सम्पूर्ण कर्मों में अनासक्ति का भाव और फलाकाँक्षा का त्याग

सम्पूर्ण कर्मों में अनासक्ति का भाव और फलाकाँक्षा का त्याग

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storyberrys

17 Aug 20249 min read

Published in spiritualism

गुरुदेव द्वारा ‘गीता’ पर विशेष व्याख्या

 

सम्पूर्ण कर्मों में अनासक्ति का भाव और फलाकाँक्षा का त्याग

 

अगले श्लोक में भगवान् कृष्ण कह रहे हैं-

एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गंत्यक्त्वा फलानि च|

कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्|| ६ ||

 

पदच्छेद अन्वय –

एतानि अपि तु कर्माणि सङ्गम् त्यक्त्वा फलानि च|

कर्तव्यानि इति मे पार्थ निश्चितम् मतम् उत्तमम्|| ६ ||

पार्थ = हे पार्थ!, एतानि = इन यज्ञ, दान और तपरूप कर्मों को, तु = तथा,) (अन्यानि) = और, अपि = भी, कर्माणि = सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को, सङ्गम् = आसक्ति, = और, फलानि = फलों का, त्यक्त्वा = त्याग करके (अवश्य), कर्तव्यानि = करना चाहिए; इति = यह, मे = मेरा, निश्चितम् = निश्चय किया हुआ, उत्तमम् = उत्तम, मतम् = मत है|

 

इसलिए हे पार्थ! इन यज्ञ, दान और तपरूप कर्मों को तथा और भी सम्पूर्ण कर्मों को आसक्ति और फलों का त्याग करके अवश्य करना चाहिए; यह मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है|| ६ ||

 

तो भगवान् कृष्ण यहाँ पर मुहर मार दिए| सबका वर्णन करते हुए कहा कि कुछ यह कहते हैं, कुछ वह कहते हैं; वहीं पर अपना मार दिए मुहर कि यह मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है| और यह निश्चय- कोई समय का सद्गुरु या बुद्ध पुरुष ही कर सकता है, सब नहीं कर सकते हैं| इसलिए कृष्ण इसको बिलकुल निश्चयात्मक कहते हुए, उस पर दस्तखत कर दिए- फरमान दे दिए कि लो, मेरा ऑर्डर| अब इसके आगे नहीं- यह निश्चय है|

किसी की तुम सेवा करते हो तो सेवा के एवज में वह तुमको धन्यवाद देता है| देखा है! आजकल के अंग्रेजी स्कूलों में यह पढ़ाया जाता है शिष्टाचार| लड़का यदि अपने बाप को भी एक गिलास पानी देता है तो वह बाप कहता है- थैंक यू| यदि थैंक यू नहीं कहे तो वह लड़का कहता है कि पापा! you don’t know courtesy, manners? कुछ सभ्यता, शिष्टाचार नहीं जानते हो? अरे हम पानी दिए- धन्यवाद नहीं किया? भारत में लड़का कितनहुँ सेवा करे, कहीं बाप धन्यवाद देता है! माँ धन्यवाद देती है? अरे तुमसे तो अपेक्षा ही है! धन्यवाद तो दिया ही जाता है ऐसे आदमी को, जिससे हमारी कोई उम्मीद नहीं है| जैसे, मैं जा रहा हूँ| मुझे ठोकर लग गई- गिर गया| रोड पर कोई आया, उठा दिया मुझे- जिससे मेरी कोई अपेक्षा नहीं है| उसको न कहेंगे कि बहुत-बहुत धन्यवाद! भाई, तुमसे तो कोई उम्मीद ही नहीं थी| लेकिन आजकल स्कूल में पढ़ाया जाता है लड़के को भी| मान लो, उसकी माँ ने उसको कलम दी तो लड़का कहता है कि थैंक यू- मम्मी| अरे! तो यह फॉर्मेलिटी बन गया| लेकिन भगवान् कृष्ण कहते हैं- निश्चयात्मक| तुम किसी की सेवा करो तो उससे धन्यवाद की अपेक्षा मत करो|

