यादें

यादें

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sagar gupta

17 Jul 20249 min read

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यादें

अकल्पित मैंने उसे वहाँ दूर बैठा देख एक हल्की-सी मुस्कान दी। पर उसकी बेरुखी अब भी वैसी ही थी, जितनी 4-5 साल पहले थी। अतीत के गर्त से मैं तो बाहर आ गया था, पर शायद उसने अपने पर काट दिए थे.. शायद वो उससे निकलना ही नहीं चाहती थी। यूं अचानक उससे इस तरह मुलाकात हो जाएगी, ये मैंने शायद सोचा भी न था। अचरज़ में मैं खुद था, पर इस बात की खुशी थी कि इतने सालों बाद उसे देख तो पाया।

मैं उसे फिर पहले की तरह निहारना चाहता था, पर शायद अब वैसा करना मुनासिब न था। लोगों की भीड़ खचाखच भरी हुई थी। मेरा उसे निहारना उनलोगों को पसंद न आता। शायद उन्हें लगता कि कैसा लड़का है, जो इतने विशेष आयोजन में किसी पराई स्त्री को इस तरह निहार रहा है।

पर उनकी क्या गलती थी.. उन्हें क्या पता था कि जिसे वो पराई कहने वाले थे, उससे कितना पुराना रिश्ता था मेरा। उन्हें क्या पता था कि हमने कितनी कसम हमेशा साथ रहने की खायी थी। कितने ख़्वाब बुने थे हमने अपने आने वाले भविष्य के…

पर किस्मत को कुछ और मंजूर था.. गलतफहमियां हुई… और वो बढ़ती चली गई। न उसने मुझे समझाने की कोशिश की और न मैंने कुछ समझने की। दरार और गहरे होते चले गए और धीरे-धीरे जो धरती एक हुआ करती थी, वो दो भागों में टूटने लगी।

ऐसा नहीं था कि दरकने वाली धरती के दोनों हिस्सों ने एक-दूसरे को जकड़ कर रखने की कोशिश न की। पर जब दरार पड़ ही गई थी तो जकड़न का कमजोर होना लाज़मी ही था। अंत में दोनों हिस्से अलग हो गए। ।।

दुख तो हुआ ही था दोनों को। पर एक-दूसरे को सही साबित करने की जद्दोजहद में दोनों ने अपने रिश्ते का गला घोंट दिया था।

अश्रुओं की बारिश दोनों ओर हुई थी। एक-दो दिन नहीं, कई महीनों तक… बारिश के साथ आई तूफ़ान ने भी काफी उत्पात मचाया था। पर जब बारिश बंद हुई तो एक अजीब-सा दृश्य देखने को मिला।

इतनी बारिश के बाद भी प्रेम रूपी धरती बंजर हो चुकी थी। पर आज उसे अचानक देख उस बंजर धरती से फिर बीज  बाहर आने को ल्लाहित हो रहे थे। पर अब बहुत देर हो चुकी थी।

मन में बीते लम्हें एक फ़िल्म के दृश्य की तरह आँखों के सामने चलने लगे। पुराने किस्से, यादें सब अब तक तरोताजा हो चुके थे। ऐसा लग रहा था मानो कल की बात है, जब हम साथ थे..  एक-दूसरे का हाथ पकड़ कर घंटों बातें किया करना, फिर अगली मुलाकात होने तक किसी तरह समय गुजारना.. फिर मिलने के बाद खुले आकाश में तारों के बीच उन साथ बिताए लम्हें के एक-एक पल को दुबारा rewind करके देखना और मंद-मंद मुस्कुराना.. सारी बातें याद आने लगी थी और मैं मंद-मंद दुबारा मुस्कुरा उठा।

तभी किसी ने कोहनी से मेरे दाई कोहनी में दे मारा। अचानक हुए इस कृत्य से मैं अपने सपनों से बाहर आ चुका था।

धीरे से किसी की मीठी आवाज आई, “क्या कर रहे हो शौर्य? सब लोग तुम्हें ही देख रहे।”

“कुछ भी तो नहीं।” मैंने लड़खड़ाते हुए उत्तर दिया।।

“तो फिर उस अंकल को देख मंद-मंद मुस्कुरा क्यों रहे? वो अंकल भी तुम्हारे इस रवैये से असहज महसूस कर रहे।” इतना कहकर स्नेहा खिल-खिला कर हँसने लगी।

