संतत्व का मूलमंत्र है सुरति

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28 Jul 20249 min read

Published in spiritualism

संतत्व का मूलमंत्र है सुरति

पउड़ी- 23 (जपुजी साहिब )

 

 

 

||श्री सद्गुरवे नमः||

 

गुरुनानक जयंती (कार्तिक पूर्णिमा, दिनांक 18.11.2021) पर विशेष |

 

जे तिसु मनहु न वीसरहि

(जिसके मन से उसकी सुधि नहीं विसरती) 

सालाहि सालाहि एती सुरति न पाईया ||

नदीया अतै वाह पवहि समुंदि न जाणीअहि ||

समुंद साह सुल्तान गिरहा सेती मालु धनु ||

कौड़ी तुलि न होवनी जे तिसु मनहु न वीसरहि ||

 

स्तुति करने वाले उसकी स्तुति करते हैं, लेकिन उन्हें उसकी स्मृति नहीं मिली| नदी और नाले समुद्र में गिरते हैं, लेकिन वे उसको जान नहीं सकते| समुद्र के समान अकूत संपत्ति वाले बादशाह और पहाड़ों के जितनी धन-संपत्ति वाले सुल्तान भी हों, उस कीड़ी की बराबरी नहीं कर सकते, जिसके मन से उसकी सुधि नहीं बिसरती|

एक कहानी याद आई| एक युवक को समझ में आ गया कि संसार निस्सार है| सारे रिश्ते-नाते बेकार हैं| वह संन्यास लेने की सोचने लगा| अपने नजदीकी रिश्तेदारों से सहायता की माँग की कि मुझे संन्यासी बनना है| अतएव कमण्डल, आसनी, माला तथा गुदड़ी देकर मेरी मदद करो| परन्तु किसी ने मदद नहीं किया| वह निराश हो गया|

कुछ दिन के बाद युवक एक मुस्लिम फ़क़ीर आजर कैबी के पास गया| उनसे अपनी कठिनाई सुनाई| वह फ़क़ीर हँसने लगा| फिर बोला- वाह भाई! तुम संसार छोड़कर संसार की वस्तुयें इकटठी करना चाहते हो| फकीरी तो सामान जमा करने में नहीं, बल्कि छोड़ने में होती है| तुम अभी संन्यास के योग्य नहीं हो| जाओ, घर-गृहस्थी में रहकर अपने कर्तव्य के साथ भगवान् का भजन करो| यही तुम्हारे लिए फकीरी और दरवेशी है| उसकी बातें सुनकर फकीरी की इच्छा से आए व्यक्ति की आँखें खुल गईं|

हम सदैव स्तुति में लगे रहते हैं| मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा सर्वत्र स्तुति होती रहती है| परमात्मा को तो अपनी बात सुनाना चाहते हैं, परन्तु उसकी सुनने का समय हमारे पास नहीं है| हमें ऐसा विश्वास हो गया है कि वह कुछ कम सुनने लगा है| इसलिए माइक, लाउडस्पीकर लगाकर सुबह ब्रह्म मुहूर्त में जोर-जोर से चिल्लाते हैं| उसे जगाने की चेष्टा करते हैं| जैसे वह गहरी नींद में चला गया हो और उसकी नींद खुल न रही हो| उसी प्रकार जैसे राजनेता नहीं सुनते हैं तो हम जुलूस निकालते हैं, रेलगाड़ी रोकते हैं, तोड़-फोड़ करते हैं| कहीं बसें तो कहीं सरकारी इमारतें जलाते हैं| अपने बात सुनने के लिए मजबूर कर देते हैं|

विध्वंसात्मक प्रवृत्तियाँ हमारे अन्दर छिपी हैं| समय पाते ही ये बाहर आ जाती हैं| सद्गुरु कबीर कहते हैं-

‘कंकड़ पत्थर जोड़ि के मस्जिद दिया बनाय |

तापर मुर्गा बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय ||’

