तीसरा नेत्र खोलने का सूत्र-महामृत्युंजय

तीसरा नेत्र खोलने का सूत्र-महामृत्युंजय

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28 Jul 202423 min read

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तीसरा नेत्र खोलने का सूत्र-महामृत्युंजय

भारतीय ऋषि ज्ञान-विज्ञान के सारे सूत्र वेद-पुराणों में छिपा दिए हैं। जैसे किसी राज महल के सभी कक्षों का वर्णन कर दिया जाए। किस कक्ष में क्या है। उस कक्ष का द्वार किधर है? कैसा है? सभी कुछ का वर्णन कर दिया गया है। परन्तु पात्र के अभाव में मुख्य द्वार का दरवाजा बन्द कर ताला लगा दिया गया एवं उसकी चाभी प्रकृति को सौंप दी गई। जैसे किसी सद्गुरु का आगमन इस धरती पर होता है, प्रकृति उचित समय पर चाभी उन्हें प्रदान कर देती है। मुख्य द्वार की तरफ इशारा कर देती है। वह सद्गुरु आराम से ताला खोलता है एवं उस महल में प्रवेश करता है। महल के आँगन में जाता है। आँगन में महल के मालिक, महल-पति अर्थात् सम्राट से मिल जाता है।

हमारा शरीर भी एक महल है। जिसमें दस दरवाजे हैं। यह महल सृष्टि का सबसे बड़ा महल है। चैतन्य है। रथ पर यात्रा कर एक स्थान से दूसरे स्थान जाता रहता है। शरीर ही रथ है। आत्मा ही रथी है। पाँच ज्ञानेन्द्रियां- नासिका, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, कर्ण एवं पांच कर्मेन्द्रिय-पांव, उपस्थ, मुख, गुदा, हाथ- ये दस घोड़े हैं। मन सारथी है। मन रूपी सारथी शराब के नशे में घोड़ों को चलाता है तब निश्चित रूप से महल को ध्वस्त कर देगा। ऋग्वेद 10/22/8 में कहा है-‘अकर्मा दस्युरभि नो अमंतुरन्यव्रतो अमानुषः।’ अर्थात् ‘मनुष्यों में दस्यु (चोर) वह होता है जो पुरुषार्थ प्रयत्न नहीं करता, सुविचार नहीं करता, दूसरे ही कार्य करता रहता है। उन्नति के कार्यों को छोड़ देता है। जो मनुष्यत्व के अयोग्य कुत्सित कार्य करता रहता है|’ दस्यु के लक्षण चार हैंः-(1) आलस्य, (2) अविचार, (3) कुकर्म, (4) अमानुष, क्रूर-कर्म। आज के संसार में घूसखोरी एवं विकास के मद के धन को खा जाने से ज्यादा कुकर्म एवं अमानुष कार्य कुछ भी नहीं है। इन्हीं का परिणाम है समाज की अराजकता। यदि घूसखोरी न हो, विकास कार्य ठीक से हो तो यह पृथ्वी स्वर्ग हो जाएगी। यह दानव समग्र निरीह प्राणी को उदरस्थ करना चाहता है।

हमारे तथा कथित विद्वान व्यक्ति भी इन ऋचाओं का मात्र पाठ कर लेते हैं। पाठ या जाप करने से कुछ भी नहीं होता है। जैसे धन-धन कहने से हम धनिक नहीं होंगे, न जल-जल कहने से प्यास मिटेगी। इसी तरह से मन को संकल्पवान बनाने के लिए-‘मे मनः शिवसंकल्पमस्तु|’ जाप कर लेने से मन संकल्पवान नहीं होगा। मन को शिव की तरह संकल्पवान बनाने की विधि को जानना ही होगा। गुरु नानक देव कहते हैं कि ‘सिर पर पूड़ियों का सौ मन भार लेकर चलने से भूख नहीं मिट सकती|’

मेरा परिवार साधु संतों का परिवार रहा है। अतएव विशेष संत महिमा एवं गुरु महिमा बचपन से ही सुनने को मिली। कर्मकाण्ड करने के लिए पंडित जी एवं कुलगुरु भी समय-समय पर आते रहे। जब कोई बीमार पड़ता, असाध्य रोग होता तब पंडित जी-महामृत्युंजय के जाप की सलाह देते एवं यजमान से संकल्प लेकर शिव मंदिर में जाप करते थे।

मेरी माँ को असाध्य रोग हो गया। पंडित जी एक लाख महामृत्युंजय का जाप किए। विधिवत-दानादि के साथ हवन हुआ। उसके चार दिन बाद माताश्री की मृत्यु हो गई। फिर वही कुल पुरोहित एवं कुलगुरु मृत्यु संस्कार सम्पन्न कराए। स्वर्गारोहण की विधि की गई। इस तरह मैंने लगभग एक सौ व्यक्तियों पर यह प्रयोग किया| जो असाध्य बीमारी या साधारण बीमारी से भी ग्रस्त है, उन्हें महामृत्युंजय जाप करने को कहा, वे जाप के मध्य में या पूर्णाहुति के बाद या एक-दो माह बाद मृत्यु को प्राप्त हो गए। एक सौ में मात्र पाँच व्यक्ति बचे हैं। जो इस मंत्र की महिमा का गुणगान करते फिरते हैं।

अभी फरवरी 2008 में वाराणसी के दो व्यक्तियों को काशी विश्वनाथ मंदिर में जाप करने हेतु कहा था। झारखण्ड के दो उच्च अधिकारी एवं एक भी.सी. बिहार के दो व्यक्तियों को जाप करने हेतु कहा, इन सभी की मृत्यु हो गई। अब मेरे शिष्य जान गए हैं। जिसे इस मंत्र का जाप करने को कहता, वे उन्हें इशारा कर देते।

इसका अर्थ उल्टा न समझें। शिव मृत्यु के देवता हैं। श्मशान भूमि ही इनका निवास है। इसी कारण योगी लोग श्मशान पर रहते हैं। मृत्यु को साकार करते हैं। जो भी साधक मृत्यु को साकार करता है वह मृत्यु से मुक्त हो जाता है। अर्थात् इस शरीर रूपी घर को जब चाहे वस्त्र की तरह त्याग कर सकता है।

इस पृथ्वी पर मात्र भारत ही ऐसा देश है, जहाँ मृत्यु की तकनीक दी गई है। पूर्व जन्म को देखने एवं भविष्य के सम्भावित जन्म को इच्छा के अनुरूप करने की तकनीक दी गई है। इतनी वृहद् खोज विश्व में कहीं भी नहीं की गई है। जो भी साधक मृत्यु को देख लेता है, उसका तीसरा नेत्र खुल जाता है। जन्म-मृत्यु से मुक्त हो जाता है। वह स्वेच्छा से अवतरित होता है। अन्तर्ध्यान होता है। अपने संकल्पानुसार इस धरती पर रहकर कार्य सम्पादन करता है।

मृत्यु का वृहद ग्रंथ है-श्रीमद्भागवत पुराण। इसका प्रारम्भ ही होता है- राजा परीक्षित मृत्यु को उपलब्ध होना चाहते हैं। पृथ्वी से सभी ऋषियों को, साधुओं को आमंत्रित करते हैं जो उन्हें महा-मृत्यु को उपलब्ध करा सकें। सभी पीछे हट गए। अल्पवय शुकदेव मुनि का आगमन होता है। जो राजा जनक को गुरु बनाकर ब्रह्म का साक्षात्कार कर लिए हैं। श्रीमद्भागवत् ग्रंथ के रचयिता श्री वेद व्यास जी स्वयं तैयार नहीं हुए। श्री शुकदेव मुनि सात दिन में परीक्षित को क्रमशः एक-एक चक्रों की यात्रा कराते सहस्रार में पहुँचा देते हैं। जहाँ परीक्षित निर्विकल्प समाधि को उपलब्ध हो जाते हैं। दशम् द्वार से शरीर को वस्त्र की तरह छोड़कर निकल जाते हैं।

परीक्षित नाम है। जिसका अर्थ है-उनकी हर क्षेत्र से परीक्षा ले ली गई है। ब्रह्म के अवतरण के लिए उचित पात्र है। वेद व्यास ने लिखा है कि परीक्षित धर्मराज युधिष्ठिर की तरह सत्यवादी हैं। अर्जुन की तरह धनुर्वेद के ज्ञाता हैं। भीम की तरह शक्तिशाली हैं। नकुल की तरह ज्योतिषी हैं। सहदेव की तरह नीतिज्ञ हैं। सबसे बड़ी विशेषता यह है कि भगवान कृष्ण की तरह धीर-गम्भीर एवं धर्मज्ञ हैं। एक ही व्यक्ति पाँच पाण्डवों एवं छठा भगवान कृष्ण के गुण से भी पूर्ण है। वह व्यक्ति जो जन्मजात सिद्ध है, किसी पूर्ण की उपस्थिति मात्र से उसकी कुण्डलिनी यात्रा प्रारम्भ कर देगी। उसके लिए सात दिन बहुत हैं।