मैं भी अचरज में था।

“नहीं.. नहीं.. कुछ नहीं। ऐसा कुछ नहीं है। मैं कहाँ किसी को देख रहा। ” शौर्य ने बिना कुछ सोचे कह दिया।

शौर्य यादों के गुल्लक जिसमें उसने हर एक याद को सहेज कर रखा था, उससे बाहर आ चुका था।

सबकी नजर उस पर और स्नेहा पर थी।

स्नेहा से उसकी मुलाकात 1 साल पहले ही कंपनी के एक मीटिंग के दौरान हुई थी। फिर काम के सिलसिले में वो दोनों एक-दूसरे से मिलने लगे। दोनों के बीच की नजदीकियां बढ़ने लगी और नजदीकियां इतनी बढ़ गई कि वो आज शादी के मंडप तक आ चुकी थी।

शौर्य और स्नेहा एक-दूसरे को बहुत प्यार करते थे। शौर्य ने स्नेहा को कई बार अपने बीते कल के बारे में बताना चाहा, पर किसी न किसी कारण से बता न सका।

पर आज शादी के स्टेज में जब वो पूरी तरह से एक-दूसरे के होने के लिए प्रतिबद्ध हुए, तो वो बीता कल सामने आ चुका था।शौर्य इस द्विधा में था कि कैसे वो आज यहाँ उसके शादी समारोह में आ गई। उसने हिम्मत करके अपने पुराने प्यार की ओर दुबारा देखा। वो शादी के स्टेज की ओर ही बढ़ रही थी।

शौर्य की धड़कनें बढ़ने लगी थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे। स्नेहा को शौर्य के बीते कल का कोई अंदाजा नहीं था। शौर्य को डर सताने लगा था कि अगर अब स्नेहा को उसके बीते कल के बारे में पता चला तो वो किस तरह प्रतिक्रिया देगी।

शौर्य व्याकुल हो चुका था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अब अगले पल क्या होने वाला है..कहीं उसका पहला प्यार उसके आने वाले कल में ग्रहण की तरह अंधकार न कर जाए। इसी उधेड़बुन में उसका सर फटा जा रहा था। वो अब उसके सामने थी। उसका इतना पास होना, उसके हृदय की धमनियों से निकलने वाले खून की गति को इतना बढ़ा दिया था कि शौर्य को लग रहा था कि उसकी धमनियाँ फट न जाए।

पर अचानक स्नेहा ने उसे गले लगा लिया।

“शौर्य, इससे मिलो। ये है मेरी बेस्ट फ्रेंड उपासना। हम पुरानी कंपनी में साथ काम करते थे।”

“और उपासना, ये है मेरे पति परमेश्वर Mr. शौर्य सिंघानिया” स्नेहा ने शौर्य की ओर इशारा करते हुए कहा।

“Hi… Congratulations on your wedding” उपासना ने फूलों का गुच्छा मुझे पकड़ाते हुए हँसते हुए कहा।

उसके हावभाव से लग ही नहीं रहा था कि वो शौर्य को पहले से जानती है। ऐसा लग रहा था कि जैसे वो दोनों कभी मिले ही न हो। उसने जयमाला के स्टेज में शौर्य और स्नेहा के साथ एक सेल्फी ली। इतने करीब होने के बाद भी शौर्य को  उसके होने का एहसास नहीं हो रहा था।

शौर्य को समझ नहीं आ रहा था कि क्या उसने पुरानी बातें भूला दी या बस भुलाने का नाटक कर रही थी।

पर शौर्य के मन में जो बवंडर उठा था, वो अब शांत होने लगा था। वो जा चुकी थी।

शौर्य को भी ऐसा लगने लगा था कि शायद उपासना भी अब अतीत की यादों से बाहर आ चुकी थी। एक नई शुरुवात के लिए…

 

उपसंहार-

पुराने कल को भुलाना इतना आसान नहीं होता। जब मैं कहानी के पात्र शौर्य और उपासना के बारे में लिख रहा था तो मैं उनदोनों के काफी करीब आ चुका था। इतना करीब कि उनके अंदर चल रहे भावनाओं के रस्सा-कस्सी के खेल को भी मैं साफ-साफ देख पा रहा था। शौर्य की आँखें बहुत कुछ बयां कर रही थी, जो शायद मेरे अलावे किसी ने न देखा।

