मन संकल्पों का केंद्र

मन संकल्पों का केंद्र

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21 Jul 202411 min read

Published in spiritualism

|| श्री सद्गुरवे नमः ||

 

मन संकल्पों का केंद्र

 

जीवन के समस्त रहस्यों की जड़ मन ही है। जो इसे अपने वश में कर लेता है, वही सम्राट हो जाता है और जो इसके वश में रहता है वही गुलाम होता है।

भारतीय परम्परा की तौल-प्रणाली में चालीस सेर का मन होता है। उसके अनुसार पाँच तत्त्व + पच्चीस प्रकृति + पाँच ज्ञानेन्द्रिय + पाँच कर्मेन्द्रिय कुल चालीस, मन इन्हीं पर विचरण करता है। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ- नाक, कान, आँख, त्वचा और जिह्वा हैं और पाँच कर्मेन्द्रियाँ- हाथ, पैर, मुँह, गुदा और उपस्थ हैं। इन्हीं के सहारे इस शरीर रूपी किले में माल अन्दर भर लिया जाता है। ज्ञानेन्द्रियाँ बाहर के ज्ञान को अन्दर पहुँचाती हैं। ये वस्तु का ज्ञान किए बिना बाह्य पदार्थ के संस्कार को अन्दर ले जाती हैं और इसकी सूचना मन को देती हैं।

मन तक इन संस्कारों को ले जाने का काम असंख्य अन्तर्मुख ज्ञान-तंतु करते हैं। मन इन सब ज्ञानों का विभाजन करता है। आराम और कष्ट देने वाले तत्त्वों को अलग-अलग करता है। फिर कर्मेन्द्रियों तक संदेश भेजकर उनसे काम करवाने का आदेश देता है। इस संदेश के लिए बहिर्मुख ज्ञान-तंतु होते हैं। जैसे आप कहीं जा रहे हैं और अचानक सामने हिंसक जानवर दिखाई पड़ गया। तब अन्तर्मुख ज्ञान-तंतुओं ने मन को संदेश पहुँचाया और मन ने पैरों को बहिर्मुख ज्ञान तंतुओं द्वारा संदेश दिया कि भागो…। तब हम तुरंत भागना शुरु कर देते हैं।

मन की शक्ति को हम तीन भागों में बाँट सकते हैं-1. संचय शक्ति, 2. सम्प्रयोजन शक्ति, 3. सम्बद्धता शक्ति।

1- संचय शक्ति – मानव-मन अपने अनुभवों को क्रमबद्ध करके रखता है। मानव जो एक बार देख लेता है, अनुभव कर लेता है, उसकी स्मृति उसे आजन्म बनी रहती है। मनुष्य के मस्तिष्क में एक भूरे रंग का कोमल पदार्थ होता है। उसी पर देखने-सुनने के अनुभव की छाप पड़ जाती है। इसे ही संचय शक्ति कहते हैं। समयानुसार मन आदेश देता है उस अनुभव को बाहर आने का। जिसका मन निर्मल शान्त है, वह शीघ्र ही दीर्घ परिचित संदेश को निकाल सामने खड़ा कर देता है और जो मन अशान्त-चंचल है, वह संदेश भेजने में विलम्ब करता है।अचेतन स्मृति संचय कहलाती है तथा चेतन संचय स्मृति कहलाती है। संचय-शक्ति प्राणिमात्र में रहती है। स्मृति उच्च-वर्ग के जीवधारियों में पाई जाती है। विचार, कल्पनादि बौद्धिक-क्रियाएँ मानव वैशिष्ट्य की बोधक हैं। उस सबका आधार स्मृति ही है। अतीत की घटनाओं की आलोचना, भविष्य की कल्पना, स्मृति से होती है। कुछ सीखना, पढ़ना, यौगिक-शक्ति ग्रहण करना संचय-शक्ति से ही सम्भव है। स्मृति का भी आधार संचय-शक्ति है।

2- सम्प्रयोजन शक्ति – इसे हम जीवनेच्छा, प्रेरणा, अज्ञात इच्छा इत्यादि नाम से पुकारते हैं। इस प्रयोजन का पता प्राणी को कभी होता है और कभी नहीं। जैसे आदमी भोजन करता है, परन्तु पाचन-क्रिया स्वयं होती है। हाथ के कटने पर रक्त अपने आप निकलता है तथा जुड़ भी जाता है। जैसे दीपक जल रहा है। मेज पर लेखनी एवं पुस्तिका रखी गई है। उनका अपना उद्देश्य कुछ भी नहीं होता है। वे मानव-उद्देश्य के साधन बनते हैं। आप (मानव) चाहें तो उस पर लिख सकते हैं, उस माध्यम से जगत को कुछ संदेश दे सकते हैं। आप चाहें तो उस दीपक की लौ (ज्योति) में कापी-टेबल को भस्म कर सकते हैं या उस घर में आग लगा सकते हैं। यह आप पर निर्भर है। सभी कार्यों का अच्छा या बुरा प्रयोजन है। जो मन का मालिक बन गया है, वह अपने घर के दीपक से पृथ्वी के प्रत्येक घर में दीपक जला देगा। किन्तु जो मन का गुलाम है वह नष्ट कर देगा। इस प्रकार मानव का प्रत्येक कार्य सम्प्रयोजन से पूर्ण है।