क्या परमात्मा बहरा हो गया है? या उसे सुनाई नहीं पड़ता है अथवा वह सुनना नहीं चाहता| ऐसे में उसे सुनाने का कोई उपाय नहीं है| इसके पूर्व की पउड़ी में नानक देव सुनने पर जोर दिए हैं| उसे सुनना होगा| वह निरंतर आवाज़ दे रहा है| अपनी तरफ आकृष्ट करने के लिए ध्वनि कर रहा है| वह ध्वनि है- ओंकार| सुनने की कला बोलने से नहीं आयेगी| बल्कि सुनने से आयेगी, यही कला है- सुरति|

सुरति- स्मृति से बनी है| इस शब्द का प्रयोग कबीर साहब किये हैं| सुरति पर ही सहज योग आधारित है| चलते-फिरते किसी भी काम को करते रहें और सुरति उस तरफ लगी रहे| मुँह से कुछ बोलना नहीं है, बस स्मृति बनाए रखनी है|

संतत्व का मूल मन्त्र है- सुरति| बुद्ध ने इसे स्मृति कहा है| महान दार्शनिक कृष्णमूर्ति इसे जागरूक भाव (अवेयरनेस) कहते हैं| गुरजियफ़ ने आत्म-स्मरण (सेल्फ रिमेम्बरिंग) कहा है|

राजस्थान में औरतें पानी भरने दूर-दूर तक जाती हैं| घड़े के ऊपर घड़ा रख लेती हैं| मस्ती में हँसती-हँसती बातें करती चलती रहती हैं, परन्तु घड़ा नहीं गिरता है| चूँकि बातें बाहर-बाहर परिधि पर होती हैं| केंद्र अर्थात् घड़ों पर सुरति या स्मृति सदैव लगी रहती है| नानक देव भी उसी तरफ इंगित कर रहे हैं- कर्म बाहर-बाहर होता रहे, सुरति उसी पर लगी रहे| उस तक सुरति से ही पहुँच सकते हैं|

उस परम प्रभु में सुरति लग जाना ही संन्यास है| उसको विस्मृत कर देना ही संसार है| परन्तु हमने मंदिर और गुरुद्वारा बनाकर पूरा इंतजाम कर दिया है कि किसी की सुरति उस तरफ जाने नहीं देंगे|

एक बार मैं ‘हेमकुंड साहब’ गया था| सुरति वहाँ अपने आप लग जाती है| अंदर से ओंकार ध्वनि, प्रणव, अनहद स्वयं सुनाई पड़ने लगता है| जिसके माध्यम से उस प्रभु की तरफ अनायास ही मन लग जाता है| परन्तु वहाँ के सेवादार शायद ऐसा नहीं चाहते| उन्होंने सेवा करने की कसमें खा ली हैं| पहाड़ों के मध्य- जिनपर बर्फ जमी रहती है, दूर-दूर तक वृक्ष नहीं होते, ऑक्सीजन की कमी वैसे ही रहती है, वहाँ जेनरेटर लगाकर दूषित वायु को दूर-दूर तक फैला रहे हैं| इसकी ध्वनि से पहाड़ों में इको उत्पन्न होती है| ध्वनि एवं वायु दोनों प्रदूषित हो रहे हैं| गुरु गोविन्द सिंह जी तथा लक्ष्मण जी ने पूर्वजन्म में यहाँ तप किया था| सचमुच यह जगह तप के लायक अत्यंत उपयुक्त है| परन्तु सेवा के नाम पर इतना रुढ़िवादी हो जाना कहाँ तक उचित है?

सुरति लगते ही अन्दर से अनहद सुनाई पड़ने लगता है| सद्गुरु कबीर कहते हैं-

अनहद अनुभव की करि आशा| ई विपरीत देखहु तमाशा||

इहै तमाशा देखहु रे भाई| जहँवाँ शून्य तहाँ चलि जाई||

दुनिया के देखने में यह उलटी है| परन्तु यह तमाशा ऐसा है कि जहाँ शून्य है यह वहाँ लेकर जाती है| उस शून्य में प्रवेश करने का एक मात्र सूत्र है- सुरति|

