गोरखवाणी

गोरखवाणी

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15 Oct 202421 min read

Published in spiritualismlatest

दिनांक 14.3.2022 दिन सोमवार को सद्गुरुधाम आश्रम नांगलोई, दिल्ली में सद्गुरुदेव के दिव्य आशीर्वचन...

अखण्ड मंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरं...

प्रिय आत्मन्,

हम गोरखवाणी पर बोल रहे हैं| इस पुस्तक को संपादन करने वाले हैं करुणाशंकर उपाध्याय और डॉ. दर्शन पाण्डेय| गोरख जी कह रहे हैं-

महंमद महंमद न करि काजी, महंमद का विषय बिचारं|

महंमद हाथि करद जे होती, लोहै गढ़ी न सारं|| 

हे काजी! तू बहुत जोर से मोहम्मद- मोहम्मद करता है| कहते हो न, अल्लाह ओ अकबर! लेकिन क्या मोहम्मद के बारे में कभी विचार किया? मनन किया? जरा विचार तो करो| मोहम्मद के हाथ में जो छुरी है- तलवार, वह लोहे की नहीं है| फिर जीव-हत्या कैसे होगी?

 इस पर विचार करना है| जब जीवंत गुरु नहीं रहता है, तब हमलोग लकीर के फ़क़ीर हो जाते हैं| और अपने ही मन से उनके कथन का अर्थ लगा लेते हैं| जो जैसा रहता है, अपनी बुद्धि के अनुसार अर्थ लगा लेता है| अरस्तू दार्शनिक था| अपना दर्शन दे दिया, लिख दिया| वृद्ध हो गया तो सोचा कि शिष्य हमारे दर्शन पर काम करेंगे| अपने शिष्यों को बुलाया कि हम दर्शन जो दिए हैं, आपलोग उसपर जरा विचार करो| मैं बैठकर सुन रहा हूँ| तो उसके दर्शन का एक विषय-बिंदु वो लोग पढ़े| अपनी-अपनी व्याख्या करने लगे कि अरस्तू इसको ऐसे समझाना चाहते हैं| प्रत्येक कहता कि नहीं-नहीं, ऐसा नहीं, ऐसा कहना चाहते हैं.. ऐसा नहीं ऐसा कह रहे हैं| अरे तू ही दर्शन का विद्यार्थी है! घंटों बहस चलती रही| अरस्तू ने थक कर कहा कि अरे रुको| रुको, मैं अभी जिंदा हूँ| तुम सब बकवास कर रहे हो| जो हम कह रहे हैं, वह कोई नहीं समझ रहा है| सब अपनी-अपनी बात हमारे कपाल पर मत मढ़ो| मैं जिंदा हूँ अभी!

तो यही हमलोग करते हैं| जब तक समय का सद्गुरु रहता है, राम रहते हैं, उसको नहीं समझते हैं| समझने में कठिनाई होगी न! जब चले जायेंगे तो कहेंगे कि हाँ, हम पढ़ लेंगे रामायण| उनकी चौपाई पढ़ेंगे| जब तक कृष्ण हैं, तब तक उनको नहीं समझेंगे| चले जायेंगे तो उनकी गीता याद करेंगे| गीता का अर्थ अपने मन से करेंगे| उसमें रस आता है| अपने अहंकार की पुष्टि होती है| इसलिए यहाँ पर गोरखनाथ कह रहे हैं- तुम मोहम्मद- मोहम्मद उसे पुकारते हो, लेकिन तुम नहीं जानते हो कि मोहम्मद के हाथ में लोहे की छुरी नहीं थी, तलवार नहीं थी| तो हत्या कैसे करेंगे? उनके हाथ में जो तलवार थी, वह सूक्ष्म थी| दिखाने के लिए| कहा कि इससे अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण करो| गो माने इन्द्रिय भी होता है| आँख, नाक, कान, जिह्वा, त्वचा- ये इन्द्रियाँ तुम्हारे कहने में नहीं हैं| तुम अपनी जीभ के स्वाद में नाना प्रकार के जीव- बकरों को मार रहे हो| तुम्हें जीवमात्र पर दर्द नहीं आता है| मोहम्मद की कहनी पर विचार नहीं कर रहे हो| तुम अपनी विषय-वासनाओं पर नियन्त्रण नहीं कर रहे हो| मोहम्मद के नाम पर शादियाँ किये जा रहे हो! हत्याएं किये जा रहे हो| गोरखनाथ कह रहे हैं कि जरा यह विचार करने लायक तो है, भाई! लकीर के फ़क़ीर क्यों हो रहे हो? हालाँकि बहुत पहले हिन्दुओं में भी यह परंपरा थी- किसी भी शुभ काम में बलि देने की, हत्या करने की| अभी भी पहाड़ी इलाकों में यह है| जैसा मैंने बताया| हिमाचल प्रदेश तो हम छोड़ ही दिए जाना- इसके चलते| लेकिन फिर जा रहे हैं मई में, वहाँ प्रोग्राम है 15-20 बरस के बाद| नॉर्थ-ईस्ट में भी ऐसा ही है, असम में| माने हर काम बलि देना| भगवान् बुद्ध और महावीर ने इसे रोका| लेकिन हमलोग इसपर मौन हो जाते हैं| बुद्ध पहले व्यक्ति थे, फिर महावीर ने रोका| इसीलिए बहुत बनिया लोग जैनी हो गए| चूँकि राजा यज्ञ करता था, बलि देता था| पण्डित, पुरोहित माँगता था| कर के रूप में बनियों को देना पड़ता था| बनिया लोग कहे कि हम तो जैनी हो गए| हम हिंसा नहीं करते हैं, हम नहीं देंगे| लेकिन कहा कि तुम्हारी जान नहीं बचेगी| अब क्या करोगे?

देखो, बुद्ध भी राजा थे, महावीर भी राजा थे| कहे कि यह दादागिरी नहीं चलेगी| तो यू-टर्न ले लिया| हिंसा को रोक दिया| और तब से ‘अहिंसा परमो धर्मः’ चल गया| तो हिन्दू उदारवादी है| हिन्दुओं का रहने का ढंग तो ऐसा है कि वह स्थान विशेष, समय विशेष, व्यक्ति विशेष के अनुसार अपने को बदल देता है| लकीर का फ़क़ीर नहीं है| हरदम जीवंत गुरु की शरण में रहता है इसलिए वह बदल देता है| जब कहा कि हिंसा गलत है तो कहा कि हाँ, यह गलत है और बलि प्रथा को छोड़ दिया| बुद्ध और महावीर ने बदला| बदल दिया| लेकिन अब हमलोग उनका नाम नहीं लेते हैं, कहते हैं कि ईसा बदल दिए| लेकिन मोहम्मद के बाद अब जीवंत कोई गुरु नहीं रहा| तो मुस्लिम समाज नहीं बदल रहा है, वहीं का वहीं खड़ा है|

बदलाव कैसे आता है? कोई-कोई समय का महापुरुष आ जाता है| जैसे कैंब्रिज यूनिवर्सिटी, लन्दन में एक नवयुवक पढ़ा-लिखा| लन्दन के ही नजदीक एक नगर है वॉल्वरहैम्पटन| वो पढ़-लिखकर वहाँ पर जब गया तो देखा कि यहाँ के लोग बहुत असभ्य हैं| अशिक्षित हैं, गाली-गलौज से बात करते हैं| उसको भी लोग बड़ा बेइज्जत किये| गाली-गलौज किये| अब पढ़ाई-लिखाई जो यूनिवर्सिटी से करते आता है, वह तो बहुत सोचता है| सपना देखता है कि आईएएस बनें हम| हमारे सिग्नेचर से लोग काम करें! हमारे आदेश से काम करें| जब तक लड़का यूनिवर्सिटी की बाउंड्री में घूमता है, उसकी सोच आईएएस से कम नहीं होती है| सिपाही, पुलिस को तो कुछ समझता ही नहीं| यूनिवर्सिटी में जो पढ़ा होगा, उसको अनुभव होगा| यूनिवर्सिटी के कैंपस का एक रुपहला संसार होता है- ख्वाबों का|

तो वह भी गया था वहाँ, बड़ी उम्मीद लेकर| कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से पढ़कर मैं आया हूँ.. लन्दन में रहकर! लेकिन उसने वहाँ गाली-गलौज देखा, अपने साथ बुरा बर्ताव देखा तो दो-चार-पाँच दिन में ऊब गया| कहा कि अब चलो, हमारी पढ़ाई का यहाँ कोई काम नहीं| हम कुछ पढ़ाना चाहते हैं, बताना चाहते हैं और सब गाली ही दे रहे हैं| कोई हमको पूछ भी नहीं रहा है| जो आता है, अपशब्द बोल रहा है.. अरे भागता है कि नहीं..? हमलोगों के बीच में क्या सोचकर आ गए हो तुम.. कुछ मालूम है तुमको! मूर्ख कहीं का| कहा कि अरे हम ही को मालूम नहीं..| बताओ, अब समझावें तो समझावें किसको? वह तंग आ गया| फिर एक दिन रात में कुछ सोचा, बोरिया-बिस्तर अपना बाँधने लगा लौटने के लिए| लेकिन उसका दूसरा मन बोला- अरे तू भी लौट जायेगा! फिर इनलोगों को जीना सिखाएगा कौन, इन्हें सुधारेगा? कोई तो कर्जा खाया है इनका| ये तो अपने को सबसे सभ्य समझते हैं| यदि ये ऐसे नहीं रहते- असभ्य तो तुम्हारी कीमत समझते| स्वागत करते न! क्या तुम भी उन सभ्य लोगों के बीच में जाना चाहते हो, जो केवल अपने लिए जीते हैं!

