आज की एक अच्छी बात

आज की एक अच्छी बात

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धनेश परमार

17 Aug 20244 min read

Published in stories

आज की एक अच्छी बात

कुछ समय पहले, मॉल की यात्रा के दौरान, मेरी मुलाकात मेरे कार्यकाल के एक मित्र से हुई। चूंकि हम लंबे समय के बाद मिले थे, हमने परिवार और बच्चों के हालचाल पूछे और फोन नंबर आदि के बारे में जानकारी का आदान-प्रदान की। स्वभाव से शांत और हँसमुख रहने वाले उनके चेहरे पर एक मायूसी थी जो हमने अपने पांच साल के सहवास में पहले कभी नहीं देखी थी।

मैंने यूँ ही पूछ लिया, “सूर्या, क्या बात है, आप पहले जैसे सहज क्यों नहीं हो ? आप ध्यान या योग करते रहो और अपनी सेहत का ख्याल रखिए।”

उसने हँसते हुए कहा, “नहीं, ऐसा कुछ नहीं है।”

बातचीत में पता चला कि सेवानिवृत्त होने पर आय कम हो जाने से घर चलाने में मुश्किल हो रही थी। वह रोज शाम को मेरे घर के पास वाले बगीचे में आता था, अतः दोबारा मिलने का वादा करके चला गया।

जिंदगी की आपाधापी, रोजमर्रा की व्यस्तता और मन की निष्क्रियता में बगीचे में जाना रह गया। एक दिन सूर्या का फोन आया और उसने मिलने का फैसला किया।

हँसी-खुशी पांच मिनट बीत गए और फिर वही जिंदगी की उथल-पुथल… घर की बातें, बच्चों की चिंता, रिश्तेदारों का व्यवहार आदि।

मैंने पूछा, “क्या आपके पास खुश रहने के लिए कुछ नहीं है?”

सूर्या एक हल्की सी मुस्कान के साथ उसे देखता रहा।

मैंने कहा, “अब हमें यहां नियमित रूप से मिलना है। यदि नहीं हो पाता तो हम पांच मिनट के लिए फोन पर भी बात कर सकते हैं, ठीक है ? लेकिन बात करते समय, आपको हर बार एक अच्छी बात कहनी होगी। मुझे बस इतना कहना है कि बड़ी और छोटी जो चीजें अच्छी होती है वह मुझे कहनी है। मुझसे वादा करो, क्या तुम कोशिश करोगे ?”

उनका हाथ वादा देने के लिए बढ़ा लेकिन वह ढीला था। मैंने उनका हाथ पकड़कर अपने दोनों हाथों के बीच कैद कर लिया और गर्मजोशी का संदेश दिया।

“क्या हमारे जीवन में हर दिन एक अच्छी चीज होती है ? सेवानिवृत्ति के बाद वही दैनिक जीवन। हमें इसके बारे में क्या बात करनी चाहिए ?” उन्होंने कहा।

मैंने कहा “कोशिश करो। चल चलते हैं, कल मिलते हैं ?”

अगले दिन सूर्या उपस्थित, मैं भी उपस्थित। मेरी आंखों में सवाल घूर रहा था। मैंने कहा “आज महीनों बाद मेरे गुलाब के पौधों पर कलियाँ निकलीं। आज गर्मी कम है।”

“अरे, पूरे दिन कुछ तो अच्छा हुआ होगा, याद करो।” वह खुल कर मुस्कुराया और बोला, ”हां, हां..हम दोनों ऐसी ही छोटी-छोटी बातें सोचकर एक-दूसरे से कहते और हँसते रहेंगे। मेरे लिए आज की अच्छी बात आपसे मिलना है।”

और इस तरह हमारी “आज की एक अच्छी बात” श्रृंखला शुरू हुई। यहां तक ​​कि जब हम व्यक्तिगत रूप से नहीं मिल पाते तब फोन पर भी बातें करते थे। तब से उनके साथ-साथ मुझे भी दिन की सबसे छोटी चीज की सराहना करने की आदत पड़ गई, जैसे देखिए सूची, आप भी आश्चर्यचकित हो जाएंगे… “खोई हुई घड़ी आज मिल गई”। “बेटी को आज मेरी कहानी बहुत पसंद आई।” “पड़ोसी के बेटे को 95 प्रतिशत अंक मिले।” “मेरे स्कूल के दिनों के एक दोस्त से मुलाकात हुई।” “मेरी पत्नी के साथ आज शॉपिंग के लिए गया।” “आज लोगों को स्वास्थ्य संबंधी व्याख्यान दिया, लोगों को काफी पसंद आया।” “आज मेरे मोगरे के पौधे पर पंद्रह फूल खिले हैं और बहुत सारी कलियाँ भी निकल रही हैं।” “कई वर्षों का मेरा पसंदीदा गाना अचानक टीवी पर दिखाई दिया”।

