मोक्षमूलं गुरुकृपा

मोक्षमूलं गुरुकृपा

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17 Jul 202426 min read

Published in spiritualism

||श्री सद्गुरवे नमः||

दिनांक 15.07.2019 गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर सद्गुरु धाम आश्रम नांगलोई दिल्ली में सद्विप्र समाज के संस्थापक और दिव्य गुप्त विज्ञान के प्रणेता ‘समय के सद्गुरु’ स्वामी  कृष्णानंद जी महाराज के दिव्य आशीर्वचन |

 

प्रिय धर्म प्रेमी बंधुओं ! योगस्थ-तपस्वी बंधुओं !

आप योगस्थ हैं, तपस्वी हैं, इसलिए न सोमवार को, वर्किंग डे को काम छोड़कर यहाँ पहुँच गए हो | यह भी बहुत बड़ा त्याग है | कबीर साहब की साखी ‘भक्ति को अंग’ पर हम बहुत दिन से बोल रहे हैं- छत्तीसगढ़ में बोलकर आए हैं और आज ही चले जायेंगे बनारस | गुरु पूर्णिमा वहाँ कल है | कबीर साहब कहते हैं –

भक्ति महल बहुत ऊँच है, दूरहि ते दरसाय |

जो कोई जन भक्ति करै, सोभा बरनि न जाय ||

 अर्थात् भक्ति महल बहुत ऊँचा है – माउंट एवेरेस्ट से भी ऊँचा | उसका वर्णन नहीं हो सकता है | जो भक्ति में होता है, उसे दूर से ही दिखाई देता है | तुम यहाँ भक्ति कर रहे हो – तीनों लोक में वह प्रदर्शित हो रहा है | उसका वर्णन नहीं होता है- तुमलोग यह नहीं पहचानते हो | विष्णु पुराण भी कहता है- ‘संयोग योग इत्युक्तो जीवात्मपरमात्मनो।’ योग का मतलब जो आत्मा और परमात्मा का संयोग कर दे | आत्मा का परमात्मा से मिलन – जब हो जाता है, तब वह भक्तियोग होता है | हमलोग आजकल शरीर को विभिन्न प्रकार की मुद्राओं से व्यक्त करते हैं और उसको योग समझ लेते हैं | आपलोग जो करते हो यह आसन असल पशु-पक्षियों के नाम पर हैं | गरुड़ासन, वज्रासन, भुजंगासन, व्याघ्रासन, शशकासन, तितली आसन, उष्ट्रासन … ये सब पशु-पक्षियों के नाम पर हैं | अब इन आसनों से पशु बनना चाहते हो या पक्षी ? क्या बनना चाहते हो ? ठीक-ठीक यह योग नहीं है | ‘योगा’ कहकर हमलोग संतोष कर लेते हैं कि हम योग कर लिए | यह योग नहीं, पशु-पक्षी बनने की प्रवृत्ति है |

आजकल योग का मतलब हो गया है रोग से निवृत्ति और कुछ लोग कहते हैं कि तनाव से मुक्ति | अरे रोग से मुक्ति और तनाव से मुक्ति का क्या योग हो गया है ? तब जो डॉक्टर बैठा है, वह किस काम का है जी ? योग का मतलब यह नहीं है | इसीलिए बहुत पहले गोरखनाथ के समय में लोग यह किये थे और यह कहकर रिजेक्ट कर दिए कि क्या गोरखधंधा में पड़ा है ! ‘गोरखधंधा’ कह दिए | योग का मतलब है कि जैसे अभी हम बैठे हैं- सिद्धासन या पद्मासन में बैठो, करो | हम योग करा देते हैं ठीक-ठीक आपलोगों को – वह शिवजी के नाम पर है, शिव ताण्डव | यह आदमी (शिव) के नाम पर है – आदमी वाला काम करो | यह भक्ति वाला काम जब करोगे तब वह जो योग है, तुम्हारा हो जाएगा | आत्मा परमात्मा से जुड़ने लगेगा |

आज गुरु पूर्णिमा के अवसर पर समझ लो कि योग क्या है ! जीवात्मा व परमात्मा के संयोग की अवस्था का नाम ही योग है | सबके मुँह से योग नहीं ‘योगा’ आता है – निपढ़ से लेकर पढ़ा-लिखा आदमी | मैं कई बार कह चुका कि योगा शब्द नहीं है – ‘योग’ है | और पश्चिम की देखादेखी तुमलोग राम नहीं ‘रामा’ शब्द कहते हो | रामा का मतलब सीता, कृष्णा का मतलब द्रौपदी हो गया | लेकिन तुमलोग कृष्ण की जगह ‘कृष्णा’ कहते हो | शिवा का मतलब पार्वती हो गया – यह समझो | लेकिन हमलोग विदेशियों की करने लगते हैं देखादेखी |

योग का मतलब है भक्ति | इसलिए भक्ति का महल बहुत ऊँचा है | जानते हो कि धर्मराज युधिष्ठिर अपने पौत्र परीक्षित (जिससे शुरू होता है श्रीमद्भागवत् कथा) तो धर्मयुक्त जानकर के स्वर्गारोहण किए | हम यह कथा नहीं कह रहे हैं, केवल इशारा कर रहे हैं कि भक्ति का महल बहुत ऊँचा है | ऊपर से, स्वर्ग से सब देखते हैं | और पाँचों भाई, द्रौपदी जब स्वर्गारोहण कर रहे थे – केदारनाथ से होकर बद्रीनाथ (जैसे परिक्रमा मार्ग में किया जाता है; यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ) और बद्रीनाथ से अलकापुरी होते हुए जा रहे थे तो द्रौपदी और चारों भाई रास्ते में ही गल गए हिमालय में | और धर्मराज युधिष्ठिर का एक अंगूठा गला | एक कुत्ता उनको आगे-आगे ले जा रहा था | अभी भी तुमलोग ऊपर जाओगे तो कुत्ता कोई न कोई तुमको मिल जाएगा – ले जाएगा ऊपर | ऊपर स्वर्ग से एक विमान आया कि धर्मराज युधिष्ठिर ! चलिए, विमान पर बैठिए | यहाँ तक आप आ सकते हैं, ऊपर विमान से जाना होगा | कहा कि पहले मेरे कुत्ते को बैठाओ | ‘यह कुत्ता नहीं जाएगा, प्रभु ! आपके लिए आया है न !’ कहा कि नहीं, यह मुझपर डिपेंडेंट है | इसकी रक्षा करना मेरा धर्म है | जो जिसपर निर्भर है, उसकी रक्षा का, भरण-पोषण का काम करना चाहिए |

शास्त्र कहता है कि ये तीन मूलतः आप पर डिपेंडेंट हैं – माँ, बाप और गुरु | माँ-बाप के लिए तो कर लेते हैं कुछ | गुरुजी को भी साल- दो साल में कभी दस-बीस दे आते हैं | चौथा इसके बाद आता है- जब आपके साथ कोई है या कोई आपकी सेवा में है और उसका भी कोई नहीं है तो उसकी भी रक्षा का भार आप पर जाता है |

अब वह कुत्ता भी उनको बहुत दूर से ला रहा था | उसका भी कोई माई-बाप नहीं है, न घर-द्वार है | धर्मराज को भी रास्ता दिखाते ला रहा था तो उनपर डिपेंडेंट हो गया न ! इसलिए धर्मराज कहे कि यह कुत्ता मुझपर डिपेंडेंट है | मैंने अपने माँ-बाप का तो जीवनभर भरण-पोषण किया | सेवा किया | गुरु का भी किया | युद्धभूमि में गुरु के खिलाफ हमलोग हथियार नहीं उठाए कोई | भले ही युद्ध हार जायें या रहें | और आज अंतिम समय में यह कुत्ता है, यदि यह नहीं जाएगा तो मैं तुम्हारे साथ स्वर्ग नहीं जाऊँगा | अच्छा है, मुझे इस हिमालय में ही गलने दो |

देखो यह बहुत बड़ा त्याग है | हमलोग तो कहीं जगह मिलती है तो खट से जाकर बैठ जाते हैं | साथ छोड़ देते हैं न ! तो देखो, वह कुत्ता नहीं था- धर्मराज ही था | प्रकट हुआ | उस कुत्ते के रूप में स्वयं धर्मराज ही उनको ले जा रहे थे | कहा कि चलो, आज तुम्हारी अंतिम परीक्षा पूर्ण हुई | धर्मराज की ड्यूटी अभी हमने देवता लोगों को दे दिया है – इसलिए कि तुम भक्ति में हो | धर्म में हो |

देखो, जब तुम भक्ति करते हो तो यह नहीं है कि गुरुजी ही देखते हैं, तुम्हारा पड़ौसी ही देखता है | बहुत लम्बी उसकी तरंग उठती चली जाती है | वहाँ से बैठकर देवता गण भी देखते हैं | लेकिन यह भी बात समझो – आप मनुष्य हो | कर्म करके देवता तो बन सकते हो | लेकिन देवता कोई भी कर्म करके भगवत्ता को नहीं प्राप्त कर सकता है | आत्म-तत्त्व में, परमात्मा में नहीं मिल सकता है | वह बुद्ध और महावीर नहीं बन सकता है | और न ही भगवान् कृष्ण और नारायण बन सकता है | यह केवल मनुष्य में सम्भावना है | इसलिए मैं हमेशा कहता हूँ कि आपलोग देवी-देवताओं से कहीं अधिक श्रेष्ठ हो | देवी-देवता से बहुत महान हो- तो यह अपने में समझो |

