सफ़र, प्यार और एक अधूरी दास्ताँ : उपसंहार

सफ़र, प्यार और एक अधूरी दास्ताँ : उपसंहार

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sagar gupta

28 Aug 20246 min read

Published in series

सफ़र, प्यार और एक अधूरी दास्ताँ 

कुछ कहानियों में अनेकों कहानियां छिपी होती। शायद मेरी कहानी भी इन्हीं में से एक है।

 

उपसंहार (Epilogue)

 

5 साल बाद….

दिनांक- 18 जुलाई, 2022

स्थान- किन्नौर, हिमाचल प्रदेश

(कोहरे से घिरे लकड़ी के बने हुए एक छोटे-से घर में एक व्यक्ति अपने बड़े से डेस्क में किसी पन्ने में कुछ लिखते हुए)

 

आज ‘सफ़र, प्यार और एक अधूरी दास्ताँ’ की कहानी मैंने पूरी तरह से इन बेजान पन्नों में उकेर दी। ऐसा लगता है मानो इस कहानी को लिखते-लिखते ये पन्ने भी कहानी के पाठक बन पड़े है। जब मैं कहानी को बीच में ही लिख कर छोड़ देता था तो मानो ये पन्ने मुझे हर पल आगे का वाक्या सुनाने को अपने मित्र वायु के जरिये मुझे उन पन्नों पर ही ला कर छोड़ देते थे, जहाँ तक मैं ये कहानी अधूरी लिख कर छोड़ जाता था। मुझे यकीन नहीं था कि मैं अंशुमन और वंशिका की कहानी को कभी पूर्ण कर पाऊँगा क्योंकि उनकी कहानी खुद ही अपूर्ण थी। अपूर्णता में पूर्णता का समावेश करना इतना आसान न था।

ख़ैर! आप सोच रहे होंगे कि ट्रैन की घटना के बाद हुआ क्या? क्या अंशुमन और वंशिका मिल पाए? आगे हुआ क्या?

उनका मिलना शायद विधाता ने लिखा ही न था। उस दिन की घटना के तुरंत बाद अंशुमन अगले स्टेशन में ही उतर गया और पागलों की तरह अपनी वंशिका को हर उन स्टेशन और आसपास के जगहों में खोजने लगा, जहाँ रात भर से अहले सुबह तक ट्रैन रुकी थी।

पर वंशिका का कोई अता-पता न चला। बिना कुछ खाए-पिये उसने हरेक चौराहे, हरेक गली को ढूढं डाला, पर उसका कोई नामो- निशान न मिला। लोगों को भी वो क्या ही दिखाता.. उसने तो खुद वंशिका को नहीं देखा था। कई दिनों के बाद भी उसे कोई जरिया न मिला, जिससे वो अपनी वंशिका तक पहुंच पाता।

थक-हार कर वो अपने घर लौट गया। वो अपने कमरे में ही पड़ा रहता। न किसी से बात करता और न किसी से मिलता। कई महीने ऐसे ही कट गए। उसके परिवार वालों को भी समझ नहीं आया कि आख़िर उसके साथ हुआ क्या था? वो भी उसके दर्द में घूँट-घूँट कर जी रहे थे।

एक दिन अंशुमन अपने कमरे में पड़ा-पड़ा पंखे को एकटक देख रहा था। तभी उसे अपनी माँ का रूदन सुनाई दिया और उसने इतने महीनों के बाद पहली बार अपने कमरे से बाहर कदम रखा। अंशुमन के लंबे-लंबे बाल, अनसुलझे लम्बी दाढ़ी जिसमें एकाध सफ़ेद बाल भी साफ-साफ नजर आ रहे थे। उसकी यह दशा देखकर उसकी माँ और रोने लगी।

पर उस दिन के बाद से अंशुमन दूबारा पहले जैसा होने लगा। पर उसकी माँ के कई बार पूँछने पर भी उसने कभी नहीं बताया कि आख़िर बात क्या थी?