उसकी आँखें मानो उपासना को देख कह रही थी…

रहती थी तुम मेरी बाँहों में,

मेरी लहू की आग पाती थी शितलता

तुम्हारी गोद के छाँव में।

 

कहा था तुमने कभी,

कभी मेरा साथ न छोड़ोगी,

कभी मुझसे मुख न मोड़ोगी।

कहा गए वो कसमें वादे,

कहा गए वो बीतीं यादें।

 

क्या सिर्फ गलती मेरी थी,

या तुमने भी ख़ता कम न की थी,

क्या  वो हसीन रात सिर्फ तेरी थी,

मैंने भी शरीर की तपिश कम न झेली थी।

 

क्यों मुझे तुम तोड़ गई,

मेरे जीवन को झकझोर गई।

क्या बिगाड़ा था मैंने तेरा,

तेरी हर बात तो कुबूल की थी।

 

 

खुश रहो तुम जहाँ भी रहो,

प्रेम था तुमसे

तुम्हें कोई बद्दुआ न दूँगा,

तेरी ख़ता का जिक्र

किसी से न करूँगा।

 

अब तो बस मौत का इंतज़ार हैं..

तेरी गर्म सांसों की कशिश काफी हैं,

आधी-अधूरी जीवन जीने के लिए,

तेरी यादों  में, तेरे बेवफाओं में मरने के लिए।।।।

 

वैसे तो उपासना को देखने से ऐसा लग रहा था कि उसे शौर्य के होने या न होने से कोई फर्क नहीं पड़ था.. शौर्य भी कुछ ऐसा ही सोच रहा था..

लेकिन मैंने जब उपासना के अंदर झाका तो स्थिति कुछ और पाया। वहाँ कोई तूफान तो नहीं उठा था, लेकिन तूफान के चले जाने के बाद हुई तबाही साफ-साफ नज़र आ रही थी। मानो उसके अंदर की आवाज कह रही थी…

हाँ.. थी मेरी ही खता,

क्यूँ हो गयी मैं बेवफा।

खुद को माफ़ न कर पाऊँगी,

 तुमसे दूर शायद न जा पाऊँगी।

तुम्हारी बाँहों की ही तो आदत थी,

  गैरों की बाँहों मैं जा न सकी।

हाँ, तुमसे दूर होकर भी,

मैं तुमसे दूर हो न सकी।

 

किसने कह दिया तुमसे,

कि मैंने मुख मोड़ लिया,

कभी गुजरों इन गलियों से,

 तो देखो,

बाकी सभी ने तुम्हें इन आँखों में ढूंढ लिया।

 

हाँ, पता है..

उन कसमों और वादों को मैं  निभा न सकी,

 पर तुम्हारी यादों को भी कभी भुला न सकी।

 

नाते चाहे कितने भी जोड़ लूं, 

कसमें चाहे कितनी भी तोड़ लूं,

पर उन साँसों को कैसे रोक लूं,

जिन्होंने तुमसे वफ़ा करके, मुझसे बेवफाई की |

 

हाँ, पता है…

 नाम नहीं जुडा मेरा तुम्हारे नाम के साथ,

 पर मेरी हर धड़कन अटक गयी है तुम्हारे जज़्बात के साथ|

 

तुम खुश रहो तब मैं भी रहूंगी,

जो कभी आह निकली तुम्हारी, तो मै भी रो दूंगी |

 

हाँ, पता है….

अपनी मोहब्बत को रिश्ते का नाम न दे पायी..

हाँ, मेरी ही गलती थी कि

 मैं वफ़ा करके भी बेवफा कहलाई…

 मैं वफ़ा करके भी बेवफा कहलाई।।

 

उनदोनों के अंदर की व्यथा देख मैंने अपने दिल से पूछा, जब प्यार आज तक है, तो वो दोनों एक क्यों न हो गए..?

तब मेरे दिल ने हंसते हुआ कहा, “कुछ रिश्तें काँच की तरह होते, एक बार टूट जाने के बाद उन्हें कितना भी जोड़ने की कोशिश कर लो, दरारें रह ही जाती…!”