राम को भी पढ़ा-लिखाकर विश्वमित्र सब वानर-भालुओं के बीच भेज दिए- नंगे पाँव| कोई खर्चा नहीं दिए| रास्ते में खाने-पीने के लिए कोई होटल नहीं बताये थे| कहा कि जाओ, उन असभ्य लोगों के बीच में| राम! वहाँ तुम्हें जाना होगा, जहाँ कोई अपना नहीं| उनसे मिलना होगा, उनके लिए कुछ कल्याण मूलक काम करना होगा- जिनसे कोई सम्बन्ध नहीं, तुम्हारा कोई फायदा नहीं| न तुमको कोई टैक्स मिलेगा| ऐसी जगह तुमको मैं भेज रहा हूँ! तैयार हो? राम ने झट से कहा- हाँ गुरुदेव! मैं जाऊँगा| तुमसे पूछेंगे कि जाओगे? कहोगे कि हाँ| कहाँ? जहाँ सरकारी नौकरी मिलेगी| सब सुख-सुविधा मिलेगी| है न जी! इसलिए गुरु को भी चिंता होती है| लेकिन देखो, वह व्यक्ति वॉल्वरहैम्पटन में रुक गया| अब कहा कि क्या करें, कैसे करें! तो वहाँ के लड़कों से मिला| आपसी सम्बन्ध करके उनकी भाषा समझने लगा| अब वो भी इसकी भाषा सुनने-समझने लगे| मुम्बई आश्रम में देखा है न, वह आदिवासी क्षेत्र है| क्रिस्चियन मिशनरीज के लोग आ गए हैं| वहाँ भी हम अपने महात्माओं से कहे कि उन आदिवासियों से संपर्क करो| उन लोगों के बच्चों को पढ़ाओ| अब वहाँ के बच्चे पाठ करने लगे| हवन करना, संस्कृत बोलना सीख गए| मेहनत बिना कुछ मिलेगा नहीं| अपने ही देना पड़ता है, लगाना भी पड़ता है| ऐसा काम कौन करेगा! मंदिर में इसीलिए बैठ जाता है पुरोहित वर्ग| जो आएगा वहाँ, देगा ही| आकर कोई लेने वाला है? लेकिन वहाँ तो देना पड़ता है तन-मन-धन|

वह व्यक्ति धीरे-धीरे वहाँ बच्चों को पढ़ाने लगा| जब बच्चे पढ़ने-सीखने लगे सदाचार, सुसंस्कार तो उनके माँ-बाप स्नेह करने लगे कि हमारा लड़का बदल रहा है, अच्छा हो रहा है| जब आठ-दस साल वहाँ पर काम किया तो मीटिंग में सबलोगों को बुलाकर कहा कि एक बात कहूँ..? कहा कि क्या? क्या मैं लौट जाऊँ! कहा कि नहीं, आप मत लौटिये| बड़े अच्छे आदमी हैं, हमारे बच्चों को पढ़ा रहे हैं.. कुछ देना पड़ता नहीं है| तो कहा कि हमारी एक बात मानियेगा? आपलोग हमसे प्रेम करते हैं न! कहा कि हाँ, अब प्रेम करने लगे| अच्छा! देखिये, हफ्ते में सात दिन होते हैं न.. बस, हफ्ते में एक दिन आप अनर्थ काम छोड़ दीजिये| मतलब? कहा कि आप जो पेड़ काटते हैं, हत्याएं करते हैं जंगल में और झूठ बोलना- यह छोड़ दीजिये सन्डे के सन्डे| कहा कि अरे बाप रे बाप, सदियों से हमलोग करते आ रहे हैं, छोड़ दें परंपरा? कहा कि जो हो, हम नहीं आपलोगों को चुनौती दे रहे हैं| लेकिन हफ्ते में एक दिन के लिए आप छोड़ सकते हैं तो ठीक, नहीं तो मैं चला जाऊँगा| कहा कि अरे भाई, मत जाओ| बड़े अच्छे आदमी हो| चलो, हमलोग एक दिन छोड़ देंगे| एक ही दिन न! कहा कि हाँ| लेकिन एक दिन छोड़ेंगे तो जीयेंगे कैसे? हमलोगों की आदत है| कहा कि कोशिश करिए|

तो सन्डे को छोड़ दिए| झूठ नहीं बोला कोई| पेड़ नहीं काटा, शिकार नहीं किया| जीव-हत्या नहीं की| साल- दो साल में जब यह प्रयोग सफल हो गया तो सबको फिर बुलाया मीटिंग में| आपलोगों का जीवन सार्थक हो रहा है न! कहा कि हाँ| हमारा बच्चा बड़ा अच्छा कर रहा है! और हमलोग बदल रहे हैं| तुम भगवान् हो हमारे लिए| तब, एक काम और करिए..| क्या? कहा कि हफ्ते में चार दिन छोड़ दीजिये| कहा कि अरे.. कैसे करेंगे? एक दिन छोड़े तो मर गए! कहा कि नहीं, मरे तो नहीं! तब? कहा कि धीरे-धीरे न होगा..| धीरे-धीरे नहीं होता है कोई काम, कल से शुरू कर दीजिये..| तब हम नहीं जायेंगे|

यह सच घटना कह रहे हैं| देखो, चार दिन छोड़ दिया- कौनहुँ नहीं मरा| बदलाव आया लोगों में| कहा कि अरे हम मरे नहीं! फ्रॉडगिरी, झूठ बोलना छोड़ दिया| तब एक दिन फिर मीटिंग बुलाई, कहा- आपलोगों का कुछ अनर्थ हुआ! कहा कि न| हमलोग खुश हैं| सत्य बोलने से हमलोगों की कीमत बढ़ रही है| जीवों की हत्या नहीं कर रहे हैं| तो कहा कि अब तीन दिन किस लिए रखे हैं! छोड़ दीजिये अब- सातों दिन| तो जाएंगे नहीं न! कहा कि न|

तो छोड़ दिए सब| वहाँ के लोगों में परिवर्तन हुआ| यह लन्दन के बड़े-बड़े अख़बारों में आया| उस व्यक्ति का नाम था- चार्ल्स फ्रीर एंड्रयूज [Charles Freer Andrews (12 February 1871 - 5 April 1940)] समाज सेवा में उसका बहुत बड़ा नाम है| बाद में वह भारत में सेवा में आ गया जब भारत दीन-हीन-अकिंचन और परतंत्र था| चूँकि वह दीनों का काम करता था- गरीबों, उपेक्षितों के कल्याण का; इसलिए उसका नाम ‘दीनबंधु’ रख दिया गया| भारत में वह दीनबंधु के नाम से प्रसिद्ध है|

देखो, हमलोग पैसा भले ही कमा लें, कुछ काल कोई रह सकता है ऐशोआराम से, लेकिन उसका नाम कोई नहीं जानेगा| भारत में कितने राजा हुए, कोई नाम जानता है? दीनबंधु का नाम इतिहास में आ गया| नाम बदल दिया| गोरखनाथ भी यही कहते हैं कि हमलोग बदलते नहीं हैं, महापुरुष कोई आ जाता है तो कुछ सीखते नहीं हैं| मोहम्मद साहब लोहे की नहीं, शब्द रूपी छुरी रखते थे, फिर हत्या कैसे करेंगे! इस पर जरा विचारो| मुसलमानों से कहते हैं कि खाली मोहम्मद- मोहम्मद मत कहो| मोहम्मद कहने से कुछ होता नहीं| अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण रखो| कबीर साहब तो कहते हैं-

