रामराज्य की अवधारणा

रामराज्य की अवधारणा

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23 Jul 202413 min read

Published in spiritualism

||श्री सद्गुरवे नमः||

 

रामराज्य की अवधारणा

 

आज हम ऐसे समय में मूक दर्शक बने हैं, जहाँ सभी कुछ तीव्र गति से गमन कर रहा है। कोई भी चीज स्थिर नहीं है। आज विज्ञान ने गति ग्रहण कर ली है। दस हजार वर्ष पूर्व की बैलगाड़ी वायुयान बन गई है। जो कुछ ही घंटों में पूरी दुनिया की दूरी तय कर लेता है। लोहार का हथौड़ा आज की फोजिंग मशीन बन गया है। लोहार का स्थान रोबोट ने ले लिया है। बच्चों के स्लेट का हिसाब केल्कुलेटर से कम्प्यूटर ने छीन लिया है।

धर्म की चाल वही है, जो हजारों वर्ष पूर्व थी| या उससे भी मंद गति ग्रहण कर ली। धर्म पिछड़ जाएगा। मिट जाएगा। बैलगाड़ी या नदी में चलती हुई नाव की गति से धर्म चलता था, तब दोनों में ताल-मेल था। धर्म अभी भी उसी गति से चल रहा है। अन्य सभी चीजें बहुत तीव्रता में हैं। तब धर्म अगर पिछड़ जाए और लोगों के पैर से उसका कोई तालमेल न रह जाए, तो आश्चर्य नहीं है। जितनी तीव्रता से जनता का भौगोलिक ज्ञान बढ़ता है, जितनी तीव्रता से विद्वान कदम भरता है। उतनी ही तीव्रता से, बल्कि थोड़ा उससे भी ज्यादा धर्म को गति करना होगा।

धर्म को व्यक्ति से आगे गमन करना होगा। धर्म ही आदर्श है। आदर्श को सदा ही थोड़ा आगे होना चाहिए। अन्यथा आदर्श निरर्थक हो जाता है। आज धर्म आदमी से पीछे पड़ गया है। तभी तो आदमी का नुकसान हो रहा है। राजनीति बिना धर्म की हो गई है। राजनीति की स्थिति वैश्या की हो गई है। वैश्या की भी कोई वसूली होती है। परंतु राजनीति की कोई वसूली ही नहीं है। जो पैसे पर अपना शरीर बेचती है, उसे वैश्या कहते हैं। जो पैसे पर अपनी आत्मा को बेचता है उसे वैश्य कहते हैं। वैश्या का ‘अ’ आकर वैश्य पर सिरमौर्य बन जाता है। आज पूरी दुनिया की राजनीति वैश्य नीति बन गई है। धन से ही सभी का निर्णय होता है। तभी तो वैश्या मजबूरी में पर्दे के पीछे अपनी अस्मत बेचती है। राजनेता या अध्किरी खुशी-खुशी पर्दे के पीछे अपने हस्ताक्षर से देश की किस्मत बेचते हैं। फिर भी अपने को सम्माननीय, आदरणीय, पूज्यनीय कहलवाने का दुस्साहस भी करते हैं। जो देश के लिए, विश्व के लिए आत्मघाती साबित हो रहा है।

आज के परिप्रेक्ष्य में वही आदमी धार्मिक हो पाता है, जो दीन-हीन, अकिंचन है। जो एक चपरासी नहीं बन सकता है, जो अति पिछड़ा है। क्योंकि धर्म से सिर्फ उसके ही पैर मिल पाते हैं। जितना विकासमान हुआ है आज का आदमी, उसका धर्म से संबंध छूट गया है। कुछ लोगों का संबंध धर्म  के बदले साम्प्रदायिक औपचारिकता रह गया है।

जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो हैरान हो जाते हैं। समाज का सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति धर्मिक है। समाधि को उपलब्ध है। राम उस समय समाज के सर्वोत्कृष्ट व्यक्ति हैं। विश्वमित्र सर्वोत्कृष्ट राजा हैं, धर्म को स्वीकारा एवं धर्मगुरु ही नहीं वर्तमान समय के सद्गुरु बने। कृष्ण, बुद्ध, महावीर उस युग के श्रेष्ठतम लोग हैं। वे धार्मिक हैं। अगर हम आज के धार्मिक व्यक्तियों पर दृष्टिपात करें तो हमारे बीच का जो निकृष्टतम आदमी है, उसी ने धार्मिक होने की चादर ओढ़ रखी है। ऐसे समय में धर्म सदा आदमी से आगे है। हम आज अपने जमाने में आएं तो आदमी सदा धर्म से आगे है। अतएव आज के निकृष्टतम आदमी का ही पैर धर्म से मिल पाता है। यह विचित्र विडम्बना है। उस युग में जो अग्रणी है, चोटी पर है वह धार्मिक या आज जो बिल्कुल मूर्ख है, पिछड़ा हुआ है, वही धार्मिक है।

बुद्ध, महावीर के समय में जैसे बिहार के छोटे-छोटे इलाके की स्थिति थी, वैसी ही सारी दुनिया की स्थिति हो गई है। उतने ही बड़े व्यापक पैमाने पर, लेकिन बिल्कुल नए तरह का धार्मिक आदमी निर्मित करना पड़ेगा। नए तरह के संन्यासी निर्मित करने पड़ेंगे। पुराने काम नहीं आएंगे। नए ध्यान और योग के प्रयोग की क्रियाएं निर्मित करनी ही पड़ेंगी। समय तेज गति से चल रहा है। अब आज से ही स्वयं को नष्ट करना होगा, जिससे दूसरा रूपांतरित हो सके।