 आज का जो दिन है, गुरु पर्व है | पूरे विश्व में यह भारत में ही मनाया जाता है | गुरु शब्द भारत में ही है | गुरु का अर्थ टीचर नहीं होता है | ‘टीचर’ कहकर तुम काम चलाते हो, गुरु प्राप्त नहीं करते हो | देखो, एक बार काशी में गुरु पूर्णिमा महोत्सव हो रहा था | एक बहुत बड़ा चोर था | चोर यदि चोरी भी छोड़ दे तो मक्कारी से बाज आएगा ? दिन निकला तो सोच रहा था कि कहाँ हम जायें- क्या करें ..घर में कुछ खाना-पीना नहीं है, कुछ मजदूरी करें | घर से निकला तो देखता है कि एक आश्रम में बहुत बड़ी भीड़ लगी है | मालूम हो रहा था कि भण्डारा वगैरह है, कुछ खाना-वाना, चाय- नाश्ता, पकौड़ा मिलेगा | तो चला गया वह भी गुरुजी के यहाँ | देखा, लाइन में लगे हैं लोग | एक बाबा बैठे हैं – आँख बंद किए हैं | सब लोग उनको रुपया-पैसा, फल-फूल चढ़ा रहे हैं | कहा कि हम तो आ गए इस लाइन में- कि कुछ खाना मिलेगा | अब क्या चढ़ावें ? चढ़ाना तो है कुछ | नहीं चढ़ायेंगे तो लोग कहेंगे कि देखो इतनी बड़ी लाइन में रहा है, चढ़ा कुछ नहीं रहा है …|

बड़ा फेर में पड़ा | पॉकेट में टटोला- कुछ नहीं था | एक रुपया का सिक्का बोहनी करके चलता है न चोर भी | चलता है तो एक रुपया रख लेता है पहले से कि बोहनी ख़राब न हो | भिखमंगा भी चलता है तो मुट्ठीभर चावल रख लेता है हाथ में | तो वह भी एक रुपया रखा था | कहा कि कहाँ हम चक्कर में पड़ गए बाबा के | ऐसा तो हम सोचे नहीं थे | तो एक रुपया निकालकर- वह भी गोड़ लगा | फिर चला गया उधर- भण्डारा में | खाना-पीना मिला | कहा कि चलो, आज एक रुपया में हमको खाना-पीना भी मिल गया | उसके बाद रोड पर आश्रम था – निकला | ट्रक उधर से आ रहा था- मारा गया | जय सच्चिदानंद !

उसके घर वाले कहे कि हमारे घर के लोग कभी किसी आश्रम में नहीं गए हैं, आज तक | ऐसा पाप नहीं किए, करम नहीं किए | देखो यह गया, बाबा का आशीर्वाद लिया | मर गया न ! बड़ा पाप हुआ ! लड़का- बच्चा से कहा कि कान पकड़ो – अब नहीं जायेंगे | तुमलोग भी कहते हो न कि हम आश्रम में गए.. वहाँ गए, देखा ! यह हो गया | यह हो जाता है ! उसके परिवार वालों ने भी कहा कि बहुत बड़ा पाप हो गया भाई ! भगवान् से प्रार्थना करते हैं कि अब नहीं हम फिर जायेंगे |

अब वह जब मरकर गया तो लेखा-जोखा हुआ | ऊपर दरबार लगा था | अकाउंट इसका देखा गया कि भाई, क्या-क्या इसका काम है ! कहा कि इसने तो जिंदगीभर कोई पुण्य ही नहीं किया है | लेकिन इसका एक तो पुण्य है – एक रुपया दिया है गुरुपूर्णिमा पर | गुरु के यहाँ दान दिया है | और फिर उससे ज्यादा वहाँ खा भी लिया है |

लेकिन दान तो दिया है न, इसका फलाफल क्या है ? सप्त ऋषि गण पूछे | देवगुरु बृहस्पति कहे कि ऐसा चोर आदमी जो केवल लेने वाला था – वह एक रुपया गुरु के यहाँ गुरु पूर्णिमा के दिन चढ़ा दिया है | यह गुरुपूर्णिमा का पर्व वर्ष में एक दिन आता है, गुरु का पर्व होता है और शास्त्र भी कहता है –

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः | गुरुः साक्षात् परमब्रहम तस्मै श्री गुरवे नमः ||

उस दिन गुरु साक्षात् परमात्मा का स्वरूप होता है, इसलिए उसके महत्व का तो वर्णन ही नहीं हो सकता है | इसलिए इसका महात्मय है कि यदि इसने एक रुपया चढ़ाया है तो दस मिनट के लिए यह इंद्र की पदवी पर बैठेगा |

तो देवगुरु बृहस्पति बोले कि इसका महत्व तो इतना है… पृथ्वी पर कहा गया है – ‘श्रीगुर पद नख मनि गन जोती | सुमिरत दिब्य दृष्टि हियँ होती ||’ यह भी कहा गया है – ‘गुर बिन भव निधि तरइ न कोई | जौं बिरंचि संकर सम होई ||’ माने तपस्या से ब्रह्मा हो सकते हो, शंकर हो सकते हो लेकिन भव नहीं पार करोगे | लेकिन तुम जानते हो, जो गुरु के खिलाफ रहता है, काल उसी को मदद करता है | और फिर उसे अपना ग्रास बना लेता है | आज बहुत गुरु विश्वस्तर पर छाये हुए हैं; जो खुद ही गुरु नहीं किए हैं | एकाध जेल तो चला गया, एकाध अभी हाईलाइट हो रहा है | जिसने अपने गुरु को मार दिया है | छीन-झपटकर गुरु की गद्दी पर बैठ गया है | अब नाम नहीं रखेंगे | टीवी पर जाएगा तो काट देंगे न ! लेकिन अब पूछो कि उनको यह क्यों हो रहा है ?

वह यम का रूप है | सब अपने-अपने भाई को मदद करता है | तुम्हारा मन ही यम है | तुम्हारे अन्दर मन ही यम का प्रतिनिधि है साक्षात् | इसीलिए कबीर साहब कहे हैं –

‘मन का कहा न कीजिए, मन है पक्का धूर्त |

ले डूबिहैं दरिया में, प्राण जाइहैं छूट ||’

 तीन प्रकार की फीलिंग होती है | फीलिंग मतलब प्रेरणा | पहली होती है शैतान की प्रेरणा | शैतान कौन है आपके अन्दर ? मन | शैतानी प्रेरणा माने मन की प्रेरणा | मन प्रेरणा देता है | आपलोग कहते हो कि हमारा मन यह कहता है… | हमारा मन नहीं कहता है गुरुजी के यहाँ जाने को | यह शैतानी प्रेरणा है | मन की प्रेरणा से तुम यह कह रहे हो | हमारा मन कहता है कि हम यह खाएं- वह खाएं | छोड़ो यार, यावत् जीवेत् सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत् | जब तक जीयें, अपना खूब मौज-मस्ती से रहें | यह मन की प्रेरणा है, इसको शैतानी प्रेरणा कहा गया है | दूसरी दैवी प्रेरणा है, तुम्हारा अहंकार | अहंकार ही तुम्हारे और परमात्मा के बीच में दीवार है | मन से ऊपर अहंकार होता है | मन बहुत सूक्षम है | मन के ऊपर होता है चित्त, बुद्धि और अहंकार | अहंकार अंतिम बैरियर होता है | तुमलोग जो समझते हो – दैवी प्रेरणा, वह अहंकार की प्रेरणा है | तीसरी जो है, उसको हम कहते हैं आत्मिक या ईश्वरीय प्रेरणा | यह आपकी आत्मा से होता है | तो जब तक आत्मा से संजोग नहीं हुआ, आत्मा को जाना नहीं, तब तक आत्मिक प्रेरणा कैसे होगी ?

 कुछ लोग बनावटी कहते हैं कि हमारा आत्मा तो यह कहता है..| अरे आत्मा को तुमने जाना ही नहीं, तब आत्मिक प्रेरणा को पहचाना कैसे ? लगभग शत-प्रतिशत आदमी शैतानी प्रेरणा में रहते हैं | बस 1% में अहंकार की प्रेरणा रहती है और 001% जो हैं, वह आत्मिक प्रेरणा में आते हैं | तो आज गुरुपूर्णिमा में आये हैं तो हमलोगों को यह समझना चाहिए कि हम शैतानी प्रेरणा में हैं, अहंकार की प्रेरणा में हैं या अहंकार की प्रेरणा में हैं | यह भी कहा गया है योग पतंजलि में – योगः चित्तवृत्ति निरोधः | चित्तवृत्ति माने चित्त का व्यापार | जैसे बनिया व्यापार करता है, हमारा चित्त जो है व्यापार करता है | जब तक हम इसके व्यापार में लगे रहेंगे, तब तक यह समझो कि वह शैतानी वृत्ति ही रहेगी | लेकिन इसका निरोध या दमन नहीं करना है, इस वृत्ति को परिवर्तित करना है |

देवगुरु बृहस्पति कहे कि यह गुरुपूर्णिमा में गया है तो दस मिनट यह इंद्र की गद्दी पर रह सकता है | इंद्र ने कहा कि यह तो बड़ा गड़बड़ है | हमारा यह गुरु इस चोर को हमारी गद्दी पर बैठाएगा ? देवगुरु कहे कि इंद्र ! अरे दस मिनट घूम लो बाहर | इधर-उधर जाकर | इसको बैठने दो बेचारे को |

‘दस मिनट बाद यह जाएगा ?’ चोर ने कहा कि हाँ | एक रुपया देने का जो प्रभाव है- अभी हमको इंद्र की गद्दी पर बैठा दीजिए | दस मिनट बाद हम चले जायेंगे |