श्रीमद्भागवद पुराण के महात्म्य में भी धुंधकारी की कथा आई है। आत्मदेव नामक ब्राह्मण अपने तप के प्रभाव से दूसरे सूर्य की तरह तप रहे हैं। परन्तु कर्मकाण्ड अपनाए हैं। कर्मकाण्ड से बहुत धन अर्जन किए हैं। जिसे परोपकार में खर्च न करके अपने उपभोग में लगाना चाहते हैं। तुंगभद्र नदी के  तट पर बसे हैं। तुंग अर्थात् शीघ्र, भद्र अर्थात् मुक्ति। वे शीघ्र मुक्ति भी चाहते हैं। धर्म में अत्यन्त धैर्य रखना होता है। उनकी पत्नी है-धुंधली। अर्थात् उनके बुद्धि-विवेक पर घोर कुहरा (अंधेरा) छा गया है। इसी से पुत्र की कामना से आत्महत्या करना चाहते हैं। जंगल में उन्हें एक संन्यासी मिलता है जो उन्हें आत्म हत्या से रोकता है। उससे राजा परीक्षित की तरह मुक्ति माँग सकते थे। परन्तु धुंधली बुद्धि के कारण पुत्र माँगते हैं। पुत्र जो उनके द्वारा अर्जित धन का भोग कर सके। संन्यासी बहुत समझाता है परन्तु आत्मदेव पुत्र माँगते हैं। संन्यासी एक फल देता है। कहता है, इसे अपनी पत्नी को खिला देना। पंडित आत्मदेव अपनी पत्नी को फल दे देते हैं। परन्तु वह आधुनिक शिक्षा प्राप्त औरत थी। पुराण का अर्थ है-पुराना, परन्तु न अर्थात् उतना ही नया। यह जितना सत्य पाँच हजार वर्ष पूर्व था उतना ही आज भी सत्य है। उस काल में भी वह आज के पश्चिम की लड़की की तरह गर्भ खरीदती है। फल को गाय को खिला देती है। अपने को पुत्र होने वाली प्रसव पीड़ा से बचा लेती है। अपनी शारीरिक सुन्दरता को कायम रखती है।

समयानुसार उसकी बहन से पुत्र होता है। उसका नाम धुंधकारी रखा जाता है। धुंधकारी अर्थात् जाड़े के दिन में गहन धुंध पड़ने पर अपना ही हाथ नहीं दिखाई देता है। उस समय बस, गाड़ियाँ बहुत एक्सीडेंट करती हैं। उसी तरह धुंधकारी भी विनाश करने लगा। माँ को प्रेत योनि तक पहुँचा दिया। पिता की भी वही गति हुई। अन्त में वेश्याएँ धुंधकारी को भी हाथ-पैर बाँधकर कुएँ में फेंक दीं। अर्थात् आत्मदेव पंडित का पुत्र माता-पिता को प्रेत बनाकर, धन का भोग कर स्वयं भी प्रेत योनि में चला गया।

गाय का पुत्र, गोकर्ण इनकी मुक्ति के लिए सात पोर का बांस रखकर धुंधकारी को उसमें आमंत्रित कर श्रीमद्भागवत की कथा कहते हैं। सातवें दिन धुंधकारी सूक्ष्म दिव्य शरीर धारण कर बैकुंठ की यात्रा करते हैं।

श्रीमद्भागवत एक शब्द में मृत्यु की कथा है। मृत्यु की तकनीक है। परन्तु दुःखद बात यह है कि कथा वाचक इसे नाच-गान के साथ गाँव-गाँव, घर-घर सुनाते हैं। श्रोता के लिए यह कथा अहंकार पूर्ण धर्म की चादर है। कथा वाचक के लिए तमसपूर्ण व्यापार बन गया है। जहाँ कथा होती है वहाँ अकाल मृत्यु अवश्य होगी। यदि अकाल मृत्यु नहीं हुई तो श्रोता या वक्ता की लड़की भाग जाती है। या चलता व्यापार बंद हो जाता है। कोई न कोई आफत जरूर आ जाएगी। इस कथा में वक्ता भगवान कृष्ण का जन्म, कृष्ण की शादी ऐसे प्रसंग पर ज्यादा जोर देते हैं। जिससे उन्हें भरपूर दान मिले।

मेरे एक मित्र थे नारायण स्वामी। वे श्रीमद्भागवत के बहुत बड़े विद्वान थे। पूरे वर्ष देश में घूम-घूम कर कथा करते थे। उनके सामने उनके लड़का, नाती, पत्नी की मृत्यु हुई। इसी वर्ष फरवरी 08 में उनकी भी अकाल मृत्यु हुई। उनके यहाँ देश के शीर्ष कथावाचक मुरारी जी बापू कथा सुना रहे थे। श्रोता भी मेरे मित्र ही थे, तीसरे दिन उन्हें गोली मार दी गई। आप लोग अपने आस-पास इसका अवलोकन करें। राम नाम सत्य है। परन्तु किसी की शादी में कहेंगे तो आपको लोग बिना मारे नहीं छोड़ेंगे।

भारतीय ऋषि मृत्यु को साकार करने हेतु परीक्षित जैसे व्यक्ति के लिए ये तकनीक खोजे हैं। परन्तु बच्चे के हाथ में बंदूक पड़ जाने पर किसी की हत्या कर सकता है। विवेकशील व्यक्ति के हाथ में बंदूक रहने पर रक्षा करती है। वैष्णव ऋषियों ने मृत्यु की कला सीखने हेतु श्रीमद्भागवत ग्रंथ का अनुसंधान किया जो सर्वोत्कृष्ट है। विश्व की अनुपम उपलब्धि है। परन्तु सुकदेव एवं गोकर्ण के हाथ से निकल कर आत्मदेव एवं धुंधकारी के हाथ में चली गयी है। इसका परिणाम है आज का समाज।

इसी तरह महामृत्युंजय शैव साधकों की अनुपम खोज है। जो साधक का तीसरा नेत्र खोलती है। जिससे वह सृष्टि के मृत्यु के देवता को साकार करता है। मृत्यु भी देव है।

अब विचार करें महामृत्युंजय सूत्र पर जिस सूत्र से जन्मों-जन्म के रहस्य स्वतः खुल जाते हैं।

ॐ त्रयम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।

उर्वारूकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्।।

यह यजुर्वेद 3/60 का छंद है। गायत्री छंद ऋग्वेद का है। जो निर्गुण निराकार परमात्मा की प्रार्थना है। जिससे सृष्टि का रहस्य खुलता है।

‘त्रयम्बकं यजामहे’ यह शब्द ही अत्यन्त विस्फोटक है। आपके तीसरे नेत्र की तरफ इशारा करता है। E= mc2 यह सूत्र इशारा ही करता है। जिससे वैज्ञानिक विश्व में क्रान्ति कर दिए। विश्व के तमाम आणविक विकास के पीछे इस सूत्र का हाथ है। हम इसे गंगा के तट पर माला लेकर जपते रहे। इससे न हममें क्रान्ति आएगी न ही इस संसार में। ऋषि भी महान वैज्ञानिक थे। अपने महान अनुसंधान को वेद की ऋचाओं में, पुराण के श्लोकों में छिपा दिए। आने वाले समय में उचित पात्र उसे खोज लेगा।

‘त्रयम्बकं यजामहे’ अर्थात् हम तीन नेत्र वाले की पूजा करते हैं। कौन है तीन नेत्र वाला? सभी एक साथ कहेंगे-भगवान शिव। भगवान शिव प्रतीक हैं। हम सभी तीन नेत्र वाले हैं। जहाँ हमारा तीसरा नेत्र है, वहीं शिव लिंग ज्योर्तिमय है। इसे ‘दिव्य गुप्त विज्ञान’ में दिखाया जाता है। जब तक हमारा तीसरा नेत्र नहीं खुलता तब तक हम समाधि में प्रवेश नहीं करते। ये दोनों नेत्र बाहर का दृश्य देखते हैं। जैसे ही साधना के द्वारा इन दोनों नेत्रों की शक्ति को एक साथ आज्ञा चक्र की तरफ प्रवाहित करते हैं वैसे ही कुण्डलिनी शक्ति पर दबाव पड़ता है। वह जाग उठती है। अति शीघ्र गति से शिव लिंग से आकर लिपट जाती है। साधक का तीसरा नेत्र खुल जाता है। सूक्ष्म सृष्टि या रहस्यमय लोक से पर्दा हट जाता है। सभी अदृश्य दृश्य हो जाता है।

गुरु शब्दों से सत्य पर प्रकाश डालने की कोशिश करता है। परन्तु जो क्रिया द्वारा, प्रयोग द्वारा शिष्यों पर सत्य का अवतरण कराता है, जिसे वह अनुभव कर सकता है। वाणी मौन हो जाती है। अभिव्यक्ति करने में असमर्थ हो जाता है। वही सद्गुरु है।

सद्गुरु की अनुकम्पा का प्रसाद है तीसरा नेत्र। ज्ञान का नेत्र। दिव्यता का नेत्र। परमात्मा हमें बाहर से ही नहीं अपितु भीतर से भी देखता है। वह बहिर्दर्शी के साथ अन्तर्दर्शी भी हे। इसी से वह ‘त्रयम्बकं’ है। तीनों लोकों को एक साथ देखने से भी वह त्रयम्बकं है। वह पृथ्वी, अंतरिक्ष (रहस्यमय लोक) द्यौ तीनों लोकों में व्याप्त है। वह आधारभूत सत्य का, ऋतु का, प्रकृति के शाश्वत नियमों का केन्द्र बिन्दु है। वह सभी रहस्यों का रहस्य भी है। वह हमारे प्रत्येक कार्यों को देख रहा है। हमारे मन-मस्तिष्क के अन्दर उठने वाले विचारों को भी देख रहा है। वह ‘ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्|’ जगत के कण-कण में व्याप्त है। इसी से त्रयम्बकं है। जैसे ही हमारा तीसरा नेत्र खुलता है जगत का रहस्य खुल जाता है। हम अपने परमपिता परमात्मा से जुड़ जाते हैं। अपने पिता के राज्य के उत्तराधिकारी हो जाते हैं। हम त्रयम्बकं हो जाते हैं। बिना त्रयम्बकं हुए पागल की तरह पागलखाने में ही रहने को विवश हैं। यह सूत्र त्रयम्बकं बनने का आह्वान करता है। हमारे तीसरे नेत्र को खोलने के लिए उत्सुक है।