इन सबके सामने छोटे-छोटे कष्टों की क्या गिनती ?

अब आज-कल की ‘एक अच्छी बात’ की जगह एक से ज़्यादा अच्छी बातें कहने की आदत हो गई है। छोटी-छोटी खुशियाँ इतनी खूबसूरत कालीन बिछाती हैं कि दिल को बोर होने का मौका ही नहीं मिलता। हम ऐसी छोटी-छोटी खुशियों को नजरअंदाज कर देते हैं और बड़ी-बड़ी खुशियों के गम में मुंह फुला कर बैठ जाते हैं और समय जाया करते हैं।

खुश रहने की आदत भी डालनी चाहिए जो ऐसे छोटे-छोटे पलों का आनंद लेने से आती है। चाहे वह सड़क पर कोई प्यारा सा बच्चा हो या सालों बाद हाथ में आई कोई पसंदीदा किताब। सूर्या के साथ शुरू की गई इस बातचीत से, मेरी “दिन की अच्छी बात” के बारे में सोचने और हल्की मुस्कान के साथ रात को सोने की आदत विकसित हो गई है।

इसी विश्वास के साथ, सभी से अनुरोध है कि “आज की एक अच्छी बात” को जरूर आजमाएं। धीरे-धीरे आपके पास भी अच्छी बातों का खजाना होगा। हमारे पुराने फोटो एलबम को देखने पर एक छिपी हुई खुशी महसूस होती है वैसा ही अनुभव जब आप इस खजाने के बारे में सोचेंगे तो आप महसूस करोगे ऐसी मेरी अभिलाषा है।

 

धनेश परमार ‘परम’

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कुछ समय पहले, मॉल की यात्रा के दौरान, मेरी मुलाकात मेरे कार्यकाल के एक मित्र से हुई। चूंकि हम लंबे समय के बाद मिले थे, हमने परिवार और बच्चों के हालचाल पूछे और फोन नंबर आदि के बारे में जानकारी का आदान-प्रदान की। स्वभाव से शांत और हँसमुख रहने वाले उनके चेहरे पर एक मायूसी थी जो हमने अपने पांच साल के सहवास में पहले कभी नहीं देखी थी।

मैंने यूँ ही पूछ लिया, “सूर्या, क्या बात है, आप पहले जैसे सहज क्यों नहीं हो ? आप ध्यान या योग करते रहो और अपनी सेहत का ख्याल रखिए।”

उसने हँसते हुए कहा, “नहीं, ऐसा कुछ नहीं है।”

बातचीत में पता चला कि सेवानिवृत्त होने पर आय कम हो जाने से घर चलाने में मुश्किल हो रही थी। वह रोज शाम को मेरे घर के पास वाले बगीचे में आता था, अतः दोबारा मिलने का वादा करके चला गया।

जिंदगी की आपाधापी, रोजमर्रा की व्यस्तता और मन की निष्क्रियता में बगीचे में जाना रह गया। एक दिन सूर्या का फोन आया और उसने मिलने का फैसला किया।

हँसी-खुशी पांच मिनट बीत गए और फिर वही जिंदगी की उथल-पुथल… घर की बातें, बच्चों की चिंता, रिश्तेदारों का व्यवहार आदि।

मैंने पूछा, “क्या आपके पास खुश रहने के लिए कुछ नहीं है?”

सूर्या एक हल्की सी मुस्कान के साथ उसे देखता रहा।

मैंने कहा, “अब हमें यहां नियमित रूप से मिलना है। यदि नहीं हो पाता तो हम पांच मिनट के लिए फोन पर भी बात कर सकते हैं, ठीक है ? लेकिन बात करते समय, आपको हर बार एक अच्छी बात कहनी होगी। मुझे बस इतना कहना है कि बड़ी और छोटी जो चीजें अच्छी होती है वह मुझे कहनी है। मुझसे वादा करो, क्या तुम कोशिश करोगे ?”