जीव मति हतो बापुरा, सबका एकै प्राण|

हत्या कबहूँ न छूटिहैं, जो कोटिन सुनो पुराण||

जीव घात न कीजिए, बहुरि लैत वह कान|

तीर्थ गये न बाँचिहो, जो कोटि हीरा देहु दान||

 बहुत बड़ा पाप लगता है| तब क्या खाएं भाई! कहते हैं-‘अकुरा खाए सो मानवा, और खाए सो दानवा|’ अंकुरित अन्न जो खाने वाला है, वो ही मानव है, और कुछ यदि खाता है तो वो दानव है| इसलिए हत्या छोड़ो| तो यहाँ पर भी गोरखनाथ जी मोहम्मद साहब का नाम लेकर कह रहे हैं-‘महंमद महंमद न करि काजी, महंमद का विषय बिचारं|’ ए काजी! केवल मोहम्मद- मोहम्मद चिल्लाते हो, जरा विचार तो कर लो| महंमद हाथि करद जे होती, लोहै गढ़ी न सारं|| मोहम्मद के हाथ में लोहे की छुरी नहीं| अपनी संसार की विषय-वासनाओं को शब्द की छुरी से मारो| इसलिए मोहम्मद साहब के सन्देश को आध्यात्मिक पक्ष की तरफ ले जा रहे हैं गोरखनाथ जी| आगे कह रहे हैं-

 

नाथ कहंतां सब जग नाथ्या, गोरष कहंतां गोई|

कलमा का गुर महंमद होता, पहलैं मूवा सोई||

 

गोरखनाथ कह रहे हैं कि सम्पूर्ण जगत को माया ने नाथ लिया है| नाथ माने घेर लिया है, आबद्ध कर लिया है माया ने| कलमा पढ़-पढ़ कर तुमलोग यदि अमर हो जाना चाहते हो तो कलमा को चलाने वाले मोहम्मद भी नहीं बच सके| वो तो अमर रहते! वो भी चले गए|

 

गोरखनाथ यहाँ पर कह रहे हैं कि माया अपने वश में सभी को कर लेती है| और जो माया के वश में हो जाता है, वो माया जैसा दिखाती है, वैसा ही देखता है| तुम्हारी आँख का चश्मा यानि दृष्टि बदल जाती है| एक राजा के यहाँ गाय की नीलामी हो रही थी| एक साधारण व्यक्ति जाकर राजा की गाय खरीद लाया| ले तो आया, अब खली-भूसी खिलाने लगा| गाय खाती ही नहीं थी| राजा के यहाँ तो हरी चरी की व्यवस्था है| हरी-हरी घास खायी है तो सूखा-सूखा भूसा कैसे खाएगी! खाती नहीं थी, मरने लगी| अब दूध क्या देगी, मरने-मरने हो गयी| वो अपने गुरुजी के यहाँ गया| कहा कि गुरुजी के यहाँ सब चीज़ का उपाय होता है| गुरु उपाय देते हैं|

गुरुजी की गठरी में सबकी दवा होती है खांसी-बुखार से टीबी, कैंसर लेकर तक| गुरुजी के यहाँ एक लाख में 99,999 आदमी केवल अपनी किसी न किसी समस्या की दवा के लिए आता है| माने लाख में एक कोई आ जाए परमात्मा को जानने के लिए तो गुरुजी का बहुत उसको धन्यवाद है| समझे! चूँकि लोग संसार के लिए ही आते हैं| इसीलिए गुरुजी की झोली एक होती है, जिसमें वो सब तरह की दवा रखते हैं| अपने मन से, जो जिसके भाग्य से निकल गया- दे दिया| अब तुम्हारा भाग्य जाने- तुम जानो| जैसे देखा, एक वो आया था| कहा कि गुरुजी! हमको तो कुछ फायदा हो नहीं रहा है| कह रहा था न! हमने कहा कि अरे और सबको फायदा हो गया, उनको क्यों नहीं हुआ भाई.. जेल में चले गए| लेकिन तुमलोगों ने नहीं कुछ कहा| कहे थे कि कुछ किताब ले लो| तो लिया नहीं, भाग गया|

अब वह बेचारा गाय खरीदकर लाया| मरने लगी तो गुरुजी के यहाँ गया| कहा कि गुरुजी! हमारी गाय घास नहीं खा रही है| कहाँ से लाया? कहा कि राजा के यहाँ से| अब बताओ, गुरुजी से गाय का क्या मतलब? गुरुजी चरवाहा हैं क्या? लेकिन जो जिस काम के लिए जायेगा, गुरुजी यदि नहीं कुछ बताएं तो कहेगा कि गुरुजी को कुछ आता नहीं है| हमारी गाय को तो झाड़े ही नहीं... ठीक ही नहीं हुई| भूत पकड़ा था| हमारे भी बहुत लोग आते थे कि अरे गुरुजी, गाय खा नहीं रही है..| किसी की गाय दूध देती नहीं थी| तो कुछ न कुछ कह देते थे| ले जाओ, भभूत| तो कहा कि अरे बड़ा ज्ञानी हैं गुरुजी! भभूत लगाये, हमारी गाय ठीक ही हो गयी| तो समझे! गुरु ही क्या जो सब रोगों की दवा न रहे! गुरुजी कहे- अरे पता लगाया, राजा के यहाँ क्या खाती थी? कहा कि राजा तो राजा था.. हरी-हरी घास खाती थी| कहा कि अच्छा.. हरी घास! तो गुरुजी एहीतरी अपनी झोली में हाथ डाले| एक हरा शीशा निकाले| उसको रस्सी बाँधे- दोनों छोर पर छेद करके एकदम बढ़िया से| कहा कि यह चश्मा ले जाकर गाय की आँख पर बाँध दो| और तब खाना डालो| तो कहा कि गुरुजी, यह मंतर है! कहे कि यह हरा शीशा जो है, इसमें सिद्ध मोहिनी मन्त्र है| ज्यों ही यह उसकी आँख पर बाँधोगे न, बस गाय खाने लगेगी| कहा कि बड़ी कीमती है! हाँ, कीमती है| फिर गाय जब खाने लगे, धीरे-धीरे ठीक हो जाये, तब दे देना| 

तो ले जाकर बाँध दिया| उसके बाद जब भूसा डाला, अब तो गाय को हरा दिखाई पड़ेगा न! अब लगी खाने| बिना खली के भी भूसी खाने लगी| तो दौड़ा-दौड़ा गया पहले दिन दूध लेकर| गुरुजी के यहाँ पहुँच गया| कहा कि गुरुजी, गज़ब! गाय तो एकदम खाने ही लगी| कहा कि हाँ बच्चा, सिद्धि है न!

तो देखो, यही है माया| उसी तरह से हमलोग भी करते हैं काम- माया के वश में|

यही कहते हैं गोरखनाथ कि केवल कलमा पढ़ने से किसी का उद्धार नहीं होगा| मोहम्मद साहब जो कलमा को चलाये, वो ही नहीं बचे- ‘कलमा का गुर महंमद होता, पहलैं मूवा सोई||’ कलमा को चलाने वाला चला गया| तब, कौन रहता है? कहा कि गुरु| गुरु रहता है| गुरु की महत्ता बता रहे हैं- नाथ कहंतां सब जग नाथ्या, गोरष कहंतां गोई| दार्शनिक दृष्टि से गुरु की महत्ता को स्वीकार करते हुए कहते हैं कि गुरु रहता है| फिर कहोगे कि गुरुजी नहीं मरते हैं, गुरुजी! अरे गोरखनाथ नहीं चले गए? नहीं, गोरखनाथ कहते हैं कि गुरु अपने शिष्य के रूप में फिर प्रकट हो जाता है| जीवंत गुरु रहता है तो प्रकट हो गया न! गोरखनाथ फिर प्रकट हो गए, अद्वैतनाथ के रूप में आ गए| तो चलो, गुरु अपने शिष्य के रूप में फिर प्रकट हो जाता है| वह गया तो फिर दूसरे शिष्य के रूप में प्रकट हो गया| इसलिए कहते हैं कि गुरु तो अमर है| अब समझ गए! गुरु केवल शरीर नहीं होता है| गुरु जाते ही, किसी शिष्य के माध्यम से प्रकट हो जाता है| तो वह अमर हुआ! इसीलिए गोरखनाथ यहाँ पर कह रहे हैं कि गुरु तो अमर होता है| वह नहीं मरता है| लेकिन मोहम्मद के बाद तो कोई नहीं न बना! ख़त्म हो गया| इसलिए यह समझो, वहाँ कोई शिष्य हुआ नहीं|

कबीर साहब भी कहते हैं- 

कांकर पाथर जोरि कै, मसजिद लई बनाय|

ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, अरे बहरा हुआ खुदाय||

अरे तू मोहम्मद-मोहम्मद कह रहा है! चिल्लाकर कहता है न मुल्ला! कबीर साहब कहते हैं कि कंकड़-पत्थर चुनकर मस्जिद तो बना लिया| उसपर चिल्ला रहा है- अल्लाह ओ अकबर! अरे तुम्हारा खुदा बहरा हो गया है! नीचे से नहीं सुनाई दे रहा है, ऊपर से सुनाई पड़ रहा है! आजकल हियरिंग एड आ गया है, दे दो| सुनने लगेगा| हालाँकि कबीर साहब कहते हैं कि उस परमात्मा के बड़े तेज हैं कान| कैसे? कहा कि ‘चींटी के पग घुंघरू बाजे, सो भी साहब सुनता है|’ तब उसके लिए इतना जोर से चिल्लाने की क्या ज़रूरत है, बोलो| अब काशी के मौलाना मारेंगे या छोड़ेंगे?

