कागज़ के टुकड़े

कागज़ के टुकड़े

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namrata gupta

28 Jul 20245 min read

Published in stories

कागज़ के टुकड़े

“संजना , संजना… मेरे जूते कहाँ है ?”

अखिल को देखते ही संजना को पुराने दिन याद आ रहे थे। कितने हसीं दिन थे वो…. कितने हसीं पल थे, अब जैसे वो पल महज़ एक याद बनकर रह गयी है।

आज संजना और अखिल दोनों एक दूसरे के आमने – सामने तो थे, पर एक कोर्ट मे। संजना और अखिल की शादी को ५ साल हो गए थे लेकिन शादी के ४ साल गुजर जाने के बाद ही दोनों ने आपसी मनमुटाव के कारण अलग होने का फैसला कर लिया – और आज दोनों कोर्ट में एक दूसरे के आमने -सामने आ खड़े हुए है | संजना के साथ उसके माता-पिता थे और अखिल के साथ उसकी बूढ़ी माँ।

संजना ने अपनी सास को भरी आँखों से देखा और दोनों हाथ जोड़ कर प्रणाम किया पर संजना पर नज़र पड़ते ही उसकी सास ने तुरंत ही नजर हटा दी| सासु माँ को लगता था की सारी गलतियाँ संजना की ही है , संजना ने उसके बेटे की ज़िन्दगी बर्बाद कर दीं, सासु माँ को ऐसा लगता था।

“आर्डर .. ऑर्डर … | कार्रवाई शुरू की जाये …. ” अचानक जज साहब की आवाज़ आयी और सभी शांत हो गए।
“अखिल और संजना , क्या आप लोग अभी भी अपने पुराने निर्णय पर अडिग है या फिर कुछ और दिनों की मोहलत चाहिए?”
अखिल ने कहा – “नहीं जज साहब , मुझे अब कोई मोहलत नहीं चाहिए, मैं अपने निर्णय पर अडिग हूँ।”

इतना सुनते ही संजना की आँखों से आंसू की झरियां गिरने लगी। उसके माता – पिता संजना को दिला रहे थे और साथ- ही- साथ अखिल को कोस भी थे। “निकम्मे ने मेरी बेटी की ज़िन्दगी बर्बाद कर दी “, अनायास ही संजना की माँ के मुँह से ये शब्द निकल पड़े।

फिर जज साहेब ने संजना से भी पूछा,”क्या वो अखिल के फैसले से सहमत है?”

संजना ने भी हामी भर दी। उसने हामी तो भरी लेकिन इसके साथ ही उसके भीतर एक सैलाब – सा उमड़ पड़ा। उसे अपने भीतर कुछ टूटता -सा , बिखरता – सा महसूस हो रहा था अखिल से उसकी शादी को महज़ ५ साल हुए थे पर दोस्ती तो कॉलेज के दिनों से ही थी। कितना समझता था अखिल संजना को, पर अचानक से क्या हुआ ? किसका अहम् किस पर भारी पड़ने लगा? क्या यह अहम् था या दोनों की नासमझी ? कारण चाहे जो भी हों पर परिणाम सही नहीं था। फिर दोनों के परिवार वालों ने उन दोनों को समझाने की कोशिश क्यों नहीं की? उन्हें क्यों नहीं बताया की विवाह एक नाजुक बंधन है ज्यादा जोर से खींचने पर यह बंधन टूट जाती है या फिर यु कहे की शायद दोनों परिवार वालो ने समझाया हो पर संजना और अखिल समझना नहीं चाहते।

“आर्डर आर्डर” जज साहब की आवाज़ आयी दोनों पक्षों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट इस नतीजे पर पहुंची है की दोनों ही आपसी सहमति से अलग होना चाहते है, इसलिए कोर्ट भी इनके फैसले सम्मान करती है और अखिल को यह आदेश देती है की संजना को जीवन – यापन के लिए मुआवजा दे। सारा कोर्ट धीरे – धीरे खली होने लगता है।

एक बेंच पर संजना बैठी है तो दूसरे बेंच पर अखिल।

“संजना , हम लोग तुम्हारा बाहर इंतज़ार कर रहे है”, इतना कहकर संजना के माता – पिता बहार निकल गए। अखिल की माता जी भी बहार जा चुकी थी।