अब वह बैठ गया | कहा कि हम बैठ गए हैं.. लेकिन मालूम नहीं हो रहा है कि हम ‘इंद्र’ हैं | हमको इंद्र का वस्त्र पहनाइए, मुकुट पहनाइए तब न इंद्र होंगे ! कहा कि क्या करें, चलो पहना दो | अब दे दिया गया | इंद्र का ड्रेस, मुकुट सब पहनकर के वह बैठ गया गद्दी पर | कहा कि देवगुरु बृहस्पति ! हमारे साथ न्याय होना चाहिए | कहा कि बिलकुल, न्याय होगा | अब कहा कि हम इंद्र हो गए हैं, पूरा न ! जो मैं कहूँगा- वह लागू होगा ? कहा कि हाँ | तो कहा कि कामधेनु गाय मैंने वशिष्ठ को दान दिया, उच्चैश्रवा घोड़ा विश्वमित्र को और कल्पवृक्ष ऋषि अंगिरा को दान दिया- जितना कीमती सामान था इंद्र का, सब दान दे दिया |

कहा कि दस मिनट हो गया | तो फट से इन्द्रासन से उतर गया | कहा कि देखिए, हम बेईमानी नहीं किए हैं.. बेईमान नहीं हैं हम | न हमने चोरी किया न बेईमानी किया | लेकिन एक मिनट.. हम पूछ लेते हैं…| तभी इंद्र को देखा कि आ रहा है तो फिर जाकर गद्दी पर बैठ गया | कहा कि फिर क्यों बैठ रहे हो ? कहा कि हम एक रुपया दिए हैं गुरु पूर्णिमा में तो इस गद्दी को प्राप्त किए | अब हम इतना दान दे दिए – सप्त ऋषियों को दान दिए हैं न, इसका भी फलाफल ज़रा सुनना चाहते हैं|

सप्तऋषि तो सब खुश हो गए कि इंद्र का इतना सब कीमती सामान यह हमको दे दिया है | देवगुरु बृहस्पति ने कहा कि इसका फल तो है कि अब तुमको इंद्र बनना चाहिए | कहा कि कहाँ बैठें ? देवराज इंद्र कहे कि अच्छा.. हमको चक्कर में डाले आपलोग ?

देवगुरु बृहस्पति ने कहा कि बेटा, इंद्र का टाइम अभी ख़त्म नहीं हुआ है | सबलोगों का निर्धारित टाइम न है ! इनका कार्यकाल ख़त्म होगा, तब तुमको इंद्र बनाया जाएगा | तब तक तुम धरातल पर जाओ | वहाँ काम करो |

वही चोर धरातल पर राजा बली के रूप में आया | और जब बली ‘राजा’ बना तो वह जानता था कि पिछला जन्म मेरा क्या था, इसलिए यज्ञ करने लगा, दान देने लगा | दान का प्रभाव वह जानता था | इंद्र ने घबराकर कहा कि अरे यज्ञ फिर वही करा रहा है चोरवा ! तब वामनावतार हुआ, भगवान् आए उसका यज्ञ भंग करने |

‘आपन सोचा दूर है, हरि सोचा तत्काल | बलि ने चाहा स्वर्ग को, हरि दे पठयो पाताल ||’

पाताल तो चला गया लेकिन यह भी आया है – ‘हरि गयो ठगने, आप गयो ठगाय |’

हरि ठगने गए थे न, लेकिन ठगा गए |

देखो इसलिए हमलोग अपना कर्म यदि करें, सत्कर्म करते रहें तो हमको कोई ठग नहीं सकता है | वह धर्म की पताका हरदम ऊँची रहती है | इसलिए कबीर साहब कहते हैं कि भक्ति का महल बहुत ऊँचा है – दूरहि से दरसाय | दूर से ही, ऊपर से ही देखते हैं देवता, दानव-दनुज, गन्धर्व, किन्नर सब तुम्हारी ध्वजा देखते हैं | पाप भी, पुण्य भी तुम्हारा देखते हैं | इसलिए यह ध्वजा जो है, खास कर गुरु पूर्णिमा के दिन तुमलोग आए हो – उसकी शोभा का वर्णन नहीं किया जा सकता है – जो कोई जन भक्ति करै, सोभा बरनि न जाय || वह चोर अपने सत्कर्मों के द्वारा इस गुरु पूर्णिमा में बली बन गया | जिसके दरवाजे पर (बावन द्वार वाला महल बनवाया था) नारायण को द्वारपाल बनना पड़ा | जानते हो न ! और लक्ष्मी जी को उसकी छोटी बहन बनना पड़ा | उनका भी फिर वही कन्यादान दिया |

कौन जीता ? ‘हरि गयो ठगने, आप गए ठगाय |’ इसलिए यह समझ लो – तुम भी जहाँ किसी को ठगने के लिए जाओगे, ठगा जाओगे | जब हरि ही ठगा गए.. इसलिए ठगो मत | आप कहीं जाकर- ठगाकर खुश हो जाओ | प्रसन्न हो जाओ कि चलो ठगा न गए – ठगे नहीं ! क्योंकि अपने मन की वृत्ति को कभी भी ठगने में नहीं लगाना चाहिए | जहाँ ठगने में लगी वृत्ति- जय सच्चिदानंद !

 

गुरु की भक्ति में ही मुक्ति की युक्ति

वेदांत कहता है कि सभी मनुष्य पावन हैं | सभी दिव्य आते ही हैं | जैसे वर्षा का जल पवित्र होता है | और जहाँ गंगा नहीं है, वहाँ वर्षा के जल को रोक दिया जाता है, पात्रों में बंद करके रखा जाता है और उसको गंगा जल कहा जाता है | इसलिए कि वर्षा का जल प्योर होता है – डिस्टिल्ड वॉटर होता है | लेकिन वह वर्षा का जल जैसी जगह पाता है, उसके साथ उसी की तरह हो जाता है | गंगा में गया – गंगा हो गया |

अब तुमलोग मानसरोवर गए थे – वहाँ वर्षा का जल आता है न ! मानसरोवर में गया तो मानसरोवर हो गया | सागर में गया तो सागर में मिलकर खारा हो गया | बहते हुए किसी नाले में पड़ा तो नाला हो गया | जब-जब मैं बद्रीनाथ जाता हूँ, यहाँ से निकलता हूँ तो बगल में नाला है न, इसके सब कीड़े-मकौड़े घेरते हैं- आकर खड़े हो जाते हैं कि इस बार चलेंगे हम | कृष्ण जन्माष्टमी पर इस बार जा रहे हैं बद्रीनाथ | प्रेम का प्रतीक तो कृष्ण ही हैं न ! इसलिए संयोग से यह कृष्ण जन्माष्टमी पर रखा गया है | प्रेम का प्रतिरूप तो कृष्ण ही हैं | भगवान् राम तो गंभीर हैं | बुद्ध गंभीर हैं | हँसते हुए नहीं देखेंगे कभी | और कृष्ण को कभी गंभीर नहीं देखोगे | हरदम हँसते-मुस्कुराते हुए दिखाई पड़ते हैं – बड़ी से बड़ी समस्या में भी |

हम सब इस पृथ्वी पर आते हैं – दिव्य, ब्रह्मस्वरूप | सब आते हैं सत्यं शिवं सुन्दरं | लेकिन हम संसर्ग से गुण-दोष ग्रहण कर लेते हैं – संसर्गे गुणदोषाभवत् | कुछ अपनी पढ़ाई-लिखाई से ग्रहण कर लेते हैं | तीन जगह से ग्रहण करते हैं – 1. माँ-बाप, 2. शिक्षक, 3. प्रारब्ध | इसके बाद चौथा है गुरु और पाँचवां है अपना कर्म जो हम करते हैं | प्रारब्ध पर, माँ-बाप पर, शिक्षक पर तो आपका वश नहीं है, एक गुरु पर आपका वश है कि हम सोच-समझकर गुरु करेंगे | और अंतिम पाँचवां अपने कर्म पर वश है कि हम एक यही कर्म करेंगे या नहीं करेंगे | इस पर तो वश है न ! यदि ठीक-ठीक हम कर्म करें तो ठीक फलाफल मिलेगा | घबड़ाना नहीं है |

देखो, जैसे यहाँ अमरूद का पेड़ है न ! तीन-चार साल में यह फलने लगता है | अभी इस पर फूल लग रहा है, फल लग रहा है | जब से अमरूद का बीज ज़मीन में पड़ गया, तभी से वह प्रक्रिया लग गई – फलने की | अब तुम उसकी जड़ काटकर खा जाओ अमरूद का टेस्ट आएगा ? पत्तियाँ चबाते रहो – आएगा ? जब फल पक जाता है, तब न आता है टेस्ट ! कहोगे कि अरे बड़ा मीठा है ! लेकिन पत्तियाँ चबाओ- फूल चबाओ – डाली चबाओ – जड़ चबाओ, तब तो नहीं आएगा न ! उसी तरह से आपमें वह परमात्मा रूपी बीज जब से जन्म लिया है, तभी से वह आगे बढ़ने लगा है और जैसे ही गुरु के सान्निध्य में आते हो, तब वह फूल लगता है ध्यान का और ध्यान जब पूर्ण होता है तब वह फल आता है समाधि का | और समाधि में जब रहने लगते हो तो वह फल मीठा हो जाता है | इसलिए घबड़ाओ मत कि इतना समय हो गया – फल आया नहीं |

किसी फलदार वृक्ष का फल काटकर देखो – कहीं उसमें वह पेड़ नहीं दिखाई पड़ेगा | बस उसका स्वाद मालूम होगा- मीठा | लेकिन बीज उसका बो दो – प्रक्रिया शुरू हो गई | सब तत्त्व वह ज़मीन से ग्रहण करने लगा | अब आपका काम है नियमित रूप से उसको सिंचित करना | पानी देना – खाद देना और फलने का अवसर उपलब्ध कराना | उसी तरह से गुरु ने आपको जो गुरु मन्त्र दिया है दीक्षा में, दिव्य गुप्त विज्ञान, स्वर साधना या प्रेम साधना की जो क्लास लिया है उसके नियमित अभ्यास से वह जो बीज रोपा गया है, उसको अंकुरित होकर वृक्ष बनने दो | निरंतर आगे बढ़ने दो | उसको सींचो | जल्दबाजी मत करो | तोड़कर मत देखने लगे | हमलोग अपनी त्याग-तपस्या को किसी की छोटी-छोटी बीमारी पर, छोटे-छोटे काम पर लगा देते हैं कि जाओ, यह हो जाएगा | आशीर्वाद- श्राप देने लगते हैं | इसमें मत लगाओ | यदि उस पेड़ को काटते रहोगे तो वह फल तुमको प्राप्त होगा ? नहीं होगा | इसलिए धैर्य रखो | समय पर फल आ जाता है |

