देवतामय शरीर

देवतामय शरीर

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28 Jul 20249 min read

Published in spiritualism

||श्री सद्गुरवे नमः||

 

देवतामय शरीर

 

वेद के ऋचा की ही बात सद्गुरु कबीर सतही भाषा में कहते हैं कि पाँच तत्वों एवं तीन गुणों से इस शरीर का निर्माण परम पुरुष ने किया है। जिसमें जीव, माया और ब्रह्म को लगाया है। पांच तत्व, पचीस प्रवृतियों के संयोग से खेल-खेल में एक समर्थ पुरुष बनाकर खड़ा कर दिया है। जिसमें काम, क्रोध, ममता का पाग लगाया है। सूर्य और चन्द्रमा को भी इसी मानव में लगा दिया है, जो गुरु की महिमा से सोता तथा जागता है।

‘तामें जीव, ब्रह्म अरू माया। समरथ ऐसा खेल बनाया।।

जीवन पाँच पचीसो लागा। काम क्रोध ममता मद पागा।।

काया गुदरी का विस्तारा। देखो संतो अगम सिंगारा।।

चंद सूर दोउ पेवन लागें। गुरु परताप से सोवत जागें ||’

ऐतरेय उपनिषद में केवल आठ ही देवताओं का निदेश मिलता है। श्रीमद्भागवत् में पंद्रह देवताओं का उल्लेख मिलता है। अथर्ववेद 90/6 निम्न ऋचा को देखें-

1)

यस्मिन् भूमिरन्तरिक्षं द्यौर्यस्मिन्नध्याहिता।

यत्राग्निश्चन्द्रमाः सूर्यो वातस्तिष्ठन्त्यार्पिता।। (12)

जिसमें भूमि, अन्तरिक्ष और द्युलोक रहे हैं, जिसमें अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य और वायु रहते हैं।

2)

यस्य त्रायस्त्रिंशद्देवा अंगे सर्वे समाहिताः।

तैंतीस देव जिसके अंग में रहते हैं।

3)

यस्य त्रायस्त्रिंशद्देवा अंगे गात्रा विभेजिरे।

तान् वै त्रायस्तिंशद्देवानेके ब्रह्माविदो विदुः।। (26)

जिसके गौत्रों और अवयवों में तैंतीस देव रहते हैं। इन तैंतीस देवों को ब्रह्मज्ञानी ही जानते हैं।

4)

यस्य सूर्यश्चक्षुश्चन्द्रमाश्च पुनर्णवः।

अग्निर्यस्यक आस्यं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः।।

जहाँ सूर्य आँख बना है, चन्द्रमा दूसरी आँख बना है, अग्नि जिसका मुख हुआ है।

5)

यस्य वातः प्राणापानौ चक्षुरंगिरसोऽभवन।

दिशो चश्चके प्रज्ञानीस्तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः।। (34)

जिसके प्राण और अपान वायु बने हैं, चक्षु सूर्य बनता है, दिशाएं कान बनी हैं, इस ज्येष्ठ ब्रह्म के लिए प्रणाम है।

 

 

यह वर्णन विश्व रूप देह परमात्मा का है। इसी का प्रतिरूप मनुष्य है। यही तैंतीस देवता मानवी शरीर में भी हैं। इसका उल्लेख अथर्ववेद 11/8 के ऋचा में देखा जा सकता है-

1)

दश साकमजायन्त देवा देवेभ्यः पुरा।

यो वै तान् विद्यात्प्रत्यक्षं स वा आद्य महद्वदेत्।। (3)

पहले दस देवों से दस पुत्र देव उत्पन्न हुए। जो यह प्रत्यक्ष देखता है, वह ब्रह्म के विषय में प्रवचन कर सकता है।

2)

प्राणापानौ चक्षुः श्रोतं अक्षितिश्च क्षितिश्च या।

व्यानोदानौ वाड्. मनस्ते वा आकूतिभावबहन्।। (4)

प्राण, अपान, चक्षु, श्रोत, अक्षिति, क्षिति, व्यान, उदान, वाणी और मन में दस छोटे देव बड़े देवों के पुत्र हैं।

3)

ये त आसन् दश जाता देवा देवेभ्यः पुरा।

पुत्रोभ्यो लोकं दत्वा कस्मिंस्ते लोक मासते।। (10)

ये दस पुत्र देव, दस पिता देवों से उत्पन्न हुए थे। पिता देवों ने पुत्र देवों को (मानवी शरीर में) स्थान दिया और वे पिता देव कहाँ भला जाकर बसने लगे? अर्थात विश्व रूप परमात्मा देह में रहने वाले इन पितृदेवों ने दस पुत्र उत्पन्न किए। इन पुत्रों को मानव देह में उचित स्थान देकर वे विश्व पुरुष देह में यथापूर्व रहने लगे।

4)