“क्यों किया अखिल तुमने ऐसा?” संजना रो पड़ी

“मैंने किया? मैंने क्या किया? तुम्हे ही आज़ादी चाहिए थी मुझसे , मेरी सोच से। तो मिल गयी तुम्हे आज़ादी। जाओ संजना , तुम आज़ाद हो। आज मैंने तुम्हे आज़ाद किया।” बोलते -बोलते अखिल का गाला भी भर आया।

संजना बेतहाशा रोये जा रही थी, उसे रोता देख अखिल भी बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था, फिर धीरे – धीरे वह संजना के करीब पहुँचा ।

“मत रो संजना , अब इसका क्या फायदा? लेकिन एक बात मैं तुम्हें बताना चाहूंगा संजना की ये तलाक मैंने अपनी ख़ुशी से नहीं बल्कि तुम्हारी ख़ुशी के लिए दी है। तुम्हे मुझसे बहुत शिकायत थी, तुम्हे लगता था कि मैं तुम्हें समय नहीं देता…. लेकिन समय के साथ -साथ जिम्मेवारियां भी बढ़ती है…. खैर, जाने दो अब इन सारी बातों का क्या फायदा?”

संजना अखिल को पकड़ कर रोने लगती है। “मुझे माफ़ कर दो अखिल…. मैं तुम्हारे बिना नहीं जी पाऊँगी … और जहाँ तक बात तलाक के कागज़ की है, तो हमारा रिश्ता किसी कागज़ के टुकड़े का मोहताज़ नहीं है।” अखिल की आँखें भी भर आयी दोनों ने एक दूसरे को गले लगा लिया और रो पड़े।

दरवाज़े के बाहर से संजना के माता – पिता और अखिल की माता जी यह सब देख रहे थे , उनकी भी आँखें भर आयी और वो लोग भी सोचने लगे की रिश्ते किसी कागज़ के टुकड़े के मोहताज़ नहीं है ।

“कागज़ पे तो अदालत चलती है…
हमने तो तेरी आँखों के फैसले मंजूर किये है।”

 

नम्रता गुप्ता

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“संजना , संजना… मेरे जूते कहाँ है ?”

अखिल को देखते ही संजना को पुराने दिन याद आ रहे थे। कितने हसीं दिन थे वो…. कितने हसीं पल थे, अब जैसे वो पल महज़ एक याद बनकर रह गयी है।

आज संजना और अखिल दोनों एक दूसरे के आमने – सामने तो थे, पर एक कोर्ट मे। संजना और अखिल की शादी को ५ साल हो गए थे लेकिन शादी के ४ साल गुजर जाने के बाद ही दोनों ने आपसी मनमुटाव के कारण अलग होने का फैसला कर लिया – और आज दोनों कोर्ट में एक दूसरे के आमने -सामने आ खड़े हुए है | संजना के साथ उसके माता-पिता थे और अखिल के साथ उसकी बूढ़ी माँ।

संजना ने अपनी सास को भरी आँखों से देखा और दोनों हाथ जोड़ कर प्रणाम किया पर संजना पर नज़र पड़ते ही उसकी सास ने तुरंत ही नजर हटा दी| सासु माँ को लगता था की सारी गलतियाँ संजना की ही है , संजना ने उसके बेटे की ज़िन्दगी बर्बाद कर दीं, सासु माँ को ऐसा लगता था।

“आर्डर .. ऑर्डर … | कार्रवाई शुरू की जाये …. ” अचानक जज साहब की आवाज़ आयी और सभी शांत हो गए।
“अखिल और संजना , क्या आप लोग अभी भी अपने पुराने निर्णय पर अडिग है या फिर कुछ और दिनों की मोहलत चाहिए?”
अखिल ने कहा – “नहीं जज साहब , मुझे अब कोई मोहलत नहीं चाहिए, मैं अपने निर्णय पर अडिग हूँ।”

इतना सुनते ही संजना की आँखों से आंसू की झरियां गिरने लगी। उसके माता – पिता संजना को दिला रहे थे और साथ- ही- साथ अखिल को कोस भी थे। “निकम्मे ने मेरी बेटी की ज़िन्दगी बर्बाद कर दी “, अनायास ही संजना की माँ के मुँह से ये शब्द निकल पड़े।

फिर जज साहेब ने संजना से भी पूछा,”क्या वो अखिल के फैसले से सहमत है?”