इसी तरह गोरखनाथ यहाँ कहते हैं कि कलमा जपने से तो कुछ होगा नहीं| E = mc2  जपो| रॉकेट चल जायेगा? अभी देख रहे हो, यूक्रेन में युद्ध का आज उन्नीसवां दिन हो गया, मिसाइल छूट रही हैं न| क्या वो रूस वाला E = mc2  रटता है, बोलता है और मिसाइल छूट गई! लेकिन इसी फार्मूला पर रॉकेट चल रहा है, मिसाइल चल रही है| वो कुछ नहीं बोलता है| यहाँ  कह रहे हैं कि तुम्हारे बोलने से कुछ नहीं होता है| धारणा कर लिया न, टिकट बन गया| इसीलिए धारणा के बाद ध्यान आता है| गुरु जब रहता है तो उस धारणा को ध्यान में परिवर्तित कर देता है| समाधि तक ले जाता है| नहीं तो कोई धारणा तक तो पहुँच जाता है, आगे नहीं| धारणा तक तो राक्षस भी पहुँच जाता है| उसी धारणा के अनुरूप न अपना रूप बदल लेते हैं| जिसका धारणा करता है, रूप पकड़ लिया उसका| राक्षस भी पकड़ लेते हैं| लेकिन ध्यान नहीं होता है बिना गुरु का| धारणा के बाद जब वो ध्यान में प्रवेश करेगा, तब गुरु की ज़रूरत हो जाएगी| ध्यान ही फूल है जीवन का| फल है समाधि| जहाँ फूल लगेगा, वहीं फल लगेगा न! इसीलिए यदि गुरु के अनुसार तुम्हारी धारणाएं बदलीं तो ध्यान का फूल लगेगा, सुगंध आ जाएगी| और यदि नहीं, तो दुर्गन्ध हो जाएगी| सब राक्षस धारणा तक पहुँचे| रावण भी अपना रूप बदल लेता था धारणा से| सूपनखिया भी बदल ली| जाकर राम से कही-

तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी| यह सँजोग बिधि रचा बिचारी||

मम अनुरूप पुरुष जग माहीं| देखेउँ खोजि लोक तिहु नाहीं||

ब्रह्मा ने यह संयोग सृष्टि में बड़ा विचारकर रचा है| हम-तुम तो आ गए! आई लव यू, मिस्टर राम| अंग्रेजी भी बोलती थी| रावण अंग्रेजी शब्द है न! Raavan माने एक ही राजा इस पृथ्वी पर जो है उसको रावण बुलाते हैं| दूसरा कौन है राजा? तो देखो, वो भी धारणा जानती थी, रूप बदल ली| रावण की बड़ी बहन है| अब बताओ, कितनी बुड्ढी होगी? फिर भी रूप तो बदल ली- धारणा से| माने माया|

इसीलिए गोरखनाथ गुरु की महत्ता कह रहे हैं- नाथ कहंतां सब जग नाथ्या, गोरष कहंतां गोई| कलमा का गुर महंमद होता, पहलैं मूवा सोई|| कलमा चलाने वाला मोहम्मद चला गया, गुरु रहता है| और जब गुरु के साथ तुम रहते हो, तो माया तुमको बाँध नहीं पाती है| गुरु देख लेता है दूर से| क्या कहता है! तू ठगिनी है, मैं जानता हूँ| 

माया महाठगिनी हम जानी|

अरे कैसे जान गए! तो कहा-

निर्गुण फांस लिये डोले, बोले मधुरी बाणी||

बड़ी मधुरी बात बोलती हो| और क्या जानते हो! कहा-

केसव के कमला होइ बैठी, शिव के भवन भवानी|

अरे तू चारों और बैठी है..

पंडा के मूरत होई बैठी, तीरथ हू में पानी||
जोगी के जोगन होई बैठी, राजा के घर रानी|
काहू के हीरा होई बैठी, काहू के कौड़ी कानी||
भक्तन के भक्ति होइ बैठी, ब्रह्मा के ब्रह्मानी|
कहे कबीर सुनो भई साधो, यह सब अकथ कहानी||

तो कबीर साहब व्याख्या कर दिए| कहा कि हम जानते हैं| वही बात गोरख भी कह रहे हैं- सब माया है, माया से बचो| देखो, गुरु परंपरा चलते रहती है| जैसे गंगा नदी एक दिशा में जाती है न! या बदल देती है? इसलिए गंगा की एक परंपरा है, समुद्र में जाकर मिल जाती है| अभी समुद्र तट पर आपलोगों को ध्यान कराकर आये थे| समुद्र नाना से मिलाये थे| समुद्र की भी एक परंपरा है, वो अपनी परंपरा में रहता है| उसी तरह से गुरु परंपरा है| लेकिन  कोई अपने गुरु नहीं करता है, गुरु बन भी जाता है| बहुत जगह पर गुरु रहते हैं और चेला परंपरा तोड़कर अपने भी गुरु बन जाता है| परंपरा है कि गुरुजी जाते हैं तो कह जाते हैं कि फलाना गुरु होगा- तब बनता है| इसीलिए कहते हैं गुरु परंपरा| परंपरा गुरु तोड़ता नहीं| नदी अपनी परंपरा तोड़ती नहीं, बाढ़ आने पर फैल जाती है| दिशा नहीं बदलती है| समुद्र अतिक्रमण नहीं करता है कभी| उसी तरह से गुरु एक परंपरा में चलता है- निश्चित| इसीलिए गुरु अमर रहता है| मरता नहीं है कभी| लेकिन कलमा लिखने वाला तो चला गया- नहीं रहा| अब समझ गए बात, गोरखनाथ की!

गुरु जीता रहता है| जो जीता है, वो जीतता है| और जो जीतता है, वह नम्र होता है| यदि हारता है तो मंथन करता है, चिंतन करता है| यह दूसरी बात है कि नेता लोग जीत जाते हैं तो उपद्रव करने लगते हैं| नियम है कि जो जीतता है, वो नम्र होता है| साधक और गुरु भी जब अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर लेता है तो वह विनम्र हो जाता है| गर्माता नहीं है| उद्दंडता नहीं करता है| और हारता है तो चिंतन करता है कि क्यों मैं अपनी ज़िन्दगी में हार गया? योग-साधना में जा रहा था, क्यों मैं हार गया? इसलिए हारने पर समीक्षा होती है| देखो, अभी कांग्रेस में समीक्षा हो रही है न! भाजपा जीत गयी तो उपद्रव नहीं न की, नम्र हो गयी न|

तो यह समझो, जो भी आदमी साधना में रहता है, साधना में वो जितना आगे बढ़ता है, उतना ही नम्र होता है| उशृंखल साधक अपने को दिखाते चलता है कि क्या समझ रहे हो? हमसे भी कहता है- गुरुजी, हमलोग गाड़ी से आज चल रहे हैं| आपको गाड़ी नहीं न है! हम कहे कि न..| तुम्हारी तो चलती हो गयी..भाई| तो मोहम्मद साहब को भी गोरखनाथ यहाँ दार्शनिकता से देख रहे हैं, तौल रहे हैं| इसको अन्यथा मत समझ लेना| आज बस इतना ही... धन्यवाद!

सद्गुरुदेव की जय!

******************


‘समय के सदगुरु’ स्वामी  कृष्णानंद  जी महाराज

आप सद्विप्र समाज की रचना कर विश्व जनमानस को कल्याण मूलक सन्देश दे रहे हैं| सद्विप्र समाज सेवा एक आध्यात्मिक संस्था है, जो आपके निर्देशन में जीवन के सच्चे मर्म को उजागर कर शाश्वत शांति की ओर समाज को अग्रगति प्रदान करती है| आपने दिव्य गुप्त विज्ञान का अन्वेषण किया है, जिससे साधक शीघ्र ही साधना की ऊँचाई पर पहुँच सकता है| संसार की कठिनाई का सहजता से समाधान कर सकता है|

स्वामी जी के प्रवचन यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध हैं –

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अखण्ड मंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरं...

