
मुक्तिदाता गुरु
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मुक्ति दाता गुरु
||श्री सद्गुरवे नमः||
नववर्ष के अवसर पर विशेष….
मेरे प्रिय आत्मन्,
आज प्रथम जनवरी से नववर्ष प्रारम्भ हो गया। आप सभी लोग नए वर्ष का स्वागत ध्यान, जप, हवन, गुरु पूजा से प्रारम्भ कर रहे हैं। अतएव परमपिता परमात्मा आप सभी का यह वर्ष मंगलमय रखे। यही मेरी कामना है। हालांकि भारतीय वांग्मय में नव वर्ष चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से प्रारम्भ होता है। जिसे आप लोग राम नवमी का प्रारम्भ भी कहते हैं। प्रथम दिन आप पूजा-उपवास-ध्यान यज्ञादि से प्रारम्भ करते हैं। नौ दिन तक व्रत रखते हैं। नवमी को भगवान राम का जन्म होता है। आप उत्सव मनाते हैं। सर्वत्र उल्लास-आनन्द का दिन होता है।
आपके शरीर में भी मुख्य नौ नाड़ियाँ हैं। ये हैं- कुहू, राका (शंखिनी), पयोस्वनी, यशस्विनी, गांधारी, अलम्बुषा, इड़ा, पिंगला एवं सुषुम्ना। सुषुम्ना सभी की केन्द्रबिन्दु है। यही ऊर्जा की स्रोत है। साधक आठ दिनों में अपनी आठों नाड़ियों का शोधन करके नवे दिन नवमी नाड़ी सुषुम्ना में प्रवेश कर जाता है। जिसमें जाकर साधक सिद्ध हो जाता है। राम रूपी समाधि को उपलब्ध हो जाता है। दशम् दिन दशम द्वार ब्रह्मरंध्र पर पहुँच जाता है। सहस्रार में रमण करता है। जहाँ हर समय दिवाली ही होती है। जिसे सद्गुरु कबीर कहते हैं- ‘संत घर सदा दिवाली|’
सिद्ध इसी दशम द्वार से सूक्ष्म शरीर ग्रहण कर निकलता है। अपना कार्य कर इसी द्वार से वापस आ जाता है। यह दशम द्वार अत्यन्त कीमती है। गुरु पर्वत के आगे की यात्रा गुरु अनुकम्पा से ही सम्भव है। सद्गुरु कबीर साहब इशारा करते हैं-
‘अक्षर पुरुष एक पेड़ है, निरंजन वाकि डार|
तीनों देव शाखा है, पात रुप संसार||’
मानव एक उल्टा वृक्ष है। जिसकी जड़ ऊपर है। तना, डार, शाखा एवं पत्तियाँ ही नीचे फैली हैं। सतपुरुष, परमपिता परमात्मा ही जड़ है अर्थात् वही साहेब है जो आवागमन के बंधन में नहीं है। निर्गुण है। निराकार है। इसी संदर्भ में सद्गुरु कबीर कहते हैं-
‘साहब सबका बाप है, बेटा किसी का नाहि|
बेटा होकर जो अवतरे, सो तो साहब नाहि||’
संत पुरुष मात्र इशारा ही कर सकता है। उसे देखना, जानना तो हम सभी का कर्त्तव्य है। वह साहब आवागमन से रहित है। वही सतलोक है। वही सत्पुरुष है। सद्गुरु उसी का प्रतिनिधित्व करता है। वह काल के बंधनों से मुक्त होता है। करुणावश वह जीवों को भी काल बंधन से मुक्त करता है। वह उसी परमसत्ता का पूजा-पाठ बताता है। जिससे मानव सहज ही गुरु करुणारूपी नाव पर सवार होकर भव-बंधन से मुक्त हो जाता है। आप अटूट धैर्य से, श्रद्धा-विश्वासपूर्वक उनका चरण पकड़े रहें। फिर सद्गुरु विहंगम मार्ग से सीधे सतलोक पहुँचा देता है। उसके रास्ते में भूत-प्रेत, वैतरणी, नदी-नाला, पर्वत, खाई, अंधकार कुछ भी नहीं आता है। न ही उनका कोई अवरोधक बनता है।
