स्टील का टिफिन

स्टील का टिफिन

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pawan kumar

17 Aug 202414 min read

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स्टील का टिफिन

यह कहानी मेरे दोस्त सियाराम शर्मा की है। जितना उनके बारे में कहा जाये कम ही हैं। शांत स्वभाव, अपने कर्मो में भरोसा रखने वाले व्यक्ति हैं। उनकी धर्मपत्नी राधा की तो बात ही निराली थी, हर प्रकार से सियाराम जी के समान थी। शांत स्वभाव, गृह कार्य में दक्ष और माँ दुर्गा की भक्त, इसी कारण उनके पडोसी उनको सिया और राम की जोड़ी की संज्ञा दिया करते थे।

बात सन 1985 की थी जब सियाराम के पिता बलदेव शर्मा की वाहन दुर्घटना मे मृत्यु हुई। उस समय सियाराम मात्र 11 वर्ष के थे। उनके ऊपर तो मानो विपत्ति का पहाड़ ही टूट गया हो। बलदेव कपड़े बुनकर अपने परिवार का भरण-पोषण किया करते थे। बलदेव पहले से ही महाजनी प्रथा के कारण पूरी तरह से कर्ज़ मे डुब हुये थे क्योकि उस समय कृत्रिम कपड़े जैसे नायलोन, पॉलिएस्टर का चलन जोरो शोरों से था। ये बेचारे सूत कात-कात के कपड़े बनाने वाले, परिणामस्वरूप कर्ज़ में और डुबते चले गये। अत: व्यवहार में भी परिवर्तन स्वभाविक था। जिसका सीधा असर उनके निजी जीवन पर पड़ा। घर में गृह क्लेश ने जन्म लिया और बढ़ता चला गया।

शकुंतला जी चाहते हुये भी उनसे कुछ न कह पाती, वजह थी गृह क्लेश को कम करना, लेकिन प्रभु को कुछ और ही मंज़ूर था। बलदेव जी वाहन दुर्घटना के शिकार हुये। साथ में शकुंतला की आवाज़ भी ले गये। शकुंतला के पास खेत में मज़दूरी करने के सिवाय कोई दूसरा विकल्प नही था। अपने बच्चे सियाराम का भरण पोषण करने के लिये वो खेत में मज़दूरी करने लगी। लेकिन उससे अर्जित आय बहुत कम थी। तब हौंसलों से मज़बूत शकुंतला ने गांव से बाहर जाने का निश्चय किया। शकुंतला ने अपने भाई से कुछ कर्ज़ लेकर सियाराम और अपनी बची हुई जिंदंगी का देवरिया से दिल्ली स्थानांतरण करा लिया। दिल्ली में रह रहे बलदेव के दोस्त राकेश ने कुछ दिन की शरण दी। वह भी बेचारा एक छोटा सा कपड़ा व्यपारी था जितना उनसे बन पड़ा, किया|

राकेश ने शकुंतला को एक धान मिल में बोरी सिलने के काम पर लगवा दिया। और पगार थी पूरे 600 रुपये महीना।  ये सुनकर शकुंतला बहुत खुश हुई। शायद ये पिछले दो साल में पहली खुशी थी। वह चाहती तो सियाराम को भी काम पर लगाकर अपनी खुशी को दुगुना कर सकती थी। लेकिन शकुंतला ने ऐसा नही किया। शकुंतला शिक्षा का महत्व समझती होगी इसलिये शायद उसने ऐसा नही किया। शकुंतला अपनी मिल के पास ही मलिन बस्ती में रहने लगी।

सियाराम का भविष्य सुधारने के लिये पास में ही स्थित विद्यालय में प्रवेश करवा दिया। जहाँ मेरी उनसे पहली मुलाकात हुई। मैं उसका मुरझाया हुआ चेहरा देखकर समझ गया कि बेचारे पर विपत्तियों को पहाड़ टूटा है लेकिन वहाँ पर सभी की कहानी लगभग समान ही थी। इसी कारण सियाराम आराम से उस माहौल में ढल गया। इकलौता मैं वहाँ पर ऐसा था जिसके पिता किसी सरकारी विभाग मे चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी थे। जिनकी आय से मेरा घर आराम से चल जाता था लेकिन कभी- कभी बिमारियां घर की आर्थिक व्यवस्था को खराब कर देती थी। सियाराम का सब कुछ हाशिये पर था। इसके वावजूद भी सियाराम अध्ययन में बहुत अच्छा था। वह हम सब में सबसे तेज़ था। ये सब सुनकर शकुंतला बहुत खुश होती, अब शकुंतला की जिंदगी पटरी पर लौटने लगी थी, भाई से लिया हुआ कर्ज़ा भी वापस कर दिया था, अब सब कुछ सामान्य हो चुका था। शकुंतला ही सियाराम की पुरी दुनिया थी।