प्रिय आत्मन्,

हम गोरखवाणी पर बोल रहे हैं| इस पुस्तक को संपादन करने वाले हैं करुणाशंकर उपाध्याय और डॉ. दर्शन पाण्डेय| गोरख जी कह रहे हैं-

महंमद महंमद न करि काजी, महंमद का विषय बिचारं|

महंमद हाथि करद जे होती, लोहै गढ़ी न सारं|| 

हे काजी! तू बहुत जोर से मोहम्मद- मोहम्मद करता है| कहते हो न, अल्लाह ओ अकबर! लेकिन क्या मोहम्मद के बारे में कभी विचार किया? मनन किया? जरा विचार तो करो| मोहम्मद के हाथ में जो छुरी है- तलवार, वह लोहे की नहीं है| फिर जीव-हत्या कैसे होगी?

 इस पर विचार करना है| जब जीवंत गुरु नहीं रहता है, तब हमलोग लकीर के फ़क़ीर हो जाते हैं| और अपने ही मन से उनके कथन का अर्थ लगा लेते हैं| जो जैसा रहता है, अपनी बुद्धि के अनुसार अर्थ लगा लेता है| अरस्तू दार्शनिक था| अपना दर्शन दे दिया, लिख दिया| वृद्ध हो गया तो सोचा कि शिष्य हमारे दर्शन पर काम करेंगे| अपने शिष्यों को बुलाया कि हम दर्शन जो दिए हैं, आपलोग उसपर जरा विचार करो| मैं बैठकर सुन रहा हूँ| तो उसके दर्शन का एक विषय-बिंदु वो लोग पढ़े| अपनी-अपनी व्याख्या करने लगे कि अरस्तू इसको ऐसे समझाना चाहते हैं| प्रत्येक कहता कि नहीं-नहीं, ऐसा नहीं, ऐसा कहना चाहते हैं.. ऐसा नहीं ऐसा कह रहे हैं| अरे तू ही दर्शन का विद्यार्थी है! घंटों बहस चलती रही| अरस्तू ने थक कर कहा कि अरे रुको| रुको, मैं अभी जिंदा हूँ| तुम सब बकवास कर रहे हो| जो हम कह रहे हैं, वह कोई नहीं समझ रहा है| सब अपनी-अपनी बात हमारे कपाल पर मत मढ़ो| मैं जिंदा हूँ अभी!

तो यही हमलोग करते हैं| जब तक समय का सद्गुरु रहता है, राम रहते हैं, उसको नहीं समझते हैं| समझने में कठिनाई होगी न! जब चले जायेंगे तो कहेंगे कि हाँ, हम पढ़ लेंगे रामायण| उनकी चौपाई पढ़ेंगे| जब तक कृष्ण हैं, तब तक उनको नहीं समझेंगे| चले जायेंगे तो उनकी गीता याद करेंगे| गीता का अर्थ अपने मन से करेंगे| उसमें रस आता है| अपने अहंकार की पुष्टि होती है| इसलिए यहाँ पर गोरखनाथ कह रहे हैं- तुम मोहम्मद- मोहम्मद उसे पुकारते हो, लेकिन तुम नहीं जानते हो कि मोहम्मद के हाथ में लोहे की छुरी नहीं थी, तलवार नहीं थी| तो हत्या कैसे करेंगे? उनके हाथ में जो तलवार थी, वह सूक्ष्म थी| दिखाने के लिए| कहा कि इससे अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण करो| गो माने इन्द्रिय भी होता है| आँख, नाक, कान, जिह्वा, त्वचा- ये इन्द्रियाँ तुम्हारे कहने में नहीं हैं| तुम अपनी जीभ के स्वाद में नाना प्रकार के जीव- बकरों को मार रहे हो| तुम्हें जीवमात्र पर दर्द नहीं आता है| मोहम्मद की कहनी पर विचार नहीं कर रहे हो| तुम अपनी विषय-वासनाओं पर नियन्त्रण नहीं कर रहे हो| मोहम्मद के नाम पर शादियाँ किये जा रहे हो! हत्याएं किये जा रहे हो| गोरखनाथ कह रहे हैं कि जरा यह विचार करने लायक तो है, भाई! लकीर के फ़क़ीर क्यों हो रहे हो? हालाँकि बहुत पहले हिन्दुओं में भी यह परंपरा थी- किसी भी शुभ काम में बलि देने की, हत्या करने की| अभी भी पहाड़ी इलाकों में यह है| जैसा मैंने बताया| हिमाचल प्रदेश तो हम छोड़ ही दिए जाना- इसके चलते| लेकिन फिर जा रहे हैं मई में, वहाँ प्रोग्राम है 15-20 बरस के बाद| नॉर्थ-ईस्ट में भी ऐसा ही है, असम में| माने हर काम बलि देना| भगवान् बुद्ध और महावीर ने इसे रोका| लेकिन हमलोग इसपर मौन हो जाते हैं| बुद्ध पहले व्यक्ति थे, फिर महावीर ने रोका| इसीलिए बहुत बनिया लोग जैनी हो गए| चूँकि राजा यज्ञ करता था, बलि देता था| पण्डित, पुरोहित माँगता था| कर के रूप में बनियों को देना पड़ता था| बनिया लोग कहे कि हम तो जैनी हो गए| हम हिंसा नहीं करते हैं, हम नहीं देंगे| लेकिन कहा कि तुम्हारी जान नहीं बचेगी| अब क्या करोगे?

देखो, बुद्ध भी राजा थे, महावीर भी राजा थे| कहे कि यह दादागिरी नहीं चलेगी| तो यू-टर्न ले लिया| हिंसा को रोक दिया| और तब से ‘अहिंसा परमो धर्मः’ चल गया| तो हिन्दू उदारवादी है| हिन्दुओं का रहने का ढंग तो ऐसा है कि वह स्थान विशेष, समय विशेष, व्यक्ति विशेष के अनुसार अपने को बदल देता है| लकीर का फ़क़ीर नहीं है| हरदम जीवंत गुरु की शरण में रहता है इसलिए वह बदल देता है| जब कहा कि हिंसा गलत है तो कहा कि हाँ, यह गलत है और बलि प्रथा को छोड़ दिया| बुद्ध और महावीर ने बदला| बदल दिया| लेकिन अब हमलोग उनका नाम नहीं लेते हैं, कहते हैं कि ईसा बदल दिए| लेकिन मोहम्मद के बाद अब जीवंत कोई गुरु नहीं रहा| तो मुस्लिम समाज नहीं बदल रहा है, वहीं का वहीं खड़ा है|

बदलाव कैसे आता है? कोई-कोई समय का महापुरुष आ जाता है| जैसे कैंब्रिज यूनिवर्सिटी, लन्दन में एक नवयुवक पढ़ा-लिखा| लन्दन के ही नजदीक एक नगर है वॉल्वरहैम्पटन| वो पढ़-लिखकर वहाँ पर जब गया तो देखा कि यहाँ के लोग बहुत असभ्य हैं| अशिक्षित हैं, गाली-गलौज से बात करते हैं| उसको भी लोग बड़ा बेइज्जत किये| गाली-गलौज किये| अब पढ़ाई-लिखाई जो यूनिवर्सिटी से करते आता है, वह तो बहुत सोचता है| सपना देखता है कि आईएएस बनें हम| हमारे सिग्नेचर से लोग काम करें! हमारे आदेश से काम करें| जब तक लड़का यूनिवर्सिटी की बाउंड्री में घूमता है, उसकी सोच आईएएस से कम नहीं होती है| सिपाही, पुलिस को तो कुछ समझता ही नहीं| यूनिवर्सिटी में जो पढ़ा होगा, उसको अनुभव होगा| यूनिवर्सिटी के कैंपस का एक रुपहला संसार होता है- ख्वाबों का|

तो वह भी गया था वहाँ, बड़ी उम्मीद लेकर| कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से पढ़कर मैं आया हूँ.. लन्दन में रहकर! लेकिन उसने वहाँ गाली-गलौज देखा, अपने साथ बुरा बर्ताव देखा तो दो-चार-पाँच दिन में ऊब गया| कहा कि अब चलो, हमारी पढ़ाई का यहाँ कोई काम नहीं| हम कुछ पढ़ाना चाहते हैं, बताना चाहते हैं और सब गाली ही दे रहे हैं| कोई हमको पूछ भी नहीं रहा है| जो आता है, अपशब्द बोल रहा है.. अरे भागता है कि नहीं..? हमलोगों के बीच में क्या सोचकर आ गए हो तुम.. कुछ मालूम है तुमको! मूर्ख कहीं का| कहा कि अरे हम ही को मालूम नहीं..| बताओ, अब समझावें तो समझावें किसको? वह तंग आ गया| फिर एक दिन रात में कुछ सोचा, बोरिया-बिस्तर अपना बाँधने लगा लौटने के लिए| लेकिन उसका दूसरा मन बोला- अरे तू भी लौट जायेगा! फिर इनलोगों को जीना सिखाएगा कौन, इन्हें सुधारेगा? कोई तो कर्जा खाया है इनका| ये तो अपने को सबसे सभ्य समझते हैं| यदि ये ऐसे नहीं रहते- असभ्य तो तुम्हारी कीमत समझते| स्वागत करते न! क्या तुम भी उन सभ्य लोगों के बीच में जाना चाहते हो, जो केवल अपने लिए जीते हैं!