इस सूत्र का दूसरा शब्द है-‘सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्’ अर्थात् हम यश (सुगंधि) कीर्ति, शक्ति (पुष्टि) की वृद्धि के लिए उस त्रयम्बकं का सुमिरण (पूजा) करते हैं। जैसे ही हमारा तीसरा नेत्र खुलता है, हमारे जीवन में एक साथ यश (सुगन्धि)और शक्ति की वृद्धि होती है। अन्यथा यश बढ़ेगा तो शक्ति नहीं, शक्ति बढ़ेगी तो हम राक्षस भी बन सकते हैं। इसकी ज्यादा सम्भावना है। शक्ति की पूजा तभी होती है, जब माँ दुर्गा के रूप में मातृत्व से, करुणा से भरी हो। तीसरे नेत्र के खुलते ही हम सुगंधि के, देवत्व के मार्ग पर चल देते हैं। जहाँ परम पिता परमात्मा अपने जन्मों जन्म से बिछुड़े पुत्र को अंक में भरने के लिए इंतजार कर रहा है। बूंद समुद्र में मिलकर समुद्र हो जाएगी।

मनुष्य के जन्मों जन्म का यही प्रयास सार्थक रहा है कि तीसरा नेत्र खुल जाए। जब साधक समय के सद्गुरु से दीक्षा लेता है, तब उसके तीसरे नेत्र पर ही दिव्यास्त्र का प्रहार करते हैं। जिससे साधक का परम लघु मंत्र-जाप सफल होता है। ध्यान करते समय अजपा-अनाहद चलता रहता है। श्रद्धा रूपी जल से सिंचित होता रहता है। साधक के प्रत्येक सेल से ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन प्रारम्भ हो जाता है। वह ऊर्जा एक सेल से दूसरे सेल में लपट की तरह फ़ैलने लगती है। कुछ ही दिन में सम्पूर्ण सेल एक ऊर्जा का क्षेत्र बन जाता है। जो तीसरे नेत्र पर धक्का मारता है। फिर वहाँ आणविक विस्फोट होता है। तीसरा नेत्र खुल जाता है। फिर आप परम सत्ता से जुड़ जाते हैं। परन्तु इस साधना के क्रम में भूलकर भी यदि गुरु के प्रति संदेह पैदा होता है, तब वही ऊर्जा तत्क्षण पीछे मुड़ जाएगी। हो सकता है शारीरिक रुग्ण्ता हाथ लगे। फिर आपको वैसी अनुभूति कभी नहीं होगी। हो सकता है आपका यह जन्म व्यर्थ चला जाए। आगे का जन्म नकारात्मकता से घिर कर राक्षस में हो जाए। यह मार्ग समर्पण का है। श्रद्धा का है। फिर गुरु ही वायुयान पर सवार करा कर आपको परमात्मा की गोद में डाल देगा। अतएव साधक गण इस पथ पर पैर रखने के पहले ही तर्क-वितर्क से शंका-संदेह से अपने को मुक्त कर लें। जैसे पति-पत्नी शादी के पहले ही जो जानना है, जान ले। बाद में जानना दोनों के लिए खतरा है। दाम्पत्य जीवन में विष घोलना है। भक्ति पथ है श्रद्धा का। समर्पण का। सकारात्मक तार ही भक्ति रूपी ऊर्जा के प्रवाह में समर्थ होता है।

भक्ति से भक्त विनम्र होता है। ज्ञान से अभिमानी होता है। भक्त सिर्फ गुरु-गोविन्द की सेवा से आनन्दित होता है। ज्ञानी कर्मफल एवं मोक्ष प्राप्त करना चाहता है। ज्ञानी अपनी विद्वता, क्षमता का प्रदर्शन करता है। यश-प्रतिष्ठा ही उसका भोजन होता है। भक्त सेवा, सहिष्णुता, अकिंचन को ही प्राप्त करता है। इसलिए इसे काम, अभिमान नहीं सताते हैं।

मैंने सुना है नर्मदा तट पर स्वामी परमानन्द जी ने एक सुन्दर आश्रम बनाया। जहाँ प्रतिदिन रामायण की कथा विद्वतापूर्ण ढंग से सुनाते थे। वे एक दिन शिष्यों के साथ तट पर टहल रहे थे। तभी देखा झुरमुट में दो व्यक्ति छिपे थे। स्वामी जी को संदेह हुआ कि ये चोर हैं। आश्रम में कुछ चुराना चाहते हैं। अपने शिष्यों से पकड़वाकर मंगवाए। वे जंगली लग रहे थे। शिष्यों ने कहा-स्वामी जी! ये प्रतिदिन राम कथा सुनने आते हैं। स्वामी जी राम कथा के सम्बन्ध में कुछ पूछे। वे दोनों मौन थे। स्वामी जी जोर से हँसते हुए बोले-तुम लोग भाग जाओ। कल भंडारा होगा, कथा भी होगी। उसी समय आना। दोनों अपमान की चिन्ता किए बिना सहज भाव से चले गए। स्वामी जी ठहाका मारकर हँसे। अपने शिष्यों से कहा तुम्हें सही-गलत की समझ नहीं है। राम कथा समझना बहुत ज्ञानी के लिए ही सम्भव है।

स्वामी जी टहलते हुए आगे बढ़े तो देखते हैं, एक छोटा सा बालक तट पर बालू का गड्ढा बनाकर अपनी अंगुली से नदी का पानी डाल रहा है। स्वामी जी ने कहा- क्या कर रहे हो भाई!

वह बालक बोला- मैं नदी का सारा पानी अपने गड्ढे में भरना चाहता हूँ। सभी शिष्य हँस दिए। वह बालक बोला- स्वामी जी भी तो सारा ज्ञान अपने मस्तिष्क में भरना चाहते हैं। स्वामी जी नतमस्तक हो गए।

दूसरे दिन आश्रम में वृहद् भंडारा एवं संत समागम का आयोजन था। स्वामी जी का प्रवचन भी होने वाला था। लेकिन रात्रि में भयंकर वर्षा हो गई। नदी का पुल बह गया। सभी मार्ग टूट गए। स्वामी जी निराश होकर आश्रम की खिड़की से पानी का बहाव देख रहे थे। उसी में गिरते-पड़ते दो व्यक्ति आश्रम की ओर चले आ रहे थे। वे दोनों आश्रम में आकर एक कोने में वृक्ष के नीचे दुबक कर बैठ गए।

स्वामी जी धीरे-धीरे दोनों भक्तों के पास पहुँचे, दोनों विनम्र भाव से खड़े होकर स्वामी जी को प्रणाम किए। स्वामी जी ने पहचाना कि ये दोनों वही रामभक्त हैं, जिन्हें कल अपमानित किया था| आज राम कथा सुनने उफनती नदी पार कर आश्रम में पहुँच गए थे।

स्वामी जी की दृष्टि अचानक बदल गई। वे देखते हैं कि ये दोनों राम-लक्ष्मण के दिव्य रूप में खड़े हैं। स्वामी जी साष्टांग प्रणाम कर अपना सिर उनके पैरों पर रख दिए। भाव की गंगा प्रवाहित हो गई जिसमें ज्ञान-अभिमान बह गया। स्वामी जी की तीसरी आँख खुल गई।

यही कारण है कि मूर्ख (निःपढ़) लोग गुरु पर अपार श्रद्धा रखते हैं। वे शीघ्र ही परम पद को प्राप्त कर लेते हैं। जबकि विद्वान व्यक्ति अपने शास्त्रों के शब्द जाल में फँसकर अहंकार इकठ्ठा कर लेते हैं। समाज में मान प्रतिष्ठा प्राप्त कर तर्क-वितर्क में जीवन बर्बाद कर देते हैं। भक्ति हाथ से निकल जाती है। दोनों के लिए खतरा है। दाम्पत्य जीवन में हलाहल घोलना है। भक्ति पथ ही है श्रद्धा का। समर्पण का। सकारात्मक तार पर ही विद्युत का प्रवाह सम्भव है।

मंत्र का तीसरा चरण है-‘उर्वारूकमिव बन्धानन्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्’ अर्थात् हे त्रयम्बकं! हमें मृत्यु के बंधन से पके हुए खरबूजे की भाँति छुड़ाओ।

साधक ने पहले चरण में यश, बल की वृद्धि की कामना की। वही अब बार-बार के जन्म-मृत्यु के बंधन से छुटकारा चाहता है। जन्म एवं मृत्यु के दुःखों से ऊब गया है। जैसे ही तीसरा नेत्र खुलता है, साधक अपने पूर्व के सैकड़ों जन्मों को चलचित्र की तरह देख लेता है। वह देखता है प्रत्येक जन्म में एक ही काम किया। पढ़ा, लिखा, शादी किया, बच्चा पैदा किया, घर मकान बनाया। मकड़जाल में फँसकर मर गया। इसी कार्य को जाने-अनजाने करता रहा। इस दृश्य को देखकर साधक पश्चाताप करता है। बार-बार के जन्म-मृत्यु के दुःख से मुक्ति की कामना करता है।