देखते हो, गुरुद्वारे में सेवादार लोग सेवा करते हैं| तुम्हारा जूठा बर्तन भी मलते हैं, जूता को पॉलिश भी कर देते हैं| आज हमारे आश्रम में भी सेवा-भण्डारा शुरू हो गया है बद्रीनाथ में| रोज़ कम से कम 500-1000 आदमियों को चाय-पानी, खाना दिया जा रहा है| गिलास, प्लेट, थाली- सबको मल करके कपड़े से पोंछा जा रहा है| तुम लोग तो मलने के चलते पत्तल चला देते हो| कौन मलेगा? हम भी नहीं मलेंगे और जो खाएगा, वह भी नहीं मलेगा| रोज़ मैं मना करता हूँ कि पत्तल मत चलाओ| तुम लोग तो बस इतने हो- इतने में ही पत्तल चलाए जा रहे हो? माने शार्ट कट वाला काम| पत्तल चलाओ- फिर फेंक दो, रोड गन्दा कर दो| अब वर्षा आ गई, जलेगा नहीं| गन्दा मत करो| बद्रीनाथ में देखो, पंजाब के लोग सेवा में हैं सब|

हम लोग सेवा करते हैं| भगवान् कृष्ण कहते हैं कि यदि सेवा करते हो तो उसमें धन्यवाद की आकांक्षा मत करो| हम तपस्या करते हैं और परमात्मा की तरफ देखते रहते हैं कि दो दिन मैं भूखा रहा..और तू प्रकट नहीं हुआ- तीन दिन हो गया…| क्या जी? कहते हैं न, इतने दिन से हम हवन-पूजा कर रहे हैं, कुछ दिया नहीं अभी तक?

हम जो कुछ भी पूजा-पाठ, हवन, जप-तप करते हैं, परमात्मा को उलाहना करते हैं कि तुमको रोज़ फल चढ़ा रहे हैं, मिठाई चढ़ा रहे हैं| अरे सुनी नहीं, हमारी बात? यदि नहीं सुना तो कल तुम्हें हम माला नहीं पहनायेंगे- लात मारेंगे| यह भी धमकी देते हो तुम परमात्मा को| तो भगवान् कृष्ण कहते हैं कि प्रार्थना करो, तपस्या करो लेकिन परमात्मा की तरफ उलाहना की दृष्टि से मत देखो| छोड़ दो उसपर- उसकी मर्ज़ी| कोई उलाहना मत रखो कि हमको यह चाहिए- वह चाहिए| आकांक्षा मत करो| इसीलिए हमारे यहाँ दान गुप्त किया जाता है| यह तो दान की कला ऐसी है कि दाहिने हाथ से देते हैं, बायाँ हाथ नहीं जानता है| इसलिए गुप्त दान की महिमा है| हमलोग ढिंढोरा पीटकर देते हैं| इधर के लोग तो पीट-पीटकर देंगे कि इतना दिए| हैं न! कहेंगे कि गुरुजी के यहाँ गए थे… आज पांच सौ रूपया दे आये हैं यार| अब चलो, बहुत दे आये हैं- तब तो कुछ कमाना होगा न| कैसे वह पांच सौ एडजस्ट होगा! इसलिए दान गुप्त होना चाहिए – पति दे रहा है, पत्नी भी न जाने| पत्नी दे रही है तो पति न जाने| लेकिन पति आँख हरदम लगाए रहता है कि यह कुछ दे मत दे| पत्नी के साथ यदि गया न, तो कहेगा कि चलो– जल्दी चलो| वह कहेगी कि चलो अच्छा, आ रहे हैं| लेकिन नहीं, वह देखते रहता है कि कुछ दे तो नहीं रही है- गुरुजी को कहीं?

है न जी! देखते रहते हो न तुम लोग, कि कहीं दे तो नहीं रही है! बड़ा आँख गड़ाए रहते हो| इसलिए औरतें ही दान देती हैं छिपाकर, चुपचाप| हमने कहा न, प्रकृति में नारी चुप रहती है- मौन| गुप्त दान देती है| सच पूछो तो बाबा लोगों का खर्चा औरतों से ही चलता है| पुरुष तो छीन ले जाएगा- देगा पांच सौ, हज़ार छीन ले जाएगा| सोचेगा कि कैसे हमारा पांच सौ वह वसूल हो जाए| खैर! तो हम यह कह रहे हैं भगवान् कृष्ण की बात- ऐसी साधना करो कि उसके प्रतिफल की कोई अपेक्षा ही न रहे कि हमें यह चाहिए| वह साधना ही तुम्हारी साध्य हो जाए| अपेक्षाएं मत करो| वर्तमान में जो तुम करते हो, यही वर्तमान तुम्हारा भविष्य बन जाएगा| इसलिए आप बिना कामना किये हुए अपने वर्तमान समय का प्रयोग इतने अच्छे ढंग से करिए- तपस्या में, दान में और यज्ञ में, कि वह भविष्य आपका सुनहरा हो जाए|