अब सियाराम दसवीं की कक्षा में आकर बड़े खुश थे क्योकि सियाराम अपने गाँव के पहले व्यक्ति थे जो दसवीं पास करने जा रहे थे। लेकिन होनी को कुछ ओर ही मंज़ूर था। धान मिल मे शार्ट-सर्किट के कारण आग लग गयी और शकुंतला जल कर खाक हो गयी। वह चिल्ला भी न सकी क्योंकि वह मूक थी। ये देखकर मानो सियाराम की तो पूरी दुनिया ही उजड़ गयी हो। और लगभग हुआ भी वही, मां के जलने के साथ- साथ सियाराम के सपने भी जल गये। अब कोई भी उसका अपना नही बचा था। बचा था तो बस लोगों की झूठी तसल्ली और मां का स्टील का टिफिन। जिसमें वह खाना लेकर जाती थी, जिसको लेकर कल सियाराम को काम पर जाना था। ये मार्मिक दृश्य देखकर मेरी आंखो से आंसू बहने लगे, वह अब शांत-शांत रहने लगा था। अब तक तो सियाराम के आंसू सूख चुके थे। एक तरफ था उसके मरे हुये सपने और दुसरी तरह था पेट की भूख। बेचारा परिक्कव भी नही हुआ था तो उसने पेट की भूख को चुना। और कोई विकल्प भी नही था।

धान मिल के मालिक ने भी दरियादिली दिखाई और सियाराम को बोरी सिलने के काम पर रख लिया और माँ के समान पगार तय की। लेकिन सियाराम को इससे कतई खुशी नही हुई, फिर भी वह उस अधजली धान मिल में बोरी  सिलने लगा। आखिर सवाल जो पेट की भूख का था लेकिन ये सियाराम के साथ सबसे बड़ी नाइंसाफी थी। अब दसवी की परीक्षा में पूरे सात महिने बाकी थे। जिसका अब सियाराम से कोई वास्ता नही था। अब मेरा भी विदयालय में मन नही लगता था अत: मैंने प्रधानाचार्य को सभी बातें बताने की सोची। जो मुझे अब तक पता थी। संयोग से उनका नाम भी सियाराम था, जब मैंने हिम्मत करके उनको सभी बातें बताई। तो प्रधानाचार्य जी भी बहुत भावुक हुये, वो मेरे मित्र सियाराम के कक्षा में अव्वल आने के बारे में पहले से ही जानते थे। शायद कक्षा के हेड मास्टर ने बताया होगा।

प्रधानाचार्य ने सियाराम के भविष्य को अपनी जिम्मेदारी समझकर दिल्ली सरकार के समाज कल्याण विभाग में टेलीफ़ोन के जरिये बाल छात्रावास के बारे में बात की। टेलीफ़ोन के दूसरे तरफ जिला समाज कल्याण आधिकरी थे। जिन्होने बाल छात्रावास के सम्बंध में आवेदन लिखने को कहा तथा पूर्ण सहयोग की बात कही। प्रधानाचार्य के अथक प्रयास से सियाराम को बाल छात्रावास मिल गया। अब तक इस बाल छात्रावास के बारे में सियाराम को कुछ भी नही पता था। उधर सियाराम बोरी सिलने में निपुण हो चुका था क्योकि वह मान चुका था कि यही उसका भविष्य है। जब मैंने सियाराम को बाल छात्रावास के बारे में बताया और कहा, कल से तुम्हे बाल छात्रावास में रहना- खाना मिलेगा वो भी सरकारी सहयता से। ये सुनकर सियाराम बहुत खुश हुआ और मेरे गले लगकर रोने लगा। शायद वो सियाराम के खुशी के आंसू थे। सियाराम के दफन हुये सपने में पुन: जान जो आने वाली थी। और सियाराम अचानक बोला मेरे बाबूजी मुझे कपड़ा विभाग में साहब देखना चाहते थे और…….. शायद वो और कुछ कहना चाहता था लेकिन अपनी बात पूरी न करते हुये धान मिल से स्टील का टिफिन लेकर निकल गया।

धान मिल के मालिक को रविवार को वापस आने की बात कही शायद बाकी के पैसे का हिसाब करना होगा। मेरे साथ वाहन में बैठकर हम दोनों छात्रावास पहुंचे। छात्रावास वार्डन से बात कर सियाराम को रहने के लिये कमरा मिल गया। अगले दिन सुबह सियाराम तिलक लगाये विद्यालय पहुंचा और तपाक से प्रधानाचार्य जी के चरण स्पर्श किये। और साथ ही कक्षा में प्रथम आने का वादा किया। कर्मों में भरोसा रखने वाला सियाराम कक्षा में प्रथम आयेगा। ऐसा मुझे पहले से ज्ञात था। शायद मैं उसे जान चुका था।

खैर समय बितता गया। दसवीं परीक्षा की घड़ी नजदीक आ चुकी थी। मेरा और सियाराम का परीक्षा केंद्र एक ही था। परीक्षा केंद्र पर सियाराम के ठीक पीछे वाली सीट पर राधा नाम की छात्रा थी। जिसके गले में मां दुर्गा का लॉकेट था जो लाल धागे से बंधा था। और बार-बार उस लॉकेट को चूम रही थी। शायद किसी प्रश्न की उलझन में रही होगी। परीक्षा  केद्र पर किसी प्रश्न को लेकर आपस में बातचीत हो जाती थी।

सियाराम ने पूरी मेहनत एवं लगन से परीक्षा दी। और मेरी सियाराम के कक्षा में प्रथम आने की भविष्यवाणी सही साबित हुई। सियाराम प्रथम श्रेणी से पास हुये और कक्षा में प्रथम भी आये। लेकिन ये खुशी जाहिर करने के लिये उसके पास उसका अपना कोई नही था। और हम भी प्रथम श्रेणी से पास हुये।