यह ध्यान में रखना होगा कि बिना यश-बल के प्रभु के द्वार तक पहुँचना असम्भव है। यश-बल के आसन पर बैठकर ही निरहंकार हो सकते हैं। पाकर छोड़ना ही श्रेष्ठ है। जब कुछ है ही नहीं, तो क्या छोड़ेंगे। यही कारण है कि ऋषि कहते हैं बड़े-बड़े ऋषि, मुनि, वेदज्ञ, चक्रवर्ती सम्राट तक मृत्यु के पाश से नहीं बच सके। हममें शक्ति ही कहाँ है कि मृत्यु के बंधन से बच सकें। अतएव मुझे यश, बल प्रदान करें, हे प्रभु! जिससे गुरु की कृपा का पात्र बन सकूँ। चूंकि आप कहते हैं-‘मोक्ष मूलं गुरुकृपा|’ गुरु कृपा होते ही मृत्यु के बंधन से छूट जाऊँगा।

उर्वारुक अर्थात् पके हुए खरबूजे की भाँति। जब खरबूज पक जाता है तब वह अपने बेल से स्वयं अलग होता है। कृषक उसे बिना परिश्रम के उठा लेता है। उस खरबूजे में हजारों खरबूजे की बेल पैदा करने की क्षमता होती है। उसी तरह भक्त कामना करता है कि हममें भी वही शक्ति आ जाए। पूर्णत्व को उपलब्ध हो जाऊँ। फिर यह शरीर रूपी वृक्ष या वस्त्र स्वतः छूट जाएगा। मैं इसके बंधन से मुक्त हो जाऊँगा। फिर हमें शरीर बाँध नहीं सकता है। मुक्त हो जाऊँगा। परन्तु जब तक कच्चा खरबूजा रहता है, बेल से अटूट सम्बन्ध बना रहता है। उसे हाथ से ऐंठकर तोड़ना पड़ता है। उसे कष्ट होता है। पीड़ा होती है। वह रोता है। वह खरबूज किसी कार्य में भी नहीं आता है। उसे सड़ना पड़ता है। उसका जन्म नाहक दुःखी होकर तड़प-तड़प कर चला जाता है। यह सब दृश्य साधक देख चुका है। अतः उसकी कामना है कि तीसरे नेत्र के खुलते ही यश-बल की वृद्धि होगी। फिर आपकी कृपा का पात्र बन जाऊँगा। गुरु की अनुकम्पा की वर्षा होगी। बहुत योनियों में भटकने से बच जाऊँगा। मृत्यु के बंधन से छूट जाऊँगा। परन्तु अमृतत्त्व अर्थात् अमरता से नहीं। अमरता भी बंधन है। दुःख का कारण है। जो अमर हैं, वे अमरता से ऊब गए हैं। परन्तु अमरता से बंध गए हैं। साधक कहता है अब कृपा करो इस बंधन से छुड़ाकर मोक्ष को प्राप्त कराओ।

यह सूत्र शरीर रूपी बंधन से मुक्ति चाहता है। परन्तु इसी शरीर में तीसरे नेत्र को उपलब्ध होकर, यश-शक्ति को प्राप्त कर।

हम किसी भी शब्द का प्रयोग अपनी इच्छा पूर्ति हेतु करने को अभ्यस्त हैं। खासकर कर्मकाण्डियों ने लोभ वश प्रत्येक चीज को कर्मकाण्ड में ही रख दिया है। यजमान भी बर्हिमुख हो गया। धन के अहंकारवश धर्म के प्रत्येक कार्य को ठेके पर देना उचित समझता है। अपने में स्वतंत्र होकर मन-मानी करता है।

मैंने एक कहानी सुनी है। एक राजा के तीन पुत्र थे। वह अपना उत्तराधिकार सौंपकर संन्यास लेना चाहता था। अतएव एक दिन अपने तीनों पुत्रों को बुलाकर अपना निर्णय सुना दिया। तीनों को एक-एक अशर्फी दी और कहा कि शाम तक जो एक अशर्फी में अपने कमरे को भर देगा, उसे राजगद्दी सौंप दूंगा।

राजा शाम होते ही अपने मंत्रीगण के साथ सबसे पहले बडे़ पुत्र के कक्ष में गए चूंकि पिता की ममता बड़े पर ज्यादा होती है। वहाँ उसने देखा कि गोबर, कूड़े-विष्ठा से घर भर दिया है। तीव्र दुर्गंध फ़ैल  रही थी। राजा भागकर बाहर आ गया। उसने बड़े राजकुमार से पूछा-यह क्या मूर्खता है?

राजकुमार ने भी कड़े शब्दों में उत्तर दिया- पिताजी, मूर्ख मैं या आप! एक अशर्फी में और क्या कर सकता हूँ?

राजा सबसे छोटे तीसरे पुत्र के महल में गए चूंकि पिता का मोह बड़े पुत्र पर होता है। माता का छोटे पर। बीच का पुत्र तो किसी का नहीं होता। चूंकि शास्त्र भी कहता है बड़ा पुत्र पिता की मुखाग्नि करता है छोटा माता का। बीच का पुत्र तो समाज सेवा के लिए, साधु-संत बनने के लिए आता है। इसी आधार पर ऋचिक ऋषि ने अपने बीच के पुत्र शुनःशेष को बलि देने हेतु राजा हरिश्चन्द्र-वशिष्ठ को बेच दिया था। राजा ने देखा उसका कमरा खाली था। हाथ पर हाथ धरे बैठा था। माँ से कह रहा था कि तुम्हीं बताओ माँ, इस एक अशर्फी में क्या करूँ! पिताजी राजा होकर भी महान कृपण हैं।

राजा ने पूछा कि तुमने अशर्फी का क्या किया? उसने बताया कि वह समझ नहीं पा रहा है कि एक अशर्फी का क्या करे? इसलिए माँ से सलाह ले रहा था। इसके पूर्व धन जुटाने के लिए जुआ घर गया। जुआ खेला| पहले तो वह जीतता गया, लेकिन अंत में सभी कुछ लुटा बैठा। राजा सिर पीटकर वापस राजमहल लौटने लगा। मंत्री ने कहा- राजन्! मध्य वाले पुत्र के कमरे पर भी चलें। राजा ने कहा कि उत्तराधिकारी या तो बड़ा पुत्र हो या छोटा हो, यही नियम है। मंझला पुत्र तो साधुता के लिए है। वह साधु स्वभाव का है भी। उसे राज-पाट से क्या सम्बन्ध। मंत्रीगण ने कहा- राजन्! वह भी आपका ही पुत्र है। उसे भी आपने एक अशर्फी दी है। अतएव उसका कमरा भी निरीक्षण करना उचित है।

राजा बेमन से उसके कमरे पर भी गए। उसने राजा को देख साष्टांग प्रणाम किया। राजा की उदासी समाप्त हो गई। उन्होंने देखा कमरे में चारों तरफ घी के दीए जल रहे थे। साथ ही कमरे का कोना-कोना इत्र से महक रहा था। राजा सहसा प्रसन्नता से मझले पुत्र को अंक में भरकर नाचने लगा।

राजा ने मझले पुत्र का राज्याभिषेक कर समझाते हुए कहा, ‘किसी भी साधन का सदुपयोग करने की क्षमता और समझ होनी चाहिए। समय, साधन और शक्ति हर किसी को मिलती है, पर हर व्यक्ति उसका सदुपयोग नहीं कर पाता। अक्सर लोग उसे नष्ट कर डालते हैं। जो इनका सदुपयोग करते हैं, उन्हीं का जीवन सार्थक होता है।’

हमारे ऋषिगण वेदों में, पुराणों में, उपनिषदों में जीवन की गुत्थियों को खोलने के लिए तमाम सूत्र दे दिए हैं। उनसे हम अपनी समस्या का समाधान न करके, उसका जाप करते हैं। पाठ करते हैं। हवन करते हैं। उसे क्रिया-कर्मकाण्ड में डालकर उलझा दिए हैं। स्वयं भी बुरी तरह उलझ गए हैं। कभी-कभी समय के सद्गुरु आते हैं जो तमाम गुत्थियों को सुलझा देते हैं। परन्तु हम लकीर के फकीर लोग उनकी नहीं सुनते हैं। परम्परा की लकीर पर चलने के अभ्यस्त हो गए हैं। जब एक समय के सद्गुरु को चूक जाते हैं तब हमारे हजारों जन्म बर्बाद चले जाते हैं।

 

||हरि ॐ||

 

समय के सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज की अनमोल कृति शिव नेत्र से उद्धृत | 

 

‘समय के सदगुरु’ स्वामी  कृष्णानंद  जी महाराज

आप सद्विप्र समाज की रचना कर विश्व जनमानस को कल्याण मूलक सन्देश दे रहे हैं| सद्विप्र समाज सेवा एक आध्यात्मिक संस्था है, जो आपके निर्देशन में जीवन के सच्चे मर्म को उजागर कर शाश्वत शांति की ओर समाज को अग्रगति प्रदान करती है| आपने दिव्य गुप्त विज्ञान का अन्वेषण किया है, जिससे साधक शीघ्र ही साधना की ऊँचाई पर पहुँच सकता है| संसार की कठिनाई का सहजता से समाधान कर सकता है|

स्वामी जी के प्रवचन यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध हैं –

