आखिरी मंज़िल

आखिरी मंज़िल

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sagar gupta

16 Jul 202412 min read

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अमावस्या के चलते इतना धुंध और अंधेरा था कि पता ही नहीं चल पा रहा था कि कौन-सी जगह हैं। बस मैं उस कच्ची पगडंडी में चले जा रहा था। रेशम का कुर्ता और धोती पहन में किसी बड़े बाबू से कम नहीं लग रहा था।

दिसंबर का महीना था। कड़कड़ाती ठंड अब पड़ने लगी थी। यूं तो अपने गाँव जाने के लिए पक्की रोड वाला रास्ता भी था। पर  सोचा क्यों न उस कच्चे रास्ते से फिर जाया जाए, जहाँ से बाबूजी बचपन में घर ले जाया करते थे। इसलिए मेरी नज़र जैसे ही उस पुराने कच्चे रास्ते में पड़ी, मैंने बस वहीं रुकवा दिया। शायद वो पुरानी यादों को मैं दुबारा जीना चाहता था।

बचपन में माँ, बाबूजी को उस रास्ते से जाने पर फटकार लगाती थी। माँ कहती थी कि क्यों उस वीरान से रास्ते से जाते हो। माँ मुझे भी खूब डराया करती थी कि उस रास्ते से रात को जो गया, वो कभी लौट कर नहीं आया। मैं भी डर जाता और माँ के आँचल में छुप जाता। पर अब मैं बड़ा हो गया था। माँ की मनग्रहन्त बातें अब मुझे नहीं डरा सकती थी।

अब मैं वो छोटा बालक न रहा। मैं अब एक व्यापारी बन गया था। बहुत पैसे भी कमाए थे, कुछ ईमानदारी के और कुछ बेईमानी के। शायद बेईमानी के पैसे, ईमानदारी के पैसे से कुछ ज्यादा ही होंगे, क्योंकि धंधा या व्यापार में झूठ-सच तो करना ही पड़ता है।

माँ अब बूढ़ी हो चुकी थी। कई सालों बाद मैं उनसे मिलने अपने गाँव जा रहा था। माँ का पत्र हमेशा मिलते रहता था। वो मुझे और उनकी बहू और पोते-पोतियों को देखने के लिए व्याकुल रहती थी। लेकिन व्यापार चलाने और धन कमाने में मैं इतना व्यस्त था कि कभी फुर्सत ही नहीं मिली कि घर जाकर अपनी बूढ़ी माँ को देख आऊँ। 5-7 महीने से उनका पत्र भी आना बंद हो चुका था।

 एक दिन गांव के रमेश चचा शहर आए हुए थे और शहर के ही एक जानेमाने दुकान में उनकी नज़र मेरे से मिल गई। मैं उनसे पल्ला छुड़ाने के लिए इधर-उधर देख दुकान से निकलने लगा था, जैसे कि मैंने उन्हें देखा ही न हो। पर उन्होंने मेरे हाथ को धर दबोचा। मेरे पास अब कोई रास्ता नहीं था।  मैंने झट से उनका पैर छू कर प्रणाम किया, “चचा प्रणाम। आप यहाँ?”

 तब उन्होंने बताया कि उनका छोटा बेटा अनिल, इंजिनीरिंग की पढ़ाई करके शहर में ही नौकरी करने लगा हैं। उससे ही मिलने वो शहर आए हुए थे। उन्होंने ही बताया कि उसकी माँ की तबियत बहुत ख़राब रहती। वो कुछ दिन की ही मेहमान हैं। उनसे मिल आओ।

वैसे तो उस समय भी मेरे पास अपने गांव जाने का समय नहीं था, फिर लगा कि अगर माँ को कुछ हो गया तो समाज वाले उसके बारे में भला-बुरा कहेंगे। बोलेंगे कि बुढ़िया अपने बेटे का मुँह देखने को तरस गई, लेकिन बेटा आया नहीं।

मैंने घर जाकर अपनी अर्धांगिनी और बच्चों को माँ के बीमार होने की बात बताई। बीवी ने गाँव जाने से मना करते हुए कहा कि आपको जाना है तो जाओ उस गाँव। शादी के तुरंत बाद गर्मी में गई थी वहाँ। AC तो छोड़िए, कूलर भी नहीं था और बिजली भी रामजी के भरोसे।

अब तो इतनी ठंड पड़ रही है। हीटर तक नहीं होगा वहाँ। इतने ठंड में कैसे रहूंगी मैं अपने बच्चों साथ।