अब बारी थी राधा की और राधा के परिणाम को जानने की। हम लोगों ने पता किया तो पता चला कि राधा अपनी दो बड़ी बहनों और पिता के साथ दिल्ली में ही रहती हैं। जो मूल रूप से बिहार से थी। बचपन में राधा के जन्म के साथ ही राधा की माँ का निधन हो चुका था। राधा के पिता बहुत बुजुर्ग हो चुके थे। अब हम तीनों लोगो ने एक साथ 11वीं कक्षा में प्रवेश लिया। और अपने-अपने सपने बुनने में लग गये। इसी साल के अंत में राधा के पिता मरते वक्त राधा का हाथ सियाराम के हाथों देकर दुनिया से अलविदा हो गये।

राधा ने इसे अपने पिता का अंतिम आशिर्वाद समझकर खुशी- खुशी स्वीकार किया। राधा के इस फैसले से उसकी बड़ी बहनें नाराज़ थी। लेकिन राधा अपने फैंसले पर अडिग थी क्योंकि वह जानती थी कि सियाराम से बेहतर लड़का मुझे मिल नही सकता और बात सौ आना सही भी थी। दोनों ने मंदिर में जाकर शादी भी कर ली। गवाह बने मैं और भगवान शिवशंकर। और इस प्रकार मेरी मन-ही-मन दूसरी भविष्यवाणी एकदम सही साबित हुई जिसका मैंने जिक्र नही किया था। अब राधा के ऊपर से माता-पिता का साया उठ चुका था। अब राधा का सियाराम के सिवाय कोई नही था। राधा की जिम्मेदारी सियाराम की थी। लेकिन खुद सियाराम का कोई ठिकाना नही था। वह खुद बाल छात्रावास में रहता था।

अब सामने समस्या ये थी कि राधा रहेगी कहाँ ? क्योकि उसकी बड़ी बहनों ने पहले ही मुख मोड़ लिया था। राधा और सियाराम के जोर देने पर मैंने अपने घर बात की। सिर्फ एक साल की ही तो बात थी। माता- पिता और बहन तीनों लोग राज़ी हो गये। और राधा मेरे घर में रहने लगी। गृह कार्यों में दक्ष राधा ने कुछ समय में ही मेरे माता-पिता के दिल में अपना स्थान भी बना लिया। राधा अपनी पढाई के साथ–साथ घर का काम भी करती थी। जिसका मेरी माँ विरोध भी करती थी। लेकिन हमेशा मेरी माँ की उम्र का बहाना मारकर बच जाती। और इस प्रकार हम तीनों की 12वीं पास हुई। पिछली बार की तरह सियाराम इस बार भी प्रथम श्रेणी से पास हुये और कक्षा में प्रथम भी आये। और उम्र के अनुसार मतदाता कार्ड धारक भी बन चुके थे।

12वीं पास करते सियाराम को बाल छात्रावास छोड़ना पड़ा। मेरे पिताजी ने मुझे स्नातक की पढाई के लिये जयपुर भेज दिया। सियाराम फिर से बेघर हो चुके थे। सियाराम के एक हाथ में स्टील का टिफिन था और दुसरे हाथ में था राधा का हाथ।                                    

सब लोग अपने सपने बेहतर करने के लिये कॉलेज तलाश कर रहे थे। और ये दोनों रहने के लिये आश्रय। फिर सियाराम धान मिल के पास स्थित मलिन बस्ती में गये। जहाँ इनकी माँ शकुंतला रहा करती थी और वहीं पर अपना आश्रय बना लिया। और आगे की पढ़ाई करने के लिये दोनों ने दिल्ली में ही एक कॉलेज में प्रवेश लिया। भरण-पोषण के लिये सियाराम टैक्सी सीखने लगा और कुछ समय में एक अच्छा ड्राइवर बन गया। और अपनी पढ़ाई के साथ-साथ रात में टैक्सी भी चलाने लगा। मैं जब भी जयपुर से दिल्ली आता उन दोनों से जरूर मिलता था।

अब सियाराम और राधा की जिंदगी सामान्य हो चुकी थी। कल को बेहतर करने के लिये ये दोनों जी तोड़ मेहनत कर रहे थे। सियाराम अपनी टैक्सी रात 8 बजे पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर लगाता, जो यात्री मिलते उन्हे उनके गंतव्य पर छोड़ता और लगभग रात 2 बजे तक घर आ जाता। सुबह दोनों 09 बजे कॉलेज जाते।

एक रात सियाराम ने अपनी टैक्सी स्टेशन पर लगाई और देखा कि मगध एक्सप्रेस के आने की घोषणा हो रही हैं। मगध एक्सप्रेस का आगमन समय 14:30 था लेकिन कोहरे के कारण देरी से चल रही थी। तभी सियाराम ने अपनी टैक्सी में एक नवविवाहित जोड़ी को बिठाया। और कुछ ही समय में उनके बताये हुये पते पर पहुंच गये। सियाराम ने उनके सामान उतारने में मदद की। फिर हर बार की तरह इस नवविवाहित जोड़ी ने भी सियाराम को धन्यवाद कहा। सर्दी अधिक होने के कारण दोनों लोग ऊनी कपडों से ढंके थे जिससे उनका चेहरा भी नही दिख रहा था फिर भी सियाराम हवा में हाथ हिलाते हुये वहां से निकल गया।