आज की राजनीति वैश्य बन गई है। यह गलती कुष्ठ की तरह हो गई है। जिसे खुजलाने में मजा आता है। शरीर से रक्त निकलता है। जिस पर मक्खियाँ भिनभिनाती हैं। इस रोग का उपचार अभी तक ठीक-ठीक खोजा नहीं जा सका। इससे आदमी सदियों से परेशान है। अतः यह मिटाने योग्य है। उसी उपचार की खोज है- ‘सद्विप्र समाज सेवा।’ अगर सद्विप्रों की आग फैलती जाती है दुनिया में तो राजनीति के कुरूप चेहरे को जलाकर राख किया जा सकता है।

दुनिया को सुन्दर बनाने के लिए न तो राज्यों की, न राष्ट्रों की, न राजनीतिज्ञों की जरूरत है। दुनिया में एक शासन काफी है। जिस शक्ति से पृथ्वी स्वर्ग हो सकती है। उसकी सत्तर प्रतिशत ऊर्जा युद्ध के नाम पर, प्रतिरक्षा के नाम पर नष्ट हो रही है। जिससे पृथ्वी नरक बनती जा रही है।

संन्यास को आज के परिप्रेक्ष्य में बदलना ही होगा। धर्मगुरु उत्तराधिकार में होता है। उसे मात्र पुस्तकीय ज्ञान होता है। धर्म से उसका संबंध दूर-दूर तक नहीं होता है। परन्तु उसकी साख होती है। बाजार में उसकी माँग होती है। वह रूढ़िवादी होता है। परम्परावादी होता है। इसे ही वह धर्म कहता है।

सद्गुरु अपने पैरों पर खड़ा होता है। वह विद्रोही होता है। वह जलता हुआ आग का अंगारा है। उसमें गर्मी है। तेज है। उसका तेज सभी नहीं झेल सकते हैं। उसे झेलने के लिए राम-लक्ष्मण, कृष्ण-बलराम-सी पात्रता चाहिए। यही कारण है कि समय के सद्गुरु को शिष्य के लिए इंतजार करना पड़ता है। या स्वयं शिष्य की खोज में विश्वमित्र की तरह अयोध्या का राजद्वार खटखटाना पड़ता है।

धर्मगुरु बुझी हुई राख है। उसमें गर्मी नहीं है। बहुत पहले कभी आग थी। अब बुझ गई है। जिसे धर्मगुरु ने संजोकर बक्से में रख लिया है। जिसकी महिमा का पाठ, स्त्रोत बना लिया गया है। नियम, उप नियम बन गए हैं। उसके प्रचार में पंडित, मौलानाओं को नियुक्त कर दिया गया है। स्वर्ग-नरक का जाल बिछाया गया है। जिसमें लोभी-लालची आसानी से फंस जाते हैं।

सद्गुरु पृथ्वी पर शंखनाद कर रहा है। जिसकी ध्वनि दूर-दूर तक गूँज रही है। पूरी पृथ्वी से सद्विप्रों ने चलकर आना प्रारम्भ कर दिया है। उन्हें विशेष संन्यास की कला प्रदान की जा रही है।

राम राज्य पर विचार करना होगा।

राम शब्द अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। जैसे रत्नों में कोहिनूर बेशकीमती है। पर्वतों में हिमालय, वृक्षों में पीपल, नदियों में गंगा, गायों में कामधेनु श्रेष्ठ है। उसी तरह शब्दों में राम शब्द श्रेष्ठतम् है। यह ढाई अक्षर का शब्द परम रहस्यपूर्ण, गुह्य मंत्र बन गया है। र का उच्चारण करते ही मूलाधर चक्र पर जोर पड़ता है। जैसे किसी ऊर्जा ने मूलाधार चक्र से गति प्रारम्भ कर दी। अ अक्षर आते ही वह परम ऊर्जा जैसे मणिपुर चक्र पर आती है। म अक्षर आते ही वह ऊर्जा आज्ञा चक्र पर आकर रुक जाती है। उच्चारण समाप्त होते ही मुँह स्वतः बंद हो जाता है। राम शब्द के बार-बार उच्चारण मात्र से साधक की सोयी हुई कुण्डलिनी; ऊर्जा मूलाधार चक्र से जागृत हो जाती है। सारे मलों को जलाकर भस्म कर देती है। तथा साधक के आज्ञा चक्र पर आकर विश्राम करने लगती है। वहीं गुरु पर्वत भी है। गुरु के इशारे मात्र से वह ऊर्जा सहस्त्रार में प्रवेश कर समाधि को उपलब्ध हो जाती है।

र+अ+म के संयोग से राम शब्द बना है। र-यह अग्नि का बीज मंत्र है। अग्नि-साधक के अन्दर के मलावरण को जलाकर भस्म कर देती है। मूलाधार चक्र के चारों तरफ विजातीय गैस, अवयव जन्मों जन्म से पड़े रहते हैं। उसे वह अग्नि जला देती है। जिससे साधक अन्दर से हल्का हो जाता है। अन्दर का दबाव कम हो जाता है। जिससे कुण्डलिनी का जागरण एवं गमन ऊर्ध्व दिशा में स्वतः हो जाता है।