 

तभी किसी की मीठी-मीठी तोतलाती हुई आवाज़ डेस्क के पीछे की खिड़की के बाहर से सुनाई देती है, ‘पापा, चलो न। खेलो न मेरे साथ बाहर।’

उस व्यक्ति ने मुस्कुराते हुए अपने चश्मे को माथे में अटकाते हुए जोर से आवाज़ दी, ‘अभी तुम खेलो बच्चे। मैं कुछ काम कर रहा हूँ।’

दूर से आवाज़ आई, ‘ओके पापा!’

उस व्यक्ति ने फिर चश्में को नाक के अंतिम छोर में अटकाते हुए दुबारा लिखना शुरू किया।

 

अंशुमन ने उस घटना के करीब 3 साल बाद शादी कर ली। परिवार के लाख मना करने के बाद भी उसने एक विधवा से शादी की, जो उससे लगभग 5 साल बड़ी थी। शायद उस विधवा से शादी करने के पीछे कहीं न कहीं वंशिका की यादें थी। अंशुमन को पता चल गया था कि आज इतने सालों के बाद भी भारतीय समाज में एक विधवा की क्या स्थिति है? किन कठिनाईयों से उन्हें गुजरना पड़ता। अंशुमन शादी करना ही नहीं चाहता था तो जब उसके परिवार वालों ने उसे शादी करने पर विवश किया तो उसने एक विधवा का घर संवारना चाहा।

उन दोनों ने मिलकर ‘स्वाश्रित’ नामक एक NGO खोला, जहाँ उन समस्त लड़कियों और औरतों को आश्रय दिया जाता है और आत्मनिर्भर और स्वावलंबी बनाया जाता हैं, जिनका कोई नहीं हैं या फिर जिनके पास पर्याप्त साधन का अभाव है। इसी NGO के माध्यम से अंशुमन और उसकी पत्नी निशिता, आज भी विधवापन का दंश सह रही लड़कियों और औरतों के अधिकार के लिए लड़ रहे है।

 

शायद ये कहानी मुझे लिखनी ही थी ताकि उन तमाम औरतों और लड़कियों के प्रति लोगों को संवेदनशील बना पाऊँ, जो ये भूल गए है कि भारत वहीं देश है, जिसमें औरतों को देवी का रूप समझा जाता है।

भारत वहीं देश है, जिस देश को ‘भारत माँ’ कहकर संबोधित किया जाता है। आज उसी देश में कुछ संक्रिन मानसिकता वाले लोग औरत पर ज़ुल्म करते है, उन्हें अपने से नीचे समझते है। आज भी समाज में एक लड़का जब कुछ ग़लत करता है तो इस बात को यह कहकर नजरअंदाज किया जाता है कि लड़का है, भूल हो जाती है। अगर वहीं काम कोई लड़की करे तो उसे हीन दृष्टि से देखा जाता है, उसे मानसिक प्रताड़ना दी जाती है। यह कहानी उसी मानसिकता को तोड़ने का एक माध्यम बना है।

 

तभी किसी ने अपने छोटे-छोटे नन्हें हाथ से पीछे से उस व्यक्ति का आँख ढक दिया और तोतलाते हुए पूछा, “बताओं कौन?”

उस व्यक्ति ने मुस्कुराते हुए कहा, “ये तो मेरी नटखट वंशु के हाथ लग रहे है।“

“पापा, आपको कैसे पता चल जाता है हमेशा?” वंशिका ने सामने आते हुए पूछा।

उस व्यक्ति ने उसे अपने गोद में बैठा कर हाथ को हवा में घुमाते-फिराते बोला, “जादू से।”

वह बच्ची खिलखिला कर हँसने लगी।

“पापा चलो न अब। कब से बुला रही हूँ आपको।”

“चलो, चलता हूँ वंशु। बस अंतिम लाइन लिख दूं।”

“ओके पापा!”

उस ब्यक्ति ने फिर लिखना शुरू किया।

 

पर क्या ये घटना सच्ची है या फिर मंग्रहन्त कहानी? फ़ैसला आपका है।

आपका अंशुमन….

 

यह लिख कर वह व्यक्ति अपनी वंशिका को अपने कंधों में उठा कर बाहर चला गया। उसके चेहरे में कहानी पूर्ण होने की खुशी और शांति साफ-साफ नजर आ रही थी…

 

“इतिहास में नाम, घटनाएँ, तिथियाँ सच होती है, बाकी सब झूठ होता है..