संजना ने भी हामी भर दी। उसने हामी तो भरी लेकिन इसके साथ ही उसके भीतर एक सैलाब – सा उमड़ पड़ा। उसे अपने भीतर कुछ टूटता -सा , बिखरता – सा महसूस हो रहा था अखिल से उसकी शादी को महज़ ५ साल हुए थे पर दोस्ती तो कॉलेज के दिनों से ही थी। कितना समझता था अखिल संजना को, पर अचानक से क्या हुआ ? किसका अहम् किस पर भारी पड़ने लगा? क्या यह अहम् था या दोनों की नासमझी ? कारण चाहे जो भी हों पर परिणाम सही नहीं था। फिर दोनों के परिवार वालों ने उन दोनों को समझाने की कोशिश क्यों नहीं की? उन्हें क्यों नहीं बताया की विवाह एक नाजुक बंधन है ज्यादा जोर से खींचने पर यह बंधन टूट जाती है या फिर यु कहे की शायद दोनों परिवार वालो ने समझाया हो पर संजना और अखिल समझना नहीं चाहते।

“आर्डर आर्डर” जज साहब की आवाज़ आयी दोनों पक्षों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट इस नतीजे पर पहुंची है की दोनों ही आपसी सहमति से अलग होना चाहते है, इसलिए कोर्ट भी इनके फैसले सम्मान करती है और अखिल को यह आदेश देती है की संजना को जीवन – यापन के लिए मुआवजा दे। सारा कोर्ट धीरे – धीरे खली होने लगता है।

एक बेंच पर संजना बैठी है तो दूसरे बेंच पर अखिल।

“संजना , हम लोग तुम्हारा बाहर इंतज़ार कर रहे है”, इतना कहकर संजना के माता – पिता बहार निकल गए। अखिल की माता जी भी बहार जा चुकी थी।

“क्यों किया अखिल तुमने ऐसा?” संजना रो पड़ी

“मैंने किया? मैंने क्या किया? तुम्हे ही आज़ादी चाहिए थी मुझसे , मेरी सोच से। तो मिल गयी तुम्हे आज़ादी। जाओ संजना , तुम आज़ाद हो। आज मैंने तुम्हे आज़ाद किया।” बोलते -बोलते अखिल का गाला भी भर आया।

संजना बेतहाशा रोये जा रही थी, उसे रोता देख अखिल भी बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था, फिर धीरे – धीरे वह संजना के करीब पहुँचा ।

“मत रो संजना , अब इसका क्या फायदा? लेकिन एक बात मैं तुम्हें बताना चाहूंगा संजना की ये तलाक मैंने अपनी ख़ुशी से नहीं बल्कि तुम्हारी ख़ुशी के लिए दी है। तुम्हे मुझसे बहुत शिकायत थी, तुम्हे लगता था कि मैं तुम्हें समय नहीं देता…. लेकिन समय के साथ -साथ जिम्मेवारियां भी बढ़ती है…. खैर, जाने दो अब इन सारी बातों का क्या फायदा?”

संजना अखिल को पकड़ कर रोने लगती है। “मुझे माफ़ कर दो अखिल…. मैं तुम्हारे बिना नहीं जी पाऊँगी … और जहाँ तक बात तलाक के कागज़ की है, तो हमारा रिश्ता किसी कागज़ के टुकड़े का मोहताज़ नहीं है।” अखिल की आँखें भी भर आयी दोनों ने एक दूसरे को गले लगा लिया और रो पड़े।

दरवाज़े के बाहर से संजना के माता – पिता और अखिल की माता जी यह सब देख रहे थे , उनकी भी आँखें भर आयी और वो लोग भी सोचने लगे की रिश्ते किसी कागज़ के टुकड़े के मोहताज़ नहीं है ।

“कागज़ पे तो अदालत चलती है…
हमने तो तेरी आँखों के फैसले मंजूर किये है।”

 

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