वैसे तो मेरी अर्धांगिनी भी गाँव में ही पली-बढ़ी थी लेकिन कुछ सालों से शहर में रहने के कारण वो भी शहर के रंग में रंग चुकी थी। मैंने अपने बच्चों की ओर देखा। उनकी नजरें भी उनके राय को बयां कर रही थी। अंततः मैंने अकेले अपने गाँव जाने का फ़ैसला किया।

मैं ये सब सोच कर उस कच्चे पगडंडी में चला जा रहा था। हवा के ठंडे थपेड़े मानो कान ही काट दे। पूरे रास्ते में उस अंधेरी रात में मुझे कोई मिला नहीं था।  पैर के नीचे दबने वाले सूखे पत्तों की कड़कड़ाहट और उल्लू की आवाज़ उस शांतिमय माहौल में कौतूहल पैदा कर रही थी। बहुत डर लग रहा था कि कही कोई चोर-हुचक्का मेरे समान औऱ पैसे न छीन ले। कुछ दूर आगे चलने पर मुझे कुछ दूर दायीं तरफ से लोगों के ठहाके मारने की आवाज सुनाई दी। उस काली रात में कुछ नज़र आ नहीं रहा था। लोगों की आवाजे सुनकर मैं वहीं रात बिताने का सोचा।

मुझे लगा कि मेरे जैसे ही कुछ मुसाफिर रात बिताने के लिए इस वीरान सी जगह में बैठ कर बातें कर रहें तो क्यों न उनके साथ ही रात बिताई जाए क्योंकि उस अंधेरी रात में रास्ता भटक जाने का डर मुझे सता रहा था। एक तो बहुत सालों पहले मैं उस रास्ते से गुजरा था और दूसरी ओर उस कोप अंधेरे में जंगली जानवर के आ जाने का भी डर सता रहा था। मैं उस रास्ते की ओर मुड़ गया, जिधर से आवाजें आ रही थी।

उस ओर जाते-जाते मेरा सर किसी दरवाजे से जा टकराया।  हाथ से छूने पर मुझे पता लग चुका था कि दरवाजा लोहे का हैं और पूरी तरह से जर्जर है। मैंने उस टूटे हुए दरवाज़े को जोर से अंदर की ओर धकेला। जंग लग जाने के कारण बहुत जोर की आवाज़ के साथ दरवाजा खुला। दरवाजे की आवाज़ से अंदर जिन लोगों की आवाज़ें आ रही थी, वो आना बिल्कुल बंद हो गया। मुझे लगा कि ये लोग मुझे चोर समझ कर पिट न दे।  मैं धीरे-धीरे अंदर प्रवेश करने लगा।

अचानक से किसी की जोर से आवाज़ आयी,” कौन हो रे?”

मैं सकपका गया।

“जी, मुसाफिर हूँ जनाब। यहाँ आप लोगों की आवाज़ आ रही थी और काफी रात भी हो गई तो सोचा यही रुक जाऊ। अहले सुबह यहाँ से निकल जाऊँगा।”

“मुसाफिर तुम अकेले थोड़ी हो। हम सब मुसाफिर हैं इस दुनिया में। कभी न कभी सबको यहाँ से जाना हैं, चाहे कितना भी कमा लो।” किसी ने ठहाका मारते हुए कहा।

“आवा हो। बैठो। हम भी सुबह के इंतज़ार में ही बैठे हैं। हम भी मुसाफिर ही हैं।” किसी दूसरे सज्जन की नम्र आवाज़ आयी।

“बैठिए।” किसी ने मेरा हाथ पकड़ कर बड़े अदब से कहा।

“जी शुक्रिया। धन्यवाद यहाँ जगह देने के लिए।”। मैंने बैठते हुए कहा।

उस अंधेरी रात में किसी का चेहरा देखना मुश्किल था। बस लोगों की बातचीत से पता चल रहा था कि वहाँ 5-6 लोग तो जरूर थे।

कुछ देर तक सन्नाटा पसड़ा रहा।  फिर उस सन्नाटे को चीरते हुए किसी की आवाज़ आयी,”बाबू, क्या करते हो तुम?”

“जी, व्यापारी हूँ।”

“तो इधर कैसे आ गए इस वीरान रास्ते में?”

“जी, अपने गाँव जा रहा था।”

“कौन सा गाँव?”

“बड़कागाँव”

“गाँव भी बड़का या छोटका होता है का रे?” किसी ने ठहाका मारते हुए कहा।

“नहीं, नहीं.. आप ग़लत समझ रहे। मेरे गाँव का नाम ही बड़कागाँव हैं।”

“किसके बेटे हो?”

“जी, मिश्रा जी का।”

“कौन? अनूप मिश्रा का?”