भगवान् कृष्ण कह रहे हैं-‘फलाकांक्षा का त्याग रहना चाहिए- कभी इच्छा मत करो|’ सात्त्विक व्यक्ति ही फलाकांक्षा का त्याग कर सकता है| तामसिक प्रवृति का व्यक्ति करता नहीं है, फल ज्यादा चाहता है| फल की आकांक्षा जो करेगा, करेगा कुछ नहीं- वह तामसिक व्यक्ति है| सात्त्विक व्यक्ति उसे कहते हैं जो करते रहेगा, लेकिन वह फल की आकांक्षा नहीं करेगा| हर तरह का त्याग करेगा, दान करेगा, तपस्या करेगा- कहेगा कुछ नहीं| चुपचाप- आँख बंद करेगा अहोभाव से और चलता बनेगा| परमात्मा को अपना कर्म अर्पित कर देगा| धन्यवाद भी देगा| दान देगा तो धन्यवाद देगा कि गुरुजी! आपने मेरा दान स्वीकार कर लिया, बहुत-बहुत धन्यवाद| आप यह नहीं भी स्वीकार कर सकते थे| तो देखो, यह सात्त्विक वृत्ति है|

तामसी व्यक्ति कुछ देगा नहीं, लेकिन आकांक्षा करेगा कि गुरुजी, आपके यहाँ इतने दिनों से आते-जाते हैं, हमको क्या मिला? बोलिए तो! करेगा कुछ नहीं, उस पर भी आने-जाने का भी उलाहना देगा गुरुजी को| अब तुम समझ लो कि यह व्यक्ति तामसी है| यही तामसिक वृत्ति है| इसलिए भगवान् कृष्ण कह रहे हैं कि पूरी प्रक्रिया में कर्म मात्र को त्यागा नहीं जा सकता है| फल की आकांक्षा त्यागी जा सकती है, कर्म नहीं| कर्म करना है रोज़| लेकिन तुम लोग यदि सोचो कि कर्म करने के बाद क्या मिलेगा तो यह फल की आकांक्षा छोड़ दो| चूँकि हो सकता है कि कर्म करने के बाद तुम लोगों को डांट भी मिले गुरुजी की| फल यही मिले- तब? मजदूरी तो दिनभर काम करता है मजदूर, उसको सौ-पचास रुपया भी मिल जाता है| तुम लोगों को तो डांट मिल जाती है| तो यह तैयारी है कि तुम फल की आकांक्षा मत करो- इसके लिए यहाँ ट्रेनिंग दिया जा रहा है| कभी भूलकर भी यदि फल की आकांक्षा करोगे तो गड़बड़ हो जाएगा|

तामसी व्यक्ति कर्म का ही त्याग कर देता है, फल का परित्याग नहीं करता है| तामसी की यह पहचान ही है कि वह कोई कर्म नहीं करेगा- बैठ जाएगा| कहेगा कि हम बाबा हैं, बैठ गए| लेकिन आकांक्षा करेगा कि हमको अच्छा-अच्छा खाना मिले| अच्छा-अच्छा कपड़ा मिले, दान मिले| यह तामसी प्रवृत्ति का व्यक्ति है| फल की आकांक्षा वह नहीं छोड़ता है| तामसी उठ नहीं सकता है, बैठा रहेगा | और सारा कर्म त्याग देगा कि मैं तो तपस्वी हूँ, संन्यासी हो गया हूँ न! कर्म क्यों करूँ?