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तीसरा नेत्र खोलने का सूत्र-महामृत्युंजय

तीसरा नेत्र खोलने का सूत्र-महामृत्युंजय

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28 Jul 202423 min read

Published in spiritualism

तीसरा नेत्र खोलने का सूत्र-महामृत्युंजय

भारतीय ऋषि ज्ञान-विज्ञान के सारे सूत्र वेद-पुराणों में छिपा दिए हैं। जैसे किसी राज महल के सभी कक्षों का वर्णन कर दिया जाए। किस कक्ष में क्या है। उस कक्ष का द्वार किधर है? कैसा है? सभी कुछ का वर्णन कर दिया गया है। परन्तु पात्र के अभाव में मुख्य द्वार का दरवाजा बन्द कर ताला लगा दिया गया एवं उसकी चाभी प्रकृति को सौंप दी गई। जैसे किसी सद्गुरु का आगमन इस धरती पर होता है, प्रकृति उचित समय पर चाभी उन्हें प्रदान कर देती है। मुख्य द्वार की तरफ इशारा कर देती है। वह सद्गुरु आराम से ताला खोलता है एवं उस महल में प्रवेश करता है। महल के आँगन में जाता है। आँगन में महल के मालिक, महल-पति अर्थात् सम्राट से मिल जाता है।

हमारा शरीर भी एक महल है। जिसमें दस दरवाजे हैं। यह महल सृष्टि का सबसे बड़ा महल है। चैतन्य है। रथ पर यात्रा कर एक स्थान से दूसरे स्थान जाता रहता है। शरीर ही रथ है। आत्मा ही रथी है। पाँच ज्ञानेन्द्रियां- नासिका, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, कर्ण एवं पांच कर्मेन्द्रिय-पांव, उपस्थ, मुख, गुदा, हाथ- ये दस घोड़े हैं। मन सारथी है। मन रूपी सारथी शराब के नशे में घोड़ों को चलाता है तब निश्चित रूप से महल को ध्वस्त कर देगा। ऋग्वेद 10/22/8 में कहा है-‘अकर्मा दस्युरभि नो अमंतुरन्यव्रतो अमानुषः।’ अर्थात् ‘मनुष्यों में दस्यु (चोर) वह होता है जो पुरुषार्थ प्रयत्न नहीं करता, सुविचार नहीं करता, दूसरे ही कार्य करता रहता है। उन्नति के कार्यों को छोड़ देता है। जो मनुष्यत्व के अयोग्य कुत्सित कार्य करता रहता है|’ दस्यु के लक्षण चार हैंः-(1) आलस्य, (2) अविचार, (3) कुकर्म, (4) अमानुष, क्रूर-कर्म। आज के संसार में घूसखोरी एवं विकास के मद के धन को खा जाने से ज्यादा कुकर्म एवं अमानुष कार्य कुछ भी नहीं है। इन्हीं का परिणाम है समाज की अराजकता। यदि घूसखोरी न हो, विकास कार्य ठीक से हो तो यह पृथ्वी स्वर्ग हो जाएगी। यह दानव समग्र निरीह प्राणी को उदरस्थ करना चाहता है।

हमारे तथा कथित विद्वान व्यक्ति भी इन ऋचाओं का मात्र पाठ कर लेते हैं। पाठ या जाप करने से कुछ भी नहीं होता है। जैसे धन-धन कहने से हम धनिक नहीं होंगे, न जल-जल कहने से प्यास मिटेगी। इसी तरह से मन को संकल्पवान बनाने के लिए-‘मे मनः शिवसंकल्पमस्तु|’ जाप कर लेने से मन संकल्पवान नहीं होगा। मन को शिव की तरह संकल्पवान बनाने की विधि को जानना ही होगा। गुरु नानक देव कहते हैं कि ‘सिर पर पूड़ियों का सौ मन भार लेकर चलने से भूख नहीं मिट सकती|’

मेरा परिवार साधु संतों का परिवार रहा है। अतएव विशेष संत महिमा एवं गुरु महिमा बचपन से ही सुनने को मिली। कर्मकाण्ड करने के लिए पंडित जी एवं कुलगुरु भी समय-समय पर आते रहे। जब कोई बीमार पड़ता, असाध्य रोग होता तब पंडित जी-महामृत्युंजय के जाप की सलाह देते एवं यजमान से संकल्प लेकर शिव मंदिर में जाप करते थे।

मेरी माँ को असाध्य रोग हो गया। पंडित जी एक लाख महामृत्युंजय का जाप किए। विधिवत-दानादि के साथ हवन हुआ। उसके चार दिन बाद माताश्री की मृत्यु हो गई। फिर वही कुल पुरोहित एवं कुलगुरु मृत्यु संस्कार सम्पन्न कराए। स्वर्गारोहण की विधि की गई। इस तरह मैंने लगभग एक सौ व्यक्तियों पर यह प्रयोग किया| जो असाध्य बीमारी या साधारण बीमारी से भी ग्रस्त है, उन्हें महामृत्युंजय जाप करने को कहा, वे जाप के मध्य में या पूर्णाहुति के बाद या एक-दो माह बाद मृत्यु को प्राप्त हो गए। एक सौ में मात्र पाँच व्यक्ति बचे हैं। जो इस मंत्र की महिमा का गुणगान करते फिरते हैं।

अभी फरवरी 2008 में वाराणसी के दो व्यक्तियों को काशी विश्वनाथ मंदिर में जाप करने हेतु कहा था। झारखण्ड के दो उच्च अधिकारी एवं एक भी.सी. बिहार के दो व्यक्तियों को जाप करने हेतु कहा, इन सभी की मृत्यु हो गई। अब मेरे शिष्य जान गए हैं। जिसे इस मंत्र का जाप करने को कहता, वे उन्हें इशारा कर देते।

इसका अर्थ उल्टा न समझें। शिव मृत्यु के देवता हैं। श्मशान भूमि ही इनका निवास है। इसी कारण योगी लोग श्मशान पर रहते हैं। मृत्यु को साकार करते हैं। जो भी साधक मृत्यु को साकार करता है वह मृत्यु से मुक्त हो जाता है। अर्थात् इस शरीर रूपी घर को जब चाहे वस्त्र की तरह त्याग कर सकता है।

इस पृथ्वी पर मात्र भारत ही ऐसा देश है, जहाँ मृत्यु की तकनीक दी गई है। पूर्व जन्म को देखने एवं भविष्य के सम्भावित जन्म को इच्छा के अनुरूप करने की तकनीक दी गई है। इतनी वृहद् खोज विश्व में कहीं भी नहीं की गई है। जो भी साधक मृत्यु को देख लेता है, उसका तीसरा नेत्र खुल जाता है। जन्म-मृत्यु से मुक्त हो जाता है। वह स्वेच्छा से अवतरित होता है। अन्तर्ध्यान होता है। अपने संकल्पानुसार इस धरती पर रहकर कार्य सम्पादन करता है।

मृत्यु का वृहद ग्रंथ है-श्रीमद्भागवत पुराण। इसका प्रारम्भ ही होता है- राजा परीक्षित मृत्यु को उपलब्ध होना चाहते हैं। पृथ्वी से सभी ऋषियों को, साधुओं को आमंत्रित करते हैं जो उन्हें महा-मृत्यु को उपलब्ध करा सकें। सभी पीछे हट गए। अल्पवय शुकदेव मुनि का आगमन होता है। जो राजा जनक को गुरु बनाकर ब्रह्म का साक्षात्कार कर लिए हैं। श्रीमद्भागवत् ग्रंथ के रचयिता श्री वेद व्यास जी स्वयं तैयार नहीं हुए। श्री शुकदेव मुनि सात दिन में परीक्षित को क्रमशः एक-एक चक्रों की यात्रा कराते सहस्रार में पहुँचा देते हैं। जहाँ परीक्षित निर्विकल्प समाधि को उपलब्ध हो जाते हैं। दशम् द्वार से शरीर को वस्त्र की तरह छोड़कर निकल जाते हैं।

परीक्षित नाम है। जिसका अर्थ है-उनकी हर क्षेत्र से परीक्षा ले ली गई है। ब्रह्म के अवतरण के लिए उचित पात्र है। वेद व्यास ने लिखा है कि परीक्षित धर्मराज युधिष्ठिर की तरह सत्यवादी हैं। अर्जुन की तरह धनुर्वेद के ज्ञाता हैं। भीम की तरह शक्तिशाली हैं। नकुल की तरह ज्योतिषी हैं। सहदेव की तरह नीतिज्ञ हैं। सबसे बड़ी विशेषता यह है कि भगवान कृष्ण की तरह धीर-गम्भीर एवं धर्मज्ञ हैं। एक ही व्यक्ति पाँच पाण्डवों एवं छठा भगवान कृष्ण के गुण से भी पूर्ण है। वह व्यक्ति जो जन्मजात सिद्ध है, किसी पूर्ण की उपस्थिति मात्र से उसकी कुण्डलिनी यात्रा प्रारम्भ कर देगी। उसके लिए सात दिन बहुत हैं।