साहित्य में नाम, घटनाएँ और तिथियाँ झूठ होती है, बाकी सब सच होता है…”

 

xxxxxx

 

सागर गुप्ता

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5 साल बाद….

दिनांक- 18 जुलाई, 2022

स्थान- किन्नौर, हिमाचल प्रदेश

(कोहरे से घिरे लकड़ी के बने हुए एक छोटे-से घर में एक व्यक्ति अपने बड़े से डेस्क में किसी पन्ने में कुछ लिखते हुए)

 

आज ‘सफ़र, प्यार और एक अधूरी दास्ताँ’ की कहानी मैंने पूरी तरह से इन बेजान पन्नों में उकेर दी। ऐसा लगता है मानो इस कहानी को लिखते-लिखते ये पन्ने भी कहानी के पाठक बन पड़े है। जब मैं कहानी को बीच में ही लिख कर छोड़ देता था तो मानो ये पन्ने मुझे हर पल आगे का वाक्या सुनाने को अपने मित्र वायु के जरिये मुझे उन पन्नों पर ही ला कर छोड़ देते थे, जहाँ तक मैं ये कहानी अधूरी लिख कर छोड़ जाता था। मुझे यकीन नहीं था कि मैं अंशुमन और वंशिका की कहानी को कभी पूर्ण कर पाऊँगा क्योंकि उनकी कहानी खुद ही अपूर्ण थी। अपूर्णता में पूर्णता का समावेश करना इतना आसान न था।

ख़ैर! आप सोच रहे होंगे कि ट्रैन की घटना के बाद हुआ क्या? क्या अंशुमन और वंशिका मिल पाए? आगे हुआ क्या?

उनका मिलना शायद विधाता ने लिखा ही न था। उस दिन की घटना के तुरंत बाद अंशुमन अगले स्टेशन में ही उतर गया और पागलों की तरह अपनी वंशिका को हर उन स्टेशन और आसपास के जगहों में खोजने लगा, जहाँ रात भर से अहले सुबह तक ट्रैन रुकी थी।

पर वंशिका का कोई अता-पता न चला। बिना कुछ खाए-पिये उसने हरेक चौराहे, हरेक गली को ढूढं डाला, पर उसका कोई नामो- निशान न मिला। लोगों को भी वो क्या ही दिखाता.. उसने तो खुद वंशिका को नहीं देखा था। कई दिनों के बाद भी उसे कोई जरिया न मिला, जिससे वो अपनी वंशिका तक पहुंच पाता।

थक-हार कर वो अपने घर लौट गया। वो अपने कमरे में ही पड़ा रहता। न किसी से बात करता और न किसी से मिलता। कई महीने ऐसे ही कट गए। उसके परिवार वालों को भी समझ नहीं आया कि आख़िर उसके साथ हुआ क्या था? वो भी उसके दर्द में घूँट-घूँट कर जी रहे थे।

एक दिन अंशुमन अपने कमरे में पड़ा-पड़ा पंखे को एकटक देख रहा था। तभी उसे अपनी माँ का रूदन सुनाई दिया और उसने इतने महीनों के बाद पहली बार अपने कमरे से बाहर कदम रखा। अंशुमन के लंबे-लंबे बाल, अनसुलझे लम्बी दाढ़ी जिसमें एकाध सफ़ेद बाल भी साफ-साफ नजर आ रहे थे। उसकी यह दशा देखकर उसकी माँ और रोने लगी।

पर उस दिन के बाद से अंशुमन दूबारा पहले जैसा होने लगा। पर उसकी माँ के कई बार पूँछने पर भी उसने कभी नहीं बताया कि आख़िर बात क्या थी?

 

तभी किसी की मीठी-मीठी तोतलाती हुई आवाज़ डेस्क के पीछे की खिड़की के बाहर से सुनाई देती है, ‘पापा, चलो न। खेलो न मेरे साथ बाहर।’

उस व्यक्ति ने मुस्कुराते हुए अपने चश्मे को माथे में अटकाते हुए जोर से आवाज़ दी, ‘अभी तुम खेलो बच्चे। मैं कुछ काम कर रहा हूँ।’

दूर से आवाज़ आई, ‘ओके पापा!’