 

सागर गुप्ता

 

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अकल्पित मैंने उसे वहाँ दूर बैठा देख एक हल्की-सी मुस्कान दी। पर उसकी बेरुखी अब भी वैसी ही थी, जितनी 4-5 साल पहले थी। अतीत के गर्त से मैं तो बाहर आ गया था, पर शायद उसने अपने पर काट दिए थे.. शायद वो उससे निकलना ही नहीं चाहती थी। यूं अचानक उससे इस तरह मुलाकात हो जाएगी, ये मैंने शायद सोचा भी न था। अचरज़ में मैं खुद था, पर इस बात की खुशी थी कि इतने सालों बाद उसे देख तो पाया।

मैं उसे फिर पहले की तरह निहारना चाहता था, पर शायद अब वैसा करना मुनासिब न था। लोगों की भीड़ खचाखच भरी हुई थी। मेरा उसे निहारना उनलोगों को पसंद न आता। शायद उन्हें लगता कि कैसा लड़का है, जो इतने विशेष आयोजन में किसी पराई स्त्री को इस तरह निहार रहा है।

पर उनकी क्या गलती थी.. उन्हें क्या पता था कि जिसे वो पराई कहने वाले थे, उससे कितना पुराना रिश्ता था मेरा। उन्हें क्या पता था कि हमने कितनी कसम हमेशा साथ रहने की खायी थी। कितने ख़्वाब बुने थे हमने अपने आने वाले भविष्य के…

पर किस्मत को कुछ और मंजूर था.. गलतफहमियां हुई… और वो बढ़ती चली गई। न उसने मुझे समझाने की कोशिश की और न मैंने कुछ समझने की। दरार और गहरे होते चले गए और धीरे-धीरे जो धरती एक हुआ करती थी, वो दो भागों में टूटने लगी।

ऐसा नहीं था कि दरकने वाली धरती के दोनों हिस्सों ने एक-दूसरे को जकड़ कर रखने की कोशिश न की। पर जब दरार पड़ ही गई थी तो जकड़न का कमजोर होना लाज़मी ही था। अंत में दोनों हिस्से अलग हो गए। ।।

दुख तो हुआ ही था दोनों को। पर एक-दूसरे को सही साबित करने की जद्दोजहद में दोनों ने अपने रिश्ते का गला घोंट दिया था।

अश्रुओं की बारिश दोनों ओर हुई थी। एक-दो दिन नहीं, कई महीनों तक… बारिश के साथ आई तूफ़ान ने भी काफी उत्पात मचाया था। पर जब बारिश बंद हुई तो एक अजीब-सा दृश्य देखने को मिला।

इतनी बारिश के बाद भी प्रेम रूपी धरती बंजर हो चुकी थी। पर आज उसे अचानक देख उस बंजर धरती से फिर बीज  बाहर आने को ल्लाहित हो रहे थे। पर अब बहुत देर हो चुकी थी।

मन में बीते लम्हें एक फ़िल्म के दृश्य की तरह आँखों के सामने चलने लगे। पुराने किस्से, यादें सब अब तक तरोताजा हो चुके थे। ऐसा लग रहा था मानो कल की बात है, जब हम साथ थे..  एक-दूसरे का हाथ पकड़ कर घंटों बातें किया करना, फिर अगली मुलाकात होने तक किसी तरह समय गुजारना.. फिर मिलने के बाद खुले आकाश में तारों के बीच उन साथ बिताए लम्हें के एक-एक पल को दुबारा rewind करके देखना और मंद-मंद मुस्कुराना.. सारी बातें याद आने लगी थी और मैं मंद-मंद दुबारा मुस्कुरा उठा।

तभी किसी ने कोहनी से मेरे दाई कोहनी में दे मारा। अचानक हुए इस कृत्य से मैं अपने सपनों से बाहर आ चुका था।

धीरे से किसी की मीठी आवाज आई, “क्या कर रहे हो शौर्य? सब लोग तुम्हें ही देख रहे।”

“कुछ भी तो नहीं।” मैंने लड़खड़ाते हुए उत्तर दिया।।

“तो फिर उस अंकल को देख मंद-मंद मुस्कुरा क्यों रहे? वो अंकल भी तुम्हारे इस रवैये से असहज महसूस कर रहे।” इतना कहकर स्नेहा खिल-खिला कर हँसने लगी।