श्रीमद्भागवद पुराण के महात्म्य में भी धुंधकारी की कथा आई है। आत्मदेव नामक ब्राह्मण अपने तप के प्रभाव से दूसरे सूर्य की तरह तप रहे हैं। परन्तु कर्मकाण्ड अपनाए हैं। कर्मकाण्ड से बहुत धन अर्जन किए हैं। जिसे परोपकार में खर्च न करके अपने उपभोग में लगाना चाहते हैं। तुंगभद्र नदी के  तट पर बसे हैं। तुंग अर्थात् शीघ्र, भद्र अर्थात् मुक्ति। वे शीघ्र मुक्ति भी चाहते हैं। धर्म में अत्यन्त धैर्य रखना होता है। उनकी पत्नी है-धुंधली। अर्थात् उनके बुद्धि-विवेक पर घोर कुहरा (अंधेरा) छा गया है। इसी से पुत्र की कामना से आत्महत्या करना चाहते हैं। जंगल में उन्हें एक संन्यासी मिलता है जो उन्हें आत्म हत्या से रोकता है। उससे राजा परीक्षित की तरह मुक्ति माँग सकते थे। परन्तु धुंधली बुद्धि के कारण पुत्र माँगते हैं। पुत्र जो उनके द्वारा अर्जित धन का भोग कर सके। संन्यासी बहुत समझाता है परन्तु आत्मदेव पुत्र माँगते हैं। संन्यासी एक फल देता है। कहता है, इसे अपनी पत्नी को खिला देना। पंडित आत्मदेव अपनी पत्नी को फल दे देते हैं। परन्तु वह आधुनिक शिक्षा प्राप्त औरत थी। पुराण का अर्थ है-पुराना, परन्तु न अर्थात् उतना ही नया। यह जितना सत्य पाँच हजार वर्ष पूर्व था उतना ही आज भी सत्य है। उस काल में भी वह आज के पश्चिम की लड़की की तरह गर्भ खरीदती है। फल को गाय को खिला देती है। अपने को पुत्र होने वाली प्रसव पीड़ा से बचा लेती है। अपनी शारीरिक सुन्दरता को कायम रखती है।

समयानुसार उसकी बहन से पुत्र होता है। उसका नाम धुंधकारी रखा जाता है। धुंधकारी अर्थात् जाड़े के दिन में गहन धुंध पड़ने पर अपना ही हाथ नहीं दिखाई देता है। उस समय बस, गाड़ियाँ बहुत एक्सीडेंट करती हैं। उसी तरह धुंधकारी भी विनाश करने लगा। माँ को प्रेत योनि तक पहुँचा दिया। पिता की भी वही गति हुई। अन्त में वेश्याएँ धुंधकारी को भी हाथ-पैर बाँधकर कुएँ में फेंक दीं। अर्थात् आत्मदेव पंडित का पुत्र माता-पिता को प्रेत बनाकर, धन का भोग कर स्वयं भी प्रेत योनि में चला गया।

गाय का पुत्र, गोकर्ण इनकी मुक्ति के लिए सात पोर का बांस रखकर धुंधकारी को उसमें आमंत्रित कर श्रीमद्भागवत की कथा कहते हैं। सातवें दिन धुंधकारी सूक्ष्म दिव्य शरीर धारण कर बैकुंठ की यात्रा करते हैं।

श्रीमद्भागवत एक शब्द में मृत्यु की कथा है। मृत्यु की तकनीक है। परन्तु दुःखद बात यह है कि कथा वाचक इसे नाच-गान के साथ गाँव-गाँव, घर-घर सुनाते हैं। श्रोता के लिए यह कथा अहंकार पूर्ण धर्म की चादर है। कथा वाचक के लिए तमसपूर्ण व्यापार बन गया है। जहाँ कथा होती है वहाँ अकाल मृत्यु अवश्य होगी। यदि अकाल मृत्यु नहीं हुई तो श्रोता या वक्ता की लड़की भाग जाती है। या चलता व्यापार बंद हो जाता है। कोई न कोई आफत जरूर आ जाएगी। इस कथा में वक्ता भगवान कृष्ण का जन्म, कृष्ण की शादी ऐसे प्रसंग पर ज्यादा जोर देते हैं। जिससे उन्हें भरपूर दान मिले।

मेरे एक मित्र थे नारायण स्वामी। वे श्रीमद्भागवत के बहुत बड़े विद्वान थे। पूरे वर्ष देश में घूम-घूम कर कथा करते थे। उनके सामने उनके लड़का, नाती, पत्नी की मृत्यु हुई। इसी वर्ष फरवरी 08 में उनकी भी अकाल मृत्यु हुई। उनके यहाँ देश के शीर्ष कथावाचक मुरारी जी बापू कथा सुना रहे थे। श्रोता भी मेरे मित्र ही थे, तीसरे दिन उन्हें गोली मार दी गई। आप लोग अपने आस-पास इसका अवलोकन करें। राम नाम सत्य है। परन्तु किसी की शादी में कहेंगे तो आपको लोग बिना मारे नहीं छोड़ेंगे।

भारतीय ऋषि मृत्यु को साकार करने हेतु परीक्षित जैसे व्यक्ति के लिए ये तकनीक खोजे हैं। परन्तु बच्चे के हाथ में बंदूक पड़ जाने पर किसी की हत्या कर सकता है। विवेकशील व्यक्ति के हाथ में बंदूक रहने पर रक्षा करती है। वैष्णव ऋषियों ने मृत्यु की कला सीखने हेतु श्रीमद्भागवत ग्रंथ का अनुसंधान किया जो सर्वोत्कृष्ट है। विश्व की अनुपम उपलब्धि है। परन्तु सुकदेव एवं गोकर्ण के हाथ से निकल कर आत्मदेव एवं धुंधकारी के हाथ में चली गयी है। इसका परिणाम है आज का समाज।

इसी तरह महामृत्युंजय शैव साधकों की अनुपम खोज है। जो साधक का तीसरा नेत्र खोलती है। जिससे वह सृष्टि के मृत्यु के देवता को साकार करता है। मृत्यु भी देव है।

अब विचार करें महामृत्युंजय सूत्र पर जिस सूत्र से जन्मों-जन्म के रहस्य स्वतः खुल जाते हैं।

ॐ त्रयम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।

उर्वारूकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्।।

यह यजुर्वेद 3/60 का छंद है। गायत्री छंद ऋग्वेद का है। जो निर्गुण निराकार परमात्मा की प्रार्थना है। जिससे सृष्टि का रहस्य खुलता है।

‘त्रयम्बकं यजामहे’ यह शब्द ही अत्यन्त विस्फोटक है। आपके तीसरे नेत्र की तरफ इशारा करता है। E= mc2 यह सूत्र इशारा ही करता है। जिससे वैज्ञानिक विश्व में क्रान्ति कर दिए। विश्व के तमाम आणविक विकास के पीछे इस सूत्र का हाथ है। हम इसे गंगा के तट पर माला लेकर जपते रहे। इससे न हममें क्रान्ति आएगी न ही इस संसार में। ऋषि भी महान वैज्ञानिक थे। अपने महान अनुसंधान को वेद की ऋचाओं में, पुराण के श्लोकों में छिपा दिए। आने वाले समय में उचित पात्र उसे खोज लेगा।

‘त्रयम्बकं यजामहे’ अर्थात् हम तीन नेत्र वाले की पूजा करते हैं। कौन है तीन नेत्र वाला? सभी एक साथ कहेंगे-भगवान शिव। भगवान शिव प्रतीक हैं। हम सभी तीन नेत्र वाले हैं। जहाँ हमारा तीसरा नेत्र है, वहीं शिव लिंग ज्योर्तिमय है। इसे ‘दिव्य गुप्त विज्ञान’ में दिखाया जाता है। जब तक हमारा तीसरा नेत्र नहीं खुलता तब तक हम समाधि में प्रवेश नहीं करते। ये दोनों नेत्र बाहर का दृश्य देखते हैं। जैसे ही साधना के द्वारा इन दोनों नेत्रों की शक्ति को एक साथ आज्ञा चक्र की तरफ प्रवाहित करते हैं वैसे ही कुण्डलिनी शक्ति पर दबाव पड़ता है। वह जाग उठती है। अति शीघ्र गति से शिव लिंग से आकर लिपट जाती है। साधक का तीसरा नेत्र खुल जाता है। सूक्ष्म सृष्टि या रहस्यमय लोक से पर्दा हट जाता है। सभी अदृश्य दृश्य हो जाता है।

गुरु शब्दों से सत्य पर प्रकाश डालने की कोशिश करता है। परन्तु जो क्रिया द्वारा, प्रयोग द्वारा शिष्यों पर सत्य का अवतरण कराता है, जिसे वह अनुभव कर सकता है। वाणी मौन हो जाती है। अभिव्यक्ति करने में असमर्थ हो जाता है। वही सद्गुरु है।

सद्गुरु की अनुकम्पा का प्रसाद है तीसरा नेत्र। ज्ञान का नेत्र। दिव्यता का नेत्र। परमात्मा हमें बाहर से ही नहीं अपितु भीतर से भी देखता है। वह बहिर्दर्शी के साथ अन्तर्दर्शी भी हे। इसी से वह ‘त्रयम्बकं’ है। तीनों लोकों को एक साथ देखने से भी वह त्रयम्बकं है। वह पृथ्वी, अंतरिक्ष (रहस्यमय लोक) द्यौ तीनों लोकों में व्याप्त है। वह आधारभूत सत्य का, ऋतु का, प्रकृति के शाश्वत नियमों का केन्द्र बिन्दु है। वह सभी रहस्यों का रहस्य भी है। वह हमारे प्रत्येक कार्यों को देख रहा है। हमारे मन-मस्तिष्क के अन्दर उठने वाले विचारों को भी देख रहा है। वह ‘ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्|’ जगत के कण-कण में व्याप्त है। इसी से त्रयम्बकं है। जैसे ही हमारा तीसरा नेत्र खुलता है जगत का रहस्य खुल जाता है। हम अपने परमपिता परमात्मा से जुड़ जाते हैं। अपने पिता के राज्य के उत्तराधिकारी हो जाते हैं। हम त्रयम्बकं हो जाते हैं। बिना त्रयम्बकं हुए पागल की तरह पागलखाने में ही रहने को विवश हैं। यह सूत्र त्रयम्बकं बनने का आह्वान करता है। हमारे तीसरे नेत्र को खोलने के लिए उत्सुक है।