“जी हाँ… आपको कैसे पता चला?” मैंने संसय में कहा।

“अरे। हमनी तोहरा के कैसे नहीं पहचन्वो? हम भी वहीं गांव का हूँ।” उन्होंने स्थानीय भाषा में कहा।

“तो आप इधर क्या कर रहे हैं? कहीं बाहर से आ रहे क्या आप?”

“नहीं, अब हम इन्हें ही रहल। यहीं अपना ठिकाना हैं।”

उनकी बात मैं समझ न सका। पर मैंने फिर कुछ पूछना ठीक नहीं समझा।

थोड़े देर तक फिर से शांति छा गई। ठंडी हवा शरीर में सिहरन पैदा कर रही थी। आधी रात गुजर चुकी थी और आधी गुजारनी थी। पर मैं खुश था कि मैं अब अकेला नहीं था। जब किसी की कोई आवाज़ नहीं आई तो मैंने रात गुजारने के लिए फिर से कोई बात शुरू करने का सोचा।

“बहुत सालों बाद मैं अपने गाँव माँ से मिलने जा रहा। उत्साहित हूँ कि अपना गाँव कैसा होगा अब?”

“इतने साल से घर नहीं गए। माँ को कौन देखता है फिर गाँव में?”

मेरे पास कोई जवाब नहीं था।

“अच्छा, माँ को अकेले छोड़ शहर में रहने लगे। अच्छा है।” किसी ने कटु कटाक्ष किया।

“अच्छा, एक बात बताईये व्यापारी बाबू। हम सब पैसे कमाने के लिए घर-बार, अपनों को छोड़-छाड़ चले जाते हैं। पैसे भी बहुत कमा लेते। लेकिन क्या जिंदगी का मकसद पैसे कमाना ही है?” एक सज्जन ने पूछा।

“नहीं। लेकिन बिना पैसे के काम भी तो नहीं चलने वाला।” मैंने उत्तर दिया।

“पैसे कमाना तो ठीक बात हैं। लेकिन जरूरत से ज्यादा पैसे कमाने से क्या होगा? व्यक्ति की तीन ही तो आधारभूत जरूरत है~ रोटी, कपड़ा और मकान। एक तरह से देखा जाए तो यही तीन चीज़ ही बस जरूरत है पैसे से कमाने की। अगर आप बहुत पैसे भी कमा लेंगे तो ज्यादा से ज़्यादा क्या कर सकते। 4-5 मकान ले लेंगे। नए-नए रेशमी कपड़े खरीद लेंगे। खाने में किसमिश, काजू को भी शामिल कर लेंगे। लेकिन 4-5 मकान लेने से क्या होगा? रहेंगे तो आप एक ही मकान में। कितने भी रेशम के कपड़े खरीद ले, लेकिन नींद तो सूती कपड़े में ही आएगी। चाहे कितने भी महँगे रेस्तरां में जितना भी स्वादिष्ट भोजन खा ले, लेकिन हमेशा वहीं खाने पर आप ऊब जाओगे। लेकिन कभी घर का रोटी-सब्जी खा कर आप कभी नहीं उबेंगे।” उसी सज्जन ने कहा।

बात तो बिल्कुल सही और सटीक थी। मैं गहन सोच में पड़ गया। मुझे याद आने लगा उन दिनों की बात, जब मेरी अर्धांगिनी अपने मायके गई हुई थी। मैंने सोचा था कि होटल का स्वादिष्ट भोजन खा कर मजे से रहूँगा। पर तीन-चार दिनों तक लगातार होटल में खाने के बाद मैं उससे इतना ऊब गया था कि होटल के खाने की बात सोचकर ही उबाश होने लगता। अर्धांगिनी के आने के शेष दिन मैंने फल खा कर जैसे-तैसे बिताए थे।  जब  मैं उस सज्जन के बातों के उधेड़बुन में फंसा हुआ उनके बातों के बारे में सोच रहा था, तभी दूसरे सज्जन ने बोलना शुरू कर दिया।।।

“बात तो सही कहा आपने। हमसब पैसे के पीछे इतने पागल हो गए है कि हमें पता ही नहीं कि पैसे एक समय के  बाद कोई मायने नहीं रखते। मायने रखता हैं तो आपका परिवार, आपका स्वास्थ्य और आपका संगीतमय जीवन। युवावस्था में हम पैसे के लिए दिनरात पागल रहते। रातों की नींद-चैन सब भूल जाते। हम सोचते है कि बुढ़ापे में ये पैसे काम देंगे। पर जब हम बुढ़ापे की ओर अग्रसर होते हैं तब पैसे के पीछे किये भाग-दौड़ के चलते अपना स्वास्थ्य खो देते हैं। हमारे पास इतनी ऊर्जा बचती ही नहीं कि हम उस पैसे का उपभोग कर पाए। जब बुढ़ापा आता, उस समय हमारे पास बस पैसे बच जाते और दोस्त, परिवार, स्वास्थ्य सब मुँह मोड़ लेते।” दूसरे सज्जन ने काफी भावपूर्ण तरीके से ये बातें व्यक्त की ।।

