समाधि में अंतर्यात्रा

समाधि में अंतर्यात्रा

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28 Jul 202413 min read

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दादागुरु स्वामी आत्मादासजी के निर्वाण दिवस (7 June) के शुभ अवसर पर सदगुरुदेव द्वारा रचित ‘रहस्यमय लोक’ में ध्यानावस्था में गुरुद्वार पर गुरु-शिष्य (दादागुरु स्वामी आत्मादास जी और गुरुदेव) की भेंट एवं संवाद का मार्मिक व प्रेरणास्पद वर्णन…… 

 

समाधि में अंतर्यात्रा (उत्तरायण की यात्रा)

 

चूँकि संकल्प मैं पहले ही ले चुका था, अतएव उसी के अनुसार मेरी यात्रा निर्धारित हो गयी | आज्ञा चक्र पर पहुँच गया | यहाँ दो दल कमल है | यहाँ अनंत सूर्यों का प्रकाश एक साथ है | यही आत्मा का निवास है | यहीं से ओंकार की प्रणव ध्वनि हर समय गूँजती रहती है | साधक  यहाँ देख सकता है | अनुभव कर सकता है | योगी लोग इसे ही ह्रदय कहते हैं | यहीं त्रिवेणी संगम है | जिसमें गोता लगाते ही जन्मोंजन्म का पाप भस्म हो जाता है | यहीं से त्रिनेत्र भी खुलता है | मैंने भी गोता लगाया | यहाँ अस्मिता का भान समाप्त हो जाता है | यहाँ ब्रह्म शरीर मिलता है | यहाँ ‘स्व’ का भान गिर जाता है | ‘सर्व’ का भान हो जाता है | यहाँ साधक अपनी इच्छानुसार स्वतंत्रतापूर्वक शरीर छोड़ सकता है | ग्रहण भी कर सकता है | वह आनंद में रहता है |

इसके ऊपर गुरुपर्वत है | जो छः दल कमल पर विराजमान है | वह अत्यंत प्रकाशमय है | मैं वहाँ पहुँच गया | साष्टांग प्रणाम कर पूजा-अर्चना किया | गुरुदेव का यह शरीर पूर्ण प्रकाश का पारदर्शी नज़र आने लगा | उनके मुँह से शब्द निकला कि तुम जाओ परन्तु शीघ्र चले आना | इसी शरीर से तुम्हें बहुत कार्य करना है | अतएव इसे छोड़ने के सम्बन्ध में तत्काल निर्णय मत लेना | छोड़ने के लिए उपयुक्त समय मैं देख रहा हूँ | चूँकि जो इस मार्ग से बाहर निकलता है, वह इस पार्थिव शरीर की नश्वरता को समझकर छोड़ देता है एवं आत्म शरीर या ब्रह्म शरीर में रहना उचित समझता है | जहाँ न कोई कष्ट है, न ही किसी तरह का झंझट | अपनी तरह के विभिन्न शरीर वाले ऋषि-मुनि, अवतारी को देखकर प्रसन्न हो जाता है | फिर पार्थिव शरीर का भान भूलकर उन्हीं लोगों के साथ हो जाता है |

यह याद रखना होगा | सारे झंझट का स्रोत एवं कर्म बंधन का जड़ यही शरीर है | कर्म- बन्धनों को तोड़ने तथा दूसरे का हित करने का साधन भी इसी शरीर से संभव है | हजारों-लाखों जीव जन्मोंजन्म से भटक गए हैं | तुम्हें उनका उद्धार करना ही है | वे तो बेचारे अपने ‘तम’ के अन्धकार से घिरे हैं | तुम्हें उन्हें आलोकित करना ही होगा | तुम्हारे साथ मैं सदैव हूँ | तुम्हारी मदद में सीता, उर्मिला, मीरा, राधा, हनुमान इत्यादि देवकन्याएँ एवं देवगण चले गए हैं | सभी किसी न किसी रूप में तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं | तुम्हें अपने ब्रह्मर्षियों को बनाना होगा | दिशा-निर्देश करना होगा | इस बार राम एक व्यक्ति न होकर संस्था होगी | तुम सद्विप्र समाज सेवा की स्थापना कर ही चुके हो | जितना बड़ा कार्य उतना ही बड़ा संघर्ष होता है | धैर्य से काम लेना है | सभी कुछ समय से पूर्ण होगा, शंखनाद करना तुम्हारा कर्तव्य है | धर्म-अधर्म का युद्ध लम्बा चलता है | जो तुम्हारे साथ खड़ा होगा वही धार्मिक है | जो सुविधाभोगी होगा व अन्याय के साथ खड़ा होगा, वही अधार्मिक है |