राजसी व्यक्ति में अनंत ऊर्जा होती है| ज़रूरत से ज्यादा उसमें शक्ति होती है, इसलिए वह ज्यादा ही जगा रहता है, उछल-कूद करता रहता है| ऐसा व्यक्ति कुछ न कुछ अपनी चर्चाएं करता और कराता रहेगा| लेकिन सत्त्ववृत्ति का  व्यक्ति श्रम और विश्राम में संतुलन रखता है| जितना सामर्थ्य है, उतना श्रम करेगा| विभिन्न पंथ के, संप्रदाय के, जाति के और देश-विदेश के लोग यहाँ आते हैं, सेवा देते हैं| ‘आश्रम’ नाम इसलिए है कि यहाँ आओ और श्रम करो| आना तो जारी है, लेकिन श्रम इसके साथ लगा है| आश्रम यानि आ-श्रम| सात्त्विक वृत्ति का व्यक्ति अपने श्रम और विश्राम में संतुलन बनाए रहता है और जब श्रम और विश्राम में संतुलन बना रहता है, तब वह आश्रम सार्थक हो जाता है| भगवान् कृष्ण कहते हैं कि समत्व का सूत्र ही है- संतुलन| अर्जुन को यह बार-बार समझा रहे हैं कि तुम कर्मों के फलों की आकांक्षा त्याग दो, आशा छोड़ दो| और कर्मों के फल की आशा यदि छोड़ दोगे अर्जुन, तो तुमसे श्रेष्ठ इस आर्यावर्त में कोई हो ही नहीं सकता है| इसलिए तुम निश्चिन्त होकर कर्म करो और फल की आकांक्षा छोड़ दो| आज बस इतना ही….धन्यवाद!

 

सद्गुरुदेव की जय !

 

 


‘समय के सदगुरु’ स्वामी  कृष्णानंद  जी महाराज

आप सद्विप्र समाज की रचना कर विश्व जनमानस को कल्याण मूलक सन्देश दे रहे हैं| सद्विप्र समाज सेवा एक आध्यात्मिक संस्था है, जो आपके निर्देशन में जीवन के सच्चे मर्म को उजागर कर शाश्वत शांति की ओर समाज को अग्रगति प्रदान करती है| आपने दिव्य गुप्त विज्ञान का अन्वेषण किया है, जिससे साधक शीघ्र ही साधना की ऊँचाई पर पहुँच सकता है| संसार की कठिनाई का सहजता से समाधान कर सकता है|

स्वामी जी के प्रवचन यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध हैं –

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सम्पूर्ण कर्मों में अनासक्ति का भाव और फलाकाँक्षा का त्याग

 

अगले श्लोक में भगवान् कृष्ण कह रहे हैं-

एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गंत्यक्त्वा फलानि च|

कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्|| ६ ||

 

पदच्छेद अन्वय –

एतानि अपि तु कर्माणि सङ्गम् त्यक्त्वा फलानि च|

कर्तव्यानि इति मे पार्थ निश्चितम् मतम् उत्तमम्|| ६ ||

पार्थ = हे पार्थ!, एतानि = इन यज्ञ, दान और तपरूप कर्मों को, तु = तथा,) (अन्यानि) = और, अपि = भी, कर्माणि = सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को, सङ्गम् = आसक्ति, = और, फलानि = फलों का, त्यक्त्वा = त्याग करके (अवश्य), कर्तव्यानि = करना चाहिए; इति = यह, मे = मेरा, निश्चितम् = निश्चय किया हुआ, उत्तमम् = उत्तम, मतम् = मत है|

 

इसलिए हे पार्थ! इन यज्ञ, दान और तपरूप कर्मों को तथा और भी सम्पूर्ण कर्मों को आसक्ति और फलों का त्याग करके अवश्य करना चाहिए; यह मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है|| ६ ||

 

तो भगवान् कृष्ण यहाँ पर मुहर मार दिए| सबका वर्णन करते हुए कहा कि कुछ यह कहते हैं, कुछ वह कहते हैं; वहीं पर अपना मार दिए मुहर कि यह मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है| और यह निश्चय- कोई समय का सद्गुरु या बुद्ध पुरुष ही कर सकता है, सब नहीं कर सकते हैं| इसलिए कृष्ण इसको बिलकुल निश्चयात्मक कहते हुए, उस पर दस्तखत कर दिए- फरमान दे दिए कि लो, मेरा ऑर्डर| अब इसके आगे नहीं- यह निश्चय है|