अ- सूर्य का बीज मंत्र है। यह स्वर का प्रथम अक्षर है। इसके उत्पन्न होने से ही सारे स्वर तत्पश्चात व्यंजनों, अक्षरों की उत्पत्ति हुई है। अ अक्षर वर्णमाला का उद्गम स्रोत है। सूर्य अर्थात ज्ञान। साधक अन्दर से परम प्रकाश से प्रकाशित हो जाता है। उसके अन्दर से स्वतः वेद का उच्चारण होने लगता है। मणिपुर चक्र पर अग्नि का स्थान है। वही भगवान विष्णु का भी स्थान है। जहाँ से पूरे शरीर का पोषण होता है। वह विशुद्धि चक्र तक ध्वनित होता है। विशुद्धि चक्र सोलह दल कमल का है। जिसके प्रथम कमल दल पर ‘अ’ अक्षर ही ध्वनित होता है। जिसकी देवी आद्या है। जो समस्त, मृत्युलोक, पाताल लोकों का संचालन करती है एवं उसकी सूचना ऊर्ध्व लोक को भेजती है।

म-चन्द्रमा का बीज मंत्र है। चन्द्रमा शीतलता प्रदान करता है। वह अमृत देता है, जिससे साधक के सम्पूर्ण शरीर में नव ऊर्जा का संचरण होता है। वह अमृत साधक के सहस्त्रार से अहिर्निश बरसता रहता है। जो अमर लिंग पर आकर गिरता है। जिससे साधक के सिर अर्थात ब्रह्माण्ड से पाताल अर्थात् पैर तक का पोषण होता है। पूरा लोक उसी अमृत वर्षा से तृप्त होता है। साध्क पर गुरु अनुकम्पा बरसती है। साधक की स्थिति वैसी ही हो जाती है जैसे नीचे से गंगा का पानी बढ़ रहा हो, जिसमें साधक डूब रहा हो। ऊपर से गुरु अनुकम्पा की वर्षा से भीग रहा हो। प्रभु अनुग्रह रूपी बिजली चमक रही हो। प्रभु रूपी बादल की गड़गड़ाहट में साधक भाव विह्वल हो जाता है। वह सहज समाधि में प्रवेश कर जाता है।

अब वह ‘स्व’ तथा ‘पर’ का भान भूल जाता है। बांसुरी किसी की हो, गीत उस एक का ही सुनता है। दीए किसी के हों- प्रकाश उस एक का ही देखता है। अब वह पक्षियों के गीतों में भी कृष्ण का गीत; भगवद्गीता सुनता है। नदियों के कलरव में भी उपनिषद के महावाक्य सुनता है। आकाश में उसी का विस्तार देखता है। पृथ्वी उसी का पद्चिह्न प्रतीत होता है। कण-कण में उसकी ही छवि दिखाई देती है। सद्गुरु की उक्ति चरितार्थ होती है-

‘पात्-पात् में साईं रमत है, कटुक बचन मत बोल रे।’

उसी निराकार से आकारों की झीनी-सी ओट अनायास ही गिर जाती है। रह जाता है- वही। वही है- राम! उसी का हस्ताक्षर है- पूरी प्रकृति! जो व्यक्ति सहज समाधि् में रहता है। सद्गुरु कबीर के शब्दों में- ‘संतों सहज समाधि भली।’

जो येन-केन प्रकारेण समाधि मिलती है, खींच-तानकर, अपने प्रयासों से प्राप्त होता है, वह कभी भी सुन्दर नहीं होगा। परन्तु जो परमात्मा के द्वारा मिलता है। वही सुन्दर होगा। सुन्दरतम् होगा। सहज होते ही समर्पण आ जाता है। समर्पण होते ही गुरु अनुकम्पा बरस जाती है। आशीर्वाद मिल जाता है। विश्वमित्र जी आशीष देते हैं-

‘सुफल मनोरथ होहुँ तुम्हारे। रामु लखनु सुनि भए सुखारे।।’

ऐसे ही सहज समाधियुक्त व्यक्ति राम हैं। जो अयोध्या के सिंहासन पर आरूढ़ हैं। वहाँ किसी से किसी प्रकार का युद्ध नहीं है। सभी अपने-अपने कर्मों में लगे हैं।

गंगा का जल गोमुख से निकलता है। यदि वहीं से जल अपवित्र एवं गंदा निकले तब आगे जाने पर उससे क्या आशा की जा सकती है। उसी तरह सत्ता के शीर्ष व्यक्ति को गोमुख के गंगा जल की तरह पवित्र रखना होगा। राम ने स्वयं अपने को आदर्श के रूप में स्थापित किया। यही कारण था कि उनके राज्य में प्रत्येक व्यक्ति संतुष्ट और न्यायप्रिय था।

‘बयरू न कर काहू सन कोई। राम-प्रताप विषमता खोई।।’

सद्विप्र समाज की नीतियों को सारी जनता ने सहज अपनाया था। जिसका परिणाम था सभी स्वधर्म में स्थित थे।

‘सब नर करहि परस्पर प्रीति। चलहि स्वधर्म निरत स्रुति नीति।।’

प्रजा को पहले से ही शीत, गर्मी, प्रभंजन; तूफान, वर्षा, बाढ़, भूकम्प और दैवी विपत्तियों से बचाकर रखने की ऐसी वैज्ञानिक व्यवस्था कर दी गई थी कि किसी भी आधिदैविक विपत्ति से किसी को कभी कोई कष्ट नहीं होने पाता था। इसी प्रकार मनुष्य, पशु, पक्षी, जीव-जन्तु आदि किसी भी प्राण से किसी प्रकार कोई आधिभौतिक कष्ट प्रजा को नहीं होने पाता था। क्योंकि इन सब विपत्तियों की पहले ही कल्पना करके उनके निराकरण के सब उपाय कर लिए गए थे।