उस सत्पुरुष को परमपिता अर्थात् जो सभी के पिता का पिता है; परमब्रह्म, परम पुरुष या निःक्षर के नाम से सम्बोधित करते हैं। जब वह सृष्टि के सम्बन्ध में सोचता है, तब अक्षर पुरुष पैदा होता है। यही अक्षर पुरुष एक पेड़ के रूप में है। इन्हें परब्रह्म भी कहते हैं। इनसे सृष्टि का विकास आगे बढ़ता है। इनसे क्षर पुरुष अर्थात् निरंजन, ब्रह्म या काल पुरुष पैदा होते हैं। श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं-कालोऽस्मि! जिसे कबीर साहब ने निरंजन कहकर उस वृक्ष की डार कहा है। यही ब्रह्म-प्रकृति, आदि शक्ति परमदेवी के सान्निध्य से त्रिदेवा- ब्रह्मा, विष्णु, शंकर की उत्पत्ति करते हैं। ब्रह्मा जी सृष्टि का कार्य आगे बढ़ाते हैं। छोटे-छोटे शाखा रूप में विभिन्न देवता हो गए। पत्तों के रूप में संसार हो गया। हम लोगों का पूजा-पाठ उल्टा है अर्थात् हम शाखाओं, डालियों या पत्तियों की पूजा करते हैं। यदि हम मूल ;जड़द्ध में पानी डालेंगे तो स्वतः सम्पूर्ण पेड़ में वह रस चला जाएगा। जिससे वृक्ष भी हरा रहेगा एवं फल भी समय पर देगा। आज जगत दुःखी है। चूंकि सभी छह दर्शन छियानवें पाखण्ड के चक्कर में पड़े हुए हैं। काल अपनी खेती करता रहता है। वही सभी को अपने अधीन रख कर अपना ग्रास बनाता है। सभी को काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर का खाना प्रदान कर उलझा रखता है। यही ब्रह्म इक्कीस ब्रह्माण्ड का मालिक है। इनके अन्दर सैकड़ों, ब्रह्मा, विष्णु, महेश हैं। ऐसे ब्रह्म भी सैकड़ों हैं जिसे परब्रह्म अक्षर पुरुष नियंत्रित करते हैं।
सद्गुरु अपने प्रिय साधकों के लिए करुणावश आते हैं। उन्हें सत् का उपदेश देकर इस काल के चक्र से बाहर निकालते हैं। उन्हें सीधे सतलोक पहुँचाते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी उसी सद्गुरु की कृपा से अपना कार्य सम्पन्न करने के पश्चात् सतलोक में गमन करते हैं। अधिकांश उच्चपदासीन अधिकारी अपनी प्रभुता रूपी कल-छल-कपट रूपी जागतिक व्यवहार के कारण अधोगति को प्राप्त करते हैं। ‘ऊँच निवास नीच करतूती। देख न सकहिं पराई विभूति||’
सद्गुरु पर इनकी माया का प्रभाव नहीं पड़ता है। हालांकि उन्हें भी अपने विभिन्न प्रकार के मायावी जाल में प्रलोभन (ऋद्धि-सिद्धि), दण्ड (दुःख), नजदीकी सम्बन्धी का असमय कष्ट, सांसारिक कार्य में व्यवधान, विभेद (अति नजदीकी में द्वेष, झगड़ा पैदा करना) पैदा कर फंसाने का प्रयास करते हैं। जिस जाल में प्रत्येक शिक्षक, देवी, देवता, गुरु फंस ही जाते हैं। परन्तु सद्गुरु इन कृतियों को माया का खेल समझकर मौन हो जाता है। वह अपने परम-पुरुष का अवलम्बन पकड़े रहता है। जिसके परिणामस्वरूप ये त्रिदेवा या काल (ब्रह्म) हथियार डाल देते हैं या उनकी आज्ञा का पालन कर अपने को कृतार्थ समझते हैं। ये अपने स्तर से विभिन्न प्रकार की परीक्षाएं लेते हैं। जिसमें ये स्वयं फेल होकर सद्गुरु की सेवा में उपस्थित रहते हैं। परन्तु सद्गुरु हानि-लाभ, सुख-दुःख से परे अपने परमानन्द में विचरण करता है। उसी में सभी को गोता लगाने का आह्नान करता है।
शुकदेव जी का गुरु