तुम बने-बनाये मार्ग पर नहीं चल रहे हो | मार्ग तुम्हें ही बनाना है | उसपर तुम्हारे ही सद्विप्र चलेंगे | कालांतर में वही राजपथ बन जायेगा | तुम इतिहास का निर्माण कर रहे हो | इतिहास को दुहरा देना कोई कला नहीं है | इतिहास का निर्माण करना ही कला है | जो अति कठिन है | उसका भविष्य अज्ञात के गर्भ में है | एक कदम भी आगे दिखाई नहीं पड़ता है | प्रत्येक कदम अपने संभल कर रखना है | बीहड़ जंगल के ऊबड़-खाबड़ मार्ग को अपने ही पदचाप से प्रशस्त कर राजपथ बनाना है | यह कहना आसान है | करना दुरूह है | सभी तुम्हारी प्रतीक्षा में हैं | तुम चिंगारी पैदा करो | कोई भी चिंगारी तो आग लगाने में सफल हो ही जाएगी | बस,  जंगल में आग फैलते देर नहीं लगती है | जंगल तो स्वयं आग का विस्तार कर लेता है | पवन देवता शीघ्र संपन्न करने में मदद करता है |

मैंने श्रद्धा-प्रेम से साष्टांग प्रणाम किया | गुरुदेव मेरे मस्तक पर हाथ रख दिए | अब मैं उठकर देखता हूँ कि गुरुदेव का शरीर प्रकाशमय है | ऐसा प्रकाश-आलोक कि वह द्वार प्रतीत होता है | जिसमें बरबस प्रवेश की भावना प्रबल बनती है | मैं उसमें सहर्ष प्रवेश कर गया |

यहाँ अनंत, मनोहर, सुरम्य प्रकाश है | कमल दल गिनना बचकाना प्रतीत होता था | जैसे किसी वृक्ष के नजदीक जाकर फल का स्वाद न लेकर वृक्ष पर फलों को गिना जाये | ऐसा प्रतीत होता है कि हजारों कमल दल हैं | सभी एक साथ प्रकाशित हैं | पूर्ण चेतना है | समग्रता है | बूँद समुद्र में मिलकर समुद्र बन जाती है | मेरी इच्छा यही हो रही थी | तभी पीछे से आवाज़ आई, सामने के द्वार से बाहर निकल आओ | यही ब्रह्मरंध्र है | योगी-यती का अंतिम द्वार | इसे ही दशम द्वार कहा गया है | जो एक बार इस द्वार से बाहर निकल जाता है, उसके लिए सारे रहस्य खुल जाते हैं | वह स्वेच्छा से शरीर छोड़ सकता है | अपने गंतव्य स्थल की यात्रा मानसिक गति से कर सकता है | उस संत पर प्रकृति का वश नहीं होता है | प्रकृति उसकी इच्छा मात्र से संचालित होती है | परन्तु उसकी अपनी इच्छा भी नहीं होती है | वह पूर्व संकल्पित कार्यों को निष्काम भाव से करता है | इस शरीर में रहते हुए भी शरीरगत फलाफल भोगता है | सामान्य जन सा सांसारिक कार्य करता है | जबकि उसके इशारे मात्र से देवगण इसकी सेवा में प्रस्तुत हो सकते हैं | वह इन सबसे परे ब्रह्मलीन रहता है | अपने में मस्त रहता है | शिष्य-साधक देवता इनकी सेवा कर अपनी शारीरिक, आर्थिक, आध्यात्मिक उन्नति करते हैं | परमात्मा सर्व साधारण को इनके माध्यम से अपनी सेवा करने का अवसर प्रदान करता है |

मैं अपने अस्तित्व को अलग ही बचाकर रखते हुए बायें मुड़कर सीधे रास्ते से निकल गया | यह मार्ग हर्षदायक एवं कौतूहलपूर्ण है | मार्ग महल से भी ज्यादा आनंदपूर्ण था | कभी-कभी यात्री रास्ते की सुखानुभूति से भी अपने गंतव्य एवं कर्तव्य-पथ से भटक जाते हैं | वह चिर विश्राम करने लगते हैं, अधिकाँश व्यक्तियों के साथ यही होता है | वे मार्ग में ही अपना महल निर्मित करने लगते हैं | मार्ग के परिचित ही उसके अपने हो जाते हैं | वह उनके सुख-दुःख में इतनी बुरी तरह आबद्ध हो जाता है कि अपने कर्तव्य, चेतना का भान ही भूल जाता है | फिर यहाँ से विदा हो जाता है | मैं निरंतर आगे बढ़ता गया |

दशम द्वार के मुख्य द्वार पर आ गया | वह द्वार अंदर से बंद था | उस द्वार पर स्वर्ण, हीरा जड़ित कार्य प्रतीत होता था | उस द्वार से भी विभिन्न प्रकार की रश्मियाँ निःसरित हो रही थीं | मैं कौतूहलवश उसे देखता रहा | उसे देखने में बहुत समय व्यतीत हो गया | मैं भी समय का भान भूल गया |

एकाएक वह विशाल गेट प्रकाश का द्वार बन गया | मैं सहसा बाहर निकल गया | शिखर पर बैठकर विचार कर रहा था की अब क्या करना है ? कहाँ चलना है ? बस अपने गुरुधाम बरईपुर पहुँच गया | ऐसा प्रतीत हुआ कि कहीं पहुँचने के सोचना ही काफी है | जैसे कंप्यूटर का एक बटन दबाया नहीं कि परिणाम हाज़िर है |