इस सूत्र का दूसरा शब्द है-‘सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्’ अर्थात् हम यश (सुगंधि) कीर्ति, शक्ति (पुष्टि) की वृद्धि के लिए उस त्रयम्बकं का सुमिरण (पूजा) करते हैं। जैसे ही हमारा तीसरा नेत्र खुलता है, हमारे जीवन में एक साथ यश (सुगन्धि)और शक्ति की वृद्धि होती है। अन्यथा यश बढ़ेगा तो शक्ति नहीं, शक्ति बढ़ेगी तो हम राक्षस भी बन सकते हैं। इसकी ज्यादा सम्भावना है। शक्ति की पूजा तभी होती है, जब माँ दुर्गा के रूप में मातृत्व से, करुणा से भरी हो। तीसरे नेत्र के खुलते ही हम सुगंधि के, देवत्व के मार्ग पर चल देते हैं। जहाँ परम पिता परमात्मा अपने जन्मों जन्म से बिछुड़े पुत्र को अंक में भरने के लिए इंतजार कर रहा है। बूंद समुद्र में मिलकर समुद्र हो जाएगी।

मनुष्य के जन्मों जन्म का यही प्रयास सार्थक रहा है कि तीसरा नेत्र खुल जाए। जब साधक समय के सद्गुरु से दीक्षा लेता है, तब उसके तीसरे नेत्र पर ही दिव्यास्त्र का प्रहार करते हैं। जिससे साधक का परम लघु मंत्र-जाप सफल होता है। ध्यान करते समय अजपा-अनाहद चलता रहता है। श्रद्धा रूपी जल से सिंचित होता रहता है। साधक के प्रत्येक सेल से ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन प्रारम्भ हो जाता है। वह ऊर्जा एक सेल से दूसरे सेल में लपट की तरह फ़ैलने लगती है। कुछ ही दिन में सम्पूर्ण सेल एक ऊर्जा का क्षेत्र बन जाता है। जो तीसरे नेत्र पर धक्का मारता है। फिर वहाँ आणविक विस्फोट होता है। तीसरा नेत्र खुल जाता है। फिर आप परम सत्ता से जुड़ जाते हैं। परन्तु इस साधना के क्रम में भूलकर भी यदि गुरु के प्रति संदेह पैदा होता है, तब वही ऊर्जा तत्क्षण पीछे मुड़ जाएगी। हो सकता है शारीरिक रुग्ण्ता हाथ लगे। फिर आपको वैसी अनुभूति कभी नहीं होगी। हो सकता है आपका यह जन्म व्यर्थ चला जाए। आगे का जन्म नकारात्मकता से घिर कर राक्षस में हो जाए। यह मार्ग समर्पण का है। श्रद्धा का है। फिर गुरु ही वायुयान पर सवार करा कर आपको परमात्मा की गोद में डाल देगा। अतएव साधक गण इस पथ पर पैर रखने के पहले ही तर्क-वितर्क से शंका-संदेह से अपने को मुक्त कर लें। जैसे पति-पत्नी शादी के पहले ही जो जानना है, जान ले। बाद में जानना दोनों के लिए खतरा है। दाम्पत्य जीवन में विष घोलना है। भक्ति पथ है श्रद्धा का। समर्पण का। सकारात्मक तार ही भक्ति रूपी ऊर्जा के प्रवाह में समर्थ होता है।

भक्ति से भक्त विनम्र होता है। ज्ञान से अभिमानी होता है। भक्त सिर्फ गुरु-गोविन्द की सेवा से आनन्दित होता है। ज्ञानी कर्मफल एवं मोक्ष प्राप्त करना चाहता है। ज्ञानी अपनी विद्वता, क्षमता का प्रदर्शन करता है। यश-प्रतिष्ठा ही उसका भोजन होता है। भक्त सेवा, सहिष्णुता, अकिंचन को ही प्राप्त करता है। इसलिए इसे काम, अभिमान नहीं सताते हैं।

मैंने सुना है नर्मदा तट पर स्वामी परमानन्द जी ने एक सुन्दर आश्रम बनाया। जहाँ प्रतिदिन रामायण की कथा विद्वतापूर्ण ढंग से सुनाते थे। वे एक दिन शिष्यों के साथ तट पर टहल रहे थे। तभी देखा झुरमुट में दो व्यक्ति छिपे थे। स्वामी जी को संदेह हुआ कि ये चोर हैं। आश्रम में कुछ चुराना चाहते हैं। अपने शिष्यों से पकड़वाकर मंगवाए। वे जंगली लग रहे थे। शिष्यों ने कहा-स्वामी जी! ये प्रतिदिन राम कथा सुनने आते हैं। स्वामी जी राम कथा के सम्बन्ध में कुछ पूछे। वे दोनों मौन थे। स्वामी जी जोर से हँसते हुए बोले-तुम लोग भाग जाओ। कल भंडारा होगा, कथा भी होगी। उसी समय आना। दोनों अपमान की चिन्ता किए बिना सहज भाव से चले गए। स्वामी जी ठहाका मारकर हँसे। अपने शिष्यों से कहा तुम्हें सही-गलत की समझ नहीं है। राम कथा समझना बहुत ज्ञानी के लिए ही सम्भव है।

स्वामी जी टहलते हुए आगे बढ़े तो देखते हैं, एक छोटा सा बालक तट पर बालू का गड्ढा बनाकर अपनी अंगुली से नदी का पानी डाल रहा है। स्वामी जी ने कहा- क्या कर रहे हो भाई!

वह बालक बोला- मैं नदी का सारा पानी अपने गड्ढे में भरना चाहता हूँ। सभी शिष्य हँस दिए। वह बालक बोला- स्वामी जी भी तो सारा ज्ञान अपने मस्तिष्क में भरना चाहते हैं। स्वामी जी नतमस्तक हो गए।

दूसरे दिन आश्रम में वृहद् भंडारा एवं संत समागम का आयोजन था। स्वामी जी का प्रवचन भी होने वाला था। लेकिन रात्रि में भयंकर वर्षा हो गई। नदी का पुल बह गया। सभी मार्ग टूट गए। स्वामी जी निराश होकर आश्रम की खिड़की से पानी का बहाव देख रहे थे। उसी में गिरते-पड़ते दो व्यक्ति आश्रम की ओर चले आ रहे थे। वे दोनों आश्रम में आकर एक कोने में वृक्ष के नीचे दुबक कर बैठ गए।

स्वामी जी धीरे-धीरे दोनों भक्तों के पास पहुँचे, दोनों विनम्र भाव से खड़े होकर स्वामी जी को प्रणाम किए। स्वामी जी ने पहचाना कि ये दोनों वही रामभक्त हैं, जिन्हें कल अपमानित किया था| आज राम कथा सुनने उफनती नदी पार कर आश्रम में पहुँच गए थे।

स्वामी जी की दृष्टि अचानक बदल गई। वे देखते हैं कि ये दोनों राम-लक्ष्मण के दिव्य रूप में खड़े हैं। स्वामी जी साष्टांग प्रणाम कर अपना सिर उनके पैरों पर रख दिए। भाव की गंगा प्रवाहित हो गई जिसमें ज्ञान-अभिमान बह गया। स्वामी जी की तीसरी आँख खुल गई।

यही कारण है कि मूर्ख (निःपढ़) लोग गुरु पर अपार श्रद्धा रखते हैं। वे शीघ्र ही परम पद को प्राप्त कर लेते हैं। जबकि विद्वान व्यक्ति अपने शास्त्रों के शब्द जाल में फँसकर अहंकार इकठ्ठा कर लेते हैं। समाज में मान प्रतिष्ठा प्राप्त कर तर्क-वितर्क में जीवन बर्बाद कर देते हैं। भक्ति हाथ से निकल जाती है। दोनों के लिए खतरा है। दाम्पत्य जीवन में हलाहल घोलना है। भक्ति पथ ही है श्रद्धा का। समर्पण का। सकारात्मक तार पर ही विद्युत का प्रवाह सम्भव है।

मंत्र का तीसरा चरण है-‘उर्वारूकमिव बन्धानन्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्’ अर्थात् हे त्रयम्बकं! हमें मृत्यु के बंधन से पके हुए खरबूजे की भाँति छुड़ाओ।

साधक ने पहले चरण में यश, बल की वृद्धि की कामना की। वही अब बार-बार के जन्म-मृत्यु के बंधन से छुटकारा चाहता है। जन्म एवं मृत्यु के दुःखों से ऊब गया है। जैसे ही तीसरा नेत्र खुलता है, साधक अपने पूर्व के सैकड़ों जन्मों को चलचित्र की तरह देख लेता है। वह देखता है प्रत्येक जन्म में एक ही काम किया। पढ़ा, लिखा, शादी किया, बच्चा पैदा किया, घर मकान बनाया। मकड़जाल में फँसकर मर गया। इसी कार्य को जाने-अनजाने करता रहा। इस दृश्य को देखकर साधक पश्चाताप करता है। बार-बार के जन्म-मृत्यु के दुःख से मुक्ति की कामना करता है।