राम को भी पढ़ा-लिखाकर विश्वमित्र सब वानर-भालुओं के बीच भेज दिए- नंगे पाँव| कोई खर्चा नहीं दिए| रास्ते में खाने-पीने के लिए कोई होटल नहीं बताये थे| कहा कि जाओ, उन असभ्य लोगों के बीच में| राम! वहाँ तुम्हें जाना होगा, जहाँ कोई अपना नहीं| उनसे मिलना होगा, उनके लिए कुछ कल्याण मूलक काम करना होगा- जिनसे कोई सम्बन्ध नहीं, तुम्हारा कोई फायदा नहीं| न तुमको कोई टैक्स मिलेगा| ऐसी जगह तुमको मैं भेज रहा हूँ! तैयार हो? राम ने झट से कहा- हाँ गुरुदेव! मैं जाऊँगा| तुमसे पूछेंगे कि जाओगे? कहोगे कि हाँ| कहाँ? जहाँ सरकारी नौकरी मिलेगी| सब सुख-सुविधा मिलेगी| है न जी! इसलिए गुरु को भी चिंता होती है| लेकिन देखो, वह व्यक्ति वॉल्वरहैम्पटन में रुक गया| अब कहा कि क्या करें, कैसे करें! तो वहाँ के लड़कों से मिला| आपसी सम्बन्ध करके उनकी भाषा समझने लगा| अब वो भी इसकी भाषा सुनने-समझने लगे| मुम्बई आश्रम में देखा है न, वह आदिवासी क्षेत्र है| क्रिस्चियन मिशनरीज के लोग आ गए हैं| वहाँ भी हम अपने महात्माओं से कहे कि उन आदिवासियों से संपर्क करो| उन लोगों के बच्चों को पढ़ाओ| अब वहाँ के बच्चे पाठ करने लगे| हवन करना, संस्कृत बोलना सीख गए| मेहनत बिना कुछ मिलेगा नहीं| अपने ही देना पड़ता है, लगाना भी पड़ता है| ऐसा काम कौन करेगा! मंदिर में इसीलिए बैठ जाता है पुरोहित वर्ग| जो आएगा वहाँ, देगा ही| आकर कोई लेने वाला है? लेकिन वहाँ तो देना पड़ता है तन-मन-धन|

वह व्यक्ति धीरे-धीरे वहाँ बच्चों को पढ़ाने लगा| जब बच्चे पढ़ने-सीखने लगे सदाचार, सुसंस्कार तो उनके माँ-बाप स्नेह करने लगे कि हमारा लड़का बदल रहा है, अच्छा हो रहा है| जब आठ-दस साल वहाँ पर काम किया तो मीटिंग में सबलोगों को बुलाकर कहा कि एक बात कहूँ..? कहा कि क्या? क्या मैं लौट जाऊँ! कहा कि नहीं, आप मत लौटिये| बड़े अच्छे आदमी हैं, हमारे बच्चों को पढ़ा रहे हैं.. कुछ देना पड़ता नहीं है| तो कहा कि हमारी एक बात मानियेगा? आपलोग हमसे प्रेम करते हैं न! कहा कि हाँ, अब प्रेम करने लगे| अच्छा! देखिये, हफ्ते में सात दिन होते हैं न.. बस, हफ्ते में एक दिन आप अनर्थ काम छोड़ दीजिये| मतलब? कहा कि आप जो पेड़ काटते हैं, हत्याएं करते हैं जंगल में और झूठ बोलना- यह छोड़ दीजिये सन्डे के सन्डे| कहा कि अरे बाप रे बाप, सदियों से हमलोग करते आ रहे हैं, छोड़ दें परंपरा? कहा कि जो हो, हम नहीं आपलोगों को चुनौती दे रहे हैं| लेकिन हफ्ते में एक दिन के लिए आप छोड़ सकते हैं तो ठीक, नहीं तो मैं चला जाऊँगा| कहा कि अरे भाई, मत जाओ| बड़े अच्छे आदमी हो| चलो, हमलोग एक दिन छोड़ देंगे| एक ही दिन न! कहा कि हाँ| लेकिन एक दिन छोड़ेंगे तो जीयेंगे कैसे? हमलोगों की आदत है| कहा कि कोशिश करिए|

तो सन्डे को छोड़ दिए| झूठ नहीं बोला कोई| पेड़ नहीं काटा, शिकार नहीं किया| जीव-हत्या नहीं की| साल- दो साल में जब यह प्रयोग सफल हो गया तो सबको फिर बुलाया मीटिंग में| आपलोगों का जीवन सार्थक हो रहा है न! कहा कि हाँ| हमारा बच्चा बड़ा अच्छा कर रहा है! और हमलोग बदल रहे हैं| तुम भगवान् हो हमारे लिए| तब, एक काम और करिए..| क्या? कहा कि हफ्ते में चार दिन छोड़ दीजिये| कहा कि अरे.. कैसे करेंगे? एक दिन छोड़े तो मर गए! कहा कि नहीं, मरे तो नहीं! तब? कहा कि धीरे-धीरे न होगा..| धीरे-धीरे नहीं होता है कोई काम, कल से शुरू कर दीजिये..| तब हम नहीं जायेंगे|

यह सच घटना कह रहे हैं| देखो, चार दिन छोड़ दिया- कौनहुँ नहीं मरा| बदलाव आया लोगों में| कहा कि अरे हम मरे नहीं! फ्रॉडगिरी, झूठ बोलना छोड़ दिया| तब एक दिन फिर मीटिंग बुलाई, कहा- आपलोगों का कुछ अनर्थ हुआ! कहा कि न| हमलोग खुश हैं| सत्य बोलने से हमलोगों की कीमत बढ़ रही है| जीवों की हत्या नहीं कर रहे हैं| तो कहा कि अब तीन दिन किस लिए रखे हैं! छोड़ दीजिये अब- सातों दिन| तो जाएंगे नहीं न! कहा कि न|

तो छोड़ दिए सब| वहाँ के लोगों में परिवर्तन हुआ| यह लन्दन के बड़े-बड़े अख़बारों में आया| उस व्यक्ति का नाम था- चार्ल्स फ्रीर एंड्रयूज [Charles Freer Andrews (12 February 1871 - 5 April 1940)] समाज सेवा में उसका बहुत बड़ा नाम है| बाद में वह भारत में सेवा में आ गया जब भारत दीन-हीन-अकिंचन और परतंत्र था| चूँकि वह दीनों का काम करता था- गरीबों, उपेक्षितों के कल्याण का; इसलिए उसका नाम ‘दीनबंधु’ रख दिया गया| भारत में वह दीनबंधु के नाम से प्रसिद्ध है|

देखो, हमलोग पैसा भले ही कमा लें, कुछ काल कोई रह सकता है ऐशोआराम से, लेकिन उसका नाम कोई नहीं जानेगा| भारत में कितने राजा हुए, कोई नाम जानता है? दीनबंधु का नाम इतिहास में आ गया| नाम बदल दिया| गोरखनाथ भी यही कहते हैं कि हमलोग बदलते नहीं हैं, महापुरुष कोई आ जाता है तो कुछ सीखते नहीं हैं| मोहम्मद साहब लोहे की नहीं, शब्द रूपी छुरी रखते थे, फिर हत्या कैसे करेंगे! इस पर जरा विचारो| मुसलमानों से कहते हैं कि खाली मोहम्मद- मोहम्मद मत कहो| मोहम्मद कहने से कुछ होता नहीं| अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण रखो| कबीर साहब तो कहते हैं-