“हमने जीवन की परिभाषा ही ग़लत समझ ली हैं। जीवन और पैसे को समानार्थी शब्द समझ लिया है। जबकि पैसा जीवन जीने का एक छोटा-सा माध्यम हैं। उसकी भूमिका बहुत ही छोटी हैं। अगर पैसे का जीवन में इतना महत्ता रहता तो भगवान महावीर, बुद्ध जैसे राजा भोगविलाश और अपना राजपाट छोड़ कर जीवन की असली परिभाषा ढूंढने नहीं निकल पड़ते।” एक बुड्ढे सज्जन की आवाज़ आई।

मैं बस उनलोगों की बस बातें सुनने में व्यस्त था। उनके विचार और बातें मेरे दिल के किसी कोने में घर कर रही थी। आजतक मैंने कभी जिंदगी के बारे में इस तरह सोचा ही नहीं था। मेरे लिए भी जीवन का अर्थ बस पैसा था लेकिन इन महानुभाओं की बातें सुन मुझे ये समझ आ गया था कि जिंदगी का असली अर्थ उसे पल-पल जीने में हैं। स्वास्थ्य, परिवार और दूसरों के हित के लिए जीना ही वास्तविक धन संग्रहित करना हैं। जब आपका अंत समय आता हैं तो ये मायने नहीं रखता कि आपने कितनी तिजोरियां भर ली, मायने ये रखता हैं कि आपके कारण कितनो के चेहरों में खुशी आई। मुझे मानो आत्मज्ञान की एक झलक उन सज्जनों से मिल गई थी।

मैं इन विचारों में खोया हुआ था ,तभी मुझे किसी की आवाज़ सुनाई दी,”चलो मियां, सुबह होने को है। अब तुम घर जाओ। हमारे सोने का समय हो गया हैं। बस हमारी बात हमेशा याद रखना कि जिंदगी को पैसे का पर्यावाची कभी मत समझना। अपने अनुभव के आधार पर हम कह रहे।”

मुझे समझ नहीं आया उनकी बात। जब सुबह होने को हैं तो वो सोने जा रहे और वो भी इतनी सुनसान जगह। मैंने आवाज लगाई, “अब तो अपने घर जाने का समय हो रहा। भोर होने वाली हैं। कहाँ आप सोने जा रहे?”

पर किसी की कोई आवाज़ नहीं आई। थोड़ी देर बाद सूर्य के आने का संकेत हो चुका था। धीरे-धीरे अंधेरी रात को ढकने प्रकाश रूपी सेना निकल चुकी थी। जब भोर हुआ तो मैंने देखा कि मेरे आस-पास कोई नहीं था। मेरे चारों ओर बस कब्रे थी और मैं खुद एक कब्र के ऊपर बैठा हुआ था। मुझे अब भी कुछ समझ नहीं आया।  मैं हड़बड़ा कर वहाँ से उठ भाग निकला। गेट से बाहर आने पर मैंने देखा कि उस कब्रिस्तान के बाहर एक  बोर्ड लगा हुआ था और जिसमें “आखिरी मंजिल” लिखी हुई थी।

अब मुझे सब कुछ स्पष्ट होने लगा था और मेरे आँखे खुद-ब-खुद नम हो चुकी थी। मैंने सर झुका कर कब्रिस्तान की ओर मुँह करके प्रणाम किया और वहाँ से एक बड़ी-सी मुस्कुराहट के साथ अपने गाँव निकल पड़ा।

आज एक बड़ी सीख उनलोगों ने मुझे दे दी थी जो इस दुनिया को पहले ही छोड़ चुके थे।

 

उपसंहार-

हमसब पूरे जीवन भर पैसे के पीछे भागते रहते बिना कुछ सोचे-समझे। फिर एक समय आता है जब  हम अपनी आखिरी साँसे गिन रहे होते हैं, तब हमारे सामने पूरी जिंदगी एक फ़िल्म की तरह सामने से गुजरती हैं और उस समय हमें समझ आता है कि हम पूरे जीवन भर पत्थर अर्जित करते रह गए ,जबकि हीरा तो कुछ और था। जितना भी पैसे एकत्रित कर लो पर “आखिरी मंजिल” मौत ही है और जब मौत आती है तो उस समय किसी की कोई “घुस” भी यमराज की मंशा बदल नहीं सकता।