3- सम्बद्धता शक्ति – यह अपने अनुभव से उत्पन्न समस्त संस्कारों को सम्बद्ध एवं व्यवस्थित करने की शक्ति है जैसे हम विभिन्न समय में अनेक कार्य करते हैं, किन्तु मन एक तरह के अनुभव को छाँटकर एक जगह कर लेता है। पोस्ट ऑफिस में विभिन्न जगहों से चिट्ठियाँ आती हैं जो कि भिन्न-भिन्न स्थानों को भी जाएंगी। इसके लिए पोस्ट ऑफिस के कर्मचारी एक गाँव-शहर के पत्र को एक खाने में छाँटकर रख देते हैं। सम्बद्धता शक्ति भी यही कार्य करती है।

मानव-मन के दो पहलू हैं। पहला मानसिक अनुभव और दूसरा मानसिक गठन। अनुभव भी तीन प्रकार के होते हैं। जब मन आत्मा-तल पर होता है, तब ज्ञान की बातें करता है; इसे ज्ञानात्मक अनुभव कहते हैं। जब किसी कारणवश सुख-दुःख, थोड़ा क्रोधादि के भावों की संवेदना व्यक्त करता है, उत्पन्न करता है तब इसे रागात्मक अनुभव कहते हैं। किसी कारणवश परिस्थिति को बदलने की इच्छा अथवा उसे यथाशक्ति बनाए रखने की इच्छा को क्रियात्मक अनुभव कहते हैं।

मन न शरीर है और न ही आत्मा, बल्कि दोनों के मध्य पुल की तरह काम करता है, दोनों को जोड़ता है। यह आत्मा के तल पर रहने का आदी (इच्छुक) नहीं है क्योंकि उस तल पर जाते ही यह मन अमन हो जाता है। मालिक का स्वभाव ग्रहण कर लेता है। यह जन्म-जन्मान्तर से शरीर तल पर रहने का अभ्यस्त हो गया है। यही कारण है कि इसे विषय-वासना ही प्रिय दिखाई पड़ता है। यह अधोगामी होने के कारण ऊर्ध्वगमन से भागता है। मन को दो भागों में बाँटा जा सकता है। प्रथम बहिर्मन और दूसरा अन्तर्मन।

1- बहिर्मन – यह जागृत अवस्था में कार्य करता है। यही समय-असमय एवं परिस्थितियों पर विचार करता है। संघर्ष के लिए प्रेरित करता है। यह क्षण-भर में सुदूर स्थानों की यात्रा पूरी कर लेता है। यह कल्पनाशील है, विज्ञान का आविष्कार करता है। इसी को केन्द्रित कर दुनिया के किसी भी कार्य को पूर्ण किया जा सकता है। इस मन में असीम क्षमता निहित है।

2- अन्तर्मन – यह सुप्त अवस्था में कार्य करता है | यह भी विभिन्न प्रकार की सूचना एवं प्रेरणा देता है। यह भी दूर-दूर तक यात्रा करता है। इसी मन की सृष्टि है- स्वप्न। जब व्यक्ति जागृति की अवस्था में अपनी इच्छा को पूर्ण नहीं कर पाता है तो वह उसे स्वप्नावस्था में गुप्त रूप से तृप्त करता है। साधक अपनी संकल्प शक्ति से कुछ भी कर सकता है। यजुर्वेद में कहा गया है- ‘तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु!’ व्यक्ति का शारीरिक, ऐन्द्रिक और मानसिक सुख मन की स्वच्छता, स्वस्थता एवं सत्य-संकल्प पर निर्भर है। शरीर रूपी यंत्र का मन ही मूल पुर्जा है। इसे ठीक रखने पर सभी कुछ ठीक है। किन्तु इसके बिगड़ने पर सभी कुछ बिगड़ने लगता है।

 

अथर्ववेद में 185218 ऋचा में कहा गया है –

कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत्।

स काम कामेन वृहता सयोनी रायस्पोष यजमानाय धेहि।

 