स्तुति मुँह से होती है तथा मन कहीं और भटकता है| यह स्तुति नहीं है| प्रार्थना नहीं है| कबीर साहिब कहते हैं- ‘पंडित वाद वदंते झूठा|’ यही पंडिताई है, जो झूठी है| इसी में जीवन बीत जाता है| मन में वासना है, संसार है, बाहर स्तुति है| इससे सुरति का तालमेल नहीं बैठता| सुरति प्रभु में हो, केंद्र में हो; परिधि पर संसार कार्य हो, तब संन्यास घटित होता है|

नदी-नाले समुद्र में गिरते हैं, लेकिन उसको जान नहीं सकते|

यहाँ होश की बात कहते हैं| प्रतिपल नदी-नाले समुद्र में ही गिरते हैं, परन्तु उन्हें इसका जरा भी भान नहीं| वह गिरने से डरते हैं, गिड़गिड़ाते हैं, फिर भी उसी में गिरते हैं| मनुष्य जाने-अनजाने निरंतर परमात्मा की तरफ बढ़ रहा है, परन्तु उसे होश नहीं है| वह बेहोश है| वह पुण्य के लिए तीर्थ कर लेगा, संगम स्नान कर लेगा, दान कर लेगा, परन्तु परम-पुरुष की तरफ से बेखबर होकर सो गया है|

जो सजग है- वह प्रतिपल उसी को देख रहा है| श्वास-श्वास में उसे ही ग्रहण कर रहा है| प्रत्येक श्वास में उसी के साथ बाहर आता है, अन्दर जाता है|

जो साधक श्वास को सुरति में लगा देता है, वह पहुँच जाता है समुद्र में| वह पा जाता है उस परम आनंद को| यात्रा पूरी हो जाती है| अन्यथा जन्मोंजन्म भटकना ही हाथ लगता है|

अकूत सम्पदा छिपाए समुद्र और पहाड़ जितना धन रखने वाला बादशाह और सुल्तान, उस चींटी की बराबरी नहीं कर सकते, जिसके मन से सुधि नहीं बिसरती है|

यहाँ प्रश्न उठता है कि वास्तविक बादशाह कौन है? एक लंगोटी पहने संन्यासी मस्ती में अपने रास्ते से गुज़रता है| उसकी कोई चाह नहीं है| वह अपने प्रभु के प्रेम में मस्त है, दीवाना है| उसकी उससे तारतम्यता लग गयी है|

एक बादशाह भी उसी रास्ते से गुज़रा है| हाथी-घोड़े का लश्कर उसके साथ है| नौकरों-चाकरों से घिरा है| सैकड़ों सेवक जय-जयकार करते हुए रास्ते पर धूल उड़ाते हुए चले जा रहे हैं उसी रास्ते पर|

उसका नंग-धड़ंग पैदलगामी संन्यासी से सामना होता है| प्रश्न उठता है कि कौन रास्ता खाली करे, दूसरे के लिए? देखते ही देखते सम्राट स्वर्णजटित हाथी के आसन से नीचे उतरता है| रत्नजटित मुकुट संन्यासी के पैर पर रखकर ज़मीन पर साष्टांग प्रणाम करता है| संन्यासी प्रभु के प्रेम में मग्न है| उसी मस्ती में प्रेम में राजा के सिर पर धूल-धूसरित पैर रख देता है|

राजा उठकर नाचने लगता है| मानो संन्यासी का दिव्य प्रेम उसके पैर के माध्यम से राजा के सर में प्रवाहित हो गया हो| राजा मग्न हो गया| पागलों की तरह नाचने लगा| चिल्लाने लगा कि अत्यंत दुखी था, दरिद्र था, परन्तु आज मैं धन्य हो गया| सम्राटों का सम्राट बन गया| अब तुम लोग यहाँ से जाओ| मुझे पृथ्वी पर सम्राटों के सम्राट की तरह घूमने दो|

यदि वह परम प्रभु मन में निरंतर वास कर रहा है, तो बाह्य आकृति की कोई कीमत नहीं| जो लक्ष्मीपति से मिल गया हो, जो नारायण को पा लिया हो, वह क्या कभी तुच्छ होगा?