संसिचो नाम ते देवा ये संभारान्त्समभरन्।

संर्व संसिच्य मंर्त्यं देवाः पुरुषमाविशन।। (13)

ये देव संसिच्नाम है। सब मर्त्य पदार्थों को अपने अमृतरस से सिंचित करके ये देव मनुष्य शरीर में घुस रहे हैं।

5)

अस्थि कृत्वा समिध्ं अदषा्पो असादयन्।

रेतः कृत्वाज्यं देवाः पुरुषभाविशन्।। (29)

अस्थि की समिधा बन गई और रेत का घृत बन गया। रेत के साथ में देव मानवी शरीर में घुस गए हैं।

6)

या आपो याश्च देवता या विराघ ब्रह्मणा सह।

शरीरं ब्रह्म प्राविशच्छरीरेऽधि प्रजापतिः।। (30)

7)

तस्माद्वे विद्वान पुरुषं इदं ब्रह्मेति मन्यते।

सर्वा अस्मिन् देवता गावो गोष्ट इवासते।। (32)

इन देवताओं के साथ ब्रह्म ने शरीर में जीव भाव से प्रवेश किया है। इसलिए ज्ञानी लोक इस पुरुष को ब्रह्म कहते हैं। सब देवता गौवें गोशाला में रहने के समान इस शरीर रूपी शाला में रहती हैं। इससे स्पष्ट होता है कि तैंतीस देवता इसी मानवी शरीर में रहते हैं। यह मानव पत्थर-पानी के देवों पर अपना सिर रगड़कर अपना तथा परम पुरुष का अपमान करता है। दूसरी तरफ किसी व्यक्ति विशेष का नीच जाति के नाम पर अपमान करता है। इन देवताओं को निम्न तालिका से स्पष्ट समझा जा सकता है-

 

 

ब्रह्माण्ड

कार्य

पिण्ड

 

 

परमात्मा, परब्रह्म 

चेतना

जीव आत्मा

 

द्युलोक

1.

द्यौः

प्रकाश

ज्ञान सिर

 

2.

सूर्य

आदित्य दृष्टि

दर्शन नेत्र

 

3.

वृहस्पति, ब्रह्मणस्वति

बुद्धि

ज्ञान ग्रहण साधन

 

4.

दिन-रात्रि

उन्मेष-निमेष

नेत्र, पलक

 

5.

असुनीति

प्राण शक्ति

प्राणसंस्थान

 

6.

यम (नियामक)

संयम

अंतःकरण

 

7.

दिशा

श्रवण

कर्ण

 

8.

नक्षत्र

तेजः केन्द्र

ज्ञान केंद्र

 

9.

पूषा

पुष्टी

शरीर पोषक

 

10.

भगः

भाग्य

तेजस्विता

 

11.

वरुणः

शांति

साम्य

 

अंतरिक्ष लोक

 

1.

अंतरिक्ष

आकाश

उदर

 

2.

इंद्र, त्वष्टा

बल, शिल्प, कर्म

हाथ

 

3.

वायु, अश्विनी 

प्राण, श्वासोच्छ्वास 

फेफड़े, नासिका

 

4.

चन्द्र

शांति

अंतर्मन

 

5.

विद्युत्

चांचल्य

मन

 

6.

नभः

समान प्राण

मध्य

 

7.

रुद्र

अहंकार

ह्रदय

 

8.

मरुतः

अन्यप्राण, उपप्राण

सर्व शरीर

 

9.

ऋभवः

शिल्प, कौशल्य

हस्तकर्म

 

10.

सोम

समता, उत्साह

दोष दूर करने की शक्ति

 

11.

मृत्यु

अपान

नाभि

 

भूलोक

 

1.

पृथ्वी

आधार

पाँव

 

2.

विष्णु

गति, रक्षण

पाँव

 

3.

प्रजापति

प्रजनन

शिश्न

 

4.

पर्वत

उच्चता

पृष्ठ वंश

 

5.

नदियाँ

रक्त सञ्चालन

नाड़ियाँ

 

6.

समुद्र

जल रस तत्व

उदर,हृदयाशय

 

7.

आपः

रेतः

शिश्न

 

8.

मेघ वृष्टि

रेतः स्खलन

शिश्न

 

9.

औषधि, वनस्पतियाँ

केश

त्वचा

 

10.

अग्निः वैश्नावरः

वाणी

मुख

 

11.