जीव मति हतो बापुरा, सबका एकै प्राण|

हत्या कबहूँ न छूटिहैं, जो कोटिन सुनो पुराण||

जीव घात न कीजिए, बहुरि लैत वह कान|

तीर्थ गये न बाँचिहो, जो कोटि हीरा देहु दान||

 बहुत बड़ा पाप लगता है| तब क्या खाएं भाई! कहते हैं-‘अकुरा खाए सो मानवा, और खाए सो दानवा|’ अंकुरित अन्न जो खाने वाला है, वो ही मानव है, और कुछ यदि खाता है तो वो दानव है| इसलिए हत्या छोड़ो| तो यहाँ पर भी गोरखनाथ जी मोहम्मद साहब का नाम लेकर कह रहे हैं-‘महंमद महंमद न करि काजी, महंमद का विषय बिचारं|’ ए काजी! केवल मोहम्मद- मोहम्मद चिल्लाते हो, जरा विचार तो कर लो| महंमद हाथि करद जे होती, लोहै गढ़ी न सारं|| मोहम्मद के हाथ में लोहे की छुरी नहीं| अपनी संसार की विषय-वासनाओं को शब्द की छुरी से मारो| इसलिए मोहम्मद साहब के सन्देश को आध्यात्मिक पक्ष की तरफ ले जा रहे हैं गोरखनाथ जी| आगे कह रहे हैं-

 

नाथ कहंतां सब जग नाथ्या, गोरष कहंतां गोई|

कलमा का गुर महंमद होता, पहलैं मूवा सोई||

 

गोरखनाथ कह रहे हैं कि सम्पूर्ण जगत को माया ने नाथ लिया है| नाथ माने घेर लिया है, आबद्ध कर लिया है माया ने| कलमा पढ़-पढ़ कर तुमलोग यदि अमर हो जाना चाहते हो तो कलमा को चलाने वाले मोहम्मद भी नहीं बच सके| वो तो अमर रहते! वो भी चले गए|

 

गोरखनाथ यहाँ पर कह रहे हैं कि माया अपने वश में सभी को कर लेती है| और जो माया के वश में हो जाता है, वो माया जैसा दिखाती है, वैसा ही देखता है| तुम्हारी आँख का चश्मा यानि दृष्टि बदल जाती है| एक राजा के यहाँ गाय की नीलामी हो रही थी| एक साधारण व्यक्ति जाकर राजा की गाय खरीद लाया| ले तो आया, अब खली-भूसी खिलाने लगा| गाय खाती ही नहीं थी| राजा के यहाँ तो हरी चरी की व्यवस्था है| हरी-हरी घास खायी है तो सूखा-सूखा भूसा कैसे खाएगी! खाती नहीं थी, मरने लगी| अब दूध क्या देगी, मरने-मरने हो गयी| वो अपने गुरुजी के यहाँ गया| कहा कि गुरुजी के यहाँ सब चीज़ का उपाय होता है| गुरु उपाय देते हैं|

गुरुजी की गठरी में सबकी दवा होती है खांसी-बुखार से टीबी, कैंसर लेकर तक| गुरुजी के यहाँ एक लाख में 99,999 आदमी केवल अपनी किसी न किसी समस्या की दवा के लिए आता है| माने लाख में एक कोई आ जाए परमात्मा को जानने के लिए तो गुरुजी का बहुत उसको धन्यवाद है| समझे! चूँकि लोग संसार के लिए ही आते हैं| इसीलिए गुरुजी की झोली एक होती है, जिसमें वो सब तरह की दवा रखते हैं| अपने मन से, जो जिसके भाग्य से निकल गया- दे दिया| अब तुम्हारा भाग्य जाने- तुम जानो| जैसे देखा, एक वो आया था| कहा कि गुरुजी! हमको तो कुछ फायदा हो नहीं रहा है| कह रहा था न! हमने कहा कि अरे और सबको फायदा हो गया, उनको क्यों नहीं हुआ भाई.. जेल में चले गए| लेकिन तुमलोगों ने नहीं कुछ कहा| कहे थे कि कुछ किताब ले लो| तो लिया नहीं, भाग गया|

अब वह बेचारा गाय खरीदकर लाया| मरने लगी तो गुरुजी के यहाँ गया| कहा कि गुरुजी! हमारी गाय घास नहीं खा रही है| कहाँ से लाया? कहा कि राजा के यहाँ से| अब बताओ, गुरुजी से गाय का क्या मतलब? गुरुजी चरवाहा हैं क्या? लेकिन जो जिस काम के लिए जायेगा, गुरुजी यदि नहीं कुछ बताएं तो कहेगा कि गुरुजी को कुछ आता नहीं है| हमारी गाय को तो झाड़े ही नहीं... ठीक ही नहीं हुई| भूत पकड़ा था| हमारे भी बहुत लोग आते थे कि अरे गुरुजी, गाय खा नहीं रही है..| किसी की गाय दूध देती नहीं थी| तो कुछ न कुछ कह देते थे| ले जाओ, भभूत| तो कहा कि अरे बड़ा ज्ञानी हैं गुरुजी! भभूत लगाये, हमारी गाय ठीक ही हो गयी| तो समझे! गुरु ही क्या जो सब रोगों की दवा न रहे! गुरुजी कहे- अरे पता लगाया, राजा के यहाँ क्या खाती थी? कहा कि राजा तो राजा था.. हरी-हरी घास खाती थी| कहा कि अच्छा.. हरी घास! तो गुरुजी एहीतरी अपनी झोली में हाथ डाले| एक हरा शीशा निकाले| उसको रस्सी बाँधे- दोनों छोर पर छेद करके एकदम बढ़िया से| कहा कि यह चश्मा ले जाकर गाय की आँख पर बाँध दो| और तब खाना डालो| तो कहा कि गुरुजी, यह मंतर है! कहे कि यह हरा शीशा जो है, इसमें सिद्ध मोहिनी मन्त्र है| ज्यों ही यह उसकी आँख पर बाँधोगे न, बस गाय खाने लगेगी| कहा कि बड़ी कीमती है! हाँ, कीमती है| फिर गाय जब खाने लगे, धीरे-धीरे ठीक हो जाये, तब दे देना| 

तो ले जाकर बाँध दिया| उसके बाद जब भूसा डाला, अब तो गाय को हरा दिखाई पड़ेगा न! अब लगी खाने| बिना खली के भी भूसी खाने लगी| तो दौड़ा-दौड़ा गया पहले दिन दूध लेकर| गुरुजी के यहाँ पहुँच गया| कहा कि गुरुजी, गज़ब! गाय तो एकदम खाने ही लगी| कहा कि हाँ बच्चा, सिद्धि है न!

तो देखो, यही है माया| उसी तरह से हमलोग भी करते हैं काम- माया के वश में|

यही कहते हैं गोरखनाथ कि केवल कलमा पढ़ने से किसी का उद्धार नहीं होगा| मोहम्मद साहब जो कलमा को चलाये, वो ही नहीं बचे- ‘कलमा का गुर महंमद होता, पहलैं मूवा सोई||’ कलमा को चलाने वाला चला गया| तब, कौन रहता है? कहा कि गुरु| गुरु रहता है| गुरु की महत्ता बता रहे हैं- नाथ कहंतां सब जग नाथ्या, गोरष कहंतां गोई| दार्शनिक दृष्टि से गुरु की महत्ता को स्वीकार करते हुए कहते हैं कि गुरु रहता है| फिर कहोगे कि गुरुजी नहीं मरते हैं, गुरुजी! अरे गोरखनाथ नहीं चले गए? नहीं, गोरखनाथ कहते हैं कि गुरु अपने शिष्य के रूप में फिर प्रकट हो जाता है| जीवंत गुरु रहता है तो प्रकट हो गया न! गोरखनाथ फिर प्रकट हो गए, अद्वैतनाथ के रूप में आ गए| तो चलो, गुरु अपने शिष्य के रूप में फिर प्रकट हो जाता है| वह गया तो फिर दूसरे शिष्य के रूप में प्रकट हो गया| इसलिए कहते हैं कि गुरु तो अमर है| अब समझ गए! गुरु केवल शरीर नहीं होता है| गुरु जाते ही, किसी शिष्य के माध्यम से प्रकट हो जाता है| तो वह अमर हुआ! इसीलिए गोरखनाथ यहाँ पर कह रहे हैं कि गुरु तो अमर होता है| वह नहीं मरता है| लेकिन मोहम्मद के बाद तो कोई नहीं न बना! ख़त्म हो गया| इसलिए यह समझो, वहाँ कोई शिष्य हुआ नहीं|

कबीर साहब भी कहते हैं- 

कांकर पाथर जोरि कै, मसजिद लई बनाय|

ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, अरे बहरा हुआ खुदाय||

अरे तू मोहम्मद-मोहम्मद कह रहा है! चिल्लाकर कहता है न मुल्ला! कबीर साहब कहते हैं कि कंकड़-पत्थर चुनकर मस्जिद तो बना लिया| उसपर चिल्ला रहा है- अल्लाह ओ अकबर! अरे तुम्हारा खुदा बहरा हो गया है! नीचे से नहीं सुनाई दे रहा है, ऊपर से सुनाई पड़ रहा है! आजकल हियरिंग एड आ गया है, दे दो| सुनने लगेगा| हालाँकि कबीर साहब कहते हैं कि उस परमात्मा के बड़े तेज हैं कान| कैसे? कहा कि ‘चींटी के पग घुंघरू बाजे, सो भी साहब सुनता है|’ तब उसके लिए इतना जोर से चिल्लाने की क्या ज़रूरत है, बोलो| अब काशी के मौलाना मारेंगे या छोड़ेंगे?