पलटूदास कहते हैं कि ‘लक्ष्मी संतों की चेरी है|’ लक्ष्मी दासी है| सेठ दुकान पर बैठता है| लक्ष्मी की पूजा करता है| प्रथम बिक्री के रुपये को सिर से स्पर्श कर प्रणाम करता है| परन्तु वही लक्ष्मीपति अर्थात् राजा लोग उस लक्ष्मी को संतों के चरणों में अर्पित करते हैं, जो उसे स्पर्श तक नहीं करते| लक्ष्मी उसके पैरों में लेटी रहती है|

वह चेरी अर्थात् दासी की तरह सेवा करके अपने को धन्य समझती है| जो संसार रूपी कंकड़-पत्थर इकटठे करने के चक्कर में फँसता है, वह उस परम प्रभु से उतना ही दूर होता चला जाता है| ईसा ने कहा है- “परमात्मा के साम्राज्य में धनी आदमी का प्रवेश करना उतना ही दुष्कर है जितना कि सुई के छेद में ऊँट को प्रवेश कराना|”

धन व्यक्ति को बहिर्मुख बनाता है| झूठा अहंकार एकत्र कराता है| वह अंतर्यात्रा से दूर होता जाता है| मिटटी को इकटठा करने के चक्कर में वास्तविक हीरे को खोता चला जाता है|

सुरति के लगते ही साधक में एक क्रांति घटती है| आमूल-चूल परिवर्तन होने लगता है| जिससे वह आनंदातिरेक से भर उठता है| पुरानी धूल धुल जाती है| नए धर्म का जन्म होता है| धर्म तो सनातन व नवनीत होता है|

 

(‘समय के सद्गुरु’ स्वामी कृष्णानंद जी महाराज की अनमोल कृति एक ओंकार से उद्धृत…)

 

||हरि ॐ||

 

 

**********************************

 

‘समय के सदगुरु’ स्वामी  कृष्णानंद  जी महाराज

आप सद्विप्र समाज की रचना कर विश्व जनमानस को कल्याण मूलक सन्देश दे रहे हैं| सद्विप्र समाज सेवा एक आध्यात्मिक संस्था है, जो आपके निर्देशन में जीवन के सच्चे मर्म को उजागर कर शाश्वत शांति की ओर समाज को अग्रगति प्रदान करती है| आपने दिव्य गुप्त विज्ञान का अन्वेषण किया है, जिससे साधक शीघ्र ही साधना की ऊँचाई पर पहुँच सकता है| संसार की कठिनाई का सहजता से समाधान कर सकता है|

स्वामी जी के प्रवचन यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध हैं –

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||श्री सद्गुरवे नमः||

 

गुरुनानक जयंती (कार्तिक पूर्णिमा, दिनांक 18.11.2021) पर विशेष |

 

जे तिसु मनहु न वीसरहि

(जिसके मन से उसकी सुधि नहीं विसरती) 

सालाहि सालाहि एती सुरति न पाईया ||

नदीया अतै वाह पवहि समुंदि न जाणीअहि ||

समुंद साह सुल्तान गिरहा सेती मालु धनु ||

कौड़ी तुलि न होवनी जे तिसु मनहु न वीसरहि ||

 

स्तुति करने वाले उसकी स्तुति करते हैं, लेकिन उन्हें उसकी स्मृति नहीं मिली| नदी और नाले समुद्र में गिरते हैं, लेकिन वे उसको जान नहीं सकते| समुद्र के समान अकूत संपत्ति वाले बादशाह और पहाड़ों के जितनी धन-संपत्ति वाले सुल्तान भी हों, उस कीड़ी की बराबरी नहीं कर सकते, जिसके मन से उसकी सुधि नहीं बिसरती|

एक कहानी याद आई| एक युवक को समझ में आ गया कि संसार निस्सार है| सारे रिश्ते-नाते बेकार हैं| वह संन्यास लेने की सोचने लगा| अपने नजदीकी रिश्तेदारों से सहायता की माँग की कि मुझे संन्यासी बनना है| अतएव कमण्डल, आसनी, माला तथा गुदड़ी देकर मेरी मदद करो| परन्तु किसी ने मदद नहीं किया| वह निराश हो गया|