देखो काशी में नहीं बताना पड़ता है | गुरु पूर्णिमा की तारीख सब देखते हैं पञ्चांग से | और उस दिन जो सालभर नहीं आता है, मुर्दा पड़ा रहता है वह भी श्मशान घाट से निकल-निकलकर आ जाएगा | काशी की विशेषता है यह कि आ जाएगा | हम भी देखते हैं तो चौंकते हैं कि अरे यह तो कभी दिखाई नहीं पड़ा | कहते हैं कि गुरुजी, आज के दिन हमलोग कब्र से निकल-निकल आ रहे हैं | तो काशी में आज भी यह महात्म्य है गुरु पूर्णिमा का |

कबीर साहब कहते हैं कि –

भक्ति भक्ति बहुत कठिन है, रती न चाले खोट |

निराधार का खेल है, अधर धार की चोट ||

यह भक्ति जो है, बहुत कठिन है | भक्त जहाँ खड़ा रहता है, उसके नीचे कोई आधार नहीं रहता है | यह बात समझो – वह आधारहीन है | बेसलेस खड़ा है | मालूम होता है कि कोई आपका रक्षा करने वाला नहीं है | आगे-पीछे कुछ नहीं है | क्योंकि वह परमात्मा तो निर्गुण है, निराकार है | कैसे दिखाई पड़ेगा ? इसलिए मालूम होगा कि निराधार है | और ज़रा सा भी गलती किया, खोट हुआ तो जानते हो, कहाँ गिरेगा ? सीधा पाताल में जाएगा |

सफ़ेद कपड़ा जो पहना है- रोड पर जाएगा जरा भी छींटा गाड़ी से पड़ेगा कीचड़ का तो फट से दिखाई पड़ जाएगा | गन्दा हो जाएगा | लेकिन जो काला ही कपड़ा पहना है उसपर – मालूम होगा ? ‘सूरदास खल कारी कामरि चढ़त न दूजो रंग’- काले कपड़े को रोज़ पहन लें तो भी दिखाई नहीं पड़ेगा | सफ़ेद ड्रेस इसीलिए दिया जाता है कि उसकी तरह हमारा मन भी सफ़ेद हो जाए और मन में जरा भी कालिमा आए तो वह दूर से दिखाई पड़ने लगे और लोग कहें कि यह तो उचित नहीं है | माने टोक दिया | जब कोई टोक दे तो उसका बुरा मत मानो | अपनी उस कमी को सुधारना चाहिए|

भगवान् बुद्ध अपने पूर्व जन्म में काशी के एक ब्राह्मण परिवार में जन्म लिए थे | तक्षिला से बहुत उच्च विद्या पढ़कर आए और एक जगह कमल का एक सुन्दर तालाब देखा, वहीं झोंपड़ी लगाकर तपस्या कर रहे थे | एक दिन सुबह-सुबह स्नान करके सूर्य को अर्ध्य देकर खड़े ही थे कि देखे कमल का पुष्प खिले हैं सुन्दर | चारों तरफ सुगंधि फ़ैल रही थी, वो उसके नजदीक जाकर सुगंध ले रहे थे | तभी एक स्वर सुनाई पड़ा कि युवक ! चोरी क्यों कर रहे हो ? वह घबड़ाया | इधर-उधर देखा | कहा कि चोरी…? वह देव बाला बोली – ‘अरे तुम चोरी नहीं कर रहे हो ? वह कमल का पुष्प सुगंध दे रहा है | उसे न तुमने अपने गुरु को अर्पित किया, न गोविन्द को अर्पित किया | पहले गुरु और गोविन्द को अर्पण किया जाता है और बिना अर्पित किए स्वयं इसका भोग लगा लिया ? तुमसे यह उम्मीद नहीं थी कि इतना बड़ा चोर हो जाओगे |

तुमलोगों को कोई ‘चोर’ कहे तो झगड़ा कर लोगे | तब तक ये देखे कि एक आदमी आया है और कमल के फूल तोड़-तोड़कर अपनी टोकरी में रखते जा रहा है | बुद्ध ने इशारा किया कि देवि ! उसको तो कुछ नहीं कह रही हो, जो कमल के पुष्पों को बेरहमी से तोड़-तोड़ टोकरी में रख रहा है |

कहा कि उसको मैं क्यों कहूँ ? वह तो जन्मोंजन्म का डकैत है, हत्यारा है | दया वश मनुष्य योनि में आया है | और तुम तो 180 जन्मों से इसी में लगे हो- सारे देवी-देवता, ग्रह-नक्षत्र की आँख तुम पर लगी है कि कब यह बुद्धत्व को प्राप्त करेगा ! सृष्टि के सारे जीव-जंतु तुम्हारी तरफ मुखातिब हो रहे हैं कि इस सृष्टि का सबसे प्योर, पायस यह व्यक्ति.. बुद्धत्व को प्राप्त करने जा रहा है | इसलिए तुममें जरा भी कलंक यदि लग जाए तो हमलोग चिंतित हो जाते हैं कि तुम्हारा बुद्धत्व कहीं झटक नहीं जाए | जरा सी डगमग से गया तुम्हारा यह जन्म भी | तुमसे यह उम्मीद नहीं की जाती है | इसलिए उससे अपनी तुलना मत करो |

तो डाँटकर वह देवकन्या यह कही | बुद्ध युवक थे – सुन्दर | शीलवान् थे, गुणवान् थे | उच्च शिक्षा लेकर आये थे तक्षिला से | कहा कि माते ! देखो अब शब्द (संबोधन) बदल गया | अपनी ही उम्र की लड़की से कह रहे हैं कि माते ! तुम मेरी गुरु हो गईं | मैं कान पकड़ता हूँ कि चोरी नहीं करूँगा | छोटा भी दोष मुझमें दिखाई पड़ा करे तो मुझे तुरंत डाँट दिया करो | वह बोली कि यह काम गुरु का है | इसी के लिए गुरु के सान्निध्य में रहा जाता है | तुम्हारी तपस्या चूँकि बढ़ रही है, पूरी सृष्टि तारे-नक्षत्र तक तुम्हारा अवलोकन कर रहे हैं कि इससे कहीं कुछ गलत मत हो जाए | चूँकि यह निराधार तो ऐसा है कि जरा सा फिसला तुम्हारा पैर, तो कितना नीचे गिरते चले जाओगे – कुछ कहा नहीं जा सकता है | अभी भक्ति के तुम एकदम शीर्ष पर चढ़े हो, जरा सा डगमग हुए तो तुम्हारा पतन हो जाएगा- युवक !

अब समझो, कुछ लोग खूब चोरी करते हैं | उनको कोई नहीं पूछता है कि यह क्या कर रहे हो ? और कुछ लोग थोड़ा ही करते हैं और पकड़ा जाते हैं | इसलिए कि उनपर आँखें लगी हैं | इसलिए देखादेखी मत करो – देखादेखी पाप और देखादेखी पुण्य | इसीलिए कहा गया है कि –

गुरु से लगन कठिन मेरे भाई |

गुरु से लगे बिन काज न सरिहे जीव प्रलय हो जाई |’

गुरु से लगन करना है, क्योंकि गुरुजी तुम्हें छोटी से छोटी बात पर डाँटते हैं | फिर तुमलोग कहते हो कि गुरुजी आज तो हमारी क्लास ले लिए, अब मैं नहीं जाता | ठीक है न !

तो देखो, और कोई नहीं है क्लास | डाँटने का मतलब यही है कि जब तुम आये हो तो आगे बढ़ो | इधर आगे बढ़ो भक्ति में | ..और आपका यह वर्ष मंगलमय हो –

‘मंगलं भगवान् विष्णुः मंगलं गरुड़ध्वजः | मंगलं पुंडरीकाक्षः मंगलाय तनो हरिः ||’

हमलोग यह कहते हैं | लेकिन ये देवी-देवता केवल त्रिलोक तक हैं | इनकी भक्ति में इन्हीं के लोक तक यात्रा करोगे | गुरु की भक्ति में ही मुक्ति पाते हो | इसलिए शंकरजी कहते हैं – मोक्षमूलं गुरुकृपा | मुक्ति जो है, गुरु-भक्ति से मिलती है | बस आज इतना ही.. धन्यवाद |

 

सद्गुरुदेव की जय !

****************

संकलन –‘हरिः ओऽम सद्गुरु टाइम्स’ (मासिक पत्रिका, सद्विप्र समाज सेवा हेतु समर्पित) से साभार

 

‘समय के सद्गुरु’ स्वामी  कृष्णानंद  जी महाराज

आप सद्विप्र समाज की रचना कर विश्व जनमानस को कल्याण मूलक सन्देश दे रहे हैं| सद्विप्र समाज सेवा एक आध्यात्मिक संस्था है, जो आपके निर्देशन में जीवन के सच्चे मर्म को उजागर कर शाश्वत शांति की ओर समाज को अग्रगति प्रदान करती है| आपने दिव्य गुप्त विज्ञान का अन्वेषण किया है, जिससे साधक शीघ्र ही साधना की ऊँचाई पर पहुँच सकता है| संसार की कठिनाई का सहजता से समाधान कर सकता है|

स्वामी जी के प्रवचन यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध हैं –

SadGuru Dham 

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मोक्षमूलं गुरुकृपा

मोक्षमूलं गुरुकृपा

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17 Jul 202426 min read

Published in spiritualism

||श्री सद्गुरवे नमः||

दिनांक 15.07.2019 गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर सद्गुरु धाम आश्रम नांगलोई दिल्ली में सद्विप्र समाज के संस्थापक और दिव्य गुप्त विज्ञान के प्रणेता ‘समय के सद्गुरु’ स्वामी  कृष्णानंद जी महाराज के दिव्य आशीर्वचन |

 

प्रिय धर्म प्रेमी बंधुओं ! योगस्थ-तपस्वी बंधुओं !