चेतः

चिंतन

चित्त

 

 

भूलोक के देवता शरीर के निचले भाग में हैं। अंतरिक्ष लोक के देवता शरीर के मध्य भाग में हैं और द्युलोक के देवता सिर के स्थान में हैं- ‘यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे’ की उक्ति इस शरीर में चरितार्थ होती है। इस विश्व ब्रह्माण्ड के सारे देवताओं के अंश अर्थात् प्रतिनिधि इस मानव शरीर में स्थित हैं। वेद तैंतीस देवताओं पर रुक नहीं गया है। ‘वहाँ तीन सौ तैंतीस, छह हजार देव, इस तरह छह हजार तीन सौ तैंतीस की गुणित के क्रम से बढ़ती जाती है और अंत में तैंतीस करोड़ पहुँच जाती है।’ (अथर्ववेद 11/6/2)

इस तरह यह मानव शरीर तैंतीस करोड़ देवताओं की मानव परिषद् है। तैंतीस देव तैंतीस विभागों के विभागाध्यक्ष हैं। जिनके शासन में अन्य देव रहकर अपना कार्य सम्पादन करते हैं। इन तैंतीसों के ऊपर देव हैं। जो अलग-अलग सेक्टर में विभक्त हैं। शासन की दृष्टि से ऐसा समझना उचित है। जो साधक अपने शरीर का शासन एवं देवताओं को समझ लेगा, उसे विश्व सृष्टि का शासन समझ में आ जाएगा।

इस शरीर रूपी ब्रह्मांड का राजा आत्मा है। इसके चार सलाहकार मंत्री हैं- मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार। इन्द्रियाँ प्रांताधिकारी हैं। प्रत्येक इन्द्रिय और अवयव का एक अधिष्ठाता है। वह मन के अधीन रहकर अपने अवयव के अन्दर कार्य सम्पादन करता है। ऐसे शरीर के तैंतीस प्रान्त हैं। इनको हम इन्द्रिय तथा अवयव कहते हैं। इस प्रत्येक प्रांत के सूत्र पृष्ठवंश से जुड़े रहते हैं। पृष्ठवंश में मज्जा ग्रन्थियाँ हैं। प्रत्येक मज्जा ग्रंथि के साथ सैकड़ों मज्जा तंतु जुड़े रहते हैं। उस प्रांत का संचालन उसके द्वारा किया जाता है। इस तरह इस संपूर्ण शरीर रूपी विश्व का संचालन होता है।

आत्मा अपने मंत्रियों से मंत्रणा करके मज्जा केन्द्रों के द्वारा मज्जा तंतुओं से जिस शरीरावयव में कार्य कराना हो, उस शरीर विभाग में कार्य करता है। इसी तरह इसी मार्ग में सब शरीर के भागों और उपभागों में जो होता है, उसका ज्ञान भी आत्मा प्राप्त करता है। वहाँ जो संदेश देना होता है, देता है। जैसे पाँव में काँटा गड़ गया तो, पाँव के मज्जा तंतु मज्जा केन्द्र को सूचना देते हैं। मज्जा केन्द्र इन्द्रियों को, इन्द्रियां मंत्री को, मंत्री राजा को सूचित करता है। फिर वहाँ से यथोचित आदेश आता है। तत्क्षण कार्य सम्पादन किया जाता है।

शरीर एक राष्ट्र हुआ।

राष्ट्राध्यक्ष- आत्मा

मंत्रीमंडल- मन, बुद्धि, चित, अहंकार

संरक्षक (सैनिक)- प्राण, उपप्राण

कार्याधिकारी- इन्द्रियाँ

प्रांत- अवयव

जब सब इन्द्रियां और अवयव राजा की आज्ञा से कार्य सम्पादन करते हैं, उन्मत्त, प्रयत और स्वेच्छाचारी नहीं होते हैं, तब तक शरीर रूपी राष्ट्र स्वस्थ रहता है। जैसे ही कोई इन्द्रिय स्वेच्छाचारी बनती है, वैसे ही शरीर रूपी राष्ट्र रुग्ण होने लगता है। यदि यह क्रम चलता रहा तब राष्ट्र का नाश हो जाता है। इसलिए संयम और मनोनिग्रह शरीर रूपी राष्ट्र के स्वास्थ्य के लिए अत्यावश्यक हैं। जब उसके सभी अधिष्ठाता अधिकारी आत्मा के अधीन रहकर सब शरीर के स्वास्थ्य के लिए कार्य करते हैं, तब शरीर निरोग और दीर्घजीवी होता है।

मन सर्वश्रेष्ठ मंत्री है। जब वह उच्छृंखल एवं विद्रोही हो जाता है, तब वह बंधन का कारण बन जाता है। वह अपने को राष्ट्राध्यक्ष बनने का दुस्साहस करके राष्ट्र को अस्त-व्यस्त कर देता है।

‘मन एवं मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।।’

शरीर रूपी राष्ट्र के सभी भागों पर मन का आधिपत्य रहता है और उसके ही आदेशानुसार सारा कार्य सम्पादन होता है। आत्मा निर्विकार भाव से तटस्थ बैठ जाता है। बुद्धि मन का लगाम है। परन्तु उसके मतंग होने पर बुद्धि बेचारी ही नहीं बनती बल्कि उसके आदेश के अनुसार उसे चलना पड़ता है। मन की सामर्थ्य अत्यधिक है। इसलिए इसे शुभ विचारों से युक्त रखना ही होगा। इसके लिए साधक को चरम निर्देश का हर हालत में पालन करना ही होगा। तब ज्योतिर्मय रहेगा।