मैं गुरुदेव के समाधि मंदिर की परिक्रमा किया, साष्टांग प्रणाम किया | षोडश विधि से पूजन कर माताजी का भी पूजन किया | मैं अपने पूजन में इतना तल्लीन था कि अपने बाएँ-दायें भी मुड़कर नहीं देखा |

गुरुदेव की समाधि पर आकर पुनः दण्डवत किया | फिर क्या था ? गुरुदेव अपनी प्रतिमा से सशरीर बाहर आ गए | उधर से सद्गुरु कबीर साहब भी बाहर आ गए | गुरु माँ बाहर एक आ गयीं | सभी एक दूसरे का अभिवादन करने लगे | मैं इस स्थिति के लिए तैयार नहीं था, न ही सोचा था | बस हड़बड़ाकर दण्डवत पृथ्वी पर गिरकर सभी को प्रणाम किया | गुरुदेव मस्तक पर हाथ रखते हुए बोले – वत्स ! उठो | ये हमारे इष्टदेव कबीर साहब हैं | योगी कभी भी मरता नहीं है | वह तो मृत्यु को साकार करता है | तुम जिस रास्ते से आये हो, उससे मृत्यु का रहस्य समझ में आ गया होगा | हम लोग केवल शरीर बदलते हैं | जैसे साधारण जन कपड़ा बदलते हैं | सद्गुरु करुणावश स्वेच्छा से शरीर ग्रहण करता है | जिससे वह संसार में अवतार कहलाता है | सामने देखो मेरे मित्र इमाम साहब भी खड़े हैं | ये भी अपने इमामबाडा से बाहर निकल आये हैं | हमलोगों में कोई घृणा नहीं है | ये हमारे साधना काल में भी मददगार थे | अभी भी ये तुम्हारे साथ हैं | मैं उन्हें भी प्रणाम किया | वे अभिवादन स्वीकार करते हुए बोले – स्वामीजी ! आप तो अपने शैशव काल में मेरे स्थान पर आते थे | वहाँ घंटों ध्यान करते थे | उस समय वहाँ जंगल ही था | आबादी नहीं थी | हाँ अब हिन्दू-मुसलमान में नफरत पैदा हो गयी है | क्या आत्मा, परमात्मा भी हिन्दू मुसलमान है ! स्वार्थी लोग अपने हित के लिए मज़हब बना लिए हैं | वे अपनी सांसारिक वासना पूर्ति करते हैं | उन्हें न इंसानियत से वास्ता है, न ही परम तत्त्व से |

मैं मंदिर के प्रांगण में नज़र दौड़ाया | सर्वत्र प्रकाशयुक्त युवक-युवतियाँ ध्यान मग्न खड़े थे | सभी निर्विकार प्रसन्न मुद्रा में थे | दूर-दूर तक उनके चेहरे पर वासना नज़र आती थी | जिधर देखता मैं उसे ही निहारता रह जाता था | यहाँ मैं बरसों रहा, ये लोग तो कभी दिखाई नहीं पड़े | गुरुदेव ने कहा, ये सभी कारण शरीर, आत्म शरीर में आनंद ले रहे थे | ये शरीर धारण नहीं करना चाहते हैं | बस अपने में आनंदित हैं | हाँ ये लोग सद्विप्रों को हर संभव सहायता करेंगे | मैं सभी को नमन किया | सभी मुस्कुराकर मुझे भी प्रति-उत्तर दिए |

मेरा कौतूहल सद्गुरु कबीर साहब की तरफ बढ़ गया | उनकी तरफ मुखातिब हुआ | वे हाथ उठाकर आशीर्वाद दिए | मैं उनसे उनके बीजक के सम्बन्ध में सुनना चाहा | उन्होंने कहा कि समय की माँग पर सद्गुरु करुणावश शरीर धारण करता है | वह आदमी का, जीवों का वैद्य होता है | रोगी के अनुसार दवा देता है | आगे बढ़ता जाता है | फिर तुम पूछोगे कि किस व्यक्ति को कौन सी दवा दिए ? तो इसे वह कैसे याद रखेगा, याद रखेगा कम्पाउण्डर | मैंने  व्यक्ति विशेष, स्थान विशेष, समय विशेष के अनुसार अपनी वाणियों का प्रयोग किया | उन वाणियों को कभी संजोकर नहीं रखा | अब देखता हूँ कि उन वाणियों की विभिन्न प्रकार की व्याख्याएं की जा रही हैं | उसमें भी अपनी मति उक्ति मिला दी गयी है | जो व्यक्ति मेरा शत्रु था अर्थात् मेरे विचारों से आहत था- वह मुल्ला-पुरोहित फिर जन्म लेकर मेरा ही लिबास ओढ़कर फिर मेरी उक्ति को अपने मन के अनुसार गढ़ रहे हैं |