मनुष्य में काम या संकल्प सबसे पूर्व उत्पन्न होता है। यह मन का संकल्प प्रथम सार है। यह संकल्प बार-बार उठे हुए संकल्प के साथ, एक क्षेत्र अर्थात् मन में एकत्र होकर यजमान स्वरूप आत्मा के लिए ऐश्वर्य, धन, स्वास्थ्य और शक्ति देता है। जो व्यक्ति जितना ही संकल्प शक्ति का धनी होगा, वह उतना ही महान होता है। दीनहीन बनाने-बनने के लिए व्यक्ति स्वयं जिम्मेवार है।

जो व्यक्ति चोर, भ्रष्ट, शराबी, चरित्रहीन (परस्त्राी गमन, घूस लेना, ब्लैक मार्केटिंग करना, चरस, नशा आदि किसी भी बुरी आदत के अधीन रहना) है, वह शक्तिहीन होगा। उसकी संकल्प-शक्ति नगण्य होगी। उसका मन अधोगामी होगा ही। विशुद्ध चाल-चरित्र एवं चिंतन ही मन को ऊर्ध्वगमन की तरफ प्रेरित करता है। साधक को संकल्प लेना चाहिए- अनवरत संघर्ष ही जीवन है। संघर्ष से पलायित होना ही मृत्यु है। अतएव दृढ़ संकल्प लें-

ऐसे साधकों के बाएं हाथ से ऊर्जा (विजय) आती है। दाएं हाथ से कर्म करते हैं। संकल्प लेते हैं- मैं इन्द्रिय-वृत्तियों, शक्तियों और राष्ट्रों का विजेता बनूँ। मैं धन, ऐश्वर्य, सम्पत्ति, यश, शोभा सब कुछ प्राप्त कर लूँ।

 

यजुर्वेद में प्रकाश स्वरूप परमात्मा से संकल्प-शक्ति को बढ़ाने के लिए प्रार्थना भी की गई है।

‘तेजोऽसि तेजो मयि धेहि वीर्यमसि वीर्यमयि धेहि बलमसि।

बलं मयि धेहि मन्युरसि मन्युमयि धेहि सहोऽसि सहो मयि धेहि ||’

अर्थात् हे परमात्मन्! तू तेजस्वरूप है, मुझमें तेज धारण करा। हे परमात्मा! तू ब्रह्मस्वरूप है, मुझे बल दे, ओज दे, साहस दे, क्रोध दे और सहिष्णुता दे।

 

मन संकल्पों का केंद्र

विश्वजनित कार्यों का केन्द्र संकल्प-शक्ति ही है। संकल्पवान व्यक्ति की सफलता अनुगामिनी है। मन वेफ बिना कुछ भी कार्य असम्भव है। यजुर्वेद की ऋचा कहती है।

‘यत्प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु |

यस्मान्न ऋते किंचन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ||’

अर्थात् जो मन ज्ञान, चिंतन और धैर्य से युक्त है और जो प्रजाओं के अन्दर अमृत ज्योति है और जिसके बिना कुछ काम नहीं किया जाता है; वह मेरा मन शिव संकल्पों वाला हो।

 

भगवान राम ने गुरु विश्वमित्र के सामने संकल्प लिया था कि पृथ्वी से अत्याचार-अनाचार समाप्त कर दूंगा। कृष्ण ने अपने गुरु संदीपनि के समक्ष संकल्प लिया कि पृथ्वी पर धर्म का राज्य स्थापित करूंगा। वे गुरु के संकल्पानुसार आगे बढ़े। कठिनाइयों, विपत्तियों एवं समस्याओं के बावजूद गुरु-अनुकम्पा हुई। दोनों व्यक्ति अपने जीवन में सफल ही नहीं हुए, बल्कि भगवत्ता को प्राप्त कर स्वयं भगवान बन गए। जो साधक तन से गुरु की सेवा करता है, वह सिद्धि को उपलब्ध होता है। जो मन से सेवा तथा ज्ञान-प्रचार करता है और मन में गुरु को गोविन्द से भी ऊँचा स्थान प्रदान करता है वह तत्त्व-ज्ञाता होता है। जो धन से सेवा करता है अर्थात् अपना धन गुरु के कार्यों में, धर्म-प्रचार में तथा उनके द्वारा निर्देशित सेवा में अर्पण करता है, वह राजा बनता है। जो तन-मन-धन तीनों को गुरु चरणों में अर्पण करता है- वह भगवान बनता है।