‘यज्जाग्रतो दूर मुदेति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवेति।

दूरंगमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवः संकल्पमस्तु।। (1)’

(वा. यजु. वेद 34)

जो मेरा मन जागते हुए दूर-दूर जाता है, वही मेरा मन सोते हुए भी उसी प्रकार दूर जाता है। वह दूर जाने वाला मेरा मन प्रकाश देने वालों को भी प्रकाशित करने वाला है। वह एकमात्र दैवी शक्ति से युक्त है। वह मेरा मन शिव (ज्योति) संकल्प करने वाला है।

मन सबल है। यह कुछ भी करने में समर्थ है। यह आकाश से भी ऊपर गमन कर सकता है। पाताल से भी नीचे गिर सकता है। ऊपर चढ़ने में इसे कठिनाई मालूम होती है। अतः साधक गुरु के सान्निध्य में रहकर मन को शुभ संकल्पों से युक्त करें। चरम निर्देश को अपने जीवन में उतार लें। फिर ध्यान द्वारा सारी शक्ति का गमन ऊर्ध्व हो जाएगा। मन आत्मा तथा शरीर के बीच रज्जू का कार्य करेगा। आत्मा के संसर्ग में रहने पर वह निर्माणमूलक कार्य कर लंका में भी सद्विप्र का साम्राज्य स्थापित कर देगा। अन्यथा विद्रोही होने पर अयोध्या में भी कैकेयी, मंथरा का राज्य हो जाएगा तथा राजा दशरथ को शरीर छोड़ने के लिए बाध्य होना होगा। राम, सीता, लक्ष्मण को वन गमन करना होगा।

मन जिस इन्द्रिय के साथ रहता है, वही सबल हो जाती है। वही कर्म करती है। दूसरे मौन हो जाते हैं। मन गुरु के सान्निध्य में रहता है, तब वह सिद्ध हो जाता है। वह संसार का कोई भी कार्य क्षण-भर में सम्पन्न कर देता है। मन का गुरु अनुकम्पा ग्रहण करना ही सिद्धता है। आज रेकी विद्या की धूम मची है। जो जापान के डॉ. मिकाउ के द्वारा फैलाई गई है। परन्तु भारतीय मनीषियों ने इससे भी आगे इसकी खोज की है। मैंने स्वयं रेकी ग्रैंड मास्टर्स का क्लास लिया तथा उसमें मंत्र, भारतीय चिह्न (सिम्बल) का समायोजन कर उन्हें बताया| उन लोगों ने मशीनों से परीक्षण कर देखा कि उसमें सौ प्रतिशत शक्ति की वृद्धि हुई है। जिसका परिणाम हुआ कि रेकी ग्रैंड मास्टर लोग शिष्यत्व ग्रहण करने लगे। हालांकि मैंने यह भी अनुभव किया कि उनकी शक्ति चैनेलाइज़ होकर ऊर्ध्व दिशा की तरफ हो गई है। इससे उन्हें गति देने में विशेष कठिनाई नहीं हुई। जो व्यक्ति बाहर केवल देवी-देवता की आराधना में लगा रहता है। उनकी ऊर्जा बिखरी पड़ी रहती है। चूँकि उनका मन बहिर्मुख हो गया है। मन का अंतर्मुख होना ही कला है। अंतर्मुख होने पर वह गुरु पर्वत से गुरु अनुकम्पा तथा आज्ञाचक्र से आत्म-निर्देश ग्रहण करता है। जिससे वह किसी कार्य को करने में समर्थ हो जाता है। मन के संकल्प से रोगी का रोग दूर किया जा सकता है। हजारों किमी. दूर बैठे अपने भक्तों की मदद कर सकता है। विषम परिस्थिति में फंसे शिष्यों को निकाल देता है।

 

||हरि ॐ||

 

समय के सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज की अनमोल कृति ‘मेरे राम’ से उद्धृत….

 

 

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‘समय के सदगुरु’ स्वामी  कृष्णानंद  जी महाराज

आप सद्विप्र समाज की रचना कर विश्व जनमानस को कल्याण मूलक सन्देश दे रहे हैं| सद्विप्र समाज सेवा एक आध्यात्मिक संस्था है, जो आपके निर्देशन में जीवन के सच्चे मर्म को उजागर कर शाश्वत शांति की ओर समाज को अग्रगति प्रदान करती है| आपने दिव्य गुप्त विज्ञान का अन्वेषण किया है, जिससे साधक शीघ्र ही साधना की ऊँचाई पर पहुँच सकता है| संसार की कठिनाई का सहजता से समाधान कर सकता है|