किसी की तुम सेवा करते हो तो सेवा के एवज में वह तुमको धन्यवाद देता है| देखा है! आजकल के अंग्रेजी स्कूलों में यह पढ़ाया जाता है शिष्टाचार| लड़का यदि अपने बाप को भी एक गिलास पानी देता है तो वह बाप कहता है- थैंक यू| यदि थैंक यू नहीं कहे तो वह लड़का कहता है कि पापा! you don’t know courtesy, manners? कुछ सभ्यता, शिष्टाचार नहीं जानते हो? अरे हम पानी दिए- धन्यवाद नहीं किया? भारत में लड़का कितनहुँ सेवा करे, कहीं बाप धन्यवाद देता है! माँ धन्यवाद देती है? अरे तुमसे तो अपेक्षा ही है! धन्यवाद तो दिया ही जाता है ऐसे आदमी को, जिससे हमारी कोई उम्मीद नहीं है| जैसे, मैं जा रहा हूँ| मुझे ठोकर लग गई- गिर गया| रोड पर कोई आया, उठा दिया मुझे- जिससे मेरी कोई अपेक्षा नहीं है| उसको न कहेंगे कि बहुत-बहुत धन्यवाद! भाई, तुमसे तो कोई उम्मीद ही नहीं थी| लेकिन आजकल स्कूल में पढ़ाया जाता है लड़के को भी| मान लो, उसकी माँ ने उसको कलम दी तो लड़का कहता है कि थैंक यू- मम्मी| अरे! तो यह फॉर्मेलिटी बन गया| लेकिन भगवान् कृष्ण कहते हैं- निश्चयात्मक| तुम किसी की सेवा करो तो उससे धन्यवाद की अपेक्षा मत करो|

देखते हो, गुरुद्वारे में सेवादार लोग सेवा करते हैं| तुम्हारा जूठा बर्तन भी मलते हैं, जूता को पॉलिश भी कर देते हैं| आज हमारे आश्रम में भी सेवा-भण्डारा शुरू हो गया है बद्रीनाथ में| रोज़ कम से कम 500-1000 आदमियों को चाय-पानी, खाना दिया जा रहा है| गिलास, प्लेट, थाली- सबको मल करके कपड़े से पोंछा जा रहा है| तुम लोग तो मलने के चलते पत्तल चला देते हो| कौन मलेगा? हम भी नहीं मलेंगे और जो खाएगा, वह भी नहीं मलेगा| रोज़ मैं मना करता हूँ कि पत्तल मत चलाओ| तुम लोग तो बस इतने हो- इतने में ही पत्तल चलाए जा रहे हो? माने शार्ट कट वाला काम| पत्तल चलाओ- फिर फेंक दो, रोड गन्दा कर दो| अब वर्षा आ गई, जलेगा नहीं| गन्दा मत करो| बद्रीनाथ में देखो, पंजाब के लोग सेवा में हैं सब|

हम लोग सेवा करते हैं| भगवान् कृष्ण कहते हैं कि यदि सेवा करते हो तो उसमें धन्यवाद की आकांक्षा मत करो| हम तपस्या करते हैं और परमात्मा की तरफ देखते रहते हैं कि दो दिन मैं भूखा रहा..और तू प्रकट नहीं हुआ- तीन दिन हो गया…| क्या जी? कहते हैं न, इतने दिन से हम हवन-पूजा कर रहे हैं, कुछ दिया नहीं अभी तक?