‘दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम-राज्य नहि काहुहिं व्यापा ||’

 

आगे कहते हैं-

विधु महिपूर मयूरवनन्हि, रवि तप जेतनेहिं ताप।

माँगे बारिद देहि जल, राम चन्द्र के राज।।

 

जहाँ रावण के राज्य में सभी एक-दूसरे से भयभीत थे। वा.रा. के उत्तरकाण्ड के सर्ग 96 में है- ‘शंकर जी द्वारा रावण ने अपना नामकरण कराके बड़ी प्रसन्नता से उन्हें प्रणाम किया और पुष्पक विमान पर सवार हो गया। अब वह दुष्ट पृथ्वी पर घूम-घूमकर क्षत्रियों को पीड़ित करने लगा। उस समय जिस वीर क्षत्रिय ने रावण की आज्ञा नहीं मानी- वह परिवार सहित मार डाला गया। बहुत से बुद्धिमान राजाओं ने रावण को अजेय समझकर हार मान ली।’ जब कभी वह किसी शक्तिशाली क्षत्रिय राजा से पराजित होता तब परदादा ब्रह्मा या दादा पुलस्त्य उसकी रक्षा करते। उनसे मैत्री संधि करा देते। जैसे वरूण, यम, सहस्त्रार्जुन, बालि आदि के साथ हुआ था। लगभग यही कार्य आर्यावर्त में रहकर परशुराम भी कर रहे थे। इन दोनों के आतंक से सद्विप्र समाज के नायक राम ने मुक्त किया। सभी परस्पर मिलकर रहने, बैरभाव को भूलकर प्रेम से कार्य करने में लग गए। जिससे स्वयं के विकास के साथ-साथ जगत का विकास होने लगा। अल्पमृत्यु का दौर रुक गया। सभी मानसिक रूप से निर्भीक हो गए। अतएव सुन्दर होना स्वाभाविक है।

अल्पमृत्यु नहि कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब विरूज सरीरा।।

नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहि कोउ अबुध न लच्छन हीना।।

सब निर्दंभ धर्मरत पुनी। नर अरू नारि चतुर सब गुनी।।

सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतग्य नहि कपट सयानी।।

 

यह स्थिति इसलिए आई कि राम गुरु आज्ञा के अधीन थे। सद्विप्र के लिए संकल्पित थे। उनकी सारी प्रजा ने भी उन्हीं का अनुकरण कर लिया। तथाकथित देवी-देवता का धर्म विदा हो गया। गुरु पूजा को ही सर्वदेवमयी पूजा के रूप में स्वीकार कर लिया। व्यक्ति देवी-देवता; पाषाण की पूजा कर मनमानी एवं उद्दण्ड हो जाता है। जबकि गुरु के सान्निध्य में रहने पर अपने मन रूपी मतंग पर स्वतः अंकुश लगाते रहता है। शिष्य शान्तिमय, मंगलमय, सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय मार्ग पर चल निकलता है। इसी संदर्भ में रा.च.मा.उ. 92/3 में कहा गया है-

गुरु बिनु भव निधि तरइ न कोई। जौं विरंचि संकर सम होई।।

 

राम राज्य में आठ मंत्री थे। 1. धृष्ट, 2. जयंत, 3. विजय, 4. सुराष्ट्र, 5.राष्ट्रवर्द्धन, 6.अकोप, 7. धर्मपाल और 8. सुमन्त्र, ये सब आठ विभागों के विभागाध्यक्ष थे। अपने-अपने कार्य में सभी दक्ष थे। ये परचित्य ज्ञानी भी थे। ये सब बड़े सदाचारी, पुण्यात्मा और निरंतर राजकार्य में लगे रहते थे।

आठ मंत्रियों के ऊपर सप्तऋषि थे, जो ऋत्विक मंत्र का भी काम करते थे। ये अर्थशास्त्र के पंडित थे। मंत्रणा का तत्व जानते थे। ये शीलवान्, विवेकशील, कार्यकुशल, जितेन्द्रिय, विनयी, शस्त्रविद्या में कुशल, अत्यंत पराक्रमी, यशस्वी, क्षमाशील, कीर्तिमान और हँसमुख थे। ये शत्रु राजाओं की रांइ-स्त्रा का भी ज्ञान रखते थे। ये थे- 1.वशिष्ठजी, 2.वामदेवजी, 3.सुयज्ञ, 4.जाबालि, 5.कश्यप, 6.मार्कण्डेय और 7.कात्यायन।

 

||हरि ॐ||

 

 

समय के सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज की अनमोल कृति ‘मेरे राम’ से उद्धृत.