अगले दिन सुबह जब सियाराम ने टैक्सी साफ की तो उसमें एक लिफाफा मिला। सियाराम तुरंत समझ गया कि यह लिफाफा उस नवविवाहित जोड़ी का ही है, क्योंकि वे दोनों लोग ही बार-बार पास रखे उस छोटे बैग के ऊपर लगी डोरी को बांध रहे थे। सियाराम ने उस लिफाफे को वापस करने को सोचा और रात वाले बंगले पर पहुंच गया। जहां सियाराम ने उस नवविवाहित जोड़ी को छोडा था। सियाराम ने जाकर देखा तो पता चला कि बंगला जर-जर हालत में है और लगभग पिछले 15 वर्ष से बंद हैं। पड़ोसियों से पता करने पर ये बात और पक्की हो गई। ये सब देखकर सियाराम दंग रह गया और सोचने लगा कि वो दोनों लोग कौन थे।

वह जब भी खाली बैठता उसके मन में बार- बार वही विचार आ जाते। और एक दिन यही सोचते- सोचते उसकी टैक्सी विद्युत पोल से जा टकराई, सियाराम गम्भीर रूप से घायल हुये। परिणामस्वरूप सियाराम पैर से अपाहिज़ हो चुका था। राधा दिन-रात उसकी सेवा करती। इस कठिन समय में धान मिल के मालिक ने मदद की, क्योंकि अब सियाराम टैक्सी चलाने में सक्षम नही रहे। घर का खर्च चलाने के लिये राधा बुटीक में काम करने लगी। राधा ने अपने भविष्य को दरकिनार करके पढाई भी बंद कर दी। सियाराम की देखभाल में अपनी पूरी बची हुई जिंदगी समर्पण कर दी। शायद यह उसके अच्छे संस्कार का परिचय रहा होगा। ये सब देखकर सियाराम बहुत दुखी हुआ। और अपने ह्रदय पर पत्थर रखकर राधा से तलाक का प्रस्ताव रखा। वजह साफ थी राधा का भविष्य। राधा के भी अपने सपने थे वह उस समय मात्र 19 वर्ष की थी। शायद सियाराम ने बुटीक की बातें सुनी होगी जिसमें राधा के भविष्य की दुहाई दी जाती थी। यह सब सुनकर राधा स्तब्ध रह रही। राधा को कतई इसका अंदाज़ा भी नही था। अत: राधा ने तलाक का प्रस्ताव खारिज़ कर दिया।

राधा, सियाराम के गले लगकर रोने लगी। राधा का ये समर्पण देखकर सियाराम को जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली। सियाराम दिन- रात अध्ययन करने लगा। उधर राधा बुटीक में जी तोड़ मेहनत करने लगी। क्योंकि अब राधा को सियाराम का भविष्य जो बनाना था। दोनों के इरादे एकदम मज़बूत थे। तो परिणाम आना भी सुनिश्चित था। सियाराम ने प्रथम श्रेणी से स्नातक की डिग्री हासिल की। दोनों का संघर्ष जारी रहा। सियाराम ने संघ लोक सेवा आयोग में भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिये आवेदन किया। और खूब मेहनत की। लेकिन असफलता हाथ लगी। पैर से न खड़े होने वाले सियाराम मन से पुन: खडे हुये और एक नयी ऊर्जा के साथ पुनः तैयारी में लग गया। इस बार साक्षात्कार भी अच्छा रहा। मेह्नत का फल आना लगभग तय था। इस बार सियाराम भा. प्रा. से. में सफल हुये। और इतने खुश हुये, जैसे कोई युद्ध जीत लिया हो। मेरे हिसाब से युद्ध ही था। किस्मत और संघर्ष का।

खैर सियाराम की विजयी होने की खबर देवरिया तक पहुंच गयी। जो कभी सियाराम से घृणा करते थे वह भी अब सगे‌‌- संबंधी हो गये। सियाराम को वस्त्र मंत्रालय में सहायक आयुक्त के रूप में नियुक्ति मिली। और इस प्रकार बाबूजी का कपड़ा विभाग में बड़ा साहब बनने क सपना भी साकार हो गया। आज समाज की नज़र में बारहवीं पास राधा एक सहायक आयुक्त की पत्नी है बज़ाय एक विकलांग के। आज सियाराम शर्मा सर की एक बेटी है जो आई.आई.टी. दिल्ली की कंप्यूटर अभियांत्रिकी की छात्रा है। आज राधा उसी बुटीक की मालकिन है। जहां उन्हे कभी अपने पति के निकम्मा होने का एहसास कराया जाता था। आज उनकी बुटीक कई बेसहारा एवं गरीब लड़कियों को प्रशिक्षण देती है। आज उनकी बुटीक “स्टील का टिफिन” के नाम से जानी जाती हैं।

आज कई लोग राधा और सियाराम के जीवन के संघर्ष को प्रेरणा मानकर आगे बढ़ रहे हैं लेकिन सियाराम आज भी उसी उलझन मे रहते हैं कि “वो दोनों लोग कौन थे” ?