स्वामी जी के प्रवचन यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध हैं –

SadGuru Dham 

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||श्री सद्गुरवे नमः||

 

देवतामय शरीर

 

वेद के ऋचा की ही बात सद्गुरु कबीर सतही भाषा में कहते हैं कि पाँच तत्वों एवं तीन गुणों से इस शरीर का निर्माण परम पुरुष ने किया है। जिसमें जीव, माया और ब्रह्म को लगाया है। पांच तत्व, पचीस प्रवृतियों के संयोग से खेल-खेल में एक समर्थ पुरुष बनाकर खड़ा कर दिया है। जिसमें काम, क्रोध, ममता का पाग लगाया है। सूर्य और चन्द्रमा को भी इसी मानव में लगा दिया है, जो गुरु की महिमा से सोता तथा जागता है।

‘तामें जीव, ब्रह्म अरू माया। समरथ ऐसा खेल बनाया।।

जीवन पाँच पचीसो लागा। काम क्रोध ममता मद पागा।।

काया गुदरी का विस्तारा। देखो संतो अगम सिंगारा।।

चंद सूर दोउ पेवन लागें। गुरु परताप से सोवत जागें ||’

ऐतरेय उपनिषद में केवल आठ ही देवताओं का निदेश मिलता है। श्रीमद्भागवत् में पंद्रह देवताओं का उल्लेख मिलता है। अथर्ववेद 90/6 निम्न ऋचा को देखें-

1)

यस्मिन् भूमिरन्तरिक्षं द्यौर्यस्मिन्नध्याहिता।

यत्राग्निश्चन्द्रमाः सूर्यो वातस्तिष्ठन्त्यार्पिता।। (12)

जिसमें भूमि, अन्तरिक्ष और द्युलोक रहे हैं, जिसमें अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य और वायु रहते हैं।

2)

यस्य त्रायस्त्रिंशद्देवा अंगे सर्वे समाहिताः।

तैंतीस देव जिसके अंग में रहते हैं।

3)

यस्य त्रायस्त्रिंशद्देवा अंगे गात्रा विभेजिरे।

तान् वै त्रायस्तिंशद्देवानेके ब्रह्माविदो विदुः।। (26)

जिसके गौत्रों और अवयवों में तैंतीस देव रहते हैं। इन तैंतीस देवों को ब्रह्मज्ञानी ही जानते हैं।

4)

यस्य सूर्यश्चक्षुश्चन्द्रमाश्च पुनर्णवः।

अग्निर्यस्यक आस्यं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः।।

जहाँ सूर्य आँख बना है, चन्द्रमा दूसरी आँख बना है, अग्नि जिसका मुख हुआ है।

5)

यस्य वातः प्राणापानौ चक्षुरंगिरसोऽभवन।

दिशो चश्चके प्रज्ञानीस्तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः।। (34)

जिसके प्राण और अपान वायु बने हैं, चक्षु सूर्य बनता है, दिशाएं कान बनी हैं, इस ज्येष्ठ ब्रह्म के लिए प्रणाम है।

 

 

यह वर्णन विश्व रूप देह परमात्मा का है। इसी का प्रतिरूप मनुष्य है। यही तैंतीस देवता मानवी शरीर में भी हैं। इसका उल्लेख अथर्ववेद 11/8 के ऋचा में देखा जा सकता है-

1)

दश साकमजायन्त देवा देवेभ्यः पुरा।

यो वै तान् विद्यात्प्रत्यक्षं स वा आद्य महद्वदेत्।। (3)

पहले दस देवों से दस पुत्र देव उत्पन्न हुए। जो यह प्रत्यक्ष देखता है, वह ब्रह्म के विषय में प्रवचन कर सकता है।

2)

प्राणापानौ चक्षुः श्रोतं अक्षितिश्च क्षितिश्च या।

व्यानोदानौ वाड्. मनस्ते वा आकूतिभावबहन्।। (4)

प्राण, अपान, चक्षु, श्रोत, अक्षिति, क्षिति, व्यान, उदान, वाणी और मन में दस छोटे देव बड़े देवों के पुत्र हैं।

3)

ये त आसन् दश जाता देवा देवेभ्यः पुरा।

पुत्रोभ्यो लोकं दत्वा कस्मिंस्ते लोक मासते।। (10)

ये दस पुत्र देव, दस पिता देवों से उत्पन्न हुए थे। पिता देवों ने पुत्र देवों को (मानवी शरीर में) स्थान दिया और वे पिता देव कहाँ भला जाकर बसने लगे? अर्थात विश्व रूप परमात्मा देह में रहने वाले इन पितृदेवों ने दस पुत्र उत्पन्न किए। इन पुत्रों को मानव देह में उचित स्थान देकर वे विश्व पुरुष देह में यथापूर्व रहने लगे।

4)