हम जो कुछ भी पूजा-पाठ, हवन, जप-तप करते हैं, परमात्मा को उलाहना करते हैं कि तुमको रोज़ फल चढ़ा रहे हैं, मिठाई चढ़ा रहे हैं| अरे सुनी नहीं, हमारी बात? यदि नहीं सुना तो कल तुम्हें हम माला नहीं पहनायेंगे- लात मारेंगे| यह भी धमकी देते हो तुम परमात्मा को| तो भगवान् कृष्ण कहते हैं कि प्रार्थना करो, तपस्या करो लेकिन परमात्मा की तरफ उलाहना की दृष्टि से मत देखो| छोड़ दो उसपर- उसकी मर्ज़ी| कोई उलाहना मत रखो कि हमको यह चाहिए- वह चाहिए| आकांक्षा मत करो| इसीलिए हमारे यहाँ दान गुप्त किया जाता है| यह तो दान की कला ऐसी है कि दाहिने हाथ से देते हैं, बायाँ हाथ नहीं जानता है| इसलिए गुप्त दान की महिमा है| हमलोग ढिंढोरा पीटकर देते हैं| इधर के लोग तो पीट-पीटकर देंगे कि इतना दिए| हैं न! कहेंगे कि गुरुजी के यहाँ गए थे… आज पांच सौ रूपया दे आये हैं यार| अब चलो, बहुत दे आये हैं- तब तो कुछ कमाना होगा न| कैसे वह पांच सौ एडजस्ट होगा! इसलिए दान गुप्त होना चाहिए – पति दे रहा है, पत्नी भी न जाने| पत्नी दे रही है तो पति न जाने| लेकिन पति आँख हरदम लगाए रहता है कि यह कुछ दे मत दे| पत्नी के साथ यदि गया न, तो कहेगा कि चलो– जल्दी चलो| वह कहेगी कि चलो अच्छा, आ रहे हैं| लेकिन नहीं, वह देखते रहता है कि कुछ दे तो नहीं रही है- गुरुजी को कहीं?

है न जी! देखते रहते हो न तुम लोग, कि कहीं दे तो नहीं रही है! बड़ा आँख गड़ाए रहते हो| इसलिए औरतें ही दान देती हैं छिपाकर, चुपचाप| हमने कहा न, प्रकृति में नारी चुप रहती है- मौन| गुप्त दान देती है| सच पूछो तो बाबा लोगों का खर्चा औरतों से ही चलता है| पुरुष तो छीन ले जाएगा- देगा पांच सौ, हज़ार छीन ले जाएगा| सोचेगा कि कैसे हमारा पांच सौ वह वसूल हो जाए| खैर! तो हम यह कह रहे हैं भगवान् कृष्ण की बात- ऐसी साधना करो कि उसके प्रतिफल की कोई अपेक्षा ही न रहे कि हमें यह चाहिए| वह साधना ही तुम्हारी साध्य हो जाए| अपेक्षाएं मत करो| वर्तमान में जो तुम करते हो, यही वर्तमान तुम्हारा भविष्य बन जाएगा| इसलिए आप बिना कामना किये हुए अपने वर्तमान समय का प्रयोग इतने अच्छे ढंग से करिए- तपस्या में, दान में और यज्ञ में, कि वह भविष्य आपका सुनहरा हो जाए|

भगवान् कृष्ण कह रहे हैं-‘फलाकांक्षा का त्याग रहना चाहिए- कभी इच्छा मत करो|’ सात्त्विक व्यक्ति ही फलाकांक्षा का त्याग कर सकता है| तामसिक प्रवृति का व्यक्ति करता नहीं है, फल ज्यादा चाहता है| फल की आकांक्षा जो करेगा, करेगा कुछ नहीं- वह तामसिक व्यक्ति है| सात्त्विक व्यक्ति उसे कहते हैं जो करते रहेगा, लेकिन वह फल की आकांक्षा नहीं करेगा| हर तरह का त्याग करेगा, दान करेगा, तपस्या करेगा- कहेगा कुछ नहीं| चुपचाप- आँख बंद करेगा अहोभाव से और चलता बनेगा| परमात्मा को अपना कर्म अर्पित कर देगा| धन्यवाद भी देगा| दान देगा तो धन्यवाद देगा कि गुरुजी! आपने मेरा दान स्वीकार कर लिया, बहुत-बहुत धन्यवाद| आप यह नहीं भी स्वीकार कर सकते थे| तो देखो, यह सात्त्विक वृत्ति है|