 

पवन कुमार

 

Image source : Pexels.com

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17 Aug 202414 min read

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यह कहानी मेरे दोस्त सियाराम शर्मा की है। जितना उनके बारे में कहा जाये कम ही हैं। शांत स्वभाव, अपने कर्मो में भरोसा रखने वाले व्यक्ति हैं। उनकी धर्मपत्नी राधा की तो बात ही निराली थी, हर प्रकार से सियाराम जी के समान थी। शांत स्वभाव, गृह कार्य में दक्ष और माँ दुर्गा की भक्त, इसी कारण उनके पडोसी उनको सिया और राम की जोड़ी की संज्ञा दिया करते थे।

बात सन 1985 की थी जब सियाराम के पिता बलदेव शर्मा की वाहन दुर्घटना मे मृत्यु हुई। उस समय सियाराम मात्र 11 वर्ष के थे। उनके ऊपर तो मानो विपत्ति का पहाड़ ही टूट गया हो। बलदेव कपड़े बुनकर अपने परिवार का भरण-पोषण किया करते थे। बलदेव पहले से ही महाजनी प्रथा के कारण पूरी तरह से कर्ज़ मे डुब हुये थे क्योकि उस समय कृत्रिम कपड़े जैसे नायलोन, पॉलिएस्टर का चलन जोरो शोरों से था। ये बेचारे सूत कात-कात के कपड़े बनाने वाले, परिणामस्वरूप कर्ज़ में और डुबते चले गये। अत: व्यवहार में भी परिवर्तन स्वभाविक था। जिसका सीधा असर उनके निजी जीवन पर पड़ा। घर में गृह क्लेश ने जन्म लिया और बढ़ता चला गया।

शकुंतला जी चाहते हुये भी उनसे कुछ न कह पाती, वजह थी गृह क्लेश को कम करना, लेकिन प्रभु को कुछ और ही मंज़ूर था। बलदेव जी वाहन दुर्घटना के शिकार हुये। साथ में शकुंतला की आवाज़ भी ले गये। शकुंतला के पास खेत में मज़दूरी करने के सिवाय कोई दूसरा विकल्प नही था। अपने बच्चे सियाराम का भरण पोषण करने के लिये वो खेत में मज़दूरी करने लगी। लेकिन उससे अर्जित आय बहुत कम थी। तब हौंसलों से मज़बूत शकुंतला ने गांव से बाहर जाने का निश्चय किया। शकुंतला ने अपने भाई से कुछ कर्ज़ लेकर सियाराम और अपनी बची हुई जिंदंगी का देवरिया से दिल्ली स्थानांतरण करा लिया। दिल्ली में रह रहे बलदेव के दोस्त राकेश ने कुछ दिन की शरण दी। वह भी बेचारा एक छोटा सा कपड़ा व्यपारी था जितना उनसे बन पड़ा, किया|

राकेश ने शकुंतला को एक धान मिल में बोरी सिलने के काम पर लगवा दिया। और पगार थी पूरे 600 रुपये महीना।  ये सुनकर शकुंतला बहुत खुश हुई। शायद ये पिछले दो साल में पहली खुशी थी। वह चाहती तो सियाराम को भी काम पर लगाकर अपनी खुशी को दुगुना कर सकती थी। लेकिन शकुंतला ने ऐसा नही किया। शकुंतला शिक्षा का महत्व समझती होगी इसलिये शायद उसने ऐसा नही किया। शकुंतला अपनी मिल के पास ही मलिन बस्ती में रहने लगी।

सियाराम का भविष्य सुधारने के लिये पास में ही स्थित विद्यालय में प्रवेश करवा दिया। जहाँ मेरी उनसे पहली मुलाकात हुई। मैं उसका मुरझाया हुआ चेहरा देखकर समझ गया कि बेचारे पर विपत्तियों को पहाड़ टूटा है लेकिन वहाँ पर सभी की कहानी लगभग समान ही थी। इसी कारण सियाराम आराम से उस माहौल में ढल गया। इकलौता मैं वहाँ पर ऐसा था जिसके पिता किसी सरकारी विभाग मे चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी थे। जिनकी आय से मेरा घर आराम से चल जाता था लेकिन कभी- कभी बिमारियां घर की आर्थिक व्यवस्था को खराब कर देती थी। सियाराम का सब कुछ हाशिये पर था। इसके वावजूद भी सियाराम अध्ययन में बहुत अच्छा था। वह हम सब में सबसे तेज़ था। ये सब सुनकर शकुंतला बहुत खुश होती, अब शकुंतला की जिंदगी पटरी पर लौटने लगी थी, भाई से लिया हुआ कर्ज़ा भी वापस कर दिया था, अब सब कुछ सामान्य हो चुका था। शकुंतला ही सियाराम की पुरी दुनिया थी।