कुछ चतुर व्यापारी बार बार अपने ही खानदान में मुझे जन्म लेने का दावा करते हैं | तो कुछ ऐसा प्रचारित करते हैं कि मैं ही सशरीर उन्हें दीक्षा दिया हूँ | हमारे नाम पर विभिन्न प्रकार के पंथ- मत- संप्रदाय खड़े हो गए | तुम ज़रा गौर करो – मेरे रहते-रहते वह मेरा विरोध किये | मुझे कहना पड़ा – ‘मेरे दुश्मन जेते, तेते आकाश में तारे |’ शिष्यत्व के नाम पर भी कोई खास उपलब्द्धि नहीं हुई | तभी मुझे कहना पड़ा- ‘जो मिला सो गुरु मिला, शिष्य मिला नहिं कोय |’ अब आप ही देखो | हमारे नाम पर कितनी बड़ी शिष्य मण्डली है |

मैंने निवेदन किया – “गुरुदेव, आप एक बार फिर आ जायें न |” वो जोर-जोर से हँसने लगे | बहुत देर तक हँसते रहे, फिर बोले – अब मेरी क्या आवश्यकता है ! अब तुम्हारे शरीर से ही कार्य करूँगा |” हाँ, ध्यान रखना पाखण्डी बड़े प्रबल होते हैं | वही सत्य का चेहरा ओढ़कर आते हैं | साधारण जीवों को भरमाते हैं | मुझे बाध्य होकर कहना पड़ा –

बार-बार मैं कह रहा, कोई न माने बात |

जब उसके हित की कहूँ, तब पुनि-पुनि मारे लात ||

सभी अपने अहंकार की पूर्ति चाहते हैं | सद्गुरु अपने शिष्य को मान-प्रतिष्ठा रूपी विष कैसे देगा ? वह तो पाखण्डी गुरु ही देने में समर्थ है | वही उसे प्रियकर प्रतीत होता है | मैंने तो कहा था कि मेरे शरीर छोड़ने के बाद मेरे पीछे संप्रदाय नहीं बनाया जाये | मेरी मूर्ति न बनाई जाये | पर कौन सुनता है ! मुझसे वास्ता किसी को नहीं है | उसे अपनी दुकानदारी एवं अपने अहं की पूर्ति से वास्ता है | उस युग में अकेले पाखण्ड का नाश कर दिया | मुल्ला-पुरोहित चीत्कार कर उठे | सभी मिलकर मुझे काशी से बाहर निकालने का दुश्चक्र रचे | जिसमें वे सफल भी हुए |

अब वे मेरी प्रतिमा बना रहे हैं | मेरी पूजा-अर्चना कर रहे हैं-

अहं अगिन ह्रदय दहै, गुरु से चाहे मन |

तिनको यम न्यौता दिया, होहुँ भोर निहमान ||

उनकी आँखों पर पट्टी बंध गई है | वे प्रतिदिन यम की तरफ गति कर रहे हैं |

आज कबीरपंथी दस करोड़ हैं | जब मैं अकेला हुँकार करता था तो पृथ्वी काँपती थी | अब दस करोड़ हुँकार करते हैं, तब एक पत्ता भी नहीं हिलता है | वे सभी अपनी रोटी सेंकते हैं | इन्हें धर्म से दूर-दूर तक सम्बन्ध नहीं है | ये पूरे राजनेता हैं | पूरी पृथ्वी को बदलने के लिए सौ सद्विप्र काफी हैं | ये दस करोड़ क्या कर रहे हैं ?

स्वामीजी इन्हें छोड़ो | उधर देखकर मुझे हँसी आती है | दुःख भी होता है |

गहन मौनता छा गयी है | मैं सद्गुरु कबीर साहब के चरणों में गिर गया | उनकी अंतर्वेदना को समझ गया | वे हमें ज़मीन पर से उठाकर अपने अंक में भर लिए | मैं उनके अंक में नन्हें शिशु की तरह लिपट गया | अपनी सुधि-बुद्धि भूल ही गया था | तंद्रा टूटी – वत्स ! तुम्हें काम करना है | मैं तुम्हारे शरीर का प्रयोग करूँगा | तुम पापाचार, तिमिरान्ध्र को मिटाने हेतु आगे बढ़ते चलो |

सर्वत्र ख़ामोशी | चुप्पी ! शांत ! धीरे-धीरे गुरुदेव के साथ-साथ सभी चित्र अंतर्ध्यान होने लगे | मैं मंदिर के प्रांगण की तरफ मुड़ा – जो दिव्य आत्माएं खड़ी थीं, सभी हाथ जोड़कर अभिनन्दन कर रही थीं | स्वामीजी ! आप धन्य हो | आपका अवतरण सार्थक है |

 

।। हरि ओम ।।

 

 

 

‘समय के सदगुरु’ स्वामी  कृष्णानंद  जी महाराज

आप सद्विप्र समाज की रचना कर विश्व जनमानस को कल्याण मूलक सन्देश दे रहे हैं| सद्विप्र समाज सेवा एक आध्यात्मिक संस्था है, जो आपके निर्देशन में जीवन के सच्चे मर्म को उजागर कर शाश्वत शांति की ओर समाज को अग्रगति प्रदान करती है| आपने दिव्य गुप्त विज्ञान का अन्वेषण किया है, जिससे साधक शीघ्र ही साधना की ऊँचाई पर पहुँच सकता है| संसार की कठिनाई का सहजता से समाधान कर सकता है|