मन ही हमारे भूत, वर्तमान तथा भविष्य का निर्माता है। हमारे गुरुदेव ‘स्वामी आत्मादास जी’ का फेफड़ा हठयोग करते समय फट गया था। सभी डॉक्टरों ने उन्हें परामर्श दिया कि आप कुछ ही दिन के मेहमान हैं। घर-परिवार, इष्ट-मित्र सभी चिन्तित हो गए। उनके गुप्त द्वार एवं मुँह-नाक से खून गिरने लगा। ऐसा असाध्य रोग हो गया। मृत्यु की प्रतीक्षा करने के सिवाए कोई दूसरा रास्ता उपाय नहीं था। इसी बीच उनके गुरु ने आवाज दी- बेटा धर्मदेव! तुम कैलाश की यात्रा करो। शिव-संकल्प लो और भगवान शंकर से भेंट करो।

गुरुदेव उसी क्षण उठे तथा हिमालय के लिए प्रस्थान कर गए। आज से लगभग 50-55 वर्ष पूर्व की घटना है। जो व्यक्ति दस पग-भर चलने में असमर्थ है, उसी व्यक्ति ने गुरु आदेश को हृदय में रखकर, रात्रि के अंधेरे में ही यात्रा करना शुरु कर दिया। दृढ़ संकल्प, अपूर्व गुरु-भक्ति ने उनको एक दिन कैलाश पर पहुँचा ही दिया। उन्होंने (गुरु आत्मादास ने) मान सरोवर के हिमजल में स्नान किया। वे बाहर निकलने पर ताजगी का अनुभव कर रहे थे। तभी एक युवक ने उनको आवाज दी, ‘स्वामी जी! आपने स्नान कर लिया हो तो मेरी गुफा की तरफ आ जाएं |’ गुरुदेव आश्चर्य चकित थे- ‘कैलाश पर कौन हमें पुकार रहा है? यहाँ तो दूर-दूर तक वृक्ष भी नहीं हैं। कोई मानव का यहाँ अस्तित्व ही नहीं है। मैं अकेले यात्रा करके पहुँचा हूँ |’ पीछे मुड़े तो देखा कि एक जटा-जूटधारी युवक था। जिसका रंग साँवला है। चेहरे पर अपूर्व तेज है। गुरुदेव अज्ञात आकर्षणवश उसकी तरफ बढ़ गए। कुछ ही दूर चलने पर, वह युवक एक चट्टान के छिद्र में प्रवेश कर गया। गुरुदेव ने भी उसका अनुगमन किया।

वह युवक शान्त-चित्त अन्दर एक व्याघ्र-चर्म पर बैठा था। गुरुदेव को उसने इशारे से दूसरे व्याघ्र-चर्म पर बैठने को कहा और पुनः गुफा में एक रहस्यमयी आवाज गूंजी।

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवोमहेश्वरः |

गुरुः साक्षात परंब्रह्मः तस्मै श्री गुरवे नमः ||

इस आवाज के नमः शब्द के साथ ही उस युवक का सिर झुक गया। गुरुदेव (आत्मादास जी) भी नमन-मुद्रा में झुक गए। कुछ देर के बाद उस युवक ने उनको एक कंद मूल दिया तथा उसे प्रसाद स्वरूप समझकर पाने का निर्देश दिया। गुरुदेव ने उसे मुँह में रख लिया। मानों वह अमृत जैसा कुछ था। मुँह से पूरे शरीर में ऊर्जा फ़ैलने लगी। शरीर का रोम-रोम प्रज्वलित होने लगा। क्षण भर में पूरा शरीर तेज से, आभा से, ऊर्जा से, प्रकाश से एवं शक्ति से भर गया। गुरुदेव आनन्द-मग्न हो गए। प्रफुल्लता के भावातिरेक से वाणी मौन हो गई। उनका शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक रोग सदा के लिए विलीन हो गया। उनके तन-मन में ध्यान का फूल खिल गया और फल लग गया समाधि का।

 

‘समय के सद्गुरु’ स्वामी कृष्णानंद जी महाराज की अनमोल कृति ‘गुरु ही मुक्तिदाता’ से उद्धृत…

 

|| हरि ॐ ||

 

 

‘समय के सदगुरु’ स्वामी  कृष्णानंद  जी महाराज

आप सद्विप्र समाज की रचना कर विश्व जनमानस को कल्याण मूलक सन्देश दे रहे हैं| सद्विप्र समाज सेवा एक आध्यात्मिक संस्था है, जो आपके निर्देशन में जीवन के सच्चे मर्म को उजागर कर शाश्वत शांति की ओर समाज को अग्रगति प्रदान करती है| आपने दिव्य गुप्त विज्ञान का अन्वेषण किया है, जिससे साधक शीघ्र ही साधना की ऊँचाई पर पहुँच सकता है| संसार की कठिनाई का सहजता से समाधान कर सकता है|