 

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‘समय के सदगुरु’ स्वामी  कृष्णानंद  जी महाराज

आप सद्विप्र समाज की रचना कर विश्व जनमानस को कल्याण मूलक सन्देश दे रहे हैं| सद्विप्र समाज सेवा एक आध्यात्मिक संस्था है, जो आपके निर्देशन में जीवन के सच्चे मर्म को उजागर कर शाश्वत शांति की ओर समाज को अग्रगति प्रदान करती है| आपने दिव्य गुप्त विज्ञान का अन्वेषण किया है, जिससे साधक शीघ्र ही साधना की ऊँचाई पर पहुँच सकता है| संसार की कठिनाई का सहजता से समाधान कर सकता है|

स्वामी जी के प्रवचन यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध हैं –

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रामराज्य की अवधारणा

 

आज हम ऐसे समय में मूक दर्शक बने हैं, जहाँ सभी कुछ तीव्र गति से गमन कर रहा है। कोई भी चीज स्थिर नहीं है। आज विज्ञान ने गति ग्रहण कर ली है। दस हजार वर्ष पूर्व की बैलगाड़ी वायुयान बन गई है। जो कुछ ही घंटों में पूरी दुनिया की दूरी तय कर लेता है। लोहार का हथौड़ा आज की फोजिंग मशीन बन गया है। लोहार का स्थान रोबोट ने ले लिया है। बच्चों के स्लेट का हिसाब केल्कुलेटर से कम्प्यूटर ने छीन लिया है।

धर्म की चाल वही है, जो हजारों वर्ष पूर्व थी| या उससे भी मंद गति ग्रहण कर ली। धर्म पिछड़ जाएगा। मिट जाएगा। बैलगाड़ी या नदी में चलती हुई नाव की गति से धर्म चलता था, तब दोनों में ताल-मेल था। धर्म अभी भी उसी गति से चल रहा है। अन्य सभी चीजें बहुत तीव्रता में हैं। तब धर्म अगर पिछड़ जाए और लोगों के पैर से उसका कोई तालमेल न रह जाए, तो आश्चर्य नहीं है। जितनी तीव्रता से जनता का भौगोलिक ज्ञान बढ़ता है, जितनी तीव्रता से विद्वान कदम भरता है। उतनी ही तीव्रता से, बल्कि थोड़ा उससे भी ज्यादा धर्म को गति करना होगा।

धर्म को व्यक्ति से आगे गमन करना होगा। धर्म ही आदर्श है। आदर्श को सदा ही थोड़ा आगे होना चाहिए। अन्यथा आदर्श निरर्थक हो जाता है। आज धर्म आदमी से पीछे पड़ गया है। तभी तो आदमी का नुकसान हो रहा है। राजनीति बिना धर्म की हो गई है। राजनीति की स्थिति वैश्या की हो गई है। वैश्या की भी कोई वसूली होती है। परंतु राजनीति की कोई वसूली ही नहीं है। जो पैसे पर अपना शरीर बेचती है, उसे वैश्या कहते हैं। जो पैसे पर अपनी आत्मा को बेचता है उसे वैश्य कहते हैं। वैश्या का ‘अ’ आकर वैश्य पर सिरमौर्य बन जाता है। आज पूरी दुनिया की राजनीति वैश्य नीति बन गई है। धन से ही सभी का निर्णय होता है। तभी तो वैश्या मजबूरी में पर्दे के पीछे अपनी अस्मत बेचती है। राजनेता या अध्किरी खुशी-खुशी पर्दे के पीछे अपने हस्ताक्षर से देश की किस्मत बेचते हैं। फिर भी अपने को सम्माननीय, आदरणीय, पूज्यनीय कहलवाने का दुस्साहस भी करते हैं। जो देश के लिए, विश्व के लिए आत्मघाती साबित हो रहा है।

आज के परिप्रेक्ष्य में वही आदमी धार्मिक हो पाता है, जो दीन-हीन, अकिंचन है। जो एक चपरासी नहीं बन सकता है, जो अति पिछड़ा है। क्योंकि धर्म से सिर्फ उसके ही पैर मिल पाते हैं। जितना विकासमान हुआ है आज का आदमी, उसका धर्म से संबंध छूट गया है। कुछ लोगों का संबंध धर्म  के बदले साम्प्रदायिक औपचारिकता रह गया है।

जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो हैरान हो जाते हैं। समाज का सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति धर्मिक है। समाधि को उपलब्ध है। राम उस समय समाज के सर्वोत्कृष्ट व्यक्ति हैं। विश्वमित्र सर्वोत्कृष्ट राजा हैं, धर्म को स्वीकारा एवं धर्मगुरु ही नहीं वर्तमान समय के सद्गुरु बने। कृष्ण, बुद्ध, महावीर उस युग के श्रेष्ठतम लोग हैं। वे धार्मिक हैं। अगर हम आज के धार्मिक व्यक्तियों पर दृष्टिपात करें तो हमारे बीच का जो निकृष्टतम आदमी है, उसी ने धार्मिक होने की चादर ओढ़ रखी है। ऐसे समय में धर्म सदा आदमी से आगे है। हम आज अपने जमाने में आएं तो आदमी सदा धर्म से आगे है। अतएव आज के निकृष्टतम आदमी का ही पैर धर्म से मिल पाता है। यह विचित्र विडम्बना है। उस युग में जो अग्रणी है, चोटी पर है वह धार्मिक या आज जो बिल्कुल मूर्ख है, पिछड़ा हुआ है, वही धार्मिक है।

बुद्ध, महावीर के समय में जैसे बिहार के छोटे-छोटे इलाके की स्थिति थी, वैसी ही सारी दुनिया की स्थिति हो गई है। उतने ही बड़े व्यापक पैमाने पर, लेकिन बिल्कुल नए तरह का धार्मिक आदमी निर्मित करना पड़ेगा। नए तरह के संन्यासी निर्मित करने पड़ेंगे। पुराने काम नहीं आएंगे। नए ध्यान और योग के प्रयोग की क्रियाएं निर्मित करनी ही पड़ेंगी। समय तेज गति से चल रहा है। अब आज से ही स्वयं को नष्ट करना होगा, जिससे दूसरा रूपांतरित हो सके।