अतः “आखिरी मंजिल” पहुँचने से पहले की सारी जिंदगी हम इस तरह जिये कि जब अंत समय आये तो कुछ मलाल न हो और खुशी-खुशी हम उस आखिरी मंजिल की ओर प्रवेश करे।।

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दिसंबर का महीना था। कड़कड़ाती ठंड अब पड़ने लगी थी। यूं तो अपने गाँव जाने के लिए पक्की रोड वाला रास्ता भी था। पर  सोचा क्यों न उस कच्चे रास्ते से फिर जाया जाए, जहाँ से बाबूजी बचपन में घर ले जाया करते थे। इसलिए मेरी नज़र जैसे ही उस पुराने कच्चे रास्ते में पड़ी, मैंने बस वहीं रुकवा दिया। शायद वो पुरानी यादों को मैं दुबारा जीना चाहता था।

बचपन में माँ, बाबूजी को उस रास्ते से जाने पर फटकार लगाती थी। माँ कहती थी कि क्यों उस वीरान से रास्ते से जाते हो। माँ मुझे भी खूब डराया करती थी कि उस रास्ते से रात को जो गया, वो कभी लौट कर नहीं आया। मैं भी डर जाता और माँ के आँचल में छुप जाता। पर अब मैं बड़ा हो गया था। माँ की मनग्रहन्त बातें अब मुझे नहीं डरा सकती थी।

अब मैं वो छोटा बालक न रहा। मैं अब एक व्यापारी बन गया था। बहुत पैसे भी कमाए थे, कुछ ईमानदारी के और कुछ बेईमानी के। शायद बेईमानी के पैसे, ईमानदारी के पैसे से कुछ ज्यादा ही होंगे, क्योंकि धंधा या व्यापार में झूठ-सच तो करना ही पड़ता है।

माँ अब बूढ़ी हो चुकी थी। कई सालों बाद मैं उनसे मिलने अपने गाँव जा रहा था। माँ का पत्र हमेशा मिलते रहता था। वो मुझे और उनकी बहू और पोते-पोतियों को देखने के लिए व्याकुल रहती थी। लेकिन व्यापार चलाने और धन कमाने में मैं इतना व्यस्त था कि कभी फुर्सत ही नहीं मिली कि घर जाकर अपनी बूढ़ी माँ को देख आऊँ। 5-7 महीने से उनका पत्र भी आना बंद हो चुका था।

 एक दिन गांव के रमेश चचा शहर आए हुए थे और शहर के ही एक जानेमाने दुकान में उनकी नज़र मेरे से मिल गई। मैं उनसे पल्ला छुड़ाने के लिए इधर-उधर देख दुकान से निकलने लगा था, जैसे कि मैंने उन्हें देखा ही न हो। पर उन्होंने मेरे हाथ को धर दबोचा। मेरे पास अब कोई रास्ता नहीं था।  मैंने झट से उनका पैर छू कर प्रणाम किया, “चचा प्रणाम। आप यहाँ?”

 तब उन्होंने बताया कि उनका छोटा बेटा अनिल, इंजिनीरिंग की पढ़ाई करके शहर में ही नौकरी करने लगा हैं। उससे ही मिलने वो शहर आए हुए थे। उन्होंने ही बताया कि उसकी माँ की तबियत बहुत ख़राब रहती। वो कुछ दिन की ही मेहमान हैं। उनसे मिल आओ।

वैसे तो उस समय भी मेरे पास अपने गांव जाने का समय नहीं था, फिर लगा कि अगर माँ को कुछ हो गया तो समाज वाले उसके बारे में भला-बुरा कहेंगे। बोलेंगे कि बुढ़िया अपने बेटे का मुँह देखने को तरस गई, लेकिन बेटा आया नहीं।

मैंने घर जाकर अपनी अर्धांगिनी और बच्चों को माँ के बीमार होने की बात बताई। बीवी ने गाँव जाने से मना करते हुए कहा कि आपको जाना है तो जाओ उस गाँव। शादी के तुरंत बाद गर्मी में गई थी वहाँ। AC तो छोड़िए, कूलर भी नहीं था और बिजली भी रामजी के भरोसे।

अब तो इतनी ठंड पड़ रही है। हीटर तक नहीं होगा वहाँ। इतने ठंड में कैसे रहूंगी मैं अपने बच्चों साथ।

वैसे तो मेरी अर्धांगिनी भी गाँव में ही पली-बढ़ी थी लेकिन कुछ सालों से शहर में रहने के कारण वो भी शहर के रंग में रंग चुकी थी। मैंने अपने बच्चों की ओर देखा। उनकी नजरें भी उनके राय को बयां कर रही थी। अंततः मैंने अकेले अपने गाँव जाने का फ़ैसला किया।

