उनके चित्त को शान्त और निर्मल ही पाया।

दुर्वासा ने प्रसन्नता पूर्वक मुद्गल से कहा-हे मुनि! इस संसार में तुम्हारे समान दाता कोई भी नहीं है। ईर्ष्या तो तुमको छू तक नहीं गई है। भूख बड़े-बड़े लोगों के धार्मिक विचार को हिला देती है और धैर्य हर लेती है। भोजन से ही प्राणों की रक्षा होती है। मन तो इतना चंचल है कि इसको वश में करना अत्यन्त कठिन जान पड़ता है। मन और इन्द्रियों की एकाग्रता को ही निश्चित रूप से तप कहा जाता है। इन सब इन्द्रियों को काबू में रखकर भूख का कष्ट सहते हुए बड़े परिश्रम से प्राप्त किए हुए धान को शुद्ध ह्रदय से दान करना अत्यन्त कठिन है। तुमने अपने शुभ कार्यों से सभी लोकों को जीत लिया। परम पद प्राप्त कर लिया। देवता भी तुम्हारे दान की महिमा गा-गाकर उनकी सर्वत्र घोषणा करते हैं। इस तरह मुद्गल परिपूर्णता से भर गए।

वेद व्यास ने कहा- हे पुत्र धर्मराज! तुम इस समय विपत्तियों से घिर गए हो। दूर-दूर तक तुम्हारे जीवन में प्रकाश नजर नहीं आता है। मैं चाहता हूँ कि तुम दिव्य प्रकाश से भर जाओ। तुम चक्रवर्ती सम्राट बन जाओ। अतः तुम्हें निम्न प्रकार अपना आचरण बनाना ही होगा।

  1. अमावस्या, चतुर्दशी, सह-पूर्णिमा का व्रत करो। अमावस्या के व्रत एवं भण्डारा से पितर, भूत-प्रेत, अनिष्ट ग्रह, पूर्व जन्म के श्रापादि से मुक्ति मिलती है। चतुर्दशी-पूर्णिमा से देवता यक्ष, गाय, शुभ ग्रहादि संतुष्ट होते हैं। जीवन मंगलमय होता है।

  2. अपने भोजन के अंश में विष्णु का भाग निकालो। भोजन बनाते समय चावल, आटा, दाल एक-एक मुट्ठी अलग-अलग पात्र में रख दो। सब्जी, नमक, मसाले के लिए आठ-आने या एक रुपया अपने सामर्थ्य एवं श्रद्धा के अनुसार एक पात्र में रख दो। पंद्रह दिन अर्थात् अमावस्या एवं पूर्णिमा को गुरु गृह पहुँचा दो। जिससे गुरु, गोविन्द दोनों प्रसन्न होंगे। फिर सम्पूर्ण देवता स्वतः प्रसन्न हो जायेंगे|

  3. अपने महीना या व्यापार में जो प्राप्त होता है, उससे दस प्रतिशत दान हेतु अवश्य निकालो। जिससे तुम्हारे यहाँ अक्षय लक्ष्मी निवास कर सके |

  4. गुरु द्वारा प्रदत्त निर्देशन का अवश्य पालन करो। गुरु-गोविन्द में भेद दृष्टि से देखना ही दोष है।

 

हे मेरे परमाचार्य, आचार्य, महात्मा एवं साधक गण आपसे भी मेरा यही परामर्श है, जो महर्षि वेद व्यास ने अपने प्रिय पौत्रों को दिया, वही गोपनीय, पावन, अति महत्वपूर्ण संदेश मैं आप लोगों को दे रहा हूँ। उपर्युक्त बिन्दुओं पर तर्क नहीं करें। श्रद्धा एवं पूर्ण आस्था से अपने जीवन में उतारें।

यदि आप उपर्युक्त बिन्दुओं को अपने जीवन में उतार लेते हैं तब आपमें देवत्व स्वतः प्रगट हो जाएगा। आप किसी भी आकाशीय देवता से श्रेष्ठ होंगे। आप नमस्य होंगे | आदरणीय होंगे । पूज्य होंगे | अन्त में आप मेरी ही पूजा स्वीकार करें। आपके अन्दर स्थित परम सत्ता को मेरा नमन है। धन्यवाद!

