
कैसे मिलूं सजन से…
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||श्री सद्गुरवे नमः||
कैसे मिलूं सजन से…
भावनाओं का बन्धन, एक धुरी जिस पर सारा संसार घूमता है, अगर हम इसको हटा दें तो सारा संसार रुक जाएगा और रुके हुए पानी और जीवन का क्या हाल होता है यह हम सभी जानते हैं। रुकने का नाम ही मृत्यु है और चलने का नाम ही जीवन है। बहुतों ने मनुष्य को कहा- रुक जाओ, ज्ञान को उपलब्ध हो जाओगे, भक्ति को उपलब्ध हो जाओगे, आनन्द को उपलब्ध हो जाओगे। परमात्मा को उपलब्ध हो जाओगे। मैं कहता हूँ- चलते रहो। चलो ही क्यों, दौड़ते रहो। आजकल चलना ही काफी नहीं है, अगर जीना है तो दौड़ना पड़ेगा। वरना दौड़ने वाले तुम्हें कुचल देंगे। मृत्यु को उपलब्ध तुम हो ही जाओगे, यह निश्चित है। जीने की कला तो तुम सीख लो।
प्रेम- जीवन और समाधि दोनों के लिए समान रूप से उपयोगी है। समाधि को वही उपलब्ध होता है जिसने जीना सीख लिया हो| जीवन को समझ चुका हो। बिना जीवन को समझे, बिना जीवन की कला सीखे, कोई भी व्यक्ति समाधि की तरफ एक भी कदम नहीं रख सकता। बल्कि वह समाधि से दूर भागता है। समाधि से वह डरता है। भारतीय समाज जब अपने आपको आध्यात्मिक कहता है तो मुझे बड़ा विरोधाभास सा लगता है क्योंकि भारतीय जितना अध्यात्म और समाधि से डरते हैं, उतना शायद ही कोई समाज डरता हो।
यह डर अकारण ही नहीं है। इसका एक कारण भी है। इसका कारण यह नहीं है कि भारतीय डरपोक है। बल्कि यह है कि यहाँ के धर्माचार्यों ने धर्म को हिंसा और पाखंड से परिपूर्ण बना डाला है। संन्यासी बनने से लोग डरते हैं। हिन्दू धर्म जितना पाखंड शायद ही किसी धर्म में हो, जहाँ संन्यासी का लाइसेंस काफी है, संन्यासी होना नहीं। बौद्ध धर्म की एक परिकल्पना है, प्रत्येक घर में एक संन्यासी होना चाहिए। हिन्दू धर्म में करोड़ों में एक संन्यासी मिलता है। पाखंडियों की संख्या हजारों है। उस एक को भी मजबूर होकर अलग सम्प्रदाय बनाना पड़ता है, क्योंकि हिन्दू विरासत में मिली अपनी इस धरोहर को छोड़ना नहीं चाहते। यही कारण है कि बुद्ध के अनुयायी भारत में कम हुए, महावीर के कम हुए, कबीर के कम हुए।
बुद्ध ने भारतीयों को दुःख का निदान बताना चाहा, पर भारतीयों को दुःख से प्यार है। इसलिए वे बुद्ध के अनुयायी नहीं बन सके। कबीर ने प्रेम का पाठ पढ़ाना चाहा। पर हमें तो नफरत के सहारे जीने की आदत पड़ गई है। यह आदत बन चुकी है इतनी आसानी से छूटने वाली नहीं।
इधर आजकल ठेका लेकर कुण्डलिनी जागरण कराने वालों की भीड़ उमड़ रही है। दुकानदारी चलाने का यह अच्छा तरीका निकल पड़ा है। जिस ज्ञान की खोज में महात्मा बुद्ध ने कई वर्ष लगा दिए, वे सारे काम अब ठेके पर ही हो रहे हैं। सर्वनाश हो उन ठेकेदारों का जिन्होंने धर्म की ठेकेदारी शुरु की है।