संसिचो नाम ते देवा ये संभारान्त्समभरन्।

संर्व संसिच्य मंर्त्यं देवाः पुरुषमाविशन।। (13)

ये देव संसिच्नाम है। सब मर्त्य पदार्थों को अपने अमृतरस से सिंचित करके ये देव मनुष्य शरीर में घुस रहे हैं।

5)

अस्थि कृत्वा समिध्ं अदषा्पो असादयन्।

रेतः कृत्वाज्यं देवाः पुरुषभाविशन्।। (29)

अस्थि की समिधा बन गई और रेत का घृत बन गया। रेत के साथ में देव मानवी शरीर में घुस गए हैं।

6)

या आपो याश्च देवता या विराघ ब्रह्मणा सह।

शरीरं ब्रह्म प्राविशच्छरीरेऽधि प्रजापतिः।। (30)

7)

तस्माद्वे विद्वान पुरुषं इदं ब्रह्मेति मन्यते।

सर्वा अस्मिन् देवता गावो गोष्ट इवासते।। (32)

इन देवताओं के साथ ब्रह्म ने शरीर में जीव भाव से प्रवेश किया है। इसलिए ज्ञानी लोक इस पुरुष को ब्रह्म कहते हैं। सब देवता गौवें गोशाला में रहने के समान इस शरीर रूपी शाला में रहती हैं। इससे स्पष्ट होता है कि तैंतीस देवता इसी मानवी शरीर में रहते हैं। यह मानव पत्थर-पानी के देवों पर अपना सिर रगड़कर अपना तथा परम पुरुष का अपमान करता है। दूसरी तरफ किसी व्यक्ति विशेष का नीच जाति के नाम पर अपमान करता है। इन देवताओं को निम्न तालिका से स्पष्ट समझा जा सकता है-

 

 

ब्रह्माण्ड

कार्य

पिण्ड

 

 

परमात्मा, परब्रह्म 

चेतना

जीव आत्मा

 

द्युलोक

1.

द्यौः

प्रकाश

ज्ञान सिर

 

2.

सूर्य

आदित्य दृष्टि

दर्शन नेत्र

 

3.

वृहस्पति, ब्रह्मणस्वति

बुद्धि

ज्ञान ग्रहण साधन

 

4.

दिन-रात्रि

उन्मेष-निमेष

नेत्र, पलक

 

5.

असुनीति

प्राण शक्ति

प्राणसंस्थान

 

6.

यम (नियामक)

संयम

अंतःकरण

 

7.

दिशा

श्रवण

कर्ण

 

8.

नक्षत्र

तेजः केन्द्र

ज्ञान केंद्र

 

9.

पूषा

पुष्टी

शरीर पोषक

 

10.

भगः

भाग्य

तेजस्विता

 

11.

वरुणः

शांति

साम्य

 

अंतरिक्ष लोक

 

1.

अंतरिक्ष

आकाश

उदर

 

2.

इंद्र, त्वष्टा

बल, शिल्प, कर्म

हाथ

 

3.

वायु, अश्विनी 

प्राण, श्वासोच्छ्वास 

फेफड़े, नासिका

 

4.

चन्द्र

शांति

अंतर्मन

 

5.

विद्युत्

चांचल्य

मन

 

6.

नभः

समान प्राण

मध्य

 

7.

रुद्र

अहंकार

ह्रदय

 

8.

मरुतः

अन्यप्राण, उपप्राण

सर्व शरीर

 

9.

ऋभवः

शिल्प, कौशल्य

हस्तकर्म

 

10.

सोम

समता, उत्साह

दोष दूर करने की शक्ति

 

11.

मृत्यु

अपान

नाभि

 

भूलोक

 

1.

पृथ्वी

आधार

पाँव

 

2.

विष्णु

गति, रक्षण

पाँव

 

3.

प्रजापति

प्रजनन

शिश्न

 

4.

पर्वत

उच्चता

पृष्ठ वंश

 

5.

नदियाँ

रक्त सञ्चालन

नाड़ियाँ

 

6.

समुद्र

जल रस तत्व

उदर,हृदयाशय

 

7.

आपः

रेतः

शिश्न

 

8.

मेघ वृष्टि

रेतः स्खलन

शिश्न

 

9.

औषधि, वनस्पतियाँ

केश

त्वचा

 

10.

अग्निः वैश्नावरः

वाणी

मुख

 

11.