अब सियाराम दसवीं की कक्षा में आकर बड़े खुश थे क्योकि सियाराम अपने गाँव के पहले व्यक्ति थे जो दसवीं पास करने जा रहे थे। लेकिन होनी को कुछ ओर ही मंज़ूर था। धान मिल मे शार्ट-सर्किट के कारण आग लग गयी और शकुंतला जल कर खाक हो गयी। वह चिल्ला भी न सकी क्योंकि वह मूक थी। ये देखकर मानो सियाराम की तो पूरी दुनिया ही उजड़ गयी हो। और लगभग हुआ भी वही, मां के जलने के साथ- साथ सियाराम के सपने भी जल गये। अब कोई भी उसका अपना नही बचा था। बचा था तो बस लोगों की झूठी तसल्ली और मां का स्टील का टिफिन। जिसमें वह खाना लेकर जाती थी, जिसको लेकर कल सियाराम को काम पर जाना था। ये मार्मिक दृश्य देखकर मेरी आंखो से आंसू बहने लगे, वह अब शांत-शांत रहने लगा था। अब तक तो सियाराम के आंसू सूख चुके थे। एक तरफ था उसके मरे हुये सपने और दुसरी तरह था पेट की भूख। बेचारा परिक्कव भी नही हुआ था तो उसने पेट की भूख को चुना। और कोई विकल्प भी नही था।

धान मिल के मालिक ने भी दरियादिली दिखाई और सियाराम को बोरी सिलने के काम पर रख लिया और माँ के समान पगार तय की। लेकिन सियाराम को इससे कतई खुशी नही हुई, फिर भी वह उस अधजली धान मिल में बोरी  सिलने लगा। आखिर सवाल जो पेट की भूख का था लेकिन ये सियाराम के साथ सबसे बड़ी नाइंसाफी थी। अब दसवी की परीक्षा में पूरे सात महिने बाकी थे। जिसका अब सियाराम से कोई वास्ता नही था। अब मेरा भी विदयालय में मन नही लगता था अत: मैंने प्रधानाचार्य को सभी बातें बताने की सोची। जो मुझे अब तक पता थी। संयोग से उनका नाम भी सियाराम था, जब मैंने हिम्मत करके उनको सभी बातें बताई। तो प्रधानाचार्य जी भी बहुत भावुक हुये, वो मेरे मित्र सियाराम के कक्षा में अव्वल आने के बारे में पहले से ही जानते थे। शायद कक्षा के हेड मास्टर ने बताया होगा।

प्रधानाचार्य ने सियाराम के भविष्य को अपनी जिम्मेदारी समझकर दिल्ली सरकार के समाज कल्याण विभाग में टेलीफ़ोन के जरिये बाल छात्रावास के बारे में बात की। टेलीफ़ोन के दूसरे तरफ जिला समाज कल्याण आधिकरी थे। जिन्होने बाल छात्रावास के सम्बंध में आवेदन लिखने को कहा तथा पूर्ण सहयोग की बात कही। प्रधानाचार्य के अथक प्रयास से सियाराम को बाल छात्रावास मिल गया। अब तक इस बाल छात्रावास के बारे में सियाराम को कुछ भी नही पता था। उधर सियाराम बोरी सिलने में निपुण हो चुका था क्योकि वह मान चुका था कि यही उसका भविष्य है। जब मैंने सियाराम को बाल छात्रावास के बारे में बताया और कहा, कल से तुम्हे बाल छात्रावास में रहना- खाना मिलेगा वो भी सरकारी सहयता से। ये सुनकर सियाराम बहुत खुश हुआ और मेरे गले लगकर रोने लगा। शायद वो सियाराम के खुशी के आंसू थे। सियाराम के दफन हुये सपने में पुन: जान जो आने वाली थी। और सियाराम अचानक बोला मेरे बाबूजी मुझे कपड़ा विभाग में साहब देखना चाहते थे और…….. शायद वो और कुछ कहना चाहता था लेकिन अपनी बात पूरी न करते हुये धान मिल से स्टील का टिफिन लेकर निकल गया।

धान मिल के मालिक को रविवार को वापस आने की बात कही शायद बाकी के पैसे का हिसाब करना होगा। मेरे साथ वाहन में बैठकर हम दोनों छात्रावास पहुंचे। छात्रावास वार्डन से बात कर सियाराम को रहने के लिये कमरा मिल गया। अगले दिन सुबह सियाराम तिलक लगाये विद्यालय पहुंचा और तपाक से प्रधानाचार्य जी के चरण स्पर्श किये। और साथ ही कक्षा में प्रथम आने का वादा किया। कर्मों में भरोसा रखने वाला सियाराम कक्षा में प्रथम आयेगा। ऐसा मुझे पहले से ज्ञात था। शायद मैं उसे जान चुका था।

खैर समय बितता गया। दसवीं परीक्षा की घड़ी नजदीक आ चुकी थी। मेरा और सियाराम का परीक्षा केंद्र एक ही था। परीक्षा केंद्र पर सियाराम के ठीक पीछे वाली सीट पर राधा नाम की छात्रा थी। जिसके गले में मां दुर्गा का लॉकेट था जो लाल धागे से बंधा था। और बार-बार उस लॉकेट को चूम रही थी। शायद किसी प्रश्न की उलझन में रही होगी। परीक्षा  केद्र पर किसी प्रश्न को लेकर आपस में बातचीत हो जाती थी।

सियाराम ने पूरी मेहनत एवं लगन से परीक्षा दी। और मेरी सियाराम के कक्षा में प्रथम आने की भविष्यवाणी सही साबित हुई। सियाराम प्रथम श्रेणी से पास हुये और कक्षा में प्रथम भी आये। लेकिन ये खुशी जाहिर करने के लिये उसके पास उसका अपना कोई नही था। और हम भी प्रथम श्रेणी से पास हुये।