हम आगे बढ़ें, इससे पहले थोड़ा सोचें कि प्रेम क्या है? वस्तुतः यह एक ऐसा शब्द है जिसके ऊपर चाहे हम कितना भी क्यों न लिखें वह कम होगा। प्रेम की व्याख्या अनेकों प्रकार से कर सकते हैं। हम कह सकते हैं, प्रेम वह है जहाँ नफरत न हो। सभी को समान रूप से देखना भी प्रेम है। दूसरे शब्दों में हर सामने वाले को अपने समान समझना ही उससे प्रेम करना है। थोड़ी देर के लिए उस युवक की स्थिति पर विचार करें जो काफी चंचल है। सारा संसार उसे सौंदर्य से परिपूर्ण दिखाई पड़ता है। ऐसे में अचानक उसकी नजर एक युवती पर पड़ती है और युवक अपना सब कुछ गंवा बैठता है, दिल-दिमाग मन और चैन। उसे अब कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता सिवा एक के। उसकी हर सांस उसी एक को पुकारने लगती है। दिन का चैन रातों की नींद सब कुछ चली जाती है। प्रेम में जलना उसकी नियति बन जाती है। सारा संसार छूट जाता है, बस एक ही बचता है। ऐसे युवक को सारा संसार समझाता है। उस पर सारा संसार हंसता है कि छोड़ दो इसको। इसमें बर्बादी के सिवा कुछ भी नहीं है। तुम जल जाओगे बर्बाद हो जाओगे। जिन्दगी खराब हो जाएगी। युवक कहता है मुझे बर्बाद हो जाने दो, मुझे खराब हो जाने दो। कबीर इसी पथ के अनुयायी हैं। वे लुकाठी लेकर घूम रहे हैं और कहते हैं जिसको बर्बाद होना है, जिसको जलना है, वे मेरे साथ हो लें। कबीर किसी दूसरे की परवाह नहीं करते, वे यह नहीं देखते कि दूसरे उनके ऊपर क्यों हँस रहे हैं, दूसरे क्या कर रहे हैं! उनका उद्घोष है, उस एक को देखो और आगे बढ़ो। रास्ते में मिलने वाले आग और कांटों की परवाह मत करो। इसलिए कबीर अपरिपक्व व्यक्ति की तलाश कर रहे हैं। उनको गीली मिट्टी की तलाश है ताकि वे बर्तन बना सकें।
आम जिन्दगी में हमने जितने प्रेमी-प्रेमिकाओं को देखा है, उससे हमने यही निष्कर्ष निकाला है कि प्रेम हमेशा अपरिपक्व युवक-युवती ही करते हैं। वे युवक जो डॉक्टर, इंजीनियर या किसी नौकरी को पा गए हैं बिरले ही लव-मैरिज करते हैं। दूसरी तरफ हमने अपनी पढ़ाई को बीच में ही छोड़ देने वाले, प्रेम में जलने वाले हजारों युवकों को देखा है। इसीलिए कबीर की बातों से अपरिपक्व लोगों को पीड़ा होती है।
दूसरी तरफ बुद्ध दुःख का निदान बता रहे हैं। वे परिपक्व हैं। वे कबीर से ज्यादा व्यवहारवादी हैं। वे व्यक्ति को जलते हुए देखना नहीं चाहते। वे व्यक्ति को दुःख का निदान बता रहे हैं। वे यह कहते हैं इस संसार में दुःख है और इस दुःख पर विजय पाई जा सकती है।