स्वामी जी के प्रवचन यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध हैं –

SadGuru Dham 

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मन संकल्पों का केंद्र

 

जीवन के समस्त रहस्यों की जड़ मन ही है। जो इसे अपने वश में कर लेता है, वही सम्राट हो जाता है और जो इसके वश में रहता है वही गुलाम होता है।

भारतीय परम्परा की तौल-प्रणाली में चालीस सेर का मन होता है। उसके अनुसार पाँच तत्त्व + पच्चीस प्रकृति + पाँच ज्ञानेन्द्रिय + पाँच कर्मेन्द्रिय कुल चालीस, मन इन्हीं पर विचरण करता है। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ- नाक, कान, आँख, त्वचा और जिह्वा हैं और पाँच कर्मेन्द्रियाँ- हाथ, पैर, मुँह, गुदा और उपस्थ हैं। इन्हीं के सहारे इस शरीर रूपी किले में माल अन्दर भर लिया जाता है। ज्ञानेन्द्रियाँ बाहर के ज्ञान को अन्दर पहुँचाती हैं। ये वस्तु का ज्ञान किए बिना बाह्य पदार्थ के संस्कार को अन्दर ले जाती हैं और इसकी सूचना मन को देती हैं।

मन तक इन संस्कारों को ले जाने का काम असंख्य अन्तर्मुख ज्ञान-तंतु करते हैं। मन इन सब ज्ञानों का विभाजन करता है। आराम और कष्ट देने वाले तत्त्वों को अलग-अलग करता है। फिर कर्मेन्द्रियों तक संदेश भेजकर उनसे काम करवाने का आदेश देता है। इस संदेश के लिए बहिर्मुख ज्ञान-तंतु होते हैं। जैसे आप कहीं जा रहे हैं और अचानक सामने हिंसक जानवर दिखाई पड़ गया। तब अन्तर्मुख ज्ञान-तंतुओं ने मन को संदेश पहुँचाया और मन ने पैरों को बहिर्मुख ज्ञान तंतुओं द्वारा संदेश दिया कि भागो…। तब हम तुरंत भागना शुरु कर देते हैं।

मन की शक्ति को हम तीन भागों में बाँट सकते हैं-1. संचय शक्ति, 2. सम्प्रयोजन शक्ति, 3. सम्बद्धता शक्ति।

1- संचय शक्ति – मानव-मन अपने अनुभवों को क्रमबद्ध करके रखता है। मानव जो एक बार देख लेता है, अनुभव कर लेता है, उसकी स्मृति उसे आजन्म बनी रहती है। मनुष्य के मस्तिष्क में एक भूरे रंग का कोमल पदार्थ होता है। उसी पर देखने-सुनने के अनुभव की छाप पड़ जाती है। इसे ही संचय शक्ति कहते हैं। समयानुसार मन आदेश देता है उस अनुभव को बाहर आने का। जिसका मन निर्मल शान्त है, वह शीघ्र ही दीर्घ परिचित संदेश को निकाल सामने खड़ा कर देता है और जो मन अशान्त-चंचल है, वह संदेश भेजने में विलम्ब करता है।अचेतन स्मृति संचय कहलाती है तथा चेतन संचय स्मृति कहलाती है। संचय-शक्ति प्राणिमात्र में रहती है। स्मृति उच्च-वर्ग के जीवधारियों में पाई जाती है। विचार, कल्पनादि बौद्धिक-क्रियाएँ मानव वैशिष्ट्य की बोधक हैं। उस सबका आधार स्मृति ही है। अतीत की घटनाओं की आलोचना, भविष्य की कल्पना, स्मृति से होती है। कुछ सीखना, पढ़ना, यौगिक-शक्ति ग्रहण करना संचय-शक्ति से ही सम्भव है। स्मृति का भी आधार संचय-शक्ति है।

2- सम्प्रयोजन शक्ति – इसे हम जीवनेच्छा, प्रेरणा, अज्ञात इच्छा इत्यादि नाम से पुकारते हैं। इस प्रयोजन का पता प्राणी को कभी होता है और कभी नहीं। जैसे आदमी भोजन करता है, परन्तु पाचन-क्रिया स्वयं होती है। हाथ के कटने पर रक्त अपने आप निकलता है तथा जुड़ भी जाता है। जैसे दीपक जल रहा है। मेज पर लेखनी एवं पुस्तिका रखी गई है। उनका अपना उद्देश्य कुछ भी नहीं होता है। वे मानव-उद्देश्य के साधन बनते हैं। आप (मानव) चाहें तो उस पर लिख सकते हैं, उस माध्यम से जगत को कुछ संदेश दे सकते हैं। आप चाहें तो उस दीपक की लौ (ज्योति) में कापी-टेबल को भस्म कर सकते हैं या उस घर में आग लगा सकते हैं। यह आप पर निर्भर है। सभी कार्यों का अच्छा या बुरा प्रयोजन है। जो मन का मालिक बन गया है, वह अपने घर के दीपक से पृथ्वी के प्रत्येक घर में दीपक जला देगा। किन्तु जो मन का गुलाम है वह नष्ट कर देगा। इस प्रकार मानव का प्रत्येक कार्य सम्प्रयोजन से पूर्ण है।