आप योगस्थ हैं, तपस्वी हैं, इसलिए न सोमवार को, वर्किंग डे को काम छोड़कर यहाँ पहुँच गए हो | यह भी बहुत बड़ा त्याग है | कबीर साहब की साखी ‘भक्ति को अंग’ पर हम बहुत दिन से बोल रहे हैं- छत्तीसगढ़ में बोलकर आए हैं और आज ही चले जायेंगे बनारस | गुरु पूर्णिमा वहाँ कल है | कबीर साहब कहते हैं –

भक्ति महल बहुत ऊँच है, दूरहि ते दरसाय |

जो कोई जन भक्ति करै, सोभा बरनि न जाय ||

 अर्थात् भक्ति महल बहुत ऊँचा है – माउंट एवेरेस्ट से भी ऊँचा | उसका वर्णन नहीं हो सकता है | जो भक्ति में होता है, उसे दूर से ही दिखाई देता है | तुम यहाँ भक्ति कर रहे हो – तीनों लोक में वह प्रदर्शित हो रहा है | उसका वर्णन नहीं होता है- तुमलोग यह नहीं पहचानते हो | विष्णु पुराण भी कहता है- ‘संयोग योग इत्युक्तो जीवात्मपरमात्मनो।’ योग का मतलब जो आत्मा और परमात्मा का संयोग कर दे | आत्मा का परमात्मा से मिलन – जब हो जाता है, तब वह भक्तियोग होता है | हमलोग आजकल शरीर को विभिन्न प्रकार की मुद्राओं से व्यक्त करते हैं और उसको योग समझ लेते हैं | आपलोग जो करते हो यह आसन असल पशु-पक्षियों के नाम पर हैं | गरुड़ासन, वज्रासन, भुजंगासन, व्याघ्रासन, शशकासन, तितली आसन, उष्ट्रासन … ये सब पशु-पक्षियों के नाम पर हैं | अब इन आसनों से पशु बनना चाहते हो या पक्षी ? क्या बनना चाहते हो ? ठीक-ठीक यह योग नहीं है | ‘योगा’ कहकर हमलोग संतोष कर लेते हैं कि हम योग कर लिए | यह योग नहीं, पशु-पक्षी बनने की प्रवृत्ति है |

आजकल योग का मतलब हो गया है रोग से निवृत्ति और कुछ लोग कहते हैं कि तनाव से मुक्ति | अरे रोग से मुक्ति और तनाव से मुक्ति का क्या योग हो गया है ? तब जो डॉक्टर बैठा है, वह किस काम का है जी ? योग का मतलब यह नहीं है | इसीलिए बहुत पहले गोरखनाथ के समय में लोग यह किये थे और यह कहकर रिजेक्ट कर दिए कि क्या गोरखधंधा में पड़ा है ! ‘गोरखधंधा’ कह दिए | योग का मतलब है कि जैसे अभी हम बैठे हैं- सिद्धासन या पद्मासन में बैठो, करो | हम योग करा देते हैं ठीक-ठीक आपलोगों को – वह शिवजी के नाम पर है, शिव ताण्डव | यह आदमी (शिव) के नाम पर है – आदमी वाला काम करो | यह भक्ति वाला काम जब करोगे तब वह जो योग है, तुम्हारा हो जाएगा | आत्मा परमात्मा से जुड़ने लगेगा |

आज गुरु पूर्णिमा के अवसर पर समझ लो कि योग क्या है ! जीवात्मा व परमात्मा के संयोग की अवस्था का नाम ही योग है | सबके मुँह से योग नहीं ‘योगा’ आता है – निपढ़ से लेकर पढ़ा-लिखा आदमी | मैं कई बार कह चुका कि योगा शब्द नहीं है – ‘योग’ है | और पश्चिम की देखादेखी तुमलोग राम नहीं ‘रामा’ शब्द कहते हो | रामा का मतलब सीता, कृष्णा का मतलब द्रौपदी हो गया | लेकिन तुमलोग कृष्ण की जगह ‘कृष्णा’ कहते हो | शिवा का मतलब पार्वती हो गया – यह समझो | लेकिन हमलोग विदेशियों की करने लगते हैं देखादेखी |

योग का मतलब है भक्ति | इसलिए भक्ति का महल बहुत ऊँचा है | जानते हो कि धर्मराज युधिष्ठिर अपने पौत्र परीक्षित (जिससे शुरू होता है श्रीमद्भागवत् कथा) तो धर्मयुक्त जानकर के स्वर्गारोहण किए | हम यह कथा नहीं कह रहे हैं, केवल इशारा कर रहे हैं कि भक्ति का महल बहुत ऊँचा है | ऊपर से, स्वर्ग से सब देखते हैं | और पाँचों भाई, द्रौपदी जब स्वर्गारोहण कर रहे थे – केदारनाथ से होकर बद्रीनाथ (जैसे परिक्रमा मार्ग में किया जाता है; यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ) और बद्रीनाथ से अलकापुरी होते हुए जा रहे थे तो द्रौपदी और चारों भाई रास्ते में ही गल गए हिमालय में | और धर्मराज युधिष्ठिर का एक अंगूठा गला | एक कुत्ता उनको आगे-आगे ले जा रहा था | अभी भी तुमलोग ऊपर जाओगे तो कुत्ता कोई न कोई तुमको मिल जाएगा – ले जाएगा ऊपर | ऊपर स्वर्ग से एक विमान आया कि धर्मराज युधिष्ठिर ! चलिए, विमान पर बैठिए | यहाँ तक आप आ सकते हैं, ऊपर विमान से जाना होगा | कहा कि पहले मेरे कुत्ते को बैठाओ | ‘यह कुत्ता नहीं जाएगा, प्रभु ! आपके लिए आया है न !’ कहा कि नहीं, यह मुझपर डिपेंडेंट है | इसकी रक्षा करना मेरा धर्म है | जो जिसपर निर्भर है, उसकी रक्षा का, भरण-पोषण का काम करना चाहिए |

शास्त्र कहता है कि ये तीन मूलतः आप पर डिपेंडेंट हैं – माँ, बाप और गुरु | माँ-बाप के लिए तो कर लेते हैं कुछ | गुरुजी को भी साल- दो साल में कभी दस-बीस दे आते हैं | चौथा इसके बाद आता है- जब आपके साथ कोई है या कोई आपकी सेवा में है और उसका भी कोई नहीं है तो उसकी भी रक्षा का भार आप पर जाता है |

अब वह कुत्ता भी उनको बहुत दूर से ला रहा था | उसका भी कोई माई-बाप नहीं है, न घर-द्वार है | धर्मराज को भी रास्ता दिखाते ला रहा था तो उनपर डिपेंडेंट हो गया न ! इसलिए धर्मराज कहे कि यह कुत्ता मुझपर डिपेंडेंट है | मैंने अपने माँ-बाप का तो जीवनभर भरण-पोषण किया | सेवा किया | गुरु का भी किया | युद्धभूमि में गुरु के खिलाफ हमलोग हथियार नहीं उठाए कोई | भले ही युद्ध हार जायें या रहें | और आज अंतिम समय में यह कुत्ता है, यदि यह नहीं जाएगा तो मैं तुम्हारे साथ स्वर्ग नहीं जाऊँगा | अच्छा है, मुझे इस हिमालय में ही गलने दो |

देखो यह बहुत बड़ा त्याग है | हमलोग तो कहीं जगह मिलती है तो खट से जाकर बैठ जाते हैं | साथ छोड़ देते हैं न ! तो देखो, वह कुत्ता नहीं था- धर्मराज ही था | प्रकट हुआ | उस कुत्ते के रूप में स्वयं धर्मराज ही उनको ले जा रहे थे | कहा कि चलो, आज तुम्हारी अंतिम परीक्षा पूर्ण हुई | धर्मराज की ड्यूटी अभी हमने देवता लोगों को दे दिया है – इसलिए कि तुम भक्ति में हो | धर्म में हो |

देखो, जब तुम भक्ति करते हो तो यह नहीं है कि गुरुजी ही देखते हैं, तुम्हारा पड़ौसी ही देखता है | बहुत लम्बी उसकी तरंग उठती चली जाती है | वहाँ से बैठकर देवता गण भी देखते हैं | लेकिन यह भी बात समझो – आप मनुष्य हो | कर्म करके देवता तो बन सकते हो | लेकिन देवता कोई भी कर्म करके भगवत्ता को नहीं प्राप्त कर सकता है | आत्म-तत्त्व में, परमात्मा में नहीं मिल सकता है | वह बुद्ध और महावीर नहीं बन सकता है | और न ही भगवान् कृष्ण और नारायण बन सकता है | यह केवल मनुष्य में सम्भावना है | इसलिए मैं हमेशा कहता हूँ कि आपलोग देवी-देवताओं से कहीं अधिक श्रेष्ठ हो | देवी-देवता से बहुत महान हो- तो यह अपने में समझो |