इस संदर्भ में मुझे एक कथा स्मरण आ रही है। वेदव्यास पुत्र शुकदेव जी जन्म से ही संन्यासी बन गए थे। अखण्ड ब्रह्मचर्य धारण कर अपने योग बल से आकाश मार्ग द्वारा एक लोक से दूसरे लोकों में विचरण करते रहते थे। एक दिन इन्द्र लोक में विश्राम कर रहे थे। जहाँ के देवी-देवताओं ने शुकदेव जी के चरण प्रक्षालन के बाद आरती उतारी एवं आतिथ्य सत्कार कर उन्हें उच्चासन पर विराजमान कराया। शुकदेव मुनि जी ने इन्द्रलोक के स्वागत-सत्कार से प्रसन्न होकर विष्णु लोक की यात्रा की। वे जैसे ही विष्णु लोक के द्वार पर पहुँचे, वैसे ही द्वारपाल ने दरवाजा बन्द कर दिया। यह देखकर इन्हें बहुत दुःख हुआ। ये क्रोधित होकर डांटते हुए बोले- क्या तुम लोगों ने हमारा नाम नहीं सुना है? मैं वेदव्यास पुत्र शुकदेव हूँ। मैं जन्मजात संन्यासी हूँ|’ द्वारपाल ने नम्रता से पूछा- महाराज! आपके पूज्य गुरुदेव का क्या नाम है? कृपया बताने का कष्ट करें। जिससे हम लोग आपकी पात्रता को जान सकें| वे गरजते हुए बोले- मैं किसको गुरु बनाऊं? हमसे उच्च एवं विद्वान कौन है? तुम्हारे सृष्टि में कौन है श्रेष्ठ, जिसके चरणों में मैं बैठूं|’
भगवान विष्णु वेफ पार्षदों ने कहा- ‘हे मुनि जी! आप अपवित्र हैं। आपके लिए दरवाजा नहीं खुलेगा|’ शुकदेव मुनि ने कहा कि तुम लोग भगवान विष्णु को मेरे आने की सूचना दो। यदि ऐसा नहीं करोगे तब मैं तुम्हें श्रापित करूंगा। पार्षदों के ऐसा करने पर भगवान विष्णु स्वयं द्वार पर आ गए। वे हंसते हुए बोले- शुकदेव मुनि! आपको क्या कष्ट हुआ? उन्होंने सभी कुछ कह सुनाया। भगवान विष्णु ने अपने पार्षदों से इन्हें रोकने का कारण पूछा। उन्होंने कहा- हे भगवान! हम लोगों ने मुनि जी के पूज्य गुरुदेव का नाम पूछा। इन्होंने गुरु धारण नहीं किया है। अपने अहंकार में कहते हैं कि हमसे कोई भी श्रेष्ठ नहीं है। तब मैं किसे गुरु बनाऊँ?
‘कबीर गुरु किए बिना, लगा हरि की सेव|
कहै कबीर स्वर्ग से, फेर दिया शुकदेव||’
भगवान विष्णु ने मुनि जी से कहा-हे शुकदेव जी! आप तपस्या से सिद्धियाँ प्राप्त कर सकते हैं। परन्तु गुरु अभाव में आप जिस जगह खड़े हैं; वहाँ की धरती भी अशुद्ध है। नारद जी के गुरु मल्लाह हैं। लव-कुश के गुरु भंगी (वाल्मीकि) हैं। मीरा के गुरु रविदास भगत हैं। महाभारत युद्ध के बाद भगवान कृष्ण ने महायज्ञ में स्वपच सुदर्शन (डोम) का चरणामृत लिया एवं प्रसाद अर्पित किया, जिससे धर्मराज का यज्ञ पूर्ण हुआ। जगद्गुरु शंकराचार्य का अन्तिम गुरु चंडाल हुआ; भगवान बुद्ध की अन्तिम गुरु सुजाता नाम की निम्न वर्गीय लड़की हुई। जो भी व्यक्ति गुरु में जाति देखता है, उसमें मान-प्रतिष्ठा खोजता है; वह नरक में जाता है। सद्गुरु तो इस सृष्टि का अनमोल कोहेनूर हीरा है। कोहेनूर हीरा अमूल्य होता है। वह कहीं भी रहेगा, अमूल्य रहेगा। चूंकि वह अकेला है। अतएव आप अपने तप एवं ऋद्धि-सिद्धि का अहंकार परित्याग कर गुरु की शरण में जाइए। तब आपका उद्धार होगा।