कुछ दिन के बाद युवक एक मुस्लिम फ़क़ीर आजर कैबी के पास गया| उनसे अपनी कठिनाई सुनाई| वह फ़क़ीर हँसने लगा| फिर बोला- वाह भाई! तुम संसार छोड़कर संसार की वस्तुयें इकटठी करना चाहते हो| फकीरी तो सामान जमा करने में नहीं, बल्कि छोड़ने में होती है| तुम अभी संन्यास के योग्य नहीं हो| जाओ, घर-गृहस्थी में रहकर अपने कर्तव्य के साथ भगवान् का भजन करो| यही तुम्हारे लिए फकीरी और दरवेशी है| उसकी बातें सुनकर फकीरी की इच्छा से आए व्यक्ति की आँखें खुल गईं|

हम सदैव स्तुति में लगे रहते हैं| मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा सर्वत्र स्तुति होती रहती है| परमात्मा को तो अपनी बात सुनाना चाहते हैं, परन्तु उसकी सुनने का समय हमारे पास नहीं है| हमें ऐसा विश्वास हो गया है कि वह कुछ कम सुनने लगा है| इसलिए माइक, लाउडस्पीकर लगाकर सुबह ब्रह्म मुहूर्त में जोर-जोर से चिल्लाते हैं| उसे जगाने की चेष्टा करते हैं| जैसे वह गहरी नींद में चला गया हो और उसकी नींद खुल न रही हो| उसी प्रकार जैसे राजनेता नहीं सुनते हैं तो हम जुलूस निकालते हैं, रेलगाड़ी रोकते हैं, तोड़-फोड़ करते हैं| कहीं बसें तो कहीं सरकारी इमारतें जलाते हैं| अपने बात सुनने के लिए मजबूर कर देते हैं|

विध्वंसात्मक प्रवृत्तियाँ हमारे अन्दर छिपी हैं| समय पाते ही ये बाहर आ जाती हैं| सद्गुरु कबीर कहते हैं-

‘कंकड़ पत्थर जोड़ि के मस्जिद दिया बनाय |

तापर मुर्गा बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय ||’

क्या परमात्मा बहरा हो गया है? या उसे सुनाई नहीं पड़ता है अथवा वह सुनना नहीं चाहता| ऐसे में उसे सुनाने का कोई उपाय नहीं है| इसके पूर्व की पउड़ी में नानक देव सुनने पर जोर दिए हैं| उसे सुनना होगा| वह निरंतर आवाज़ दे रहा है| अपनी तरफ आकृष्ट करने के लिए ध्वनि कर रहा है| वह ध्वनि है- ओंकार| सुनने की कला बोलने से नहीं आयेगी| बल्कि सुनने से आयेगी, यही कला है- सुरति|

सुरति- स्मृति से बनी है| इस शब्द का प्रयोग कबीर साहब किये हैं| सुरति पर ही सहज योग आधारित है| चलते-फिरते किसी भी काम को करते रहें और सुरति उस तरफ लगी रहे| मुँह से कुछ बोलना नहीं है, बस स्मृति बनाए रखनी है|

संतत्व का मूल मन्त्र है- सुरति| बुद्ध ने इसे स्मृति कहा है| महान दार्शनिक कृष्णमूर्ति इसे जागरूक भाव (अवेयरनेस) कहते हैं| गुरजियफ़ ने आत्म-स्मरण (सेल्फ रिमेम्बरिंग) कहा है|

राजस्थान में औरतें पानी भरने दूर-दूर तक जाती हैं| घड़े के ऊपर घड़ा रख लेती हैं| मस्ती में हँसती-हँसती बातें करती चलती रहती हैं, परन्तु घड़ा नहीं गिरता है| चूँकि बातें बाहर-बाहर परिधि पर होती हैं| केंद्र अर्थात् घड़ों पर सुरति या स्मृति सदैव लगी रहती है| नानक देव भी उसी तरफ इंगित कर रहे हैं- कर्म बाहर-बाहर होता रहे, सुरति उसी पर लगी रहे| उस तक सुरति से ही पहुँच सकते हैं|