पर वास्तव में दुःख है क्या, यह अपने आप में एक प्रश्न है। अगर इस शब्द पर लिखा जाए तो एक पूरा निबन्ध लिखा जा सकता है। पर मोटे तौर पर दुःख हम उन परिस्थितियों को कह सकते हैं जिनके कारण हमारी आत्मा, शरीर और मन क्षीण होता है, अत्यावस्थित हो जाता है। इन्सान की कोशिश यही होती है कि दुःख से लड़कर सुख की प्राप्ति करें। पर माया का ऐसा आवरण हमारे ऊपर छाया रहता है कि हम हमेशा सुख से लड़ते हैं और दुःख को खरीदते रहते हैं। हम जितने काम करते हैं उससे लगता है कि हमें सुख की प्राप्ति होगी, पर अन्ततः हमें दुःख की प्राप्ति होती है। इसी को विद्वानों ने माया कहा है, भ्रम कहा है।
‘काम’ को ही हम ले लें। हमें कितना आकर्षक लगता है पर उसके बाद में हमें थकान मिलती है। फ्रस्ट्रेशन मिलती है। एक गरीब व्यक्ति हमेशा सुख की तलाश धन में करता है| पर जब धनवान हो जाता है तब भी जब उसे सुख की प्राप्ति नहीं होती, वह और ज्यादा बेचैनी महसूस करने लगता है। इसे ही कहते हैं भ्रम या माया। इस माया के आवरण के कारण ही सही दिशा में हम अपना कदम नहीं बढ़ा पाते हैं। इस संसार में जितने भी असत्य हैं, क्षणभंगुर हैं। भ्रम हैं, माया हैं, मिथ्या हैं, कष्टकारी हैं और जितने भी सत्य हैं वे सुन्दर हैं, वास्तविक हैं और आनन्ददायक हैं।
इसी भ्रम, इसी माया को हम अपने जीवन से हटा दें तो हम दुःख पर विजय प्राप्त कर लेंगे। नाश हो उन कूपमंडूकों का जिन्होंने भारतीय समाज में यह बतलाया कि ‘माया’ संपत्ति है, ‘माया’ स्त्राी है। माया सगे-संबंधी हैं। अगर कोई कहता है कि मनुष्य इन्हीं के कारण दुःख भोगता है तो वह सर्वथा गलत है। राम और कृष्ण ने तो कभी ऐसा नहीं कहा, फिर सारे सनातन धर्म के ठेकेदार बार-बार इन उक्तियों को क्यों दोहराते हैं? अपने घर, अपने बच्चों, अपनी संपत्ति का परित्याग कदापि वैराग्य नहीं है। बल्कि वास्तविकता को स्वीकार कर लेना वैराग्य है, जैसे मृत्यु जीवन का एक अनिवार्य अंग है। पर है कि वह अपने बच्चों का पालन-पोषण सही ढंग से करे। पर इसके बावजूद भी बच्चा सही नहीं निकलता। इसमें माता-पिता को दुःखी होने की क्या जरूरत है, पर पिता दुःखी हो जाते हैं। यही खरीदा हुआ दुःख है। इसलिए वैरागी मनुष्य निरुद्देश्य व मोह रहित कर्म करता है, यहाँ तक कि वह ईश्वर से भी विरक्त हो जाता है| क्योंकि जब तक एक भी खूंटे से हम बंधे होंगे तो मोह में जकड़े होंगे। परिणाम स्वरूप दुःख की मात्रा कम ही सही पर होगी जरूर। इसलिए बुद्ध उस ईश्वर रूपी डोर को भी काट देते हैं। जब हम दुनिया के सारे डोर काट देते हैं। इसका अर्थ है कि हमने सत्य को स्वीकार कर लिया। इस बात को स्वीकार कर लिया है कि हम अकेले आए हैं और अकेले ही जाएंगे और यही सत्य सुन्दर, पर कड़वा है। आनन्ददायक है, पर अपनाना अत्यन्त कठिन है। वैराग्य से परिपूर्ण जीवन मोह रहित होता है। ऐसी स्थिति में स्त्री, पुत्र सभी आनन्द का माध्यम होते हैं, दुःख का नहीं| पर मनुष्य ने कसम खा रखी है कि वह दुःख खरीदेगा। अगर अपने पास दुःख नहीं है तो पड़ोसी से उधार ले लेंगे। भारत