श्री शुकदेव मुनि लज्जित हो गए। उन्होंने कहा- हे भगवान! आप ही मार्गदर्शन करें। किसका मैं शिष्य बनूं? भगवान विष्णु ने कहा- ‘आप पृथ्वी पर जाकर राजा जनक का शिष्यत्व ग्रहण करें। वही ब्रह्मज्ञाता हैं। उनसे आप ब्रह्मज्ञान ग्रहण करें|’ शुकदेव जी उदास होकर वहाँ से इन्द्रपुरी आ गए। देवतागण ने उनका पुनः स्वागत किया| तत्पश्चात् उनकी उदासी का कारण पूछा। मुनि जी ने सभी कुछ सच-सच कह दिया। देवगण बोले कि हे मुनि! आप अभी तक गुरुमुख नहीं हुए। यह तो ठीक नहीं है। भगवान विष्णु तो परम वैष्णव हैं। वे तो भक्तों के पैर के नीचे अपना हाथ रखते हैं। जिससे गुरु भक्तों को कहीं कष्ट न हो जाए। आप शीघ्रता से इन्द्रपुरी खाली करें। हमें अपनी अशुद्धि से अपवित्र न करें। आप शीघ्र ही गुरु धारण करें। गरीब दास जी कहते हैं-
‘कैसे शीश नवाऊँ जाई, जनक विदेह राजा भाई|
देव बोले शब्द विवेका, हमने स्त्री का मुख नहीं देखा||’
शुकदेव मुनि स्वगृह लौट आए। अपने पिताश्री वेदव्यास जी से दुःख की घटना कही। पिताजी भी दुःखी हो गए। उन्होंने कहा- बेटा! मैं तुम्हारा सम्मान करता था। तुम्हारे आगमन पर मैं खड़ा हो जाता था। मैंने तो स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि तुमने अभी तक गुरु धारण नहीं किया है। तुम भगवान विष्णु के निर्देशानुसार राजा जनक से शिष्यत्व ग्रहण करो। तुम अपने मन से यह शंका निकाल दो कि तुम ब्राह्मण कुलोत्पन्न हो। राजा क्षत्रिय है। जो व्यक्ति गुरु में जाति भेद देखता है, वह नरकगामी होता है। उसकी रक्षा इस त्रिलोक में कोई भी नहीं कर सकता। तुम शीघ्र ही अपने गुरु राजा जनक की शरण में चले जाओ।
श्री शुकदेव मुनि आकाश मार्ग से जनकपुर पहुँच गए। उस समय जनक स्नान करने जा रहे थे। द्वारपालों ने सूचना दी कि वेदव्यास पुत्र शुकदेव आए हैं। राजा ने आदेश दिया कि शीघ्र ही उच्चासन लगाकर उन्हें बैठाओ तथा संन्यासी का पूर्ण स्वागत-सत्कार करो।
श्री शुकदेव मुनि उच्चासन पर नहीं बैठे। वे जमीन पर ही बैठ गए। दरबारियों ने इसका कारण पूछा तो मुनि ने कहा कि- ‘मैंने राजा को मन से गुरु मान लिया है। गुरु दरबार में उच्चासन पर नहीं बैठा जाता है। आज ही गुरुदेव से हमें दीक्षा ग्रहण करना है|’ यह संदेश राजा को दिया गया। राजा ने तुरंत अन्दर बुलाया तथा कहा कि- ‘हे मुनि जी, मैं स्नान कर रहा हूँ। आप कुछ देर यहीं बैठें|’ मुनि जी देख रहे हैं कि जनक की पटरानियाँ बड़े-बड़े बर्तनों में पानी गरम कर रही हैं। जब जल उबलने लगा तब राजा जनक नंगे बदन तख्त पर बैठ गए। रानियाँ लोटे से पानी निकाल कर उनके शरीर पर डालने लगीं। कुछ उनके शरीर को मलने लगीं। शुकदेव जी देख रहे हैं। विश्व-सुन्दरियाँ जल निकाल रही हैं। जल उबल रहा है। ये उफ तक नहीं करतीं। न इनके चेहरे पर वासना का विकार ही है।