इसी तरह गोरखनाथ यहाँ कहते हैं कि कलमा जपने से तो कुछ होगा नहीं| E = mc2  जपो| रॉकेट चल जायेगा? अभी देख रहे हो, यूक्रेन में युद्ध का आज उन्नीसवां दिन हो गया, मिसाइल छूट रही हैं न| क्या वो रूस वाला E = mc2  रटता है, बोलता है और मिसाइल छूट गई! लेकिन इसी फार्मूला पर रॉकेट चल रहा है, मिसाइल चल रही है| वो कुछ नहीं बोलता है| यहाँ  कह रहे हैं कि तुम्हारे बोलने से कुछ नहीं होता है| धारणा कर लिया न, टिकट बन गया| इसीलिए धारणा के बाद ध्यान आता है| गुरु जब रहता है तो उस धारणा को ध्यान में परिवर्तित कर देता है| समाधि तक ले जाता है| नहीं तो कोई धारणा तक तो पहुँच जाता है, आगे नहीं| धारणा तक तो राक्षस भी पहुँच जाता है| उसी धारणा के अनुरूप न अपना रूप बदल लेते हैं| जिसका धारणा करता है, रूप पकड़ लिया उसका| राक्षस भी पकड़ लेते हैं| लेकिन ध्यान नहीं होता है बिना गुरु का| धारणा के बाद जब वो ध्यान में प्रवेश करेगा, तब गुरु की ज़रूरत हो जाएगी| ध्यान ही फूल है जीवन का| फल है समाधि| जहाँ फूल लगेगा, वहीं फल लगेगा न! इसीलिए यदि गुरु के अनुसार तुम्हारी धारणाएं बदलीं तो ध्यान का फूल लगेगा, सुगंध आ जाएगी| और यदि नहीं, तो दुर्गन्ध हो जाएगी| सब राक्षस धारणा तक पहुँचे| रावण भी अपना रूप बदल लेता था धारणा से| सूपनखिया भी बदल ली| जाकर राम से कही-

तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी| यह सँजोग बिधि रचा बिचारी||

मम अनुरूप पुरुष जग माहीं| देखेउँ खोजि लोक तिहु नाहीं||

ब्रह्मा ने यह संयोग सृष्टि में बड़ा विचारकर रचा है| हम-तुम तो आ गए! आई लव यू, मिस्टर राम| अंग्रेजी भी बोलती थी| रावण अंग्रेजी शब्द है न! Raavan माने एक ही राजा इस पृथ्वी पर जो है उसको रावण बुलाते हैं| दूसरा कौन है राजा? तो देखो, वो भी धारणा जानती थी, रूप बदल ली| रावण की बड़ी बहन है| अब बताओ, कितनी बुड्ढी होगी? फिर भी रूप तो बदल ली- धारणा से| माने माया|

इसीलिए गोरखनाथ गुरु की महत्ता कह रहे हैं- नाथ कहंतां सब जग नाथ्या, गोरष कहंतां गोई| कलमा का गुर महंमद होता, पहलैं मूवा सोई|| कलमा चलाने वाला मोहम्मद चला गया, गुरु रहता है| और जब गुरु के साथ तुम रहते हो, तो माया तुमको बाँध नहीं पाती है| गुरु देख लेता है दूर से| क्या कहता है! तू ठगिनी है, मैं जानता हूँ| 

माया महाठगिनी हम जानी|

अरे कैसे जान गए! तो कहा-

निर्गुण फांस लिये डोले, बोले मधुरी बाणी||

बड़ी मधुरी बात बोलती हो| और क्या जानते हो! कहा-

केसव के कमला होइ बैठी, शिव के भवन भवानी|

अरे तू चारों और बैठी है..

पंडा के मूरत होई बैठी, तीरथ हू में पानी||
जोगी के जोगन होई बैठी, राजा के घर रानी|
काहू के हीरा होई बैठी, काहू के कौड़ी कानी||
भक्तन के भक्ति होइ बैठी, ब्रह्मा के ब्रह्मानी|
कहे कबीर सुनो भई साधो, यह सब अकथ कहानी||

तो कबीर साहब व्याख्या कर दिए| कहा कि हम जानते हैं| वही बात गोरख भी कह रहे हैं- सब माया है, माया से बचो| देखो, गुरु परंपरा चलते रहती है| जैसे गंगा नदी एक दिशा में जाती है न! या बदल देती है? इसलिए गंगा की एक परंपरा है, समुद्र में जाकर मिल जाती है| अभी समुद्र तट पर आपलोगों को ध्यान कराकर आये थे| समुद्र नाना से मिलाये थे| समुद्र की भी एक परंपरा है, वो अपनी परंपरा में रहता है| उसी तरह से गुरु परंपरा है| लेकिन  कोई अपने गुरु नहीं करता है, गुरु बन भी जाता है| बहुत जगह पर गुरु रहते हैं और चेला परंपरा तोड़कर अपने भी गुरु बन जाता है| परंपरा है कि गुरुजी जाते हैं तो कह जाते हैं कि फलाना गुरु होगा- तब बनता है| इसीलिए कहते हैं गुरु परंपरा| परंपरा गुरु तोड़ता नहीं| नदी अपनी परंपरा तोड़ती नहीं, बाढ़ आने पर फैल जाती है| दिशा नहीं बदलती है| समुद्र अतिक्रमण नहीं करता है कभी| उसी तरह से गुरु एक परंपरा में चलता है- निश्चित| इसीलिए गुरु अमर रहता है| मरता नहीं है कभी| लेकिन कलमा लिखने वाला तो चला गया- नहीं रहा| अब समझ गए बात, गोरखनाथ की!

गुरु जीता रहता है| जो जीता है, वो जीतता है| और जो जीतता है, वह नम्र होता है| यदि हारता है तो मंथन करता है, चिंतन करता है| यह दूसरी बात है कि नेता लोग जीत जाते हैं तो उपद्रव करने लगते हैं| नियम है कि जो जीतता है, वो नम्र होता है| साधक और गुरु भी जब अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर लेता है तो वह विनम्र हो जाता है| गर्माता नहीं है| उद्दंडता नहीं करता है| और हारता है तो चिंतन करता है कि क्यों मैं अपनी ज़िन्दगी में हार गया? योग-साधना में जा रहा था, क्यों मैं हार गया? इसलिए हारने पर समीक्षा होती है| देखो, अभी कांग्रेस में समीक्षा हो रही है न! भाजपा जीत गयी तो उपद्रव नहीं न की, नम्र हो गयी न|

तो यह समझो, जो भी आदमी साधना में रहता है, साधना में वो जितना आगे बढ़ता है, उतना ही नम्र होता है| उशृंखल साधक अपने को दिखाते चलता है कि क्या समझ रहे हो? हमसे भी कहता है- गुरुजी, हमलोग गाड़ी से आज चल रहे हैं| आपको गाड़ी नहीं न है! हम कहे कि न..| तुम्हारी तो चलती हो गयी..भाई| तो मोहम्मद साहब को भी गोरखनाथ यहाँ दार्शनिकता से देख रहे हैं, तौल रहे हैं| इसको अन्यथा मत समझ लेना| आज बस इतना ही... धन्यवाद!

सद्गुरुदेव की जय!

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‘समय के सदगुरु’ स्वामी  कृष्णानंद  जी महाराज

आप सद्विप्र समाज की रचना कर विश्व जनमानस को कल्याण मूलक सन्देश दे रहे हैं| सद्विप्र समाज सेवा एक आध्यात्मिक संस्था है, जो आपके निर्देशन में जीवन के सच्चे मर्म को उजागर कर शाश्वत शांति की ओर समाज को अग्रगति प्रदान करती है| आपने दिव्य गुप्त विज्ञान का अन्वेषण किया है, जिससे साधक शीघ्र ही साधना की ऊँचाई पर पहुँच सकता है| संसार की कठिनाई का सहजता से समाधान कर सकता है|

स्वामी जी के प्रवचन यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध हैं –

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