में एक कहावत प्रचलित है हम इसलिए दुःखी नहीं हैं कि हमारे पास दुःख है। बल्कि इसलिए दुःखी हैं कि हमारे पड़ोसी सुखी हैं। ऐसी स्थिति में यदि बुद्ध अमृत भी पिलाते हैं तो मनुष्य पीने को तैयार नहीं है और सनातन धर्म वालों की तो बात ही छोड़ो। इन्हें दुःख भोगने की तो आदत है। सीता को माता मानकर पूजने वाले व्यक्ति अपनी पत्नी को तरह-तरह की यातनाएँ देते हैं। ऐसे व्यक्ति दुःख नहीं झेलेंगे तो क्या करेंगे।
मैं यह नहीं कहता कि हमारा हिन्दू धर्म, सनातन धर्म बुरा है। यह एक बड़ा ही वैज्ञानिक धर्म है। इस धर्म में संन्यास का स्थान नम्बर वन पर है। प्रारंभिक जीवन को ब्रह्मचर्य कहा गया है। ब्रह्मचर्य जीवन का चाहे हम जो अर्थ लगाएं, पर मेरी समझ से इसका वास्तविक अर्थ है इस जीवन में क्या सत्य है, क्या असत्य- इसको जानना। चूंकि प्रत्येक आदमी ब्रह्म के समान आचरण नहीं कर सकता। ब्रह्म के समान वही हो सकता है जो ब्रह्म को जान गया हो। अपने आपको पहचान गया हो। पर हमने इस व्यवस्था के सृजन के समय इतना अवश्य सोचा होगा कि ब्रह्मचर्य-जीवन में व्यक्ति को इतनी शिक्षा अवश्य मिल जाए ताकि वह सत्य और असत्य को जान सके।
मनुष्य के लिए सत्य को जानना इसलिए जरूरी है कि सत्य सुन्दर है। सत्य आनन्दकारी है। सत्य से जीवन में निखार आता है। जीवन सौंदर्य से परिपूर्ण बनता है। व्यक्ति सहज बन जाता है। उसमें वास्तविकता और सच्चाई को स्वीकार करने की शक्ति आ जाती है। एक सहज हृदय ही प्रेम की ओर प्रवृत्त होता है। जिसके कारण जीवन में सरसता का संचार होता है। चेहरा खिल जाता है मुखड़े पर मुस्कान रहती है। असत्य को जानना इसलिए जरूरी है क्योंकि यह मिथ्या है, भ्रम है, कपटकारी है। इसके सान्निध्य से जीवन नरक बन जाता है। जीवन शुष्क पड़ जाता है। प्रेम की जगह नफरत ले लेती है। ऐसा व्यक्ति वास्तविकता को स्वीकारने के बजाए उसे नकार देता है। वह असहज बन जाता है। व्यक्ति अंदर से राक्षस बन जाता है। असत्य की पहचान यही है कि जो इसके सान्निध्य में रहता है, वह उसी का नाश करता है इसलिए इससे बचना जरूरी है।
पर धर्माचार्य इस व्यवस्था का रुपांतर अपने फायदे के अनुसार करने लगे। ब्रह्मचर्य का अर्थ कूपमंडूक ने यह बता दिया कि पच्चीस वर्ष तक लंगोटी बांधकर रहो। लड़का और लड़की एक-दूसरे से अलग रहें। परिणाम यह हुआ कि समाज के दो आधार स्तम्भ, जिन्हें नौजवान होकर मिलना है, एक-दूसरे को समझ नहीं पाते। एक-दूसरे से अजनबी बने रहते हैं। सत्य क्या है, समझ नहीं पाते।
आचार्य रजनीश कहते हैं कि भारतीय युवकों की अधिकांश शक्ति लड़कियों के स्कर्ट के नीचे क्या है, यह देखने में बर्बाद हो जाती है। फिर वह कैसे सोचेंगे चाँद पर जाने के बारे में, कैसे सोचेंगे विज्ञान के बारे में, आत्मा और जीवन के बारे में!