मैं ये सब सोच कर उस कच्चे पगडंडी में चला जा रहा था। हवा के ठंडे थपेड़े मानो कान ही काट दे। पूरे रास्ते में उस अंधेरी रात में मुझे कोई मिला नहीं था।  पैर के नीचे दबने वाले सूखे पत्तों की कड़कड़ाहट और उल्लू की आवाज़ उस शांतिमय माहौल में कौतूहल पैदा कर रही थी। बहुत डर लग रहा था कि कही कोई चोर-हुचक्का मेरे समान औऱ पैसे न छीन ले। कुछ दूर आगे चलने पर मुझे कुछ दूर दायीं तरफ से लोगों के ठहाके मारने की आवाज सुनाई दी। उस काली रात में कुछ नज़र आ नहीं रहा था। लोगों की आवाजे सुनकर मैं वहीं रात बिताने का सोचा।

मुझे लगा कि मेरे जैसे ही कुछ मुसाफिर रात बिताने के लिए इस वीरान सी जगह में बैठ कर बातें कर रहें तो क्यों न उनके साथ ही रात बिताई जाए क्योंकि उस अंधेरी रात में रास्ता भटक जाने का डर मुझे सता रहा था। एक तो बहुत सालों पहले मैं उस रास्ते से गुजरा था और दूसरी ओर उस कोप अंधेरे में जंगली जानवर के आ जाने का भी डर सता रहा था। मैं उस रास्ते की ओर मुड़ गया, जिधर से आवाजें आ रही थी।

उस ओर जाते-जाते मेरा सर किसी दरवाजे से जा टकराया।  हाथ से छूने पर मुझे पता लग चुका था कि दरवाजा लोहे का हैं और पूरी तरह से जर्जर है। मैंने उस टूटे हुए दरवाज़े को जोर से अंदर की ओर धकेला। जंग लग जाने के कारण बहुत जोर की आवाज़ के साथ दरवाजा खुला। दरवाजे की आवाज़ से अंदर जिन लोगों की आवाज़ें आ रही थी, वो आना बिल्कुल बंद हो गया। मुझे लगा कि ये लोग मुझे चोर समझ कर पिट न दे।  मैं धीरे-धीरे अंदर प्रवेश करने लगा।

अचानक से किसी की जोर से आवाज़ आयी,” कौन हो रे?”

मैं सकपका गया।

“जी, मुसाफिर हूँ जनाब। यहाँ आप लोगों की आवाज़ आ रही थी और काफी रात भी हो गई तो सोचा यही रुक जाऊ। अहले सुबह यहाँ से निकल जाऊँगा।”

“मुसाफिर तुम अकेले थोड़ी हो। हम सब मुसाफिर हैं इस दुनिया में। कभी न कभी सबको यहाँ से जाना हैं, चाहे कितना भी कमा लो।” किसी ने ठहाका मारते हुए कहा।

“आवा हो। बैठो। हम भी सुबह के इंतज़ार में ही बैठे हैं। हम भी मुसाफिर ही हैं।” किसी दूसरे सज्जन की नम्र आवाज़ आयी।

“बैठिए।” किसी ने मेरा हाथ पकड़ कर बड़े अदब से कहा।

“जी शुक्रिया। धन्यवाद यहाँ जगह देने के लिए।”। मैंने बैठते हुए कहा।

उस अंधेरी रात में किसी का चेहरा देखना मुश्किल था। बस लोगों की बातचीत से पता चल रहा था कि वहाँ 5-6 लोग तो जरूर थे।

कुछ देर तक सन्नाटा पसड़ा रहा।  फिर उस सन्नाटे को चीरते हुए किसी की आवाज़ आयी,”बाबू, क्या करते हो तुम?”

“जी, व्यापारी हूँ।”

“तो इधर कैसे आ गए इस वीरान रास्ते में?”

“जी, अपने गाँव जा रहा था।”

“कौन सा गाँव?”

“बड़कागाँव”

“गाँव भी बड़का या छोटका होता है का रे?” किसी ने ठहाका मारते हुए कहा।

“नहीं, नहीं.. आप ग़लत समझ रहे। मेरे गाँव का नाम ही बड़कागाँव हैं।”

“किसके बेटे हो?”

“जी, मिश्रा जी का।”

“कौन? अनूप मिश्रा का?”

“जी हाँ… आपको कैसे पता चला?” मैंने संसय में कहा।

“अरे। हमनी तोहरा के कैसे नहीं पहचन्वो? हम भी वहीं गांव का हूँ।” उन्होंने स्थानीय भाषा में कहा।

“तो आप इधर क्या कर रहे हैं? कहीं बाहर से आ रहे क्या आप?”