चेतः

चिंतन

चित्त

 

 

भूलोक के देवता शरीर के निचले भाग में हैं। अंतरिक्ष लोक के देवता शरीर के मध्य भाग में हैं और द्युलोक के देवता सिर के स्थान में हैं- ‘यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे’ की उक्ति इस शरीर में चरितार्थ होती है। इस विश्व ब्रह्माण्ड के सारे देवताओं के अंश अर्थात् प्रतिनिधि इस मानव शरीर में स्थित हैं। वेद तैंतीस देवताओं पर रुक नहीं गया है। ‘वहाँ तीन सौ तैंतीस, छह हजार देव, इस तरह छह हजार तीन सौ तैंतीस की गुणित के क्रम से बढ़ती जाती है और अंत में तैंतीस करोड़ पहुँच जाती है।’ (अथर्ववेद 11/6/2)

इस तरह यह मानव शरीर तैंतीस करोड़ देवताओं की मानव परिषद् है। तैंतीस देव तैंतीस विभागों के विभागाध्यक्ष हैं। जिनके शासन में अन्य देव रहकर अपना कार्य सम्पादन करते हैं। इन तैंतीसों के ऊपर देव हैं। जो अलग-अलग सेक्टर में विभक्त हैं। शासन की दृष्टि से ऐसा समझना उचित है। जो साधक अपने शरीर का शासन एवं देवताओं को समझ लेगा, उसे विश्व सृष्टि का शासन समझ में आ जाएगा।

इस शरीर रूपी ब्रह्मांड का राजा आत्मा है। इसके चार सलाहकार मंत्री हैं- मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार। इन्द्रियाँ प्रांताधिकारी हैं। प्रत्येक इन्द्रिय और अवयव का एक अधिष्ठाता है। वह मन के अधीन रहकर अपने अवयव के अन्दर कार्य सम्पादन करता है। ऐसे शरीर के तैंतीस प्रान्त हैं। इनको हम इन्द्रिय तथा अवयव कहते हैं। इस प्रत्येक प्रांत के सूत्र पृष्ठवंश से जुड़े रहते हैं। पृष्ठवंश में मज्जा ग्रन्थियाँ हैं। प्रत्येक मज्जा ग्रंथि के साथ सैकड़ों मज्जा तंतु जुड़े रहते हैं। उस प्रांत का संचालन उसके द्वारा किया जाता है। इस तरह इस संपूर्ण शरीर रूपी विश्व का संचालन होता है।

आत्मा अपने मंत्रियों से मंत्रणा करके मज्जा केन्द्रों के द्वारा मज्जा तंतुओं से जिस शरीरावयव में कार्य कराना हो, उस शरीर विभाग में कार्य करता है। इसी तरह इसी मार्ग में सब शरीर के भागों और उपभागों में जो होता है, उसका ज्ञान भी आत्मा प्राप्त करता है। वहाँ जो संदेश देना होता है, देता है। जैसे पाँव में काँटा गड़ गया तो, पाँव के मज्जा तंतु मज्जा केन्द्र को सूचना देते हैं। मज्जा केन्द्र इन्द्रियों को, इन्द्रियां मंत्री को, मंत्री राजा को सूचित करता है। फिर वहाँ से यथोचित आदेश आता है। तत्क्षण कार्य सम्पादन किया जाता है।

शरीर एक राष्ट्र हुआ।

राष्ट्राध्यक्ष- आत्मा

मंत्रीमंडल- मन, बुद्धि, चित, अहंकार

संरक्षक (सैनिक)- प्राण, उपप्राण

कार्याधिकारी- इन्द्रियाँ

प्रांत- अवयव

जब सब इन्द्रियां और अवयव राजा की आज्ञा से कार्य सम्पादन करते हैं, उन्मत्त, प्रयत और स्वेच्छाचारी नहीं होते हैं, तब तक शरीर रूपी राष्ट्र स्वस्थ रहता है। जैसे ही कोई इन्द्रिय स्वेच्छाचारी बनती है, वैसे ही शरीर रूपी राष्ट्र रुग्ण होने लगता है। यदि यह क्रम चलता रहा तब राष्ट्र का नाश हो जाता है। इसलिए संयम और मनोनिग्रह शरीर रूपी राष्ट्र के स्वास्थ्य के लिए अत्यावश्यक हैं। जब उसके सभी अधिष्ठाता अधिकारी आत्मा के अधीन रहकर सब शरीर के स्वास्थ्य के लिए कार्य करते हैं, तब शरीर निरोग और दीर्घजीवी होता है।

मन सर्वश्रेष्ठ मंत्री है। जब वह उच्छृंखल एवं विद्रोही हो जाता है, तब वह बंधन का कारण बन जाता है। वह अपने को राष्ट्राध्यक्ष बनने का दुस्साहस करके राष्ट्र को अस्त-व्यस्त कर देता है।

‘मन एवं मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।।’

शरीर रूपी राष्ट्र के सभी भागों पर मन का आधिपत्य रहता है और उसके ही आदेशानुसार सारा कार्य सम्पादन होता है। आत्मा निर्विकार भाव से तटस्थ बैठ जाता है। बुद्धि मन का लगाम है। परन्तु उसके मतंग होने पर बुद्धि बेचारी ही नहीं बनती बल्कि उसके आदेश के अनुसार उसे चलना पड़ता है। मन की सामर्थ्य अत्यधिक है। इसलिए इसे शुभ विचारों से युक्त रखना ही होगा। इसके लिए साधक को चरम निर्देश का हर हालत में पालन करना ही होगा। तब ज्योतिर्मय रहेगा।