 

।। हरि ओम ।।

 

 

‘समय के सद्गुरु’ स्वामी  कृष्णानंद  जी महाराज

आप सद्विप्र समाज की रचना कर विश्व जनमानस को कल्याण मूलक सन्देश दे रहे हैं| सद्विप्र समाज सेवा एक आध्यात्मिक संस्था है, जो आपके निर्देशन में जीवन के सच्चे मर्म को उजागर कर शाश्वत शांति की ओर समाज को अग्रगति प्रदान करती है| आपने दिव्य गुप्त विज्ञान का अन्वेषण किया है, जिससे साधक शीघ्र ही साधना की ऊँचाई पर पहुँच सकता है| संसार की कठिनाई का सहजता से समाधान कर सकता है|

स्वामी जी के प्रवचन यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध हैं –

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तुम भक्तों के मध्य अपने को पाकर मैं प्रसन्न होता हूँ। तुम लोगों से पूर्व में मैं बहुत बार तप-योग के महात्म्य पर चर्चा कर चुका हूँ | 

समय गतिशील है। समय के सद्गुरु काल, स्थान, अवस्था, साधक की स्थिति के अनुसार विधियाँ देते हैं। वही महत्त्वपूर्ण होता है। रविवार, मंगलवार, अमावस्या, चतुर्दशी, सह-पूर्णिमा को  विधि से हवन करें। यदि आपके नजदीक आश्रम नहीं है तब अपने आस-पास के यहाँ एकत्र होकर हवन करें। जिससे समग्र सांसारिक कष्ट दूर हो जाएं। बुराई-निन्दा से दूर रहें। अपने अन्दर बुराई देखने की कोशिश करें। अपने अन्दर स्थित एक-एक बुराई को गुरु को अर्पित करते जाएं।

 

वेद व्यास औैर पाण्डव   

महाभारत के वन पर्व में एक कथा आई है। पाण्डव लोग ग्यारह वर्ष बड़े कष्ट पूर्वक फल-मूल खाकर रहते थे। विषम परिस्थितियों में सम बना रहना ही तप है। वेद व्यास जी ने पाण्डवों के तपस्या रूपी कष्ट को सुना। एक दिन वे पाण्डवों को देखने वन में आ गए। धर्मराज युधिष्ठिर उन्हें आते देख दौड़कर आगे आए। साष्टांग प्रणाम कर बड़े सत्कार के साथ लिवा लाए। आदरपूर्वक एक उच्चासन पर बैठाया। उनका चरणामृत लेकर, विधिपूर्वक पूजन कर, श्रद्धापूर्वक सभी पाण्डव उनके चरणों में सिर झुका कर बैठ गए।

व्यास जी ने अपने पौत्रों को वनवास के कष्ट से दुर्बल और जंगली फल-मूल खाकर जीवन-निर्वाह करते देखा। व्यास जी की आंखों में आंसू भर आए।

वे गद्-गद् कण्ठ से बोले-‘हे महाबाहु युधिष्ठिर! संसार में तपस्या के बिना (कष्ट उठाए बिना) किसी को भी उच्च कोटि का सुख नहीं मिलता। तप से बढ़कर दूसरा कोई साधन नहीं है। तप से महत् पद की प्राप्ति होती है। ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो तपस्या से न मिल सके। इसलिए अपने शरीर को तप और नियमों के पालन में लगाना ही चाहिए। हे राजन! यदि कोई साधु, ब्राह्मण, अतिथि समय पर आ जाए तो प्रसन्न होकर अपनी शक्ति के अनुसार दान अवश्य दें तथा विधिवत् पूजा करके उसे प्रणाम करें। मन में द्वेष को कभी न आने दें। हर समय गुरु का ध्यान कर, उनके द्वारा प्रदत्त मंत्र का मन ही मन जाप करते रहें। इससे संसार का प्रत्येक कष्ट टल जाता है। वह व्यक्ति संसार में सफलता प्राप्त कर गुरु के आशीर्वाद की पात्रता पा लेता है।

युधिष्ठिर ने पूछा- हे महामुने! दान और तपस्या में किसका फल अधिक है ? और दोनों में कौन कठिन है?