पश्चिम की लड़कियाँ थोड़े कम कपड़े पहनती हैं। आलिंगन तथा चुम्मा लेना आम बात है। इसलिए पश्चिम के लोगों ने चाँद-तारों के बारे में सोचा, विज्ञान के बारे में सोचा, उनके यहाँ कमरे के भीतर जो कुछ भी होता है वही कमरे के बाहर भी होता है। वे जो अंदर हैं, वही बाहर भी हैं। वे सहज हैं, सरल हैं, इसलिए आज हमारे स्वामी की तरह हैं| हम उनसे कर्ज लेते हैं। कभी गरीबी के नाम पर, कभी शिक्षा के नाम पर तो कभी विकास के नाम पर। परिणाम स्वरूप स्त्री-पुरुष का संभोग जो कि सृष्टि का आधार है, उपेक्षित हो गया। हम काम को सहज रूप में स्वीकार नहीं कर पाए। इसलिए अब स्त्री-पुरुष मिलते भी हैं तो बंद कमरे में। उमस भरे वातावरण में। किसी पार्क के खुले वातावरण के बीच वे कैसे मिल सकते हैं! पच्चीस वर्ष तक जिस युवक-युवती को यह समझाया गया कि संभोग पाप है तो पच्चीस वर्ष के बाद उसकी इजाजत मिल जाने के बाद भी सहज रूप में वे इसको कैसे स्वीकार कर पाएंगे! परिणामस्वरूप विरोधाभास हमारी जिन्दगी का हिस्सा बन जाता है। असहजता हमारी प्रकृति बन जाती है। हम जानते हैं कि असहज व्यक्ति का मन स्थिर नहीं होता, उसका मन डाँवाडोल होता है। और अस्थिर मन शायद ही कोई ऐसा काम कर पाता है, जो सुन्दर है।
ब्रह्मचर्य के लिए जो शिक्षा ग्रहण करने की उम्र हो, उसमें वे सारी बातें एक बच्चे को बता देनी चाहिए, जो उसके जीवन के लिए जरूरी हैं। जो समाज के लिए जरूरी हैं, वह बतलाई ही नहीं जातीं। बल्कि गलत मान्यताओं व अवधारणाओं से एक बालक के मन को विकृत बना दिया जाता है। स्थिति यह होती है कि जब हमारा युवक ब्रह्मचर्य की उम्र को पार करता है तो जीवन का सामना नहीं कर पाता।
आज हमारे देश के अधिकांश भागों में अपहरण, चोरी, डकैती आम बात हो गई है। सबसे गरीब बिहार को अगर हम ले लें तो वहाँ का अधिकांश युवक विक्षुब्ध अवस्था में है। वहाँ पर युवकों के पढ़ने का उद्देश्य यह नहीं है कि पढ़ने से देश, समाज के लिए उपयोगी अंग बनेंगे बल्कि धन कमाना है। परिणाम स्वरूप पढ़ने के बाद भी जब वे धन नहीं कमा पाते तो धन कमाने के लिए अपहरण और डकैती शुरु कर देते हैं। यह गलत शिक्षा पद्धति का ही परिणाम है।
भारतीय आध्यात्म लोगों को जीने की कला सिखाता है। लेकिन हम अपने आपको ही भूल चुके हैं। जब भारतीय आध्यात्म यह कहता है कि काम के प्रति संयम रखो तो दूसरे शब्दों में यह भी कह रहा है कि जनसंख्या कम रखो। यह कहता है कि प्रेम करो, पर काम के प्रति संयम बरतो। प्रेम जीवन का आधार है। यह सृष्टि का आधार है और साथ-ही-साथ हमें एक-दूसरे के लिए जीना भी सिखाता है। लेकिन कूपमंडूकों ने यह कहना शुरु कर दिया कि स्त्री से दूर रहो, उसके पास जाओगे तो काम भावना उभरेगी। यह कहा गया कि संन्यासी वही कहलाएगा जो शादी नहीं करेगा। परिणाम यह हुआ कि साधु-महंत बिना शादी के रहने लगे।