उस परम प्रभु में सुरति लग जाना ही संन्यास है| उसको विस्मृत कर देना ही संसार है| परन्तु हमने मंदिर और गुरुद्वारा बनाकर पूरा इंतजाम कर दिया है कि किसी की सुरति उस तरफ जाने नहीं देंगे|

एक बार मैं ‘हेमकुंड साहब’ गया था| सुरति वहाँ अपने आप लग जाती है| अंदर से ओंकार ध्वनि, प्रणव, अनहद स्वयं सुनाई पड़ने लगता है| जिसके माध्यम से उस प्रभु की तरफ अनायास ही मन लग जाता है| परन्तु वहाँ के सेवादार शायद ऐसा नहीं चाहते| उन्होंने सेवा करने की कसमें खा ली हैं| पहाड़ों के मध्य- जिनपर बर्फ जमी रहती है, दूर-दूर तक वृक्ष नहीं होते, ऑक्सीजन की कमी वैसे ही रहती है, वहाँ जेनरेटर लगाकर दूषित वायु को दूर-दूर तक फैला रहे हैं| इसकी ध्वनि से पहाड़ों में इको उत्पन्न होती है| ध्वनि एवं वायु दोनों प्रदूषित हो रहे हैं| गुरु गोविन्द सिंह जी तथा लक्ष्मण जी ने पूर्वजन्म में यहाँ तप किया था| सचमुच यह जगह तप के लायक अत्यंत उपयुक्त है| परन्तु सेवा के नाम पर इतना रुढ़िवादी हो जाना कहाँ तक उचित है?

सुरति लगते ही अन्दर से अनहद सुनाई पड़ने लगता है| सद्गुरु कबीर कहते हैं-

अनहद अनुभव की करि आशा| ई विपरीत देखहु तमाशा||

इहै तमाशा देखहु रे भाई| जहँवाँ शून्य तहाँ चलि जाई||

दुनिया के देखने में यह उलटी है| परन्तु यह तमाशा ऐसा है कि जहाँ शून्य है यह वहाँ लेकर जाती है| उस शून्य में प्रवेश करने का एक मात्र सूत्र है- सुरति|

स्तुति मुँह से होती है तथा मन कहीं और भटकता है| यह स्तुति नहीं है| प्रार्थना नहीं है| कबीर साहिब कहते हैं- ‘पंडित वाद वदंते झूठा|’ यही पंडिताई है, जो झूठी है| इसी में जीवन बीत जाता है| मन में वासना है, संसार है, बाहर स्तुति है| इससे सुरति का तालमेल नहीं बैठता| सुरति प्रभु में हो, केंद्र में हो; परिधि पर संसार कार्य हो, तब संन्यास घटित होता है|

नदी-नाले समुद्र में गिरते हैं, लेकिन उसको जान नहीं सकते|

यहाँ होश की बात कहते हैं| प्रतिपल नदी-नाले समुद्र में ही गिरते हैं, परन्तु उन्हें इसका जरा भी भान नहीं| वह गिरने से डरते हैं, गिड़गिड़ाते हैं, फिर भी उसी में गिरते हैं| मनुष्य जाने-अनजाने निरंतर परमात्मा की तरफ बढ़ रहा है, परन्तु उसे होश नहीं है| वह बेहोश है| वह पुण्य के लिए तीर्थ कर लेगा, संगम स्नान कर लेगा, दान कर लेगा, परन्तु परम-पुरुष की तरफ से बेखबर होकर सो गया है|

जो सजग है- वह प्रतिपल उसी को देख रहा है| श्वास-श्वास में उसे ही ग्रहण कर रहा है| प्रत्येक श्वास में उसी के साथ बाहर आता है, अन्दर जाता है|

जो साधक श्वास को सुरति में लगा देता है, वह पहुँच जाता है समुद्र में| वह पा जाता है उस परम आनंद को| यात्रा पूरी हो जाती है| अन्यथा जन्मोंजन्म भटकना ही हाथ लगता है|

अकूत सम्पदा छिपाए समुद्र और पहाड़ जितना धन रखने वाला बादशाह और सुल्तान, उस चींटी की बराबरी नहीं कर सकते, जिसके मन से सुधि नहीं बिसरती है|