स्वामी जी के प्रवचन यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध हैं –

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चूँकि संकल्प मैं पहले ही ले चुका था, अतएव उसी के अनुसार मेरी यात्रा निर्धारित हो गयी | आज्ञा चक्र पर पहुँच गया | यहाँ दो दल कमल है | यहाँ अनंत सूर्यों का प्रकाश एक साथ है | यही आत्मा का निवास है | यहीं से ओंकार की प्रणव ध्वनि हर समय गूँजती रहती है | साधक  यहाँ देख सकता है | अनुभव कर सकता है | योगी लोग इसे ही ह्रदय कहते हैं | यहीं त्रिवेणी संगम है | जिसमें गोता लगाते ही जन्मोंजन्म का पाप भस्म हो जाता है | यहीं से त्रिनेत्र भी खुलता है | मैंने भी गोता लगाया | यहाँ अस्मिता का भान समाप्त हो जाता है | यहाँ ब्रह्म शरीर मिलता है | यहाँ ‘स्व’ का भान गिर जाता है | ‘सर्व’ का भान हो जाता है | यहाँ साधक अपनी इच्छानुसार स्वतंत्रतापूर्वक शरीर छोड़ सकता है | ग्रहण भी कर सकता है | वह आनंद में रहता है |

इसके ऊपर गुरुपर्वत है | जो छः दल कमल पर विराजमान है | वह अत्यंत प्रकाशमय है | मैं वहाँ पहुँच गया | साष्टांग प्रणाम कर पूजा-अर्चना किया | गुरुदेव का यह शरीर पूर्ण प्रकाश का पारदर्शी नज़र आने लगा | उनके मुँह से शब्द निकला कि तुम जाओ परन्तु शीघ्र चले आना | इसी शरीर से तुम्हें बहुत कार्य करना है | अतएव इसे छोड़ने के सम्बन्ध में तत्काल निर्णय मत लेना | छोड़ने के लिए उपयुक्त समय मैं देख रहा हूँ | चूँकि जो इस मार्ग से बाहर निकलता है, वह इस पार्थिव शरीर की नश्वरता को समझकर छोड़ देता है एवं आत्म शरीर या ब्रह्म शरीर में रहना उचित समझता है | जहाँ न कोई कष्ट है, न ही किसी तरह का झंझट | अपनी तरह के विभिन्न शरीर वाले ऋषि-मुनि, अवतारी को देखकर प्रसन्न हो जाता है | फिर पार्थिव शरीर का भान भूलकर उन्हीं लोगों के साथ हो जाता है |

यह याद रखना होगा | सारे झंझट का स्रोत एवं कर्म बंधन का जड़ यही शरीर है | कर्म- बन्धनों को तोड़ने तथा दूसरे का हित करने का साधन भी इसी शरीर से संभव है | हजारों-लाखों जीव जन्मोंजन्म से भटक गए हैं | तुम्हें उनका उद्धार करना ही है | वे तो बेचारे अपने ‘तम’ के अन्धकार से घिरे हैं | तुम्हें उन्हें आलोकित करना ही होगा | तुम्हारे साथ मैं सदैव हूँ | तुम्हारी मदद में सीता, उर्मिला, मीरा, राधा, हनुमान इत्यादि देवकन्याएँ एवं देवगण चले गए हैं | सभी किसी न किसी रूप में तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं | तुम्हें अपने ब्रह्मर्षियों को बनाना होगा | दिशा-निर्देश करना होगा | इस बार राम एक व्यक्ति न होकर संस्था होगी | तुम सद्विप्र समाज सेवा की स्थापना कर ही चुके हो | जितना बड़ा कार्य उतना ही बड़ा संघर्ष होता है | धैर्य से काम लेना है | सभी कुछ समय से पूर्ण होगा, शंखनाद करना तुम्हारा कर्तव्य है | धर्म-अधर्म का युद्ध लम्बा चलता है | जो तुम्हारे साथ खड़ा होगा वही धार्मिक है | जो सुविधाभोगी होगा व अन्याय के साथ खड़ा होगा, वही अधार्मिक है |

तुम बने-बनाये मार्ग पर नहीं चल रहे हो | मार्ग तुम्हें ही बनाना है | उसपर तुम्हारे ही सद्विप्र चलेंगे | कालांतर में वही राजपथ बन जायेगा | तुम इतिहास का निर्माण कर रहे हो | इतिहास को दुहरा देना कोई कला नहीं है | इतिहास का निर्माण करना ही कला है | जो अति कठिन है | उसका भविष्य अज्ञात के गर्भ में है | एक कदम भी आगे दिखाई नहीं पड़ता है | प्रत्येक कदम अपने संभल कर रखना है | बीहड़ जंगल के ऊबड़-खाबड़ मार्ग को अपने ही पदचाप से प्रशस्त कर राजपथ बनाना है | यह कहना आसान है | करना दुरूह है | सभी तुम्हारी प्रतीक्षा में हैं | तुम चिंगारी पैदा करो | कोई भी चिंगारी तो आग लगाने में सफल हो ही जाएगी | बस,  जंगल में आग फैलते देर नहीं लगती है | जंगल तो स्वयं आग का विस्तार कर लेता है | पवन देवता शीघ्र संपन्न करने में मदद करता है |