आज की राजनीति वैश्य बन गई है। यह गलती कुष्ठ की तरह हो गई है। जिसे खुजलाने में मजा आता है। शरीर से रक्त निकलता है। जिस पर मक्खियाँ भिनभिनाती हैं। इस रोग का उपचार अभी तक ठीक-ठीक खोजा नहीं जा सका। इससे आदमी सदियों से परेशान है। अतः यह मिटाने योग्य है। उसी उपचार की खोज है- ‘सद्विप्र समाज सेवा।’ अगर सद्विप्रों की आग फैलती जाती है दुनिया में तो राजनीति के कुरूप चेहरे को जलाकर राख किया जा सकता है।

दुनिया को सुन्दर बनाने के लिए न तो राज्यों की, न राष्ट्रों की, न राजनीतिज्ञों की जरूरत है। दुनिया में एक शासन काफी है। जिस शक्ति से पृथ्वी स्वर्ग हो सकती है। उसकी सत्तर प्रतिशत ऊर्जा युद्ध के नाम पर, प्रतिरक्षा के नाम पर नष्ट हो रही है। जिससे पृथ्वी नरक बनती जा रही है।

संन्यास को आज के परिप्रेक्ष्य में बदलना ही होगा। धर्मगुरु उत्तराधिकार में होता है। उसे मात्र पुस्तकीय ज्ञान होता है। धर्म से उसका संबंध दूर-दूर तक नहीं होता है। परन्तु उसकी साख होती है। बाजार में उसकी माँग होती है। वह रूढ़िवादी होता है। परम्परावादी होता है। इसे ही वह धर्म कहता है।

सद्गुरु अपने पैरों पर खड़ा होता है। वह विद्रोही होता है। वह जलता हुआ आग का अंगारा है। उसमें गर्मी है। तेज है। उसका तेज सभी नहीं झेल सकते हैं। उसे झेलने के लिए राम-लक्ष्मण, कृष्ण-बलराम-सी पात्रता चाहिए। यही कारण है कि समय के सद्गुरु को शिष्य के लिए इंतजार करना पड़ता है। या स्वयं शिष्य की खोज में विश्वमित्र की तरह अयोध्या का राजद्वार खटखटाना पड़ता है।

धर्मगुरु बुझी हुई राख है। उसमें गर्मी नहीं है। बहुत पहले कभी आग थी। अब बुझ गई है। जिसे धर्मगुरु ने संजोकर बक्से में रख लिया है। जिसकी महिमा का पाठ, स्त्रोत बना लिया गया है। नियम, उप नियम बन गए हैं। उसके प्रचार में पंडित, मौलानाओं को नियुक्त कर दिया गया है। स्वर्ग-नरक का जाल बिछाया गया है। जिसमें लोभी-लालची आसानी से फंस जाते हैं।

सद्गुरु पृथ्वी पर शंखनाद कर रहा है। जिसकी ध्वनि दूर-दूर तक गूँज रही है। पूरी पृथ्वी से सद्विप्रों ने चलकर आना प्रारम्भ कर दिया है। उन्हें विशेष संन्यास की कला प्रदान की जा रही है।

राम राज्य पर विचार करना होगा।

राम शब्द अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। जैसे रत्नों में कोहिनूर बेशकीमती है। पर्वतों में हिमालय, वृक्षों में पीपल, नदियों में गंगा, गायों में कामधेनु श्रेष्ठ है। उसी तरह शब्दों में राम शब्द श्रेष्ठतम् है। यह ढाई अक्षर का शब्द परम रहस्यपूर्ण, गुह्य मंत्र बन गया है। र का उच्चारण करते ही मूलाधर चक्र पर जोर पड़ता है। जैसे किसी ऊर्जा ने मूलाधार चक्र से गति प्रारम्भ कर दी। अ अक्षर आते ही वह परम ऊर्जा जैसे मणिपुर चक्र पर आती है। म अक्षर आते ही वह ऊर्जा आज्ञा चक्र पर आकर रुक जाती है। उच्चारण समाप्त होते ही मुँह स्वतः बंद हो जाता है। राम शब्द के बार-बार उच्चारण मात्र से साधक की सोयी हुई कुण्डलिनी; ऊर्जा मूलाधार चक्र से जागृत हो जाती है। सारे मलों को जलाकर भस्म कर देती है। तथा साधक के आज्ञा चक्र पर आकर विश्राम करने लगती है। वहीं गुरु पर्वत भी है। गुरु के इशारे मात्र से वह ऊर्जा सहस्त्रार में प्रवेश कर समाधि को उपलब्ध हो जाती है।

र+अ+म के संयोग से राम शब्द बना है। र-यह अग्नि का बीज मंत्र है। अग्नि-साधक के अन्दर के मलावरण को जलाकर भस्म कर देती है। मूलाधार चक्र के चारों तरफ विजातीय गैस, अवयव जन्मों जन्म से पड़े रहते हैं। उसे वह अग्नि जला देती है। जिससे साधक अन्दर से हल्का हो जाता है। अन्दर का दबाव कम हो जाता है। जिससे कुण्डलिनी का जागरण एवं गमन ऊर्ध्व दिशा में स्वतः हो जाता है।