राजा जनक ने कहा- हे मुनि जी! आप मेरे नजदीक आ जाएं। आप मेरे शिष्य बनेंगे न। मेरे स्नान के बाद जल, जो नाली में बह रहा है; उसे अपने शरीर पर छिड़क लें जिससे आपका भौतिक शरीर पवित्र हो जाए एवं मन की कलुषता दूर हो जाए। तब आपको ब्रह्म ज्ञान की दीक्षा देने में आसानी होगी। शुकदेव मुनि ने जैसे ही अपना हाथ नाली के जल में डाला, उनका हाथ जल गया। हाथ में फोड़ा बन गया। वे चिल्लाते हुए पीछे हट गए। राजा जनक ने कहा- क्या आप पक्षियों की तरह आकाश में उड़ना ही जानते हैं! आपसे तो कठोर एवं सिद्ध ये औरतें ही हैं। आप अपने मन में निरंतर सोच रहे हैं कि मैं बालब्रह्मचारी ब्राह्मण कुलोत्पन्न संन्यासी हूँ। राजा सैकड़ों पत्नियों के साथ रहने वाला भोगी है। अब आप अपने मन का संशय बाहर निकाल दें। निर्मल मन से बैठ जाएं। गुरु के प्रति जरा-सा भी संशय व्यक्ति को डुबा देता है। अपना मन पूर्ण रूपेण मुझे अर्पित कर दें। आप देखें, ये महिलाएँ पूर्णतः मुझे समर्पित हैं। इनका अहंकार बह गया है। गुरु अनुकम्पा का परिणाम है- ब्रह्म ज्ञान।
शुकदेव जी! मन को गुरु के चरणों पर लगा दें। आँखों से गुरु मूर्ति पर त्राटक करें। कान से गुरु वाणी श्रवण करें। जीभ से गुरु का गुणगान करें। श्वास से गुरु मंत्र (सतनाम जो आपको मिला है) का जाप करें। हाथ से गुरु का कार्य करें। पैर से गुरु कार्य हेतु यात्रा करें। यही परिक्रमा है। भोजन गुरु के लिए करें, यही गुरु की भेंट है। प्रसाद है। तब आप जो करेंगे वही पूजा होगी। आपका सोना गुरु को साष्टांग प्रणाम होगा। श्वास लेना मंत्र जाप होगा। सोचना सुमिरण होगा। आप गुरु सत्ता से जुड़ जाएंगे। पारस लोहे को स्वर्ण बनाता है। गुरु अपने सदृश बनाता है। फिर आप परमपुरुष से जुड़ जाएंगे। परमपुरुष से जुड़ते ही काल ब्रह्म एवं इनकी सृष्टि के देवी-देवता आपकी सेवा में जुट जाएंगे। जैसे राष्ट्रपति के पद पर बैठते ही राष्ट्र के सारे कर्मचारीगण राष्ट्रपति की सेवा में लग जाते हैं। उसके मुँह से निकला शब्द आदेश हो जाता है। महामहिम का आदेश समझ कर उसका पूरा राष्ट्र पालन करता है।
शुकदेव मुनि ने अपने गुरु जनक के सारे शब्दों को मंत्रवत अपने हृदय में उतार लिया। उसे उतारते ही वे पूर्णरूपेण क्षण भर में बदल गए। आप लोग भी अवश्य पुण्यगामी हैं। जन्मों-जन्म का पाप अवश्य भस्म हो गया है। जिससे आप लोगों ने मेरे सान्निध्य में आकर पाठ, योग, जाप, ध्यान, हवन में भाग लिया एवं अपने मन को, विचारों को एक तरफ करके ध्यान के, आनन्द के सागर में गोता लगा रहे हैं। आप सभी के अन्दर बैठे हुए परमात्मा को मेरा प्रणाम है। मेरा प्रणाम स्वीकार करें।
||हरि ॐ||
‘समय के सद्गुरु’ स्वामी श्री कृष्णानंद जी महाराज की अनमोल कृति ‘गुरु ही मुक्तिदाता’ से उद्धृत….
‘समय के सदगुरु’ स्वामी कृष्णानंद जी महाराज
आप सद्विप्र समाज की रचना कर विश्व जनमानस को कल्याण मूलक सन्देश दे रहे हैं| सद्विप्र समाज सेवा एक आध्यात्मिक संस्था है, जो आपके निर्देशन में जीवन के सच्चे मर्म को उजागर कर शाश्वत शांति की ओर समाज को अग्रगति प्रदान करती है| आपने दिव्य गुप्त विज्ञान का अन्वेषण किया है, जिससे साधक शीघ्र ही साधना की ऊँचाई पर पहुँच सकता है| संसार की कठिनाई का सहजता से समाधान कर सकता है|
स्वामी जी के प्रवचन यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध हैं –
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