उनका हाथ वादा देने के लिए बढ़ा लेकिन वह ढीला था। मैंने उनका हाथ पकड़कर अपने दोनों हाथों के बीच कैद कर लिया और गर्मजोशी का संदेश दिया।

“क्या हमारे जीवन में हर दिन एक अच्छी चीज होती है ? सेवानिवृत्ति के बाद वही दैनिक जीवन। हमें इसके बारे में क्या बात करनी चाहिए ?” उन्होंने कहा।

मैंने कहा “कोशिश करो। चल चलते हैं, कल मिलते हैं ?”

अगले दिन सूर्या उपस्थित, मैं भी उपस्थित। मेरी आंखों में सवाल घूर रहा था। मैंने कहा “आज महीनों बाद मेरे गुलाब के पौधों पर कलियाँ निकलीं। आज गर्मी कम है।”

“अरे, पूरे दिन कुछ तो अच्छा हुआ होगा, याद करो।” वह खुल कर मुस्कुराया और बोला, ”हां, हां..हम दोनों ऐसी ही छोटी-छोटी बातें सोचकर एक-दूसरे से कहते और हँसते रहेंगे। मेरे लिए आज की अच्छी बात आपसे मिलना है।”

और इस तरह हमारी “आज की एक अच्छी बात” श्रृंखला शुरू हुई। यहां तक ​​कि जब हम व्यक्तिगत रूप से नहीं मिल पाते तब फोन पर भी बातें करते थे। तब से उनके साथ-साथ मुझे भी दिन की सबसे छोटी चीज की सराहना करने की आदत पड़ गई, जैसे देखिए सूची, आप भी आश्चर्यचकित हो जाएंगे… “खोई हुई घड़ी आज मिल गई”। “बेटी को आज मेरी कहानी बहुत पसंद आई।” “पड़ोसी के बेटे को 95 प्रतिशत अंक मिले।” “मेरे स्कूल के दिनों के एक दोस्त से मुलाकात हुई।” “मेरी पत्नी के साथ आज शॉपिंग के लिए गया।” “आज लोगों को स्वास्थ्य संबंधी व्याख्यान दिया, लोगों को काफी पसंद आया।” “आज मेरे मोगरे के पौधे पर पंद्रह फूल खिले हैं और बहुत सारी कलियाँ भी निकल रही हैं।” “कई वर्षों का मेरा पसंदीदा गाना अचानक टीवी पर दिखाई दिया”।

इन सबके सामने छोटे-छोटे कष्टों की क्या गिनती ?

अब आज-कल की ‘एक अच्छी बात’ की जगह एक से ज़्यादा अच्छी बातें कहने की आदत हो गई है। छोटी-छोटी खुशियाँ इतनी खूबसूरत कालीन बिछाती हैं कि दिल को बोर होने का मौका ही नहीं मिलता। हम ऐसी छोटी-छोटी खुशियों को नजरअंदाज कर देते हैं और बड़ी-बड़ी खुशियों के गम में मुंह फुला कर बैठ जाते हैं और समय जाया करते हैं।

खुश रहने की आदत भी डालनी चाहिए जो ऐसे छोटे-छोटे पलों का आनंद लेने से आती है। चाहे वह सड़क पर कोई प्यारा सा बच्चा हो या सालों बाद हाथ में आई कोई पसंदीदा किताब। सूर्या के साथ शुरू की गई इस बातचीत से, मेरी “दिन की अच्छी बात” के बारे में सोचने और हल्की मुस्कान के साथ रात को सोने की आदत विकसित हो गई है।

इसी विश्वास के साथ, सभी से अनुरोध है कि “आज की एक अच्छी बात” को जरूर आजमाएं। धीरे-धीरे आपके पास भी अच्छी बातों का खजाना होगा। हमारे पुराने फोटो एलबम को देखने पर एक छिपी हुई खुशी महसूस होती है वैसा ही अनुभव जब आप इस खजाने के बारे में सोचेंगे तो आप महसूस करोगे ऐसी मेरी अभिलाषा है।

 

धनेश परमार ‘परम’

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