 आज का जो दिन है, गुरु पर्व है | पूरे विश्व में यह भारत में ही मनाया जाता है | गुरु शब्द भारत में ही है | गुरु का अर्थ टीचर नहीं होता है | ‘टीचर’ कहकर तुम काम चलाते हो, गुरु प्राप्त नहीं करते हो | देखो, एक बार काशी में गुरु पूर्णिमा महोत्सव हो रहा था | एक बहुत बड़ा चोर था | चोर यदि चोरी भी छोड़ दे तो मक्कारी से बाज आएगा ? दिन निकला तो सोच रहा था कि कहाँ हम जायें- क्या करें ..घर में कुछ खाना-पीना नहीं है, कुछ मजदूरी करें | घर से निकला तो देखता है कि एक आश्रम में बहुत बड़ी भीड़ लगी है | मालूम हो रहा था कि भण्डारा वगैरह है, कुछ खाना-वाना, चाय- नाश्ता, पकौड़ा मिलेगा | तो चला गया वह भी गुरुजी के यहाँ | देखा, लाइन में लगे हैं लोग | एक बाबा बैठे हैं – आँख बंद किए हैं | सब लोग उनको रुपया-पैसा, फल-फूल चढ़ा रहे हैं | कहा कि हम तो आ गए इस लाइन में- कि कुछ खाना मिलेगा | अब क्या चढ़ावें ? चढ़ाना तो है कुछ | नहीं चढ़ायेंगे तो लोग कहेंगे कि देखो इतनी बड़ी लाइन में रहा है, चढ़ा कुछ नहीं रहा है …|

बड़ा फेर में पड़ा | पॉकेट में टटोला- कुछ नहीं था | एक रुपया का सिक्का बोहनी करके चलता है न चोर भी | चलता है तो एक रुपया रख लेता है पहले से कि बोहनी ख़राब न हो | भिखमंगा भी चलता है तो मुट्ठीभर चावल रख लेता है हाथ में | तो वह भी एक रुपया रखा था | कहा कि कहाँ हम चक्कर में पड़ गए बाबा के | ऐसा तो हम सोचे नहीं थे | तो एक रुपया निकालकर- वह भी गोड़ लगा | फिर चला गया उधर- भण्डारा में | खाना-पीना मिला | कहा कि चलो, आज एक रुपया में हमको खाना-पीना भी मिल गया | उसके बाद रोड पर आश्रम था – निकला | ट्रक उधर से आ रहा था- मारा गया | जय सच्चिदानंद !

उसके घर वाले कहे कि हमारे घर के लोग कभी किसी आश्रम में नहीं गए हैं, आज तक | ऐसा पाप नहीं किए, करम नहीं किए | देखो यह गया, बाबा का आशीर्वाद लिया | मर गया न ! बड़ा पाप हुआ ! लड़का- बच्चा से कहा कि कान पकड़ो – अब नहीं जायेंगे | तुमलोग भी कहते हो न कि हम आश्रम में गए.. वहाँ गए, देखा ! यह हो गया | यह हो जाता है ! उसके परिवार वालों ने भी कहा कि बहुत बड़ा पाप हो गया भाई ! भगवान् से प्रार्थना करते हैं कि अब नहीं हम फिर जायेंगे |

अब वह जब मरकर गया तो लेखा-जोखा हुआ | ऊपर दरबार लगा था | अकाउंट इसका देखा गया कि भाई, क्या-क्या इसका काम है ! कहा कि इसने तो जिंदगीभर कोई पुण्य ही नहीं किया है | लेकिन इसका एक तो पुण्य है – एक रुपया दिया है गुरुपूर्णिमा पर | गुरु के यहाँ दान दिया है | और फिर उससे ज्यादा वहाँ खा भी लिया है |

लेकिन दान तो दिया है न, इसका फलाफल क्या है ? सप्त ऋषि गण पूछे | देवगुरु बृहस्पति कहे कि ऐसा चोर आदमी जो केवल लेने वाला था – वह एक रुपया गुरु के यहाँ गुरु पूर्णिमा के दिन चढ़ा दिया है | यह गुरुपूर्णिमा का पर्व वर्ष में एक दिन आता है, गुरु का पर्व होता है और शास्त्र भी कहता है –

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः | गुरुः साक्षात् परमब्रहम तस्मै श्री गुरवे नमः ||

उस दिन गुरु साक्षात् परमात्मा का स्वरूप होता है, इसलिए उसके महत्व का तो वर्णन ही नहीं हो सकता है | इसलिए इसका महात्मय है कि यदि इसने एक रुपया चढ़ाया है तो दस मिनट के लिए यह इंद्र की पदवी पर बैठेगा |

तो देवगुरु बृहस्पति बोले कि इसका महत्व तो इतना है… पृथ्वी पर कहा गया है – ‘श्रीगुर पद नख मनि गन जोती | सुमिरत दिब्य दृष्टि हियँ होती ||’ यह भी कहा गया है – ‘गुर बिन भव निधि तरइ न कोई | जौं बिरंचि संकर सम होई ||’ माने तपस्या से ब्रह्मा हो सकते हो, शंकर हो सकते हो लेकिन भव नहीं पार करोगे | लेकिन तुम जानते हो, जो गुरु के खिलाफ रहता है, काल उसी को मदद करता है | और फिर उसे अपना ग्रास बना लेता है | आज बहुत गुरु विश्वस्तर पर छाये हुए हैं; जो खुद ही गुरु नहीं किए हैं | एकाध जेल तो चला गया, एकाध अभी हाईलाइट हो रहा है | जिसने अपने गुरु को मार दिया है | छीन-झपटकर गुरु की गद्दी पर बैठ गया है | अब नाम नहीं रखेंगे | टीवी पर जाएगा तो काट देंगे न ! लेकिन अब पूछो कि उनको यह क्यों हो रहा है ?

वह यम का रूप है | सब अपने-अपने भाई को मदद करता है | तुम्हारा मन ही यम है | तुम्हारे अन्दर मन ही यम का प्रतिनिधि है साक्षात् | इसीलिए कबीर साहब कहे हैं –

‘मन का कहा न कीजिए, मन है पक्का धूर्त |

ले डूबिहैं दरिया में, प्राण जाइहैं छूट ||’

 तीन प्रकार की फीलिंग होती है | फीलिंग मतलब प्रेरणा | पहली होती है शैतान की प्रेरणा | शैतान कौन है आपके अन्दर ? मन | शैतानी प्रेरणा माने मन की प्रेरणा | मन प्रेरणा देता है | आपलोग कहते हो कि हमारा मन यह कहता है… | हमारा मन नहीं कहता है गुरुजी के यहाँ जाने को | यह शैतानी प्रेरणा है | मन की प्रेरणा से तुम यह कह रहे हो | हमारा मन कहता है कि हम यह खाएं- वह खाएं | छोड़ो यार, यावत् जीवेत् सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत् | जब तक जीयें, अपना खूब मौज-मस्ती से रहें | यह मन की प्रेरणा है, इसको शैतानी प्रेरणा कहा गया है | दूसरी दैवी प्रेरणा है, तुम्हारा अहंकार | अहंकार ही तुम्हारे और परमात्मा के बीच में दीवार है | मन से ऊपर अहंकार होता है | मन बहुत सूक्षम है | मन के ऊपर होता है चित्त, बुद्धि और अहंकार | अहंकार अंतिम बैरियर होता है | तुमलोग जो समझते हो – दैवी प्रेरणा, वह अहंकार की प्रेरणा है | तीसरी जो है, उसको हम कहते हैं आत्मिक या ईश्वरीय प्रेरणा | यह आपकी आत्मा से होता है | तो जब तक आत्मा से संजोग नहीं हुआ, आत्मा को जाना नहीं, तब तक आत्मिक प्रेरणा कैसे होगी ?

 कुछ लोग बनावटी कहते हैं कि हमारा आत्मा तो यह कहता है..| अरे आत्मा को तुमने जाना ही नहीं, तब आत्मिक प्रेरणा को पहचाना कैसे ? लगभग शत-प्रतिशत आदमी शैतानी प्रेरणा में रहते हैं | बस 1% में अहंकार की प्रेरणा रहती है और 001% जो हैं, वह आत्मिक प्रेरणा में आते हैं | तो आज गुरुपूर्णिमा में आये हैं तो हमलोगों को यह समझना चाहिए कि हम शैतानी प्रेरणा में हैं, अहंकार की प्रेरणा में हैं या अहंकार की प्रेरणा में हैं | यह भी कहा गया है योग पतंजलि में – योगः चित्तवृत्ति निरोधः | चित्तवृत्ति माने चित्त का व्यापार | जैसे बनिया व्यापार करता है, हमारा चित्त जो है व्यापार करता है | जब तक हम इसके व्यापार में लगे रहेंगे, तब तक यह समझो कि वह शैतानी वृत्ति ही रहेगी | लेकिन इसका निरोध या दमन नहीं करना है, इस वृत्ति को परिवर्तित करना है |

देवगुरु बृहस्पति कहे कि यह गुरुपूर्णिमा में गया है तो दस मिनट यह इंद्र की गद्दी पर रह सकता है | इंद्र ने कहा कि यह तो बड़ा गड़बड़ है | हमारा यह गुरु इस चोर को हमारी गद्दी पर बैठाएगा ? देवगुरु कहे कि इंद्र ! अरे दस मिनट घूम लो बाहर | इधर-उधर जाकर | इसको बैठने दो बेचारे को |

‘दस मिनट बाद यह जाएगा ?’ चोर ने कहा कि हाँ | एक रुपया देने का जो प्रभाव है- अभी हमको इंद्र की गद्दी पर बैठा दीजिए | दस मिनट बाद हम चले जायेंगे |