मैंने श्रद्धा-प्रेम से साष्टांग प्रणाम किया | गुरुदेव मेरे मस्तक पर हाथ रख दिए | अब मैं उठकर देखता हूँ कि गुरुदेव का शरीर प्रकाशमय है | ऐसा प्रकाश-आलोक कि वह द्वार प्रतीत होता है | जिसमें बरबस प्रवेश की भावना प्रबल बनती है | मैं उसमें सहर्ष प्रवेश कर गया |

यहाँ अनंत, मनोहर, सुरम्य प्रकाश है | कमल दल गिनना बचकाना प्रतीत होता था | जैसे किसी वृक्ष के नजदीक जाकर फल का स्वाद न लेकर वृक्ष पर फलों को गिना जाये | ऐसा प्रतीत होता है कि हजारों कमल दल हैं | सभी एक साथ प्रकाशित हैं | पूर्ण चेतना है | समग्रता है | बूँद समुद्र में मिलकर समुद्र बन जाती है | मेरी इच्छा यही हो रही थी | तभी पीछे से आवाज़ आई, सामने के द्वार से बाहर निकल आओ | यही ब्रह्मरंध्र है | योगी-यती का अंतिम द्वार | इसे ही दशम द्वार कहा गया है | जो एक बार इस द्वार से बाहर निकल जाता है, उसके लिए सारे रहस्य खुल जाते हैं | वह स्वेच्छा से शरीर छोड़ सकता है | अपने गंतव्य स्थल की यात्रा मानसिक गति से कर सकता है | उस संत पर प्रकृति का वश नहीं होता है | प्रकृति उसकी इच्छा मात्र से संचालित होती है | परन्तु उसकी अपनी इच्छा भी नहीं होती है | वह पूर्व संकल्पित कार्यों को निष्काम भाव से करता है | इस शरीर में रहते हुए भी शरीरगत फलाफल भोगता है | सामान्य जन सा सांसारिक कार्य करता है | जबकि उसके इशारे मात्र से देवगण इसकी सेवा में प्रस्तुत हो सकते हैं | वह इन सबसे परे ब्रह्मलीन रहता है | अपने में मस्त रहता है | शिष्य-साधक देवता इनकी सेवा कर अपनी शारीरिक, आर्थिक, आध्यात्मिक उन्नति करते हैं | परमात्मा सर्व साधारण को इनके माध्यम से अपनी सेवा करने का अवसर प्रदान करता है |

मैं अपने अस्तित्व को अलग ही बचाकर रखते हुए बायें मुड़कर सीधे रास्ते से निकल गया | यह मार्ग हर्षदायक एवं कौतूहलपूर्ण है | मार्ग महल से भी ज्यादा आनंदपूर्ण था | कभी-कभी यात्री रास्ते की सुखानुभूति से भी अपने गंतव्य एवं कर्तव्य-पथ से भटक जाते हैं | वह चिर विश्राम करने लगते हैं, अधिकाँश व्यक्तियों के साथ यही होता है | वे मार्ग में ही अपना महल निर्मित करने लगते हैं | मार्ग के परिचित ही उसके अपने हो जाते हैं | वह उनके सुख-दुःख में इतनी बुरी तरह आबद्ध हो जाता है कि अपने कर्तव्य, चेतना का भान ही भूल जाता है | फिर यहाँ से विदा हो जाता है | मैं निरंतर आगे बढ़ता गया |

दशम द्वार के मुख्य द्वार पर आ गया | वह द्वार अंदर से बंद था | उस द्वार पर स्वर्ण, हीरा जड़ित कार्य प्रतीत होता था | उस द्वार से भी विभिन्न प्रकार की रश्मियाँ निःसरित हो रही थीं | मैं कौतूहलवश उसे देखता रहा | उसे देखने में बहुत समय व्यतीत हो गया | मैं भी समय का भान भूल गया |

एकाएक वह विशाल गेट प्रकाश का द्वार बन गया | मैं सहसा बाहर निकल गया | शिखर पर बैठकर विचार कर रहा था की अब क्या करना है ? कहाँ चलना है ? बस अपने गुरुधाम बरईपुर पहुँच गया | ऐसा प्रतीत हुआ कि कहीं पहुँचने के सोचना ही काफी है | जैसे कंप्यूटर का एक बटन दबाया नहीं कि परिणाम हाज़िर है |

मैं गुरुदेव के समाधि मंदिर की परिक्रमा किया, साष्टांग प्रणाम किया | षोडश विधि से पूजन कर माताजी का भी पूजन किया | मैं अपने पूजन में इतना तल्लीन था कि अपने बाएँ-दायें भी मुड़कर नहीं देखा |