सही अर्थ में अगर समझा जाए तो जीवन का प्रारंभिक वर्ष इसलिए है कि एक व्यक्ति यह समझ जाए कि पूरा जीवन क्या है! स्त्राी क्या है? पुरुष क्या है? इसलिए सहशिक्षा अनिवार्य है। इधर दिल्ली में हमने देखा कि लड़कियों व लड़कों के लिए अलग-अलग विद्यालय खुले हैं। कॉलेज भी अलग-अलग खुले हैं। लेकिन दिल्ली में सबसे ज्यादा बलात्कार की घटनाएँ घट रही हैं। भाई-बहन और बाप-बेटी का रिश्ता भी खत्म हो गया है। इसलिए प्राचीन भारतीय जीवन व्यवस्था में सुधार की जरूरत है। अब संन्यास पहले आना चाहिए और ब्रह्मचर्य बाद में। यदि ब्रह्मचर्य का अर्थ है पच्चीस वर्षों तक लड़कियों से दूर रहना।
जीवन के लिए, जीवन के प्रारंभिक वर्षों में संन्यासी की तरह जीवन व्यतीत करना बहुत जरूरी है। प्रारंभिक वर्षों में जीवन-चर्या ठीक उसी प्रकार होनी चाहिए, जिस प्रकार प्राचीन काल में इसी देश में आश्रमी शिक्षा पद्धति के अंतर्गत थी। उस समय ज्ञान व उपदेश के साथ-साथ बच्चों से खेती भी करवाई जाती थी। आरुणि की कहानी लगभग सबने पढ़ी होगी। जो बच्चा अपने शरीर से खेत का पानी रोकने का साहस कर सकता है, वह जीवन में क्या कुछ नहीं कर सकता है! दूसरे शब्दों में उस वक्त ज्ञान देने के साथ-साथ उस ज्ञान को व्यवहार में उतारने का प्रयास भी कराया जाता था। लेकिन आज की शिक्षा पद्धति ऐसी है कि जो पढ़-लिख गए हैं, वे मिट्टी को छूना अपनी-अपनी शिक्षा का अपमान समझते हैं। भारत का इंजीनियर ऑफिस में बैठता है| मशीनों के पास खड़ा नहीं रहता। एक नट भी खोलनी पड़ जाए तो अपने हाथों से नहीं खोलता, बल्कि दूसरे से खुलवाता है और दूसरा नहीं है तो समझो काम बंद। जिस देश के इंजीनियर कालिख और धूल-मिट्टी लगने से डरते हैं, उस देश का विकास कैसे हो सकता है।
मेरा एक अपना अनुभव है-एक इटली के कारखाने में जाने का मौका मिला। मैं जब वहाँ गया तो देखकर आश्चर्य से भर गया। दो अंग्रेज जिसमें से एक इंजीनियर मैनेजर था, उसके हाथों में कालिख लगी थी। वह जनरेटर ठीक कर रहा था। वहाँ का जनरल मैनेजर हर दस मिनट के अंदर पूरे फॉर्म की परिक्रमा पूरी कर लेता था। हमारे देश के मैनेजर पत्थर की मूर्ति की परिक्रमा करते हैं। मेरे आश्चर्य का ठिकाना उस वक्त और न रहा, जब उसने एक मजदूर को एक टोकरी उसके सिर पर उठवाने में मदद की। जिस फॉर्म में श्रम और बुद्धि का इतना अच्छा समन्वय हो, वह विकास कैसे नहीं करेगी। इसलिए मैं दोबारा कह रहा हूँ इस वक्त यूरोप के लोग भारतीयों से ज्यादा आध्यात्मिक हैं। उनका जीवन हमसे ज्यादा परिपूर्ण है। वे हमसे ज्यादा धन-धान्य से परिपूर्ण हैं। वे जीने की कला को जानते हैं।
।। हरि ॐ।।
समय के सद्गुरु स्वामी श्री कृष्णानंद जी महाराज की अनमोल कृति ‘गुरु ही मुक्तिदाता’ से उद्धृत…
‘समय के सदगुरु’ स्वामी कृष्णानंद जी महाराज
आप सद्विप्र समाज की रचना कर विश्व जनमानस को कल्याण मूलक सन्देश दे रहे हैं| सद्विप्र समाज सेवा एक आध्यात्मिक संस्था है, जो आपके निर्देशन में जीवन के सच्चे मर्म को उजागर कर शाश्वत शांति की ओर समाज को अग्रगति प्रदान करती है| आपने दिव्य गुप्त विज्ञान का अन्वेषण किया है, जिससे साधक शीघ्र ही साधना की ऊँचाई पर पहुँच सकता है| संसार की कठिनाई का सहजता से समाधान कर सकता है|
स्वामी जी के प्रवचन यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध हैं –
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