यहाँ प्रश्न उठता है कि वास्तविक बादशाह कौन है? एक लंगोटी पहने संन्यासी मस्ती में अपने रास्ते से गुज़रता है| उसकी कोई चाह नहीं है| वह अपने प्रभु के प्रेम में मस्त है, दीवाना है| उसकी उससे तारतम्यता लग गयी है|

एक बादशाह भी उसी रास्ते से गुज़रा है| हाथी-घोड़े का लश्कर उसके साथ है| नौकरों-चाकरों से घिरा है| सैकड़ों सेवक जय-जयकार करते हुए रास्ते पर धूल उड़ाते हुए चले जा रहे हैं उसी रास्ते पर|

उसका नंग-धड़ंग पैदलगामी संन्यासी से सामना होता है| प्रश्न उठता है कि कौन रास्ता खाली करे, दूसरे के लिए? देखते ही देखते सम्राट स्वर्णजटित हाथी के आसन से नीचे उतरता है| रत्नजटित मुकुट संन्यासी के पैर पर रखकर ज़मीन पर साष्टांग प्रणाम करता है| संन्यासी प्रभु के प्रेम में मग्न है| उसी मस्ती में प्रेम में राजा के सिर पर धूल-धूसरित पैर रख देता है|

राजा उठकर नाचने लगता है| मानो संन्यासी का दिव्य प्रेम उसके पैर के माध्यम से राजा के सर में प्रवाहित हो गया हो| राजा मग्न हो गया| पागलों की तरह नाचने लगा| चिल्लाने लगा कि अत्यंत दुखी था, दरिद्र था, परन्तु आज मैं धन्य हो गया| सम्राटों का सम्राट बन गया| अब तुम लोग यहाँ से जाओ| मुझे पृथ्वी पर सम्राटों के सम्राट की तरह घूमने दो|

यदि वह परम प्रभु मन में निरंतर वास कर रहा है, तो बाह्य आकृति की कोई कीमत नहीं| जो लक्ष्मीपति से मिल गया हो, जो नारायण को पा लिया हो, वह क्या कभी तुच्छ होगा?

पलटूदास कहते हैं कि ‘लक्ष्मी संतों की चेरी है|’ लक्ष्मी दासी है| सेठ दुकान पर बैठता है| लक्ष्मी की पूजा करता है| प्रथम बिक्री के रुपये को सिर से स्पर्श कर प्रणाम करता है| परन्तु वही लक्ष्मीपति अर्थात् राजा लोग उस लक्ष्मी को संतों के चरणों में अर्पित करते हैं, जो उसे स्पर्श तक नहीं करते| लक्ष्मी उसके पैरों में लेटी रहती है|

वह चेरी अर्थात् दासी की तरह सेवा करके अपने को धन्य समझती है| जो संसार रूपी कंकड़-पत्थर इकटठे करने के चक्कर में फँसता है, वह उस परम प्रभु से उतना ही दूर होता चला जाता है| ईसा ने कहा है- “परमात्मा के साम्राज्य में धनी आदमी का प्रवेश करना उतना ही दुष्कर है जितना कि सुई के छेद में ऊँट को प्रवेश कराना|”

धन व्यक्ति को बहिर्मुख बनाता है| झूठा अहंकार एकत्र कराता है| वह अंतर्यात्रा से दूर होता जाता है| मिटटी को इकटठा करने के चक्कर में वास्तविक हीरे को खोता चला जाता है|

सुरति के लगते ही साधक में एक क्रांति घटती है| आमूल-चूल परिवर्तन होने लगता है| जिससे वह आनंदातिरेक से भर उठता है| पुरानी धूल धुल जाती है| नए धर्म का जन्म होता है| धर्म तो सनातन व नवनीत होता है|

 

(‘समय के सद्गुरु’ स्वामी कृष्णानंद जी महाराज की अनमोल कृति एक ओंकार से उद्धृत…)

 

||हरि ॐ||

 

 

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‘समय के सदगुरु’ स्वामी  कृष्णानंद  जी महाराज

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