मैं भी अचरज में था।

“नहीं.. नहीं.. कुछ नहीं। ऐसा कुछ नहीं है। मैं कहाँ किसी को देख रहा। ” शौर्य ने बिना कुछ सोचे कह दिया।

शौर्य यादों के गुल्लक जिसमें उसने हर एक याद को सहेज कर रखा था, उससे बाहर आ चुका था।

सबकी नजर उस पर और स्नेहा पर थी।

स्नेहा से उसकी मुलाकात 1 साल पहले ही कंपनी के एक मीटिंग के दौरान हुई थी। फिर काम के सिलसिले में वो दोनों एक-दूसरे से मिलने लगे। दोनों के बीच की नजदीकियां बढ़ने लगी और नजदीकियां इतनी बढ़ गई कि वो आज शादी के मंडप तक आ चुकी थी।

शौर्य और स्नेहा एक-दूसरे को बहुत प्यार करते थे। शौर्य ने स्नेहा को कई बार अपने बीते कल के बारे में बताना चाहा, पर किसी न किसी कारण से बता न सका।

पर आज शादी के स्टेज में जब वो पूरी तरह से एक-दूसरे के होने के लिए प्रतिबद्ध हुए, तो वो बीता कल सामने आ चुका था।शौर्य इस द्विधा में था कि कैसे वो आज यहाँ उसके शादी समारोह में आ गई। उसने हिम्मत करके अपने पुराने प्यार की ओर दुबारा देखा। वो शादी के स्टेज की ओर ही बढ़ रही थी।

शौर्य की धड़कनें बढ़ने लगी थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे। स्नेहा को शौर्य के बीते कल का कोई अंदाजा नहीं था। शौर्य को डर सताने लगा था कि अगर अब स्नेहा को उसके बीते कल के बारे में पता चला तो वो किस तरह प्रतिक्रिया देगी।

शौर्य व्याकुल हो चुका था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अब अगले पल क्या होने वाला है..कहीं उसका पहला प्यार उसके आने वाले कल में ग्रहण की तरह अंधकार न कर जाए। इसी उधेड़बुन में उसका सर फटा जा रहा था। वो अब उसके सामने थी। उसका इतना पास होना, उसके हृदय की धमनियों से निकलने वाले खून की गति को इतना बढ़ा दिया था कि शौर्य को लग रहा था कि उसकी धमनियाँ फट न जाए।

पर अचानक स्नेहा ने उसे गले लगा लिया।

“शौर्य, इससे मिलो। ये है मेरी बेस्ट फ्रेंड उपासना। हम पुरानी कंपनी में साथ काम करते थे।”

“और उपासना, ये है मेरे पति परमेश्वर Mr. शौर्य सिंघानिया” स्नेहा ने शौर्य की ओर इशारा करते हुए कहा।

“Hi… Congratulations on your wedding” उपासना ने फूलों का गुच्छा मुझे पकड़ाते हुए हँसते हुए कहा।

उसके हावभाव से लग ही नहीं रहा था कि वो शौर्य को पहले से जानती है। ऐसा लग रहा था कि जैसे वो दोनों कभी मिले ही न हो। उसने जयमाला के स्टेज में शौर्य और स्नेहा के साथ एक सेल्फी ली। इतने करीब होने के बाद भी शौर्य को  उसके होने का एहसास नहीं हो रहा था।

शौर्य को समझ नहीं आ रहा था कि क्या उसने पुरानी बातें भूला दी या बस भुलाने का नाटक कर रही थी।

पर शौर्य के मन में जो बवंडर उठा था, वो अब शांत होने लगा था। वो जा चुकी थी।

शौर्य को भी ऐसा लगने लगा था कि शायद उपासना भी अब अतीत की यादों से बाहर आ चुकी थी। एक नई शुरुवात के लिए…

 

उपसंहार-

पुराने कल को भुलाना इतना आसान नहीं होता। जब मैं कहानी के पात्र शौर्य और उपासना के बारे में लिख रहा था तो मैं उनदोनों के काफी करीब आ चुका था। इतना करीब कि उनके अंदर चल रहे भावनाओं के रस्सा-कस्सी के खेल को भी मैं साफ-साफ देख पा रहा था। शौर्य की आँखें बहुत कुछ बयां कर रही थी, जो शायद मेरे अलावे किसी ने न देखा।