मुद्गल ऋषि की कथा

व्यास जी ने कहा- हे युधिष्ठिर! दान से बढ़कर कठिन तप इस पृथ्वी पर दूसरा कोई नहीं है। लोगों को धन का लोभ विशेष होता है, धन बड़े ही कष्ट से प्राप्त होता है। उत्साही मनुष्य ध्यान के लिए अपने प्यारे प्राणों का भी मोह छोड़कर जंगलों में भटकते हैं, समुद्र में गोते लगाते हैं। कई खेती करते हैं और कई गौएं पालते हैं। कई लोग तो ध्यान की इच्छा से दूसरों की दासता भी स्वीकार कर लेते हैं। इस प्रकार कष्ट सहकर कमाए हुए धन का त्याग करना बड़ा ही कठिन है | दान से दुष्कर कोई कार्य नहीं है | इसीलिए मैं दान को सर्वश्रेष्ठ मानता हूँ। उसमें भी यदि धन न्याय से कमाया गया हो और उत्तम देश, काल तथा पात्र का विचार करके दान किया जाए तो इसका महत्त्व और अधिक बढ़ जाता है। यदि अच्छे समय पर शुद्ध भाव से सत्पात्र को थोड़ा ही दान दिया जाए तो परलोक में उसका अनन्त फल होता है। बहुत लोग अच्छे-अच्छे भाषण दे लेते हैं, शरीर से सेवा भी कर देते हैं, परन्तु दान देने में प्राण निकल जाता है। कृपण व्यक्ति को मृत ही समझना चाहिए। कृपण व्यक्ति का स्वर्ग में प्रवेश करना असम्भव है। जबकि सुई की छेद में ऊँट का प्रवेश करना सम्भव हो सकता है।

हे राजन! कुरुक्षेत्र में एक मुद्गल नामक ऋषि रहते थे। वे बड़े सत्यवादी, धर्मनिष्ठ, कर्मनिष्ठ और तपस्वी महात्मा थे। जब कृषक धान की फसल काट लेते थे तब मुद्गल ऋषि उससे धान चुन लेते थे। उसका भी आधा भाग कृषक के लिए छोड़ देते थे। इस तरह पंद्रह दिन में पंद्रह सेर धान इकठ्ठा कर लेते थे। इसी से ‘इष्टीकृत’ नामक यज्ञ करते थे अर्थात् हर अमावस्या और पूर्णिमा को दर्श-पौर्णमास यज्ञ किया करते थे। यज्ञों में देवता और अतिथियों को देने से जो अन्न बचता, उसी से परिवार का निर्वाह करते थे। घर में स्त्री, पुत्रादि थे। इस तरह तीनों एक पक्ष में एक ही दिन भोजन करते थे। उनके यज्ञ रूपी तप का प्रभाव ऐसा बढ़ा कि प्रत्येक पर्व के दिन देवराज इन्द्रादि देवता रूप बदल कर उपस्थित होने लगे। धीरे-धीरे उनका पंद्रह सेर अन्न घटने के बजाए बढ़ने लगा। सभी भोजन करके जय-जयकार करते हुए जाते।

मुनि के इस व्रत की ख्याति दूर-दूर तक फ़ैल गई। एक दिन दुर्वासा मुनि ने भी सुना तथा वे नंग-धड़ंग पागलों-सा वेष बनाए, मूंड़-मुड़ाए, कटु वचन कहते हुए वहाँ आ पहुँचे। आते ही बोले विप्रवर! आपको मालूम होना चाहिए कि मैं भोजन की इच्छा से यहाँ आया हूँ। मुद्गल ने उनको पाद्य, अर्ध्य, आचमनीय आदि पूजन की सामग्री भेंट की तथा ऋषि से भोजन परोस कर दिया। मुनि भूखे थे | ऋषि से प्राप्त अन्न अति स्वादिष्ट लगा। अतः वे सब अन्न खा गए। अन्त में जब उठने लगे तो कुछ जूठा अन्न बचा था, उसे अपने शरीर में लपेट लिया और वे जिधर से आए थे उधर ही निकल गए। दुर्वासा जी इस तरह हर अमावस्या और पूर्णिमा पर आने लगे। खाकर चले जाते, मुनि सपरिवार उपवास रह जाते। उन्हें किंचित भी दुःख नहीं होता। वे छह माह तक प्रत्येक पर्व पर आते रहे। हर बार उनके चित्त को शान्त और निर्मल ही पाया।