गुरुदेव की समाधि पर आकर पुनः दण्डवत किया | फिर क्या था ? गुरुदेव अपनी प्रतिमा से सशरीर बाहर आ गए | उधर से सद्गुरु कबीर साहब भी बाहर आ गए | गुरु माँ बाहर एक आ गयीं | सभी एक दूसरे का अभिवादन करने लगे | मैं इस स्थिति के लिए तैयार नहीं था, न ही सोचा था | बस हड़बड़ाकर दण्डवत पृथ्वी पर गिरकर सभी को प्रणाम किया | गुरुदेव मस्तक पर हाथ रखते हुए बोले – वत्स ! उठो | ये हमारे इष्टदेव कबीर साहब हैं | योगी कभी भी मरता नहीं है | वह तो मृत्यु को साकार करता है | तुम जिस रास्ते से आये हो, उससे मृत्यु का रहस्य समझ में आ गया होगा | हम लोग केवल शरीर बदलते हैं | जैसे साधारण जन कपड़ा बदलते हैं | सद्गुरु करुणावश स्वेच्छा से शरीर ग्रहण करता है | जिससे वह संसार में अवतार कहलाता है | सामने देखो मेरे मित्र इमाम साहब भी खड़े हैं | ये भी अपने इमामबाडा से बाहर निकल आये हैं | हमलोगों में कोई घृणा नहीं है | ये हमारे साधना काल में भी मददगार थे | अभी भी ये तुम्हारे साथ हैं | मैं उन्हें भी प्रणाम किया | वे अभिवादन स्वीकार करते हुए बोले – स्वामीजी ! आप तो अपने शैशव काल में मेरे स्थान पर आते थे | वहाँ घंटों ध्यान करते थे | उस समय वहाँ जंगल ही था | आबादी नहीं थी | हाँ अब हिन्दू-मुसलमान में नफरत पैदा हो गयी है | क्या आत्मा, परमात्मा भी हिन्दू मुसलमान है ! स्वार्थी लोग अपने हित के लिए मज़हब बना लिए हैं | वे अपनी सांसारिक वासना पूर्ति करते हैं | उन्हें न इंसानियत से वास्ता है, न ही परम तत्त्व से |

मैं मंदिर के प्रांगण में नज़र दौड़ाया | सर्वत्र प्रकाशयुक्त युवक-युवतियाँ ध्यान मग्न खड़े थे | सभी निर्विकार प्रसन्न मुद्रा में थे | दूर-दूर तक उनके चेहरे पर वासना नज़र आती थी | जिधर देखता मैं उसे ही निहारता रह जाता था | यहाँ मैं बरसों रहा, ये लोग तो कभी दिखाई नहीं पड़े | गुरुदेव ने कहा, ये सभी कारण शरीर, आत्म शरीर में आनंद ले रहे थे | ये शरीर धारण नहीं करना चाहते हैं | बस अपने में आनंदित हैं | हाँ ये लोग सद्विप्रों को हर संभव सहायता करेंगे | मैं सभी को नमन किया | सभी मुस्कुराकर मुझे भी प्रति-उत्तर दिए |

मेरा कौतूहल सद्गुरु कबीर साहब की तरफ बढ़ गया | उनकी तरफ मुखातिब हुआ | वे हाथ उठाकर आशीर्वाद दिए | मैं उनसे उनके बीजक के सम्बन्ध में सुनना चाहा | उन्होंने कहा कि समय की माँग पर सद्गुरु करुणावश शरीर धारण करता है | वह आदमी का, जीवों का वैद्य होता है | रोगी के अनुसार दवा देता है | आगे बढ़ता जाता है | फिर तुम पूछोगे कि किस व्यक्ति को कौन सी दवा दिए ? तो इसे वह कैसे याद रखेगा, याद रखेगा कम्पाउण्डर | मैंने  व्यक्ति विशेष, स्थान विशेष, समय विशेष के अनुसार अपनी वाणियों का प्रयोग किया | उन वाणियों को कभी संजोकर नहीं रखा | अब देखता हूँ कि उन वाणियों की विभिन्न प्रकार की व्याख्याएं की जा रही हैं | उसमें भी अपनी मति उक्ति मिला दी गयी है | जो व्यक्ति मेरा शत्रु था अर्थात् मेरे विचारों से आहत था- वह मुल्ला-पुरोहित फिर जन्म लेकर मेरा ही लिबास ओढ़कर फिर मेरी उक्ति को अपने मन के अनुसार गढ़ रहे हैं |

कुछ चतुर व्यापारी बार बार अपने ही खानदान में मुझे जन्म लेने का दावा करते हैं | तो कुछ ऐसा प्रचारित करते हैं कि मैं ही सशरीर उन्हें दीक्षा दिया हूँ | हमारे नाम पर विभिन्न प्रकार के पंथ- मत- संप्रदाय खड़े हो गए | तुम ज़रा गौर करो – मेरे रहते-रहते वह मेरा विरोध किये | मुझे कहना पड़ा – ‘मेरे दुश्मन जेते, तेते आकाश में तारे |’ शिष्यत्व के नाम पर भी कोई खास उपलब्द्धि नहीं हुई | तभी मुझे कहना पड़ा- ‘जो मिला सो गुरु मिला, शिष्य मिला नहिं कोय |’ अब आप ही देखो | हमारे नाम पर कितनी बड़ी शिष्य मण्डली है |