3- सम्बद्धता शक्ति – यह अपने अनुभव से उत्पन्न समस्त संस्कारों को सम्बद्ध एवं व्यवस्थित करने की शक्ति है जैसे हम विभिन्न समय में अनेक कार्य करते हैं, किन्तु मन एक तरह के अनुभव को छाँटकर एक जगह कर लेता है। पोस्ट ऑफिस में विभिन्न जगहों से चिट्ठियाँ आती हैं जो कि भिन्न-भिन्न स्थानों को भी जाएंगी। इसके लिए पोस्ट ऑफिस के कर्मचारी एक गाँव-शहर के पत्र को एक खाने में छाँटकर रख देते हैं। सम्बद्धता शक्ति भी यही कार्य करती है।

मानव-मन के दो पहलू हैं। पहला मानसिक अनुभव और दूसरा मानसिक गठन। अनुभव भी तीन प्रकार के होते हैं। जब मन आत्मा-तल पर होता है, तब ज्ञान की बातें करता है; इसे ज्ञानात्मक अनुभव कहते हैं। जब किसी कारणवश सुख-दुःख, थोड़ा क्रोधादि के भावों की संवेदना व्यक्त करता है, उत्पन्न करता है तब इसे रागात्मक अनुभव कहते हैं। किसी कारणवश परिस्थिति को बदलने की इच्छा अथवा उसे यथाशक्ति बनाए रखने की इच्छा को क्रियात्मक अनुभव कहते हैं।

मन न शरीर है और न ही आत्मा, बल्कि दोनों के मध्य पुल की तरह काम करता है, दोनों को जोड़ता है। यह आत्मा के तल पर रहने का आदी (इच्छुक) नहीं है क्योंकि उस तल पर जाते ही यह मन अमन हो जाता है। मालिक का स्वभाव ग्रहण कर लेता है। यह जन्म-जन्मान्तर से शरीर तल पर रहने का अभ्यस्त हो गया है। यही कारण है कि इसे विषय-वासना ही प्रिय दिखाई पड़ता है। यह अधोगामी होने के कारण ऊर्ध्वगमन से भागता है। मन को दो भागों में बाँटा जा सकता है। प्रथम बहिर्मन और दूसरा अन्तर्मन।

1- बहिर्मन – यह जागृत अवस्था में कार्य करता है। यही समय-असमय एवं परिस्थितियों पर विचार करता है। संघर्ष के लिए प्रेरित करता है। यह क्षण-भर में सुदूर स्थानों की यात्रा पूरी कर लेता है। यह कल्पनाशील है, विज्ञान का आविष्कार करता है। इसी को केन्द्रित कर दुनिया के किसी भी कार्य को पूर्ण किया जा सकता है। इस मन में असीम क्षमता निहित है।

2- अन्तर्मन – यह सुप्त अवस्था में कार्य करता है | यह भी विभिन्न प्रकार की सूचना एवं प्रेरणा देता है। यह भी दूर-दूर तक यात्रा करता है। इसी मन की सृष्टि है- स्वप्न। जब व्यक्ति जागृति की अवस्था में अपनी इच्छा को पूर्ण नहीं कर पाता है तो वह उसे स्वप्नावस्था में गुप्त रूप से तृप्त करता है। साधक अपनी संकल्प शक्ति से कुछ भी कर सकता है। यजुर्वेद में कहा गया है- ‘तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु!’ व्यक्ति का शारीरिक, ऐन्द्रिक और मानसिक सुख मन की स्वच्छता, स्वस्थता एवं सत्य-संकल्प पर निर्भर है। शरीर रूपी यंत्र का मन ही मूल पुर्जा है। इसे ठीक रखने पर सभी कुछ ठीक है। किन्तु इसके बिगड़ने पर सभी कुछ बिगड़ने लगता है।

 

अथर्ववेद में 185218 ऋचा में कहा गया है –

कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत्।

स काम कामेन वृहता सयोनी रायस्पोष यजमानाय धेहि।

 