उसकी आँखें मानो उपासना को देख कह रही थी…

रहती थी तुम मेरी बाँहों में,

मेरी लहू की आग पाती थी शितलता

तुम्हारी गोद के छाँव में।

 

कहा था तुमने कभी,

कभी मेरा साथ न छोड़ोगी,

कभी मुझसे मुख न मोड़ोगी।

कहा गए वो कसमें वादे,

कहा गए वो बीतीं यादें।

 

क्या सिर्फ गलती मेरी थी,

या तुमने भी ख़ता कम न की थी,

क्या  वो हसीन रात सिर्फ तेरी थी,

मैंने भी शरीर की तपिश कम न झेली थी।

 

क्यों मुझे तुम तोड़ गई,

मेरे जीवन को झकझोर गई।

क्या बिगाड़ा था मैंने तेरा,

तेरी हर बात तो कुबूल की थी।

 

 

खुश रहो तुम जहाँ भी रहो,

प्रेम था तुमसे

तुम्हें कोई बद्दुआ न दूँगा,

तेरी ख़ता का जिक्र

किसी से न करूँगा।

 

अब तो बस मौत का इंतज़ार हैं..

तेरी गर्म सांसों की कशिश काफी हैं,

आधी-अधूरी जीवन जीने के लिए,

तेरी यादों  में, तेरे बेवफाओं में मरने के लिए।।।।

 

वैसे तो उपासना को देखने से ऐसा लग रहा था कि उसे शौर्य के होने या न होने से कोई फर्क नहीं पड़ था.. शौर्य भी कुछ ऐसा ही सोच रहा था..

लेकिन मैंने जब उपासना के अंदर झाका तो स्थिति कुछ और पाया। वहाँ कोई तूफान तो नहीं उठा था, लेकिन तूफान के चले जाने के बाद हुई तबाही साफ-साफ नज़र आ रही थी। मानो उसके अंदर की आवाज कह रही थी…

हाँ.. थी मेरी ही खता,

क्यूँ हो गयी मैं बेवफा।

खुद को माफ़ न कर पाऊँगी,

 तुमसे दूर शायद न जा पाऊँगी।

तुम्हारी बाँहों की ही तो आदत थी,

  गैरों की बाँहों मैं जा न सकी।

हाँ, तुमसे दूर होकर भी,

मैं तुमसे दूर हो न सकी।

 

किसने कह दिया तुमसे,

कि मैंने मुख मोड़ लिया,

कभी गुजरों इन गलियों से,

 तो देखो,

बाकी सभी ने तुम्हें इन आँखों में ढूंढ लिया।

 

हाँ, पता है..

उन कसमों और वादों को मैं  निभा न सकी,

 पर तुम्हारी यादों को भी कभी भुला न सकी।

 

नाते चाहे कितने भी जोड़ लूं, 

कसमें चाहे कितनी भी तोड़ लूं,

पर उन साँसों को कैसे रोक लूं,

जिन्होंने तुमसे वफ़ा करके, मुझसे बेवफाई की |

 

हाँ, पता है…

 नाम नहीं जुडा मेरा तुम्हारे नाम के साथ,

 पर मेरी हर धड़कन अटक गयी है तुम्हारे जज़्बात के साथ|

 

तुम खुश रहो तब मैं भी रहूंगी,

जो कभी आह निकली तुम्हारी, तो मै भी रो दूंगी |

 

हाँ, पता है….

अपनी मोहब्बत को रिश्ते का नाम न दे पायी..

हाँ, मेरी ही गलती थी कि

 मैं वफ़ा करके भी बेवफा कहलाई…

 मैं वफ़ा करके भी बेवफा कहलाई।।

 

उनदोनों के अंदर की व्यथा देख मैंने अपने दिल से पूछा, जब प्यार आज तक है, तो वो दोनों एक क्यों न हो गए..?

तब मेरे दिल ने हंसते हुआ कहा, “कुछ रिश्तें काँच की तरह होते, एक बार टूट जाने के बाद उन्हें कितना भी जोड़ने की कोशिश कर लो, दरारें रह ही जाती…!”

 

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