उस व्यक्ति ने फिर चश्में को नाक के अंतिम छोर में अटकाते हुए दुबारा लिखना शुरू किया।

 

अंशुमन ने उस घटना के करीब 3 साल बाद शादी कर ली। परिवार के लाख मना करने के बाद भी उसने एक विधवा से शादी की, जो उससे लगभग 5 साल बड़ी थी। शायद उस विधवा से शादी करने के पीछे कहीं न कहीं वंशिका की यादें थी। अंशुमन को पता चल गया था कि आज इतने सालों के बाद भी भारतीय समाज में एक विधवा की क्या स्थिति है? किन कठिनाईयों से उन्हें गुजरना पड़ता। अंशुमन शादी करना ही नहीं चाहता था तो जब उसके परिवार वालों ने उसे शादी करने पर विवश किया तो उसने एक विधवा का घर संवारना चाहा।

उन दोनों ने मिलकर ‘स्वाश्रित’ नामक एक NGO खोला, जहाँ उन समस्त लड़कियों और औरतों को आश्रय दिया जाता है और आत्मनिर्भर और स्वावलंबी बनाया जाता हैं, जिनका कोई नहीं हैं या फिर जिनके पास पर्याप्त साधन का अभाव है। इसी NGO के माध्यम से अंशुमन और उसकी पत्नी निशिता, आज भी विधवापन का दंश सह रही लड़कियों और औरतों के अधिकार के लिए लड़ रहे है।

 

शायद ये कहानी मुझे लिखनी ही थी ताकि उन तमाम औरतों और लड़कियों के प्रति लोगों को संवेदनशील बना पाऊँ, जो ये भूल गए है कि भारत वहीं देश है, जिसमें औरतों को देवी का रूप समझा जाता है।

भारत वहीं देश है, जिस देश को ‘भारत माँ’ कहकर संबोधित किया जाता है। आज उसी देश में कुछ संक्रिन मानसिकता वाले लोग औरत पर ज़ुल्म करते है, उन्हें अपने से नीचे समझते है। आज भी समाज में एक लड़का जब कुछ ग़लत करता है तो इस बात को यह कहकर नजरअंदाज किया जाता है कि लड़का है, भूल हो जाती है। अगर वहीं काम कोई लड़की करे तो उसे हीन दृष्टि से देखा जाता है, उसे मानसिक प्रताड़ना दी जाती है। यह कहानी उसी मानसिकता को तोड़ने का एक माध्यम बना है।

 

तभी किसी ने अपने छोटे-छोटे नन्हें हाथ से पीछे से उस व्यक्ति का आँख ढक दिया और तोतलाते हुए पूछा, “बताओं कौन?”

उस व्यक्ति ने मुस्कुराते हुए कहा, “ये तो मेरी नटखट वंशु के हाथ लग रहे है।“

“पापा, आपको कैसे पता चल जाता है हमेशा?” वंशिका ने सामने आते हुए पूछा।

उस व्यक्ति ने उसे अपने गोद में बैठा कर हाथ को हवा में घुमाते-फिराते बोला, “जादू से।”

वह बच्ची खिलखिला कर हँसने लगी।

“पापा चलो न अब। कब से बुला रही हूँ आपको।”

“चलो, चलता हूँ वंशु। बस अंतिम लाइन लिख दूं।”

“ओके पापा!”

उस ब्यक्ति ने फिर लिखना शुरू किया।

 

पर क्या ये घटना सच्ची है या फिर मंग्रहन्त कहानी? फ़ैसला आपका है।

आपका अंशुमन….

 

यह लिख कर वह व्यक्ति अपनी वंशिका को अपने कंधों में उठा कर बाहर चला गया। उसके चेहरे में कहानी पूर्ण होने की खुशी और शांति साफ-साफ नजर आ रही थी…

 

“इतिहास में नाम, घटनाएँ, तिथियाँ सच होती है, बाकी सब झूठ होता है..

साहित्य में नाम, घटनाएँ और तिथियाँ झूठ होती है, बाकी सब सच होता है…”

 

xxxxxx

 

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