अब वह बैठ गया | कहा कि हम बैठ गए हैं.. लेकिन मालूम नहीं हो रहा है कि हम ‘इंद्र’ हैं | हमको इंद्र का वस्त्र पहनाइए, मुकुट पहनाइए तब न इंद्र होंगे ! कहा कि क्या करें, चलो पहना दो | अब दे दिया गया | इंद्र का ड्रेस, मुकुट सब पहनकर के वह बैठ गया गद्दी पर | कहा कि देवगुरु बृहस्पति ! हमारे साथ न्याय होना चाहिए | कहा कि बिलकुल, न्याय होगा | अब कहा कि हम इंद्र हो गए हैं, पूरा न ! जो मैं कहूँगा- वह लागू होगा ? कहा कि हाँ | तो कहा कि कामधेनु गाय मैंने वशिष्ठ को दान दिया, उच्चैश्रवा घोड़ा विश्वमित्र को और कल्पवृक्ष ऋषि अंगिरा को दान दिया- जितना कीमती सामान था इंद्र का, सब दान दे दिया |

कहा कि दस मिनट हो गया | तो फट से इन्द्रासन से उतर गया | कहा कि देखिए, हम बेईमानी नहीं किए हैं.. बेईमान नहीं हैं हम | न हमने चोरी किया न बेईमानी किया | लेकिन एक मिनट.. हम पूछ लेते हैं…| तभी इंद्र को देखा कि आ रहा है तो फिर जाकर गद्दी पर बैठ गया | कहा कि फिर क्यों बैठ रहे हो ? कहा कि हम एक रुपया दिए हैं गुरु पूर्णिमा में तो इस गद्दी को प्राप्त किए | अब हम इतना दान दे दिए – सप्त ऋषियों को दान दिए हैं न, इसका भी फलाफल ज़रा सुनना चाहते हैं|

सप्तऋषि तो सब खुश हो गए कि इंद्र का इतना सब कीमती सामान यह हमको दे दिया है | देवगुरु बृहस्पति ने कहा कि इसका फल तो है कि अब तुमको इंद्र बनना चाहिए | कहा कि कहाँ बैठें ? देवराज इंद्र कहे कि अच्छा.. हमको चक्कर में डाले आपलोग ?

देवगुरु बृहस्पति ने कहा कि बेटा, इंद्र का टाइम अभी ख़त्म नहीं हुआ है | सबलोगों का निर्धारित टाइम न है ! इनका कार्यकाल ख़त्म होगा, तब तुमको इंद्र बनाया जाएगा | तब तक तुम धरातल पर जाओ | वहाँ काम करो |

वही चोर धरातल पर राजा बली के रूप में आया | और जब बली ‘राजा’ बना तो वह जानता था कि पिछला जन्म मेरा क्या था, इसलिए यज्ञ करने लगा, दान देने लगा | दान का प्रभाव वह जानता था | इंद्र ने घबराकर कहा कि अरे यज्ञ फिर वही करा रहा है चोरवा ! तब वामनावतार हुआ, भगवान् आए उसका यज्ञ भंग करने |

‘आपन सोचा दूर है, हरि सोचा तत्काल | बलि ने चाहा स्वर्ग को, हरि दे पठयो पाताल ||’

पाताल तो चला गया लेकिन यह भी आया है – ‘हरि गयो ठगने, आप गयो ठगाय |’

हरि ठगने गए थे न, लेकिन ठगा गए |

देखो इसलिए हमलोग अपना कर्म यदि करें, सत्कर्म करते रहें तो हमको कोई ठग नहीं सकता है | वह धर्म की पताका हरदम ऊँची रहती है | इसलिए कबीर साहब कहते हैं कि भक्ति का महल बहुत ऊँचा है – दूरहि से दरसाय | दूर से ही, ऊपर से ही देखते हैं देवता, दानव-दनुज, गन्धर्व, किन्नर सब तुम्हारी ध्वजा देखते हैं | पाप भी, पुण्य भी तुम्हारा देखते हैं | इसलिए यह ध्वजा जो है, खास कर गुरु पूर्णिमा के दिन तुमलोग आए हो – उसकी शोभा का वर्णन नहीं किया जा सकता है – जो कोई जन भक्ति करै, सोभा बरनि न जाय || वह चोर अपने सत्कर्मों के द्वारा इस गुरु पूर्णिमा में बली बन गया | जिसके दरवाजे पर (बावन द्वार वाला महल बनवाया था) नारायण को द्वारपाल बनना पड़ा | जानते हो न ! और लक्ष्मी जी को उसकी छोटी बहन बनना पड़ा | उनका भी फिर वही कन्यादान दिया |

कौन जीता ? ‘हरि गयो ठगने, आप गए ठगाय |’ इसलिए यह समझ लो – तुम भी जहाँ किसी को ठगने के लिए जाओगे, ठगा जाओगे | जब हरि ही ठगा गए.. इसलिए ठगो मत | आप कहीं जाकर- ठगाकर खुश हो जाओ | प्रसन्न हो जाओ कि चलो ठगा न गए – ठगे नहीं ! क्योंकि अपने मन की वृत्ति को कभी भी ठगने में नहीं लगाना चाहिए | जहाँ ठगने में लगी वृत्ति- जय सच्चिदानंद !

 

गुरु की भक्ति में ही मुक्ति की युक्ति

वेदांत कहता है कि सभी मनुष्य पावन हैं | सभी दिव्य आते ही हैं | जैसे वर्षा का जल पवित्र होता है | और जहाँ गंगा नहीं है, वहाँ वर्षा के जल को रोक दिया जाता है, पात्रों में बंद करके रखा जाता है और उसको गंगा जल कहा जाता है | इसलिए कि वर्षा का जल प्योर होता है – डिस्टिल्ड वॉटर होता है | लेकिन वह वर्षा का जल जैसी जगह पाता है, उसके साथ उसी की तरह हो जाता है | गंगा में गया – गंगा हो गया |

अब तुमलोग मानसरोवर गए थे – वहाँ वर्षा का जल आता है न ! मानसरोवर में गया तो मानसरोवर हो गया | सागर में गया तो सागर में मिलकर खारा हो गया | बहते हुए किसी नाले में पड़ा तो नाला हो गया | जब-जब मैं बद्रीनाथ जाता हूँ, यहाँ से निकलता हूँ तो बगल में नाला है न, इसके सब कीड़े-मकौड़े घेरते हैं- आकर खड़े हो जाते हैं कि इस बार चलेंगे हम | कृष्ण जन्माष्टमी पर इस बार जा रहे हैं बद्रीनाथ | प्रेम का प्रतीक तो कृष्ण ही हैं न ! इसलिए संयोग से यह कृष्ण जन्माष्टमी पर रखा गया है | प्रेम का प्रतिरूप तो कृष्ण ही हैं | भगवान् राम तो गंभीर हैं | बुद्ध गंभीर हैं | हँसते हुए नहीं देखेंगे कभी | और कृष्ण को कभी गंभीर नहीं देखोगे | हरदम हँसते-मुस्कुराते हुए दिखाई पड़ते हैं – बड़ी से बड़ी समस्या में भी |

हम सब इस पृथ्वी पर आते हैं – दिव्य, ब्रह्मस्वरूप | सब आते हैं सत्यं शिवं सुन्दरं | लेकिन हम संसर्ग से गुण-दोष ग्रहण कर लेते हैं – संसर्गे गुणदोषाभवत् | कुछ अपनी पढ़ाई-लिखाई से ग्रहण कर लेते हैं | तीन जगह से ग्रहण करते हैं – 1. माँ-बाप, 2. शिक्षक, 3. प्रारब्ध | इसके बाद चौथा है गुरु और पाँचवां है अपना कर्म जो हम करते हैं | प्रारब्ध पर, माँ-बाप पर, शिक्षक पर तो आपका वश नहीं है, एक गुरु पर आपका वश है कि हम सोच-समझकर गुरु करेंगे | और अंतिम पाँचवां अपने कर्म पर वश है कि हम एक यही कर्म करेंगे या नहीं करेंगे | इस पर तो वश है न ! यदि ठीक-ठीक हम कर्म करें तो ठीक फलाफल मिलेगा | घबड़ाना नहीं है |

देखो, जैसे यहाँ अमरूद का पेड़ है न ! तीन-चार साल में यह फलने लगता है | अभी इस पर फूल लग रहा है, फल लग रहा है | जब से अमरूद का बीज ज़मीन में पड़ गया, तभी से वह प्रक्रिया लग गई – फलने की | अब तुम उसकी जड़ काटकर खा जाओ अमरूद का टेस्ट आएगा ? पत्तियाँ चबाते रहो – आएगा ? जब फल पक जाता है, तब न आता है टेस्ट ! कहोगे कि अरे बड़ा मीठा है ! लेकिन पत्तियाँ चबाओ- फूल चबाओ – डाली चबाओ – जड़ चबाओ, तब तो नहीं आएगा न ! उसी तरह से आपमें वह परमात्मा रूपी बीज जब से जन्म लिया है, तभी से वह आगे बढ़ने लगा है और जैसे ही गुरु के सान्निध्य में आते हो, तब वह फूल लगता है ध्यान का और ध्यान जब पूर्ण होता है तब वह फल आता है समाधि का | और समाधि में जब रहने लगते हो तो वह फल मीठा हो जाता है | इसलिए घबड़ाओ मत कि इतना समय हो गया – फल आया नहीं |

किसी फलदार वृक्ष का फल काटकर देखो – कहीं उसमें वह पेड़ नहीं दिखाई पड़ेगा | बस उसका स्वाद मालूम होगा- मीठा | लेकिन बीज उसका बो दो – प्रक्रिया शुरू हो गई | सब तत्त्व वह ज़मीन से ग्रहण करने लगा | अब आपका काम है नियमित रूप से उसको सिंचित करना | पानी देना – खाद देना और फलने का अवसर उपलब्ध कराना | उसी तरह से गुरु ने आपको जो गुरु मन्त्र दिया है दीक्षा में, दिव्य गुप्त विज्ञान, स्वर साधना या प्रेम साधना की जो क्लास लिया है उसके नियमित अभ्यास से वह जो बीज रोपा गया है, उसको अंकुरित होकर वृक्ष बनने दो | निरंतर आगे बढ़ने दो | उसको सींचो | जल्दबाजी मत करो | तोड़कर मत देखने लगे | हमलोग अपनी त्याग-तपस्या को किसी की छोटी-छोटी बीमारी पर, छोटे-छोटे काम पर लगा देते हैं कि जाओ, यह हो जाएगा | आशीर्वाद- श्राप देने लगते हैं | इसमें मत लगाओ | यदि उस पेड़ को काटते रहोगे तो वह फल तुमको प्राप्त होगा ? नहीं होगा | इसलिए धैर्य रखो | समय पर फल आ जाता है |