“नहीं, अब हम इन्हें ही रहल। यहीं अपना ठिकाना हैं।”

उनकी बात मैं समझ न सका। पर मैंने फिर कुछ पूछना ठीक नहीं समझा।

थोड़े देर तक फिर से शांति छा गई। ठंडी हवा शरीर में सिहरन पैदा कर रही थी। आधी रात गुजर चुकी थी और आधी गुजारनी थी। पर मैं खुश था कि मैं अब अकेला नहीं था। जब किसी की कोई आवाज़ नहीं आई तो मैंने रात गुजारने के लिए फिर से कोई बात शुरू करने का सोचा।

“बहुत सालों बाद मैं अपने गाँव माँ से मिलने जा रहा। उत्साहित हूँ कि अपना गाँव कैसा होगा अब?”

“इतने साल से घर नहीं गए। माँ को कौन देखता है फिर गाँव में?”

मेरे पास कोई जवाब नहीं था।

“अच्छा, माँ को अकेले छोड़ शहर में रहने लगे। अच्छा है।” किसी ने कटु कटाक्ष किया।

“अच्छा, एक बात बताईये व्यापारी बाबू। हम सब पैसे कमाने के लिए घर-बार, अपनों को छोड़-छाड़ चले जाते हैं। पैसे भी बहुत कमा लेते। लेकिन क्या जिंदगी का मकसद पैसे कमाना ही है?” एक सज्जन ने पूछा।

“नहीं। लेकिन बिना पैसे के काम भी तो नहीं चलने वाला।” मैंने उत्तर दिया।

“पैसे कमाना तो ठीक बात हैं। लेकिन जरूरत से ज्यादा पैसे कमाने से क्या होगा? व्यक्ति की तीन ही तो आधारभूत जरूरत है~ रोटी, कपड़ा और मकान। एक तरह से देखा जाए तो यही तीन चीज़ ही बस जरूरत है पैसे से कमाने की। अगर आप बहुत पैसे भी कमा लेंगे तो ज्यादा से ज़्यादा क्या कर सकते। 4-5 मकान ले लेंगे। नए-नए रेशमी कपड़े खरीद लेंगे। खाने में किसमिश, काजू को भी शामिल कर लेंगे। लेकिन 4-5 मकान लेने से क्या होगा? रहेंगे तो आप एक ही मकान में। कितने भी रेशम के कपड़े खरीद ले, लेकिन नींद तो सूती कपड़े में ही आएगी। चाहे कितने भी महँगे रेस्तरां में जितना भी स्वादिष्ट भोजन खा ले, लेकिन हमेशा वहीं खाने पर आप ऊब जाओगे। लेकिन कभी घर का रोटी-सब्जी खा कर आप कभी नहीं उबेंगे।” उसी सज्जन ने कहा।

बात तो बिल्कुल सही और सटीक थी। मैं गहन सोच में पड़ गया। मुझे याद आने लगा उन दिनों की बात, जब मेरी अर्धांगिनी अपने मायके गई हुई थी। मैंने सोचा था कि होटल का स्वादिष्ट भोजन खा कर मजे से रहूँगा। पर तीन-चार दिनों तक लगातार होटल में खाने के बाद मैं उससे इतना ऊब गया था कि होटल के खाने की बात सोचकर ही उबाश होने लगता। अर्धांगिनी के आने के शेष दिन मैंने फल खा कर जैसे-तैसे बिताए थे।  जब  मैं उस सज्जन के बातों के उधेड़बुन में फंसा हुआ उनके बातों के बारे में सोच रहा था, तभी दूसरे सज्जन ने बोलना शुरू कर दिया।।।

“बात तो सही कहा आपने। हमसब पैसे के पीछे इतने पागल हो गए है कि हमें पता ही नहीं कि पैसे एक समय के  बाद कोई मायने नहीं रखते। मायने रखता हैं तो आपका परिवार, आपका स्वास्थ्य और आपका संगीतमय जीवन। युवावस्था में हम पैसे के लिए दिनरात पागल रहते। रातों की नींद-चैन सब भूल जाते। हम सोचते है कि बुढ़ापे में ये पैसे काम देंगे। पर जब हम बुढ़ापे की ओर अग्रसर होते हैं तब पैसे के पीछे किये भाग-दौड़ के चलते अपना स्वास्थ्य खो देते हैं। हमारे पास इतनी ऊर्जा बचती ही नहीं कि हम उस पैसे का उपभोग कर पाए। जब बुढ़ापा आता, उस समय हमारे पास बस पैसे बच जाते और दोस्त, परिवार, स्वास्थ्य सब मुँह मोड़ लेते।” दूसरे सज्जन ने काफी भावपूर्ण तरीके से ये बातें व्यक्त की ।।