अ- सूर्य का बीज मंत्र है। यह स्वर का प्रथम अक्षर है। इसके उत्पन्न होने से ही सारे स्वर तत्पश्चात व्यंजनों, अक्षरों की उत्पत्ति हुई है। अ अक्षर वर्णमाला का उद्गम स्रोत है। सूर्य अर्थात ज्ञान। साधक अन्दर से परम प्रकाश से प्रकाशित हो जाता है। उसके अन्दर से स्वतः वेद का उच्चारण होने लगता है। मणिपुर चक्र पर अग्नि का स्थान है। वही भगवान विष्णु का भी स्थान है। जहाँ से पूरे शरीर का पोषण होता है। वह विशुद्धि चक्र तक ध्वनित होता है। विशुद्धि चक्र सोलह दल कमल का है। जिसके प्रथम कमल दल पर ‘अ’ अक्षर ही ध्वनित होता है। जिसकी देवी आद्या है। जो समस्त, मृत्युलोक, पाताल लोकों का संचालन करती है एवं उसकी सूचना ऊर्ध्व लोक को भेजती है।

म-चन्द्रमा का बीज मंत्र है। चन्द्रमा शीतलता प्रदान करता है। वह अमृत देता है, जिससे साधक के सम्पूर्ण शरीर में नव ऊर्जा का संचरण होता है। वह अमृत साधक के सहस्त्रार से अहिर्निश बरसता रहता है। जो अमर लिंग पर आकर गिरता है। जिससे साधक के सिर अर्थात ब्रह्माण्ड से पाताल अर्थात् पैर तक का पोषण होता है। पूरा लोक उसी अमृत वर्षा से तृप्त होता है। साध्क पर गुरु अनुकम्पा बरसती है। साधक की स्थिति वैसी ही हो जाती है जैसे नीचे से गंगा का पानी बढ़ रहा हो, जिसमें साधक डूब रहा हो। ऊपर से गुरु अनुकम्पा की वर्षा से भीग रहा हो। प्रभु अनुग्रह रूपी बिजली चमक रही हो। प्रभु रूपी बादल की गड़गड़ाहट में साधक भाव विह्वल हो जाता है। वह सहज समाधि में प्रवेश कर जाता है।

अब वह ‘स्व’ तथा ‘पर’ का भान भूल जाता है। बांसुरी किसी की हो, गीत उस एक का ही सुनता है। दीए किसी के हों- प्रकाश उस एक का ही देखता है। अब वह पक्षियों के गीतों में भी कृष्ण का गीत; भगवद्गीता सुनता है। नदियों के कलरव में भी उपनिषद के महावाक्य सुनता है। आकाश में उसी का विस्तार देखता है। पृथ्वी उसी का पद्चिह्न प्रतीत होता है। कण-कण में उसकी ही छवि दिखाई देती है। सद्गुरु की उक्ति चरितार्थ होती है-

‘पात्-पात् में साईं रमत है, कटुक बचन मत बोल रे।’

उसी निराकार से आकारों की झीनी-सी ओट अनायास ही गिर जाती है। रह जाता है- वही। वही है- राम! उसी का हस्ताक्षर है- पूरी प्रकृति! जो व्यक्ति सहज समाधि् में रहता है। सद्गुरु कबीर के शब्दों में- ‘संतों सहज समाधि भली।’

जो येन-केन प्रकारेण समाधि मिलती है, खींच-तानकर, अपने प्रयासों से प्राप्त होता है, वह कभी भी सुन्दर नहीं होगा। परन्तु जो परमात्मा के द्वारा मिलता है। वही सुन्दर होगा। सुन्दरतम् होगा। सहज होते ही समर्पण आ जाता है। समर्पण होते ही गुरु अनुकम्पा बरस जाती है। आशीर्वाद मिल जाता है। विश्वमित्र जी आशीष देते हैं-

‘सुफल मनोरथ होहुँ तुम्हारे। रामु लखनु सुनि भए सुखारे।।’

ऐसे ही सहज समाधियुक्त व्यक्ति राम हैं। जो अयोध्या के सिंहासन पर आरूढ़ हैं। वहाँ किसी से किसी प्रकार का युद्ध नहीं है। सभी अपने-अपने कर्मों में लगे हैं।

गंगा का जल गोमुख से निकलता है। यदि वहीं से जल अपवित्र एवं गंदा निकले तब आगे जाने पर उससे क्या आशा की जा सकती है। उसी तरह सत्ता के शीर्ष व्यक्ति को गोमुख के गंगा जल की तरह पवित्र रखना होगा। राम ने स्वयं अपने को आदर्श के रूप में स्थापित किया। यही कारण था कि उनके राज्य में प्रत्येक व्यक्ति संतुष्ट और न्यायप्रिय था।

‘बयरू न कर काहू सन कोई। राम-प्रताप विषमता खोई।।’

सद्विप्र समाज की नीतियों को सारी जनता ने सहज अपनाया था। जिसका परिणाम था सभी स्वधर्म में स्थित थे।

‘सब नर करहि परस्पर प्रीति। चलहि स्वधर्म निरत स्रुति नीति।।’

प्रजा को पहले से ही शीत, गर्मी, प्रभंजन; तूफान, वर्षा, बाढ़, भूकम्प और दैवी विपत्तियों से बचाकर रखने की ऐसी वैज्ञानिक व्यवस्था कर दी गई थी कि किसी भी आधिदैविक विपत्ति से किसी को कभी कोई कष्ट नहीं होने पाता था। इसी प्रकार मनुष्य, पशु, पक्षी, जीव-जन्तु आदि किसी भी प्राण से किसी प्रकार कोई आधिभौतिक कष्ट प्रजा को नहीं होने पाता था। क्योंकि इन सब विपत्तियों की पहले ही कल्पना करके उनके निराकरण के सब उपाय कर लिए गए थे।