अब बारी थी राधा की और राधा के परिणाम को जानने की। हम लोगों ने पता किया तो पता चला कि राधा अपनी दो बड़ी बहनों और पिता के साथ दिल्ली में ही रहती हैं। जो मूल रूप से बिहार से थी। बचपन में राधा के जन्म के साथ ही राधा की माँ का निधन हो चुका था। राधा के पिता बहुत बुजुर्ग हो चुके थे। अब हम तीनों लोगो ने एक साथ 11वीं कक्षा में प्रवेश लिया। और अपने-अपने सपने बुनने में लग गये। इसी साल के अंत में राधा के पिता मरते वक्त राधा का हाथ सियाराम के हाथों देकर दुनिया से अलविदा हो गये।

राधा ने इसे अपने पिता का अंतिम आशिर्वाद समझकर खुशी- खुशी स्वीकार किया। राधा के इस फैसले से उसकी बड़ी बहनें नाराज़ थी। लेकिन राधा अपने फैंसले पर अडिग थी क्योंकि वह जानती थी कि सियाराम से बेहतर लड़का मुझे मिल नही सकता और बात सौ आना सही भी थी। दोनों ने मंदिर में जाकर शादी भी कर ली। गवाह बने मैं और भगवान शिवशंकर। और इस प्रकार मेरी मन-ही-मन दूसरी भविष्यवाणी एकदम सही साबित हुई जिसका मैंने जिक्र नही किया था। अब राधा के ऊपर से माता-पिता का साया उठ चुका था। अब राधा का सियाराम के सिवाय कोई नही था। राधा की जिम्मेदारी सियाराम की थी। लेकिन खुद सियाराम का कोई ठिकाना नही था। वह खुद बाल छात्रावास में रहता था।

अब सामने समस्या ये थी कि राधा रहेगी कहाँ ? क्योकि उसकी बड़ी बहनों ने पहले ही मुख मोड़ लिया था। राधा और सियाराम के जोर देने पर मैंने अपने घर बात की। सिर्फ एक साल की ही तो बात थी। माता- पिता और बहन तीनों लोग राज़ी हो गये। और राधा मेरे घर में रहने लगी। गृह कार्यों में दक्ष राधा ने कुछ समय में ही मेरे माता-पिता के दिल में अपना स्थान भी बना लिया। राधा अपनी पढाई के साथ–साथ घर का काम भी करती थी। जिसका मेरी माँ विरोध भी करती थी। लेकिन हमेशा मेरी माँ की उम्र का बहाना मारकर बच जाती। और इस प्रकार हम तीनों की 12वीं पास हुई। पिछली बार की तरह सियाराम इस बार भी प्रथम श्रेणी से पास हुये और कक्षा में प्रथम भी आये। और उम्र के अनुसार मतदाता कार्ड धारक भी बन चुके थे।

12वीं पास करते सियाराम को बाल छात्रावास छोड़ना पड़ा। मेरे पिताजी ने मुझे स्नातक की पढाई के लिये जयपुर भेज दिया। सियाराम फिर से बेघर हो चुके थे। सियाराम के एक हाथ में स्टील का टिफिन था और दुसरे हाथ में था राधा का हाथ।                                    

सब लोग अपने सपने बेहतर करने के लिये कॉलेज तलाश कर रहे थे। और ये दोनों रहने के लिये आश्रय। फिर सियाराम धान मिल के पास स्थित मलिन बस्ती में गये। जहाँ इनकी माँ शकुंतला रहा करती थी और वहीं पर अपना आश्रय बना लिया। और आगे की पढ़ाई करने के लिये दोनों ने दिल्ली में ही एक कॉलेज में प्रवेश लिया। भरण-पोषण के लिये सियाराम टैक्सी सीखने लगा और कुछ समय में एक अच्छा ड्राइवर बन गया। और अपनी पढ़ाई के साथ-साथ रात में टैक्सी भी चलाने लगा। मैं जब भी जयपुर से दिल्ली आता उन दोनों से जरूर मिलता था।

अब सियाराम और राधा की जिंदगी सामान्य हो चुकी थी। कल को बेहतर करने के लिये ये दोनों जी तोड़ मेहनत कर रहे थे। सियाराम अपनी टैक्सी रात 8 बजे पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर लगाता, जो यात्री मिलते उन्हे उनके गंतव्य पर छोड़ता और लगभग रात 2 बजे तक घर आ जाता। सुबह दोनों 09 बजे कॉलेज जाते।

एक रात सियाराम ने अपनी टैक्सी स्टेशन पर लगाई और देखा कि मगध एक्सप्रेस के आने की घोषणा हो रही हैं। मगध एक्सप्रेस का आगमन समय 14:30 था लेकिन कोहरे के कारण देरी से चल रही थी। तभी सियाराम ने अपनी टैक्सी में एक नवविवाहित जोड़ी को बिठाया। और कुछ ही समय में उनके बताये हुये पते पर पहुंच गये। सियाराम ने उनके सामान उतारने में मदद की। फिर हर बार की तरह इस नवविवाहित जोड़ी ने भी सियाराम को धन्यवाद कहा। सर्दी अधिक होने के कारण दोनों लोग ऊनी कपडों से ढंके थे जिससे उनका चेहरा भी नही दिख रहा था फिर भी सियाराम हवा में हाथ हिलाते हुये वहां से निकल गया।