यह ध्यान में रखना होगा कि बिना यश-बल के प्रभु के द्वार तक पहुँचना असम्भव है। यश-बल के आसन पर बैठकर ही निरहंकार हो सकते हैं। पाकर छोड़ना ही श्रेष्ठ है। जब कुछ है ही नहीं, तो क्या छोड़ेंगे। यही कारण है कि ऋषि कहते हैं बड़े-बड़े ऋषि, मुनि, वेदज्ञ, चक्रवर्ती सम्राट तक मृत्यु के पाश से नहीं बच सके। हममें शक्ति ही कहाँ है कि मृत्यु के बंधन से बच सकें। अतएव मुझे यश, बल प्रदान करें, हे प्रभु! जिससे गुरु की कृपा का पात्र बन सकूँ। चूंकि आप कहते हैं-‘मोक्ष मूलं गुरुकृपा|’ गुरु कृपा होते ही मृत्यु के बंधन से छूट जाऊँगा।

उर्वारुक अर्थात् पके हुए खरबूजे की भाँति। जब खरबूज पक जाता है तब वह अपने बेल से स्वयं अलग होता है। कृषक उसे बिना परिश्रम के उठा लेता है। उस खरबूजे में हजारों खरबूजे की बेल पैदा करने की क्षमता होती है। उसी तरह भक्त कामना करता है कि हममें भी वही शक्ति आ जाए। पूर्णत्व को उपलब्ध हो जाऊँ। फिर यह शरीर रूपी वृक्ष या वस्त्र स्वतः छूट जाएगा। मैं इसके बंधन से मुक्त हो जाऊँगा। फिर हमें शरीर बाँध नहीं सकता है। मुक्त हो जाऊँगा। परन्तु जब तक कच्चा खरबूजा रहता है, बेल से अटूट सम्बन्ध बना रहता है। उसे हाथ से ऐंठकर तोड़ना पड़ता है। उसे कष्ट होता है। पीड़ा होती है। वह रोता है। वह खरबूज किसी कार्य में भी नहीं आता है। उसे सड़ना पड़ता है। उसका जन्म नाहक दुःखी होकर तड़प-तड़प कर चला जाता है। यह सब दृश्य साधक देख चुका है। अतः उसकी कामना है कि तीसरे नेत्र के खुलते ही यश-बल की वृद्धि होगी। फिर आपकी कृपा का पात्र बन जाऊँगा। गुरु की अनुकम्पा की वर्षा होगी। बहुत योनियों में भटकने से बच जाऊँगा। मृत्यु के बंधन से छूट जाऊँगा। परन्तु अमृतत्त्व अर्थात् अमरता से नहीं। अमरता भी बंधन है। दुःख का कारण है। जो अमर हैं, वे अमरता से ऊब गए हैं। परन्तु अमरता से बंध गए हैं। साधक कहता है अब कृपा करो इस बंधन से छुड़ाकर मोक्ष को प्राप्त कराओ।

यह सूत्र शरीर रूपी बंधन से मुक्ति चाहता है। परन्तु इसी शरीर में तीसरे नेत्र को उपलब्ध होकर, यश-शक्ति को प्राप्त कर।

हम किसी भी शब्द का प्रयोग अपनी इच्छा पूर्ति हेतु करने को अभ्यस्त हैं। खासकर कर्मकाण्डियों ने लोभ वश प्रत्येक चीज को कर्मकाण्ड में ही रख दिया है। यजमान भी बर्हिमुख हो गया। धन के अहंकारवश धर्म के प्रत्येक कार्य को ठेके पर देना उचित समझता है। अपने में स्वतंत्र होकर मन-मानी करता है।

मैंने एक कहानी सुनी है। एक राजा के तीन पुत्र थे। वह अपना उत्तराधिकार सौंपकर संन्यास लेना चाहता था। अतएव एक दिन अपने तीनों पुत्रों को बुलाकर अपना निर्णय सुना दिया। तीनों को एक-एक अशर्फी दी और कहा कि शाम तक जो एक अशर्फी में अपने कमरे को भर देगा, उसे राजगद्दी सौंप दूंगा।

राजा शाम होते ही अपने मंत्रीगण के साथ सबसे पहले बडे़ पुत्र के कक्ष में गए चूंकि पिता की ममता बड़े पर ज्यादा होती है। वहाँ उसने देखा कि गोबर, कूड़े-विष्ठा से घर भर दिया है। तीव्र दुर्गंध फ़ैल  रही थी। राजा भागकर बाहर आ गया। उसने बड़े राजकुमार से पूछा-यह क्या मूर्खता है?

राजकुमार ने भी कड़े शब्दों में उत्तर दिया- पिताजी, मूर्ख मैं या आप! एक अशर्फी में और क्या कर सकता हूँ?

राजा सबसे छोटे तीसरे पुत्र के महल में गए चूंकि पिता का मोह बड़े पुत्र पर होता है। माता का छोटे पर। बीच का पुत्र तो किसी का नहीं होता। चूंकि शास्त्र भी कहता है बड़ा पुत्र पिता की मुखाग्नि करता है छोटा माता का। बीच का पुत्र तो समाज सेवा के लिए, साधु-संत बनने के लिए आता है। इसी आधार पर ऋचिक ऋषि ने अपने बीच के पुत्र शुनःशेष को बलि देने हेतु राजा हरिश्चन्द्र-वशिष्ठ को बेच दिया था। राजा ने देखा उसका कमरा खाली था। हाथ पर हाथ धरे बैठा था। माँ से कह रहा था कि तुम्हीं बताओ माँ, इस एक अशर्फी में क्या करूँ! पिताजी राजा होकर भी महान कृपण हैं।

राजा ने पूछा कि तुमने अशर्फी का क्या किया? उसने बताया कि वह समझ नहीं पा रहा है कि एक अशर्फी का क्या करे? इसलिए माँ से सलाह ले रहा था। इसके पूर्व धन जुटाने के लिए जुआ घर गया। जुआ खेला| पहले तो वह जीतता गया, लेकिन अंत में सभी कुछ लुटा बैठा। राजा सिर पीटकर वापस राजमहल लौटने लगा। मंत्री ने कहा- राजन्! मध्य वाले पुत्र के कमरे पर भी चलें। राजा ने कहा कि उत्तराधिकारी या तो बड़ा पुत्र हो या छोटा हो, यही नियम है। मंझला पुत्र तो साधुता के लिए है। वह साधु स्वभाव का है भी। उसे राज-पाट से क्या सम्बन्ध। मंत्रीगण ने कहा- राजन्! वह भी आपका ही पुत्र है। उसे भी आपने एक अशर्फी दी है। अतएव उसका कमरा भी निरीक्षण करना उचित है।

राजा बेमन से उसके कमरे पर भी गए। उसने राजा को देख साष्टांग प्रणाम किया। राजा की उदासी समाप्त हो गई। उन्होंने देखा कमरे में चारों तरफ घी के दीए जल रहे थे। साथ ही कमरे का कोना-कोना इत्र से महक रहा था। राजा सहसा प्रसन्नता से मझले पुत्र को अंक में भरकर नाचने लगा।

राजा ने मझले पुत्र का राज्याभिषेक कर समझाते हुए कहा, ‘किसी भी साधन का सदुपयोग करने की क्षमता और समझ होनी चाहिए। समय, साधन और शक्ति हर किसी को मिलती है, पर हर व्यक्ति उसका सदुपयोग नहीं कर पाता। अक्सर लोग उसे नष्ट कर डालते हैं। जो इनका सदुपयोग करते हैं, उन्हीं का जीवन सार्थक होता है।’

हमारे ऋषिगण वेदों में, पुराणों में, उपनिषदों में जीवन की गुत्थियों को खोलने के लिए तमाम सूत्र दे दिए हैं। उनसे हम अपनी समस्या का समाधान न करके, उसका जाप करते हैं। पाठ करते हैं। हवन करते हैं। उसे क्रिया-कर्मकाण्ड में डालकर उलझा दिए हैं। स्वयं भी बुरी तरह उलझ गए हैं। कभी-कभी समय के सद्गुरु आते हैं जो तमाम गुत्थियों को सुलझा देते हैं। परन्तु हम लकीर के फकीर लोग उनकी नहीं सुनते हैं। परम्परा की लकीर पर चलने के अभ्यस्त हो गए हैं। जब एक समय के सद्गुरु को चूक जाते हैं तब हमारे हजारों जन्म बर्बाद चले जाते हैं।

 

||हरि ॐ||

 

समय के सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज की अनमोल कृति शिव नेत्र से उद्धृत | 

 

‘समय के सदगुरु’ स्वामी  कृष्णानंद  जी महाराज

आप सद्विप्र समाज की रचना कर विश्व जनमानस को कल्याण मूलक सन्देश दे रहे हैं| सद्विप्र समाज सेवा एक आध्यात्मिक संस्था है, जो आपके निर्देशन में जीवन के सच्चे मर्म को उजागर कर शाश्वत शांति की ओर समाज को अग्रगति प्रदान करती है| आपने दिव्य गुप्त विज्ञान का अन्वेषण किया है, जिससे साधक शीघ्र ही साधना की ऊँचाई पर पहुँच सकता है| संसार की कठिनाई का सहजता से समाधान कर सकता है|

स्वामी जी के प्रवचन यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध हैं –

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