मैंने निवेदन किया – “गुरुदेव, आप एक बार फिर आ जायें न |” वो जोर-जोर से हँसने लगे | बहुत देर तक हँसते रहे, फिर बोले – अब मेरी क्या आवश्यकता है ! अब तुम्हारे शरीर से ही कार्य करूँगा |” हाँ, ध्यान रखना पाखण्डी बड़े प्रबल होते हैं | वही सत्य का चेहरा ओढ़कर आते हैं | साधारण जीवों को भरमाते हैं | मुझे बाध्य होकर कहना पड़ा –

बार-बार मैं कह रहा, कोई न माने बात |

जब उसके हित की कहूँ, तब पुनि-पुनि मारे लात ||

सभी अपने अहंकार की पूर्ति चाहते हैं | सद्गुरु अपने शिष्य को मान-प्रतिष्ठा रूपी विष कैसे देगा ? वह तो पाखण्डी गुरु ही देने में समर्थ है | वही उसे प्रियकर प्रतीत होता है | मैंने तो कहा था कि मेरे शरीर छोड़ने के बाद मेरे पीछे संप्रदाय नहीं बनाया जाये | मेरी मूर्ति न बनाई जाये | पर कौन सुनता है ! मुझसे वास्ता किसी को नहीं है | उसे अपनी दुकानदारी एवं अपने अहं की पूर्ति से वास्ता है | उस युग में अकेले पाखण्ड का नाश कर दिया | मुल्ला-पुरोहित चीत्कार कर उठे | सभी मिलकर मुझे काशी से बाहर निकालने का दुश्चक्र रचे | जिसमें वे सफल भी हुए |

अब वे मेरी प्रतिमा बना रहे हैं | मेरी पूजा-अर्चना कर रहे हैं-

अहं अगिन ह्रदय दहै, गुरु से चाहे मन |

तिनको यम न्यौता दिया, होहुँ भोर निहमान ||

उनकी आँखों पर पट्टी बंध गई है | वे प्रतिदिन यम की तरफ गति कर रहे हैं |

आज कबीरपंथी दस करोड़ हैं | जब मैं अकेला हुँकार करता था तो पृथ्वी काँपती थी | अब दस करोड़ हुँकार करते हैं, तब एक पत्ता भी नहीं हिलता है | वे सभी अपनी रोटी सेंकते हैं | इन्हें धर्म से दूर-दूर तक सम्बन्ध नहीं है | ये पूरे राजनेता हैं | पूरी पृथ्वी को बदलने के लिए सौ सद्विप्र काफी हैं | ये दस करोड़ क्या कर रहे हैं ?

स्वामीजी इन्हें छोड़ो | उधर देखकर मुझे हँसी आती है | दुःख भी होता है |

गहन मौनता छा गयी है | मैं सद्गुरु कबीर साहब के चरणों में गिर गया | उनकी अंतर्वेदना को समझ गया | वे हमें ज़मीन पर से उठाकर अपने अंक में भर लिए | मैं उनके अंक में नन्हें शिशु की तरह लिपट गया | अपनी सुधि-बुद्धि भूल ही गया था | तंद्रा टूटी – वत्स ! तुम्हें काम करना है | मैं तुम्हारे शरीर का प्रयोग करूँगा | तुम पापाचार, तिमिरान्ध्र को मिटाने हेतु आगे बढ़ते चलो |

सर्वत्र ख़ामोशी | चुप्पी ! शांत ! धीरे-धीरे गुरुदेव के साथ-साथ सभी चित्र अंतर्ध्यान होने लगे | मैं मंदिर के प्रांगण की तरफ मुड़ा – जो दिव्य आत्माएं खड़ी थीं, सभी हाथ जोड़कर अभिनन्दन कर रही थीं | स्वामीजी ! आप धन्य हो | आपका अवतरण सार्थक है |

 

।। हरि ओम ।।

 

 

 

‘समय के सदगुरु’ स्वामी  कृष्णानंद  जी महाराज

आप सद्विप्र समाज की रचना कर विश्व जनमानस को कल्याण मूलक सन्देश दे रहे हैं| सद्विप्र समाज सेवा एक आध्यात्मिक संस्था है, जो आपके निर्देशन में जीवन के सच्चे मर्म को उजागर कर शाश्वत शांति की ओर समाज को अग्रगति प्रदान करती है| आपने दिव्य गुप्त विज्ञान का अन्वेषण किया है, जिससे साधक शीघ्र ही साधना की ऊँचाई पर पहुँच सकता है| संसार की कठिनाई का सहजता से समाधान कर सकता है|

स्वामी जी के प्रवचन यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध हैं –

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