‘दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम-राज्य नहि काहुहिं व्यापा ||’

 

आगे कहते हैं-

विधु महिपूर मयूरवनन्हि, रवि तप जेतनेहिं ताप।

माँगे बारिद देहि जल, राम चन्द्र के राज।।

 

जहाँ रावण के राज्य में सभी एक-दूसरे से भयभीत थे। वा.रा. के उत्तरकाण्ड के सर्ग 96 में है- ‘शंकर जी द्वारा रावण ने अपना नामकरण कराके बड़ी प्रसन्नता से उन्हें प्रणाम किया और पुष्पक विमान पर सवार हो गया। अब वह दुष्ट पृथ्वी पर घूम-घूमकर क्षत्रियों को पीड़ित करने लगा। उस समय जिस वीर क्षत्रिय ने रावण की आज्ञा नहीं मानी- वह परिवार सहित मार डाला गया। बहुत से बुद्धिमान राजाओं ने रावण को अजेय समझकर हार मान ली।’ जब कभी वह किसी शक्तिशाली क्षत्रिय राजा से पराजित होता तब परदादा ब्रह्मा या दादा पुलस्त्य उसकी रक्षा करते। उनसे मैत्री संधि करा देते। जैसे वरूण, यम, सहस्त्रार्जुन, बालि आदि के साथ हुआ था। लगभग यही कार्य आर्यावर्त में रहकर परशुराम भी कर रहे थे। इन दोनों के आतंक से सद्विप्र समाज के नायक राम ने मुक्त किया। सभी परस्पर मिलकर रहने, बैरभाव को भूलकर प्रेम से कार्य करने में लग गए। जिससे स्वयं के विकास के साथ-साथ जगत का विकास होने लगा। अल्पमृत्यु का दौर रुक गया। सभी मानसिक रूप से निर्भीक हो गए। अतएव सुन्दर होना स्वाभाविक है।

अल्पमृत्यु नहि कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब विरूज सरीरा।।

नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहि कोउ अबुध न लच्छन हीना।।

सब निर्दंभ धर्मरत पुनी। नर अरू नारि चतुर सब गुनी।।

सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतग्य नहि कपट सयानी।।

 

यह स्थिति इसलिए आई कि राम गुरु आज्ञा के अधीन थे। सद्विप्र के लिए संकल्पित थे। उनकी सारी प्रजा ने भी उन्हीं का अनुकरण कर लिया। तथाकथित देवी-देवता का धर्म विदा हो गया। गुरु पूजा को ही सर्वदेवमयी पूजा के रूप में स्वीकार कर लिया। व्यक्ति देवी-देवता; पाषाण की पूजा कर मनमानी एवं उद्दण्ड हो जाता है। जबकि गुरु के सान्निध्य में रहने पर अपने मन रूपी मतंग पर स्वतः अंकुश लगाते रहता है। शिष्य शान्तिमय, मंगलमय, सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय मार्ग पर चल निकलता है। इसी संदर्भ में रा.च.मा.उ. 92/3 में कहा गया है-

गुरु बिनु भव निधि तरइ न कोई। जौं विरंचि संकर सम होई।।

 

राम राज्य में आठ मंत्री थे। 1. धृष्ट, 2. जयंत, 3. विजय, 4. सुराष्ट्र, 5.राष्ट्रवर्द्धन, 6.अकोप, 7. धर्मपाल और 8. सुमन्त्र, ये सब आठ विभागों के विभागाध्यक्ष थे। अपने-अपने कार्य में सभी दक्ष थे। ये परचित्य ज्ञानी भी थे। ये सब बड़े सदाचारी, पुण्यात्मा और निरंतर राजकार्य में लगे रहते थे।

आठ मंत्रियों के ऊपर सप्तऋषि थे, जो ऋत्विक मंत्र का भी काम करते थे। ये अर्थशास्त्र के पंडित थे। मंत्रणा का तत्व जानते थे। ये शीलवान्, विवेकशील, कार्यकुशल, जितेन्द्रिय, विनयी, शस्त्रविद्या में कुशल, अत्यंत पराक्रमी, यशस्वी, क्षमाशील, कीर्तिमान और हँसमुख थे। ये शत्रु राजाओं की रांइ-स्त्रा का भी ज्ञान रखते थे। ये थे- 1.वशिष्ठजी, 2.वामदेवजी, 3.सुयज्ञ, 4.जाबालि, 5.कश्यप, 6.मार्कण्डेय और 7.कात्यायन।

 

||हरि ॐ||

 

 

समय के सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज की अनमोल कृति ‘मेरे राम’ से उद्धृत.

 

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‘समय के सदगुरु’ स्वामी  कृष्णानंद  जी महाराज

आप सद्विप्र समाज की रचना कर विश्व जनमानस को कल्याण मूलक सन्देश दे रहे हैं| सद्विप्र समाज सेवा एक आध्यात्मिक संस्था है, जो आपके निर्देशन में जीवन के सच्चे मर्म को उजागर कर शाश्वत शांति की ओर समाज को अग्रगति प्रदान करती है| आपने दिव्य गुप्त विज्ञान का अन्वेषण किया है, जिससे साधक शीघ्र ही साधना की ऊँचाई पर पहुँच सकता है| संसार की कठिनाई का सहजता से समाधान कर सकता है|

स्वामी जी के प्रवचन यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध हैं –

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