तामसी व्यक्ति कुछ देगा नहीं, लेकिन आकांक्षा करेगा कि गुरुजी, आपके यहाँ इतने दिनों से आते-जाते हैं, हमको क्या मिला? बोलिए तो! करेगा कुछ नहीं, उस पर भी आने-जाने का भी उलाहना देगा गुरुजी को| अब तुम समझ लो कि यह व्यक्ति तामसी है| यही तामसिक वृत्ति है| इसलिए भगवान् कृष्ण कह रहे हैं कि पूरी प्रक्रिया में कर्म मात्र को त्यागा नहीं जा सकता है| फल की आकांक्षा त्यागी जा सकती है, कर्म नहीं| कर्म करना है रोज़| लेकिन तुम लोग यदि सोचो कि कर्म करने के बाद क्या मिलेगा तो यह फल की आकांक्षा छोड़ दो| चूँकि हो सकता है कि कर्म करने के बाद तुम लोगों को डांट भी मिले गुरुजी की| फल यही मिले- तब? मजदूरी तो दिनभर काम करता है मजदूर, उसको सौ-पचास रुपया भी मिल जाता है| तुम लोगों को तो डांट मिल जाती है| तो यह तैयारी है कि तुम फल की आकांक्षा मत करो- इसके लिए यहाँ ट्रेनिंग दिया जा रहा है| कभी भूलकर भी यदि फल की आकांक्षा करोगे तो गड़बड़ हो जाएगा|

तामसी व्यक्ति कर्म का ही त्याग कर देता है, फल का परित्याग नहीं करता है| तामसी की यह पहचान ही है कि वह कोई कर्म नहीं करेगा- बैठ जाएगा| कहेगा कि हम बाबा हैं, बैठ गए| लेकिन आकांक्षा करेगा कि हमको अच्छा-अच्छा खाना मिले| अच्छा-अच्छा कपड़ा मिले, दान मिले| यह तामसी प्रवृत्ति का व्यक्ति है| फल की आकांक्षा वह नहीं छोड़ता है| तामसी उठ नहीं सकता है, बैठा रहेगा | और सारा कर्म त्याग देगा कि मैं तो तपस्वी हूँ, संन्यासी हो गया हूँ न! कर्म क्यों करूँ?

राजसी व्यक्ति में अनंत ऊर्जा होती है| ज़रूरत से ज्यादा उसमें शक्ति होती है, इसलिए वह ज्यादा ही जगा रहता है, उछल-कूद करता रहता है| ऐसा व्यक्ति कुछ न कुछ अपनी चर्चाएं करता और कराता रहेगा| लेकिन सत्त्ववृत्ति का  व्यक्ति श्रम और विश्राम में संतुलन रखता है| जितना सामर्थ्य है, उतना श्रम करेगा| विभिन्न पंथ के, संप्रदाय के, जाति के और देश-विदेश के लोग यहाँ आते हैं, सेवा देते हैं| ‘आश्रम’ नाम इसलिए है कि यहाँ आओ और श्रम करो| आना तो जारी है, लेकिन श्रम इसके साथ लगा है| आश्रम यानि आ-श्रम| सात्त्विक वृत्ति का व्यक्ति अपने श्रम और विश्राम में संतुलन बनाए रहता है और जब श्रम और विश्राम में संतुलन बना रहता है, तब वह आश्रम सार्थक हो जाता है| भगवान् कृष्ण कहते हैं कि समत्व का सूत्र ही है- संतुलन| अर्जुन को यह बार-बार समझा रहे हैं कि तुम कर्मों के फलों की आकांक्षा त्याग दो, आशा छोड़ दो| और कर्मों के फल की आशा यदि छोड़ दोगे अर्जुन, तो तुमसे श्रेष्ठ इस आर्यावर्त में कोई हो ही नहीं सकता है| इसलिए तुम निश्चिन्त होकर कर्म करो और फल की आकांक्षा छोड़ दो| आज बस इतना ही….धन्यवाद!

 

सद्गुरुदेव की जय !

 

 


‘समय के सदगुरु’ स्वामी  कृष्णानंद  जी महाराज

आप सद्विप्र समाज की रचना कर विश्व जनमानस को कल्याण मूलक सन्देश दे रहे हैं| सद्विप्र समाज सेवा एक आध्यात्मिक संस्था है, जो आपके निर्देशन में जीवन के सच्चे मर्म को उजागर कर शाश्वत शांति की ओर समाज को अग्रगति प्रदान करती है| आपने दिव्य गुप्त विज्ञान का अन्वेषण किया है, जिससे साधक शीघ्र ही साधना की ऊँचाई पर पहुँच सकता है| संसार की कठिनाई का सहजता से समाधान कर सकता है|

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