अगले दिन सुबह जब सियाराम ने टैक्सी साफ की तो उसमें एक लिफाफा मिला। सियाराम तुरंत समझ गया कि यह लिफाफा उस नवविवाहित जोड़ी का ही है, क्योंकि वे दोनों लोग ही बार-बार पास रखे उस छोटे बैग के ऊपर लगी डोरी को बांध रहे थे। सियाराम ने उस लिफाफे को वापस करने को सोचा और रात वाले बंगले पर पहुंच गया। जहां सियाराम ने उस नवविवाहित जोड़ी को छोडा था। सियाराम ने जाकर देखा तो पता चला कि बंगला जर-जर हालत में है और लगभग पिछले 15 वर्ष से बंद हैं। पड़ोसियों से पता करने पर ये बात और पक्की हो गई। ये सब देखकर सियाराम दंग रह गया और सोचने लगा कि वो दोनों लोग कौन थे।

वह जब भी खाली बैठता उसके मन में बार- बार वही विचार आ जाते। और एक दिन यही सोचते- सोचते उसकी टैक्सी विद्युत पोल से जा टकराई, सियाराम गम्भीर रूप से घायल हुये। परिणामस्वरूप सियाराम पैर से अपाहिज़ हो चुका था। राधा दिन-रात उसकी सेवा करती। इस कठिन समय में धान मिल के मालिक ने मदद की, क्योंकि अब सियाराम टैक्सी चलाने में सक्षम नही रहे। घर का खर्च चलाने के लिये राधा बुटीक में काम करने लगी। राधा ने अपने भविष्य को दरकिनार करके पढाई भी बंद कर दी। सियाराम की देखभाल में अपनी पूरी बची हुई जिंदगी समर्पण कर दी। शायद यह उसके अच्छे संस्कार का परिचय रहा होगा। ये सब देखकर सियाराम बहुत दुखी हुआ। और अपने ह्रदय पर पत्थर रखकर राधा से तलाक का प्रस्ताव रखा। वजह साफ थी राधा का भविष्य। राधा के भी अपने सपने थे वह उस समय मात्र 19 वर्ष की थी। शायद सियाराम ने बुटीक की बातें सुनी होगी जिसमें राधा के भविष्य की दुहाई दी जाती थी। यह सब सुनकर राधा स्तब्ध रह रही। राधा को कतई इसका अंदाज़ा भी नही था। अत: राधा ने तलाक का प्रस्ताव खारिज़ कर दिया।

राधा, सियाराम के गले लगकर रोने लगी। राधा का ये समर्पण देखकर सियाराम को जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली। सियाराम दिन- रात अध्ययन करने लगा। उधर राधा बुटीक में जी तोड़ मेहनत करने लगी। क्योंकि अब राधा को सियाराम का भविष्य जो बनाना था। दोनों के इरादे एकदम मज़बूत थे। तो परिणाम आना भी सुनिश्चित था। सियाराम ने प्रथम श्रेणी से स्नातक की डिग्री हासिल की। दोनों का संघर्ष जारी रहा। सियाराम ने संघ लोक सेवा आयोग में भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिये आवेदन किया। और खूब मेहनत की। लेकिन असफलता हाथ लगी। पैर से न खड़े होने वाले सियाराम मन से पुन: खडे हुये और एक नयी ऊर्जा के साथ पुनः तैयारी में लग गया। इस बार साक्षात्कार भी अच्छा रहा। मेह्नत का फल आना लगभग तय था। इस बार सियाराम भा. प्रा. से. में सफल हुये। और इतने खुश हुये, जैसे कोई युद्ध जीत लिया हो। मेरे हिसाब से युद्ध ही था। किस्मत और संघर्ष का।

खैर सियाराम की विजयी होने की खबर देवरिया तक पहुंच गयी। जो कभी सियाराम से घृणा करते थे वह भी अब सगे‌‌- संबंधी हो गये। सियाराम को वस्त्र मंत्रालय में सहायक आयुक्त के रूप में नियुक्ति मिली। और इस प्रकार बाबूजी का कपड़ा विभाग में बड़ा साहब बनने क सपना भी साकार हो गया। आज समाज की नज़र में बारहवीं पास राधा एक सहायक आयुक्त की पत्नी है बज़ाय एक विकलांग के। आज सियाराम शर्मा सर की एक बेटी है जो आई.आई.टी. दिल्ली की कंप्यूटर अभियांत्रिकी की छात्रा है। आज राधा उसी बुटीक की मालकिन है। जहां उन्हे कभी अपने पति के निकम्मा होने का एहसास कराया जाता था। आज उनकी बुटीक कई बेसहारा एवं गरीब लड़कियों को प्रशिक्षण देती है। आज उनकी बुटीक “स्टील का टिफिन” के नाम से जानी जाती हैं।

आज कई लोग राधा और सियाराम के जीवन के संघर्ष को प्रेरणा मानकर आगे बढ़ रहे हैं लेकिन सियाराम आज भी उसी उलझन मे रहते हैं कि “वो दोनों लोग कौन थे” ?

 

पवन कुमार

 

Image source : Pexels.com

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