‘यज्जाग्रतो दूर मुदेति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवेति।

दूरंगमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवः संकल्पमस्तु।। (1)’

(वा. यजु. वेद 34)

जो मेरा मन जागते हुए दूर-दूर जाता है, वही मेरा मन सोते हुए भी उसी प्रकार दूर जाता है। वह दूर जाने वाला मेरा मन प्रकाश देने वालों को भी प्रकाशित करने वाला है। वह एकमात्र दैवी शक्ति से युक्त है। वह मेरा मन शिव (ज्योति) संकल्प करने वाला है।

मन सबल है। यह कुछ भी करने में समर्थ है। यह आकाश से भी ऊपर गमन कर सकता है। पाताल से भी नीचे गिर सकता है। ऊपर चढ़ने में इसे कठिनाई मालूम होती है। अतः साधक गुरु के सान्निध्य में रहकर मन को शुभ संकल्पों से युक्त करें। चरम निर्देश को अपने जीवन में उतार लें। फिर ध्यान द्वारा सारी शक्ति का गमन ऊर्ध्व हो जाएगा। मन आत्मा तथा शरीर के बीच रज्जू का कार्य करेगा। आत्मा के संसर्ग में रहने पर वह निर्माणमूलक कार्य कर लंका में भी सद्विप्र का साम्राज्य स्थापित कर देगा। अन्यथा विद्रोही होने पर अयोध्या में भी कैकेयी, मंथरा का राज्य हो जाएगा तथा राजा दशरथ को शरीर छोड़ने के लिए बाध्य होना होगा। राम, सीता, लक्ष्मण को वन गमन करना होगा।

मन जिस इन्द्रिय के साथ रहता है, वही सबल हो जाती है। वही कर्म करती है। दूसरे मौन हो जाते हैं। मन गुरु के सान्निध्य में रहता है, तब वह सिद्ध हो जाता है। वह संसार का कोई भी कार्य क्षण-भर में सम्पन्न कर देता है। मन का गुरु अनुकम्पा ग्रहण करना ही सिद्धता है। आज रेकी विद्या की धूम मची है। जो जापान के डॉ. मिकाउ के द्वारा फैलाई गई है। परन्तु भारतीय मनीषियों ने इससे भी आगे इसकी खोज की है। मैंने स्वयं रेकी ग्रैंड मास्टर्स का क्लास लिया तथा उसमें मंत्र, भारतीय चिह्न (सिम्बल) का समायोजन कर उन्हें बताया| उन लोगों ने मशीनों से परीक्षण कर देखा कि उसमें सौ प्रतिशत शक्ति की वृद्धि हुई है। जिसका परिणाम हुआ कि रेकी ग्रैंड मास्टर लोग शिष्यत्व ग्रहण करने लगे। हालांकि मैंने यह भी अनुभव किया कि उनकी शक्ति चैनेलाइज़ होकर ऊर्ध्व दिशा की तरफ हो गई है। इससे उन्हें गति देने में विशेष कठिनाई नहीं हुई। जो व्यक्ति बाहर केवल देवी-देवता की आराधना में लगा रहता है। उनकी ऊर्जा बिखरी पड़ी रहती है। चूँकि उनका मन बहिर्मुख हो गया है। मन का अंतर्मुख होना ही कला है। अंतर्मुख होने पर वह गुरु पर्वत से गुरु अनुकम्पा तथा आज्ञाचक्र से आत्म-निर्देश ग्रहण करता है। जिससे वह किसी कार्य को करने में समर्थ हो जाता है। मन के संकल्प से रोगी का रोग दूर किया जा सकता है। हजारों किमी. दूर बैठे अपने भक्तों की मदद कर सकता है। विषम परिस्थिति में फंसे शिष्यों को निकाल देता है।

 

||हरि ॐ||

 

समय के सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज की अनमोल कृति ‘मेरे राम’ से उद्धृत….

 

 

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‘समय के सदगुरु’ स्वामी  कृष्णानंद  जी महाराज

आप सद्विप्र समाज की रचना कर विश्व जनमानस को कल्याण मूलक सन्देश दे रहे हैं| सद्विप्र समाज सेवा एक आध्यात्मिक संस्था है, जो आपके निर्देशन में जीवन के सच्चे मर्म को उजागर कर शाश्वत शांति की ओर समाज को अग्रगति प्रदान करती है| आपने दिव्य गुप्त विज्ञान का अन्वेषण किया है, जिससे साधक शीघ्र ही साधना की ऊँचाई पर पहुँच सकता है| संसार की कठिनाई का सहजता से समाधान कर सकता है|

स्वामी जी के प्रवचन यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध हैं –

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