मनुष्य में काम या संकल्प सबसे पूर्व उत्पन्न होता है। यह मन का संकल्प प्रथम सार है। यह संकल्प बार-बार उठे हुए संकल्प के साथ, एक क्षेत्र अर्थात् मन में एकत्र होकर यजमान स्वरूप आत्मा के लिए ऐश्वर्य, धन, स्वास्थ्य और शक्ति देता है। जो व्यक्ति जितना ही संकल्प शक्ति का धनी होगा, वह उतना ही महान होता है। दीनहीन बनाने-बनने के लिए व्यक्ति स्वयं जिम्मेवार है।

जो व्यक्ति चोर, भ्रष्ट, शराबी, चरित्रहीन (परस्त्राी गमन, घूस लेना, ब्लैक मार्केटिंग करना, चरस, नशा आदि किसी भी बुरी आदत के अधीन रहना) है, वह शक्तिहीन होगा। उसकी संकल्प-शक्ति नगण्य होगी। उसका मन अधोगामी होगा ही। विशुद्ध चाल-चरित्र एवं चिंतन ही मन को ऊर्ध्वगमन की तरफ प्रेरित करता है। साधक को संकल्प लेना चाहिए- अनवरत संघर्ष ही जीवन है। संघर्ष से पलायित होना ही मृत्यु है। अतएव दृढ़ संकल्प लें-

ऐसे साधकों के बाएं हाथ से ऊर्जा (विजय) आती है। दाएं हाथ से कर्म करते हैं। संकल्प लेते हैं- मैं इन्द्रिय-वृत्तियों, शक्तियों और राष्ट्रों का विजेता बनूँ। मैं धन, ऐश्वर्य, सम्पत्ति, यश, शोभा सब कुछ प्राप्त कर लूँ।

 

यजुर्वेद में प्रकाश स्वरूप परमात्मा से संकल्प-शक्ति को बढ़ाने के लिए प्रार्थना भी की गई है।

‘तेजोऽसि तेजो मयि धेहि वीर्यमसि वीर्यमयि धेहि बलमसि।

बलं मयि धेहि मन्युरसि मन्युमयि धेहि सहोऽसि सहो मयि धेहि ||’

अर्थात् हे परमात्मन्! तू तेजस्वरूप है, मुझमें तेज धारण करा। हे परमात्मा! तू ब्रह्मस्वरूप है, मुझे बल दे, ओज दे, साहस दे, क्रोध दे और सहिष्णुता दे।

 

मन संकल्पों का केंद्र

विश्वजनित कार्यों का केन्द्र संकल्प-शक्ति ही है। संकल्पवान व्यक्ति की सफलता अनुगामिनी है। मन वेफ बिना कुछ भी कार्य असम्भव है। यजुर्वेद की ऋचा कहती है।

‘यत्प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु |

यस्मान्न ऋते किंचन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ||’

अर्थात् जो मन ज्ञान, चिंतन और धैर्य से युक्त है और जो प्रजाओं के अन्दर अमृत ज्योति है और जिसके बिना कुछ काम नहीं किया जाता है; वह मेरा मन शिव संकल्पों वाला हो।

 

भगवान राम ने गुरु विश्वमित्र के सामने संकल्प लिया था कि पृथ्वी से अत्याचार-अनाचार समाप्त कर दूंगा। कृष्ण ने अपने गुरु संदीपनि के समक्ष संकल्प लिया कि पृथ्वी पर धर्म का राज्य स्थापित करूंगा। वे गुरु के संकल्पानुसार आगे बढ़े। कठिनाइयों, विपत्तियों एवं समस्याओं के बावजूद गुरु-अनुकम्पा हुई। दोनों व्यक्ति अपने जीवन में सफल ही नहीं हुए, बल्कि भगवत्ता को प्राप्त कर स्वयं भगवान बन गए। जो साधक तन से गुरु की सेवा करता है, वह सिद्धि को उपलब्ध होता है। जो मन से सेवा तथा ज्ञान-प्रचार करता है और मन में गुरु को गोविन्द से भी ऊँचा स्थान प्रदान करता है वह तत्त्व-ज्ञाता होता है। जो धन से सेवा करता है अर्थात् अपना धन गुरु के कार्यों में, धर्म-प्रचार में तथा उनके द्वारा निर्देशित सेवा में अर्पण करता है, वह राजा बनता है। जो तन-मन-धन तीनों को गुरु चरणों में अर्पण करता है- वह भगवान बनता है।