“हमने जीवन की परिभाषा ही ग़लत समझ ली हैं। जीवन और पैसे को समानार्थी शब्द समझ लिया है। जबकि पैसा जीवन जीने का एक छोटा-सा माध्यम हैं। उसकी भूमिका बहुत ही छोटी हैं। अगर पैसे का जीवन में इतना महत्ता रहता तो भगवान महावीर, बुद्ध जैसे राजा भोगविलाश और अपना राजपाट छोड़ कर जीवन की असली परिभाषा ढूंढने नहीं निकल पड़ते।” एक बुड्ढे सज्जन की आवाज़ आई।

मैं बस उनलोगों की बस बातें सुनने में व्यस्त था। उनके विचार और बातें मेरे दिल के किसी कोने में घर कर रही थी। आजतक मैंने कभी जिंदगी के बारे में इस तरह सोचा ही नहीं था। मेरे लिए भी जीवन का अर्थ बस पैसा था लेकिन इन महानुभाओं की बातें सुन मुझे ये समझ आ गया था कि जिंदगी का असली अर्थ उसे पल-पल जीने में हैं। स्वास्थ्य, परिवार और दूसरों के हित के लिए जीना ही वास्तविक धन संग्रहित करना हैं। जब आपका अंत समय आता हैं तो ये मायने नहीं रखता कि आपने कितनी तिजोरियां भर ली, मायने ये रखता हैं कि आपके कारण कितनो के चेहरों में खुशी आई। मुझे मानो आत्मज्ञान की एक झलक उन सज्जनों से मिल गई थी।

मैं इन विचारों में खोया हुआ था ,तभी मुझे किसी की आवाज़ सुनाई दी,”चलो मियां, सुबह होने को है। अब तुम घर जाओ। हमारे सोने का समय हो गया हैं। बस हमारी बात हमेशा याद रखना कि जिंदगी को पैसे का पर्यावाची कभी मत समझना। अपने अनुभव के आधार पर हम कह रहे।”

मुझे समझ नहीं आया उनकी बात। जब सुबह होने को हैं तो वो सोने जा रहे और वो भी इतनी सुनसान जगह। मैंने आवाज लगाई, “अब तो अपने घर जाने का समय हो रहा। भोर होने वाली हैं। कहाँ आप सोने जा रहे?”

पर किसी की कोई आवाज़ नहीं आई। थोड़ी देर बाद सूर्य के आने का संकेत हो चुका था। धीरे-धीरे अंधेरी रात को ढकने प्रकाश रूपी सेना निकल चुकी थी। जब भोर हुआ तो मैंने देखा कि मेरे आस-पास कोई नहीं था। मेरे चारों ओर बस कब्रे थी और मैं खुद एक कब्र के ऊपर बैठा हुआ था। मुझे अब भी कुछ समझ नहीं आया।  मैं हड़बड़ा कर वहाँ से उठ भाग निकला। गेट से बाहर आने पर मैंने देखा कि उस कब्रिस्तान के बाहर एक  बोर्ड लगा हुआ था और जिसमें “आखिरी मंजिल” लिखी हुई थी।

अब मुझे सब कुछ स्पष्ट होने लगा था और मेरे आँखे खुद-ब-खुद नम हो चुकी थी। मैंने सर झुका कर कब्रिस्तान की ओर मुँह करके प्रणाम किया और वहाँ से एक बड़ी-सी मुस्कुराहट के साथ अपने गाँव निकल पड़ा।

आज एक बड़ी सीख उनलोगों ने मुझे दे दी थी जो इस दुनिया को पहले ही छोड़ चुके थे।

 

उपसंहार-

हमसब पूरे जीवन भर पैसे के पीछे भागते रहते बिना कुछ सोचे-समझे। फिर एक समय आता है जब  हम अपनी आखिरी साँसे गिन रहे होते हैं, तब हमारे सामने पूरी जिंदगी एक फ़िल्म की तरह सामने से गुजरती हैं और उस समय हमें समझ आता है कि हम पूरे जीवन भर पत्थर अर्जित करते रह गए ,जबकि हीरा तो कुछ और था। जितना भी पैसे एकत्रित कर लो पर “आखिरी मंजिल” मौत ही है और जब मौत आती है तो उस समय किसी की कोई “घुस” भी यमराज की मंशा बदल नहीं सकता।

अतः “आखिरी मंजिल” पहुँचने से पहले की सारी जिंदगी हम इस तरह जिये कि जब अंत समय आये तो कुछ मलाल न हो और खुशी-खुशी हम उस आखिरी मंजिल की ओर प्रवेश करे।।

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