दुर्वासा ने प्रसन्नता पूर्वक मुद्गल से कहा-हे मुनि! इस संसार में तुम्हारे समान दाता कोई भी नहीं है। ईर्ष्या तो तुमको छू तक नहीं गई है। भूख बड़े-बड़े लोगों के धार्मिक विचार को हिला देती है और धैर्य हर लेती है। भोजन से ही प्राणों की रक्षा होती है। मन तो इतना चंचल है कि इसको वश में करना अत्यन्त कठिन जान पड़ता है। मन और इन्द्रियों की एकाग्रता को ही निश्चित रूप से तप कहा जाता है। इन सब इन्द्रियों को काबू में रखकर भूख का कष्ट सहते हुए बड़े परिश्रम से प्राप्त किए हुए धान को शुद्ध ह्रदय से दान करना अत्यन्त कठिन है। तुमने अपने शुभ कार्यों से सभी लोकों को जीत लिया। परम पद प्राप्त कर लिया। देवता भी तुम्हारे दान की महिमा गा-गाकर उनकी सर्वत्र घोषणा करते हैं। इस तरह मुद्गल परिपूर्णता से भर गए।

वेद व्यास ने कहा- हे पुत्र धर्मराज! तुम इस समय विपत्तियों से घिर गए हो। दूर-दूर तक तुम्हारे जीवन में प्रकाश नजर नहीं आता है। मैं चाहता हूँ कि तुम दिव्य प्रकाश से भर जाओ। तुम चक्रवर्ती सम्राट बन जाओ। अतः तुम्हें निम्न प्रकार अपना आचरण बनाना ही होगा।

  1. अमावस्या, चतुर्दशी, सह-पूर्णिमा का व्रत करो। अमावस्या के व्रत एवं भण्डारा से पितर, भूत-प्रेत, अनिष्ट ग्रह, पूर्व जन्म के श्रापादि से मुक्ति मिलती है। चतुर्दशी-पूर्णिमा से देवता यक्ष, गाय, शुभ ग्रहादि संतुष्ट होते हैं। जीवन मंगलमय होता है।

  2. अपने भोजन के अंश में विष्णु का भाग निकालो। भोजन बनाते समय चावल, आटा, दाल एक-एक मुट्ठी अलग-अलग पात्र में रख दो। सब्जी, नमक, मसाले के लिए आठ-आने या एक रुपया अपने सामर्थ्य एवं श्रद्धा के अनुसार एक पात्र में रख दो। पंद्रह दिन अर्थात् अमावस्या एवं पूर्णिमा को गुरु गृह पहुँचा दो। जिससे गुरु, गोविन्द दोनों प्रसन्न होंगे। फिर सम्पूर्ण देवता स्वतः प्रसन्न हो जायेंगे|

  3. अपने महीना या व्यापार में जो प्राप्त होता है, उससे दस प्रतिशत दान हेतु अवश्य निकालो। जिससे तुम्हारे यहाँ अक्षय लक्ष्मी निवास कर सके |

  4. गुरु द्वारा प्रदत्त निर्देशन का अवश्य पालन करो। गुरु-गोविन्द में भेद दृष्टि से देखना ही दोष है।

 

हे मेरे परमाचार्य, आचार्य, महात्मा एवं साधक गण आपसे भी मेरा यही परामर्श है, जो महर्षि वेद व्यास ने अपने प्रिय पौत्रों को दिया, वही गोपनीय, पावन, अति महत्वपूर्ण संदेश मैं आप लोगों को दे रहा हूँ। उपर्युक्त बिन्दुओं पर तर्क नहीं करें। श्रद्धा एवं पूर्ण आस्था से अपने जीवन में उतारें।

यदि आप उपर्युक्त बिन्दुओं को अपने जीवन में उतार लेते हैं तब आपमें देवत्व स्वतः प्रगट हो जाएगा। आप किसी भी आकाशीय देवता से श्रेष्ठ होंगे। आप नमस्य होंगे | आदरणीय होंगे । पूज्य होंगे | अन्त में आप मेरी ही पूजा स्वीकार करें। आपके अन्दर स्थित परम सत्ता को मेरा नमन है। धन्यवाद!

 

।। हरि ओम ।।

 

 

‘समय के सद्गुरु’ स्वामी  कृष्णानंद  जी महाराज

आप सद्विप्र समाज की रचना कर विश्व जनमानस को कल्याण मूलक सन्देश दे रहे हैं| सद्विप्र समाज सेवा एक आध्यात्मिक संस्था है, जो आपके निर्देशन में जीवन के सच्चे मर्म को उजागर कर शाश्वत शांति की ओर समाज को अग्रगति प्रदान करती है| आपने दिव्य गुप्त विज्ञान का अन्वेषण किया है, जिससे साधक शीघ्र ही साधना की ऊँचाई पर पहुँच सकता है| संसार की कठिनाई का सहजता से समाधान कर सकता है|

स्वामी जी के प्रवचन यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध हैं –

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