देखो काशी में नहीं बताना पड़ता है | गुरु पूर्णिमा की तारीख सब देखते हैं पञ्चांग से | और उस दिन जो सालभर नहीं आता है, मुर्दा पड़ा रहता है वह भी श्मशान घाट से निकल-निकलकर आ जाएगा | काशी की विशेषता है यह कि आ जाएगा | हम भी देखते हैं तो चौंकते हैं कि अरे यह तो कभी दिखाई नहीं पड़ा | कहते हैं कि गुरुजी, आज के दिन हमलोग कब्र से निकल-निकल आ रहे हैं | तो काशी में आज भी यह महात्म्य है गुरु पूर्णिमा का |

कबीर साहब कहते हैं कि –

भक्ति भक्ति बहुत कठिन है, रती न चाले खोट |

निराधार का खेल है, अधर धार की चोट ||

यह भक्ति जो है, बहुत कठिन है | भक्त जहाँ खड़ा रहता है, उसके नीचे कोई आधार नहीं रहता है | यह बात समझो – वह आधारहीन है | बेसलेस खड़ा है | मालूम होता है कि कोई आपका रक्षा करने वाला नहीं है | आगे-पीछे कुछ नहीं है | क्योंकि वह परमात्मा तो निर्गुण है, निराकार है | कैसे दिखाई पड़ेगा ? इसलिए मालूम होगा कि निराधार है | और ज़रा सा भी गलती किया, खोट हुआ तो जानते हो, कहाँ गिरेगा ? सीधा पाताल में जाएगा |

सफ़ेद कपड़ा जो पहना है- रोड पर जाएगा जरा भी छींटा गाड़ी से पड़ेगा कीचड़ का तो फट से दिखाई पड़ जाएगा | गन्दा हो जाएगा | लेकिन जो काला ही कपड़ा पहना है उसपर – मालूम होगा ? ‘सूरदास खल कारी कामरि चढ़त न दूजो रंग’- काले कपड़े को रोज़ पहन लें तो भी दिखाई नहीं पड़ेगा | सफ़ेद ड्रेस इसीलिए दिया जाता है कि उसकी तरह हमारा मन भी सफ़ेद हो जाए और मन में जरा भी कालिमा आए तो वह दूर से दिखाई पड़ने लगे और लोग कहें कि यह तो उचित नहीं है | माने टोक दिया | जब कोई टोक दे तो उसका बुरा मत मानो | अपनी उस कमी को सुधारना चाहिए|

भगवान् बुद्ध अपने पूर्व जन्म में काशी के एक ब्राह्मण परिवार में जन्म लिए थे | तक्षिला से बहुत उच्च विद्या पढ़कर आए और एक जगह कमल का एक सुन्दर तालाब देखा, वहीं झोंपड़ी लगाकर तपस्या कर रहे थे | एक दिन सुबह-सुबह स्नान करके सूर्य को अर्ध्य देकर खड़े ही थे कि देखे कमल का पुष्प खिले हैं सुन्दर | चारों तरफ सुगंधि फ़ैल रही थी, वो उसके नजदीक जाकर सुगंध ले रहे थे | तभी एक स्वर सुनाई पड़ा कि युवक ! चोरी क्यों कर रहे हो ? वह घबड़ाया | इधर-उधर देखा | कहा कि चोरी…? वह देव बाला बोली – ‘अरे तुम चोरी नहीं कर रहे हो ? वह कमल का पुष्प सुगंध दे रहा है | उसे न तुमने अपने गुरु को अर्पित किया, न गोविन्द को अर्पित किया | पहले गुरु और गोविन्द को अर्पण किया जाता है और बिना अर्पित किए स्वयं इसका भोग लगा लिया ? तुमसे यह उम्मीद नहीं थी कि इतना बड़ा चोर हो जाओगे |

तुमलोगों को कोई ‘चोर’ कहे तो झगड़ा कर लोगे | तब तक ये देखे कि एक आदमी आया है और कमल के फूल तोड़-तोड़कर अपनी टोकरी में रखते जा रहा है | बुद्ध ने इशारा किया कि देवि ! उसको तो कुछ नहीं कह रही हो, जो कमल के पुष्पों को बेरहमी से तोड़-तोड़ टोकरी में रख रहा है |

कहा कि उसको मैं क्यों कहूँ ? वह तो जन्मोंजन्म का डकैत है, हत्यारा है | दया वश मनुष्य योनि में आया है | और तुम तो 180 जन्मों से इसी में लगे हो- सारे देवी-देवता, ग्रह-नक्षत्र की आँख तुम पर लगी है कि कब यह बुद्धत्व को प्राप्त करेगा ! सृष्टि के सारे जीव-जंतु तुम्हारी तरफ मुखातिब हो रहे हैं कि इस सृष्टि का सबसे प्योर, पायस यह व्यक्ति.. बुद्धत्व को प्राप्त करने जा रहा है | इसलिए तुममें जरा भी कलंक यदि लग जाए तो हमलोग चिंतित हो जाते हैं कि तुम्हारा बुद्धत्व कहीं झटक नहीं जाए | जरा सी डगमग से गया तुम्हारा यह जन्म भी | तुमसे यह उम्मीद नहीं की जाती है | इसलिए उससे अपनी तुलना मत करो |

तो डाँटकर वह देवकन्या यह कही | बुद्ध युवक थे – सुन्दर | शीलवान् थे, गुणवान् थे | उच्च शिक्षा लेकर आये थे तक्षिला से | कहा कि माते ! देखो अब शब्द (संबोधन) बदल गया | अपनी ही उम्र की लड़की से कह रहे हैं कि माते ! तुम मेरी गुरु हो गईं | मैं कान पकड़ता हूँ कि चोरी नहीं करूँगा | छोटा भी दोष मुझमें दिखाई पड़ा करे तो मुझे तुरंत डाँट दिया करो | वह बोली कि यह काम गुरु का है | इसी के लिए गुरु के सान्निध्य में रहा जाता है | तुम्हारी तपस्या चूँकि बढ़ रही है, पूरी सृष्टि तारे-नक्षत्र तक तुम्हारा अवलोकन कर रहे हैं कि इससे कहीं कुछ गलत मत हो जाए | चूँकि यह निराधार तो ऐसा है कि जरा सा फिसला तुम्हारा पैर, तो कितना नीचे गिरते चले जाओगे – कुछ कहा नहीं जा सकता है | अभी भक्ति के तुम एकदम शीर्ष पर चढ़े हो, जरा सा डगमग हुए तो तुम्हारा पतन हो जाएगा- युवक !

अब समझो, कुछ लोग खूब चोरी करते हैं | उनको कोई नहीं पूछता है कि यह क्या कर रहे हो ? और कुछ लोग थोड़ा ही करते हैं और पकड़ा जाते हैं | इसलिए कि उनपर आँखें लगी हैं | इसलिए देखादेखी मत करो – देखादेखी पाप और देखादेखी पुण्य | इसीलिए कहा गया है कि –

गुरु से लगन कठिन मेरे भाई |

गुरु से लगे बिन काज न सरिहे जीव प्रलय हो जाई |’

गुरु से लगन करना है, क्योंकि गुरुजी तुम्हें छोटी से छोटी बात पर डाँटते हैं | फिर तुमलोग कहते हो कि गुरुजी आज तो हमारी क्लास ले लिए, अब मैं नहीं जाता | ठीक है न !

तो देखो, और कोई नहीं है क्लास | डाँटने का मतलब यही है कि जब तुम आये हो तो आगे बढ़ो | इधर आगे बढ़ो भक्ति में | ..और आपका यह वर्ष मंगलमय हो –

‘मंगलं भगवान् विष्णुः मंगलं गरुड़ध्वजः | मंगलं पुंडरीकाक्षः मंगलाय तनो हरिः ||’

हमलोग यह कहते हैं | लेकिन ये देवी-देवता केवल त्रिलोक तक हैं | इनकी भक्ति में इन्हीं के लोक तक यात्रा करोगे | गुरु की भक्ति में ही मुक्ति पाते हो | इसलिए शंकरजी कहते हैं – मोक्षमूलं गुरुकृपा | मुक्ति जो है, गुरु-भक्ति से मिलती है | बस आज इतना ही.. धन्यवाद |

 

सद्गुरुदेव की जय !

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संकलन –‘हरिः ओऽम सद्गुरु टाइम्स’ (मासिक पत्रिका, सद्विप्र समाज सेवा हेतु समर्पित) से साभार

 

‘समय के सद्गुरु’ स्वामी  कृष्णानंद  जी महाराज

आप सद्विप्र समाज की रचना कर विश्व जनमानस को कल्याण मूलक सन्देश दे रहे हैं| सद्विप्र समाज सेवा एक आध्यात्मिक संस्था है, जो आपके निर्देशन में जीवन के सच्चे मर्म को उजागर कर शाश्वत शांति की ओर समाज को अग्रगति प्रदान करती है| आपने दिव्य गुप्त विज्ञान का अन्वेषण किया है, जिससे साधक शीघ्र ही साधना की ऊँचाई पर पहुँच सकता है| संसार की कठिनाई का सहजता से समाधान कर सकता है|

स्वामी जी के प्रवचन यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध हैं –

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