मन ही हमारे भूत, वर्तमान तथा भविष्य का निर्माता है। हमारे गुरुदेव ‘स्वामी आत्मादास जी’ का फेफड़ा हठयोग करते समय फट गया था। सभी डॉक्टरों ने उन्हें परामर्श दिया कि आप कुछ ही दिन के मेहमान हैं। घर-परिवार, इष्ट-मित्र सभी चिन्तित हो गए। उनके गुप्त द्वार एवं मुँह-नाक से खून गिरने लगा। ऐसा असाध्य रोग हो गया। मृत्यु की प्रतीक्षा करने के सिवाए कोई दूसरा रास्ता उपाय नहीं था। इसी बीच उनके गुरु ने आवाज दी- बेटा धर्मदेव! तुम कैलाश की यात्रा करो। शिव-संकल्प लो और भगवान शंकर से भेंट करो।

गुरुदेव उसी क्षण उठे तथा हिमालय के लिए प्रस्थान कर गए। आज से लगभग 50-55 वर्ष पूर्व की घटना है। जो व्यक्ति दस पग-भर चलने में असमर्थ है, उसी व्यक्ति ने गुरु आदेश को हृदय में रखकर, रात्रि के अंधेरे में ही यात्रा करना शुरु कर दिया। दृढ़ संकल्प, अपूर्व गुरु-भक्ति ने उनको एक दिन कैलाश पर पहुँचा ही दिया। उन्होंने (गुरु आत्मादास ने) मान सरोवर के हिमजल में स्नान किया। वे बाहर निकलने पर ताजगी का अनुभव कर रहे थे। तभी एक युवक ने उनको आवाज दी, ‘स्वामी जी! आपने स्नान कर लिया हो तो मेरी गुफा की तरफ आ जाएं |’ गुरुदेव आश्चर्य चकित थे- ‘कैलाश पर कौन हमें पुकार रहा है? यहाँ तो दूर-दूर तक वृक्ष भी नहीं हैं। कोई मानव का यहाँ अस्तित्व ही नहीं है। मैं अकेले यात्रा करके पहुँचा हूँ |’ पीछे मुड़े तो देखा कि एक जटा-जूटधारी युवक था। जिसका रंग साँवला है। चेहरे पर अपूर्व तेज है। गुरुदेव अज्ञात आकर्षणवश उसकी तरफ बढ़ गए। कुछ ही दूर चलने पर, वह युवक एक चट्टान के छिद्र में प्रवेश कर गया। गुरुदेव ने भी उसका अनुगमन किया।

वह युवक शान्त-चित्त अन्दर एक व्याघ्र-चर्म पर बैठा था। गुरुदेव को उसने इशारे से दूसरे व्याघ्र-चर्म पर बैठने को कहा और पुनः गुफा में एक रहस्यमयी आवाज गूंजी।

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवोमहेश्वरः |

गुरुः साक्षात परंब्रह्मः तस्मै श्री गुरवे नमः ||

इस आवाज के नमः शब्द के साथ ही उस युवक का सिर झुक गया। गुरुदेव (आत्मादास जी) भी नमन-मुद्रा में झुक गए। कुछ देर के बाद उस युवक ने उनको एक कंद मूल दिया तथा उसे प्रसाद स्वरूप समझकर पाने का निर्देश दिया। गुरुदेव ने उसे मुँह में रख लिया। मानों वह अमृत जैसा कुछ था। मुँह से पूरे शरीर में ऊर्जा फ़ैलने लगी। शरीर का रोम-रोम प्रज्वलित होने लगा। क्षण भर में पूरा शरीर तेज से, आभा से, ऊर्जा से, प्रकाश से एवं शक्ति से भर गया। गुरुदेव आनन्द-मग्न हो गए। प्रफुल्लता के भावातिरेक से वाणी मौन हो गई। उनका शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक रोग सदा के लिए विलीन हो गया। उनके तन-मन में ध्यान का फूल खिल गया और फल लग गया समाधि का।

 

‘समय के सद्गुरु’ स्वामी कृष्णानंद जी महाराज की अनमोल कृति ‘गुरु ही मुक्तिदाता’ से उद्धृत…

 

|| हरि ॐ ||

 

 

‘समय के सदगुरु’ स्वामी  कृष्णानंद  जी महाराज

आप सद्विप्र समाज की रचना कर विश्व जनमानस को कल्याण मूलक सन्देश दे रहे हैं| सद्विप्र समाज सेवा एक आध्यात्मिक संस्था है, जो आपके निर्देशन में जीवन के सच्चे मर्म को उजागर कर शाश्वत शांति की ओर समाज को अग्रगति प्रदान करती है| आपने दिव्य गुप्त विज्ञान का अन्वेषण किया है, जिससे साधक शीघ्र ही साधना की ऊँचाई पर पहुँच सकता है| संसार की कठिनाई का सहजता से समाधान कर सकता है|

स्वामी जी के प्रवचन यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध हैं –

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