दान का सदुपयोग – ईश्वर की नियामतों को बांटना

दान का सदुपयोग – ईश्वर की नियामतों को बांटना

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dhanesh r parmar "param"

14 Feb 20252 min read

Published in storieslatest

एक ठंडी शाम, नगर की एक प्रमुख संस्था के पदाधिकारी एक सभा में एकत्रित हुए। विषय था—दान और उसका सही उपयोग। सभी के मन में समाज सेवा की भावना थी, परंतु दान की दिशा को लेकर मतभेद थे। सभा का उद्देश्य था किसी ऐसी संस्था का चयन करना, जो दान राशि का सदुपयोग करे।

बैठक आरंभ हुई। पहला व्यक्ति एक संस्था का नाम सुझाता, तो दूसरा उसकी पारदर्शिता पर सवाल उठाता। तीसरा व्यक्ति किसी अन्य संस्था का नाम लेता, तो चौथा उसकी आलोचना करने लगता। धीरे-धीरे चर्चा व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप में बदल गई, और सभा में नकारात्मकता का माहौल बन गया।

तभी सभा के एक कोने में बैठे एक वृद्ध सज्जन, जो अब तक मौन थे, खड़े हुए। उनकी गंभीर मुद्रा और शांत, लेकिन प्रभावशाली आवाज़ ने सभी का ध्यान खींचा। 

उन्होंने कहा,"आप सभी समाज सेवा के लिए समर्पित हैं, लेकिन क्या आपने सोचा है कि दान क्यों दिया जाता है? दान का उद्देश्य है—ईश्वर की दी हुई नियामतों को बांटना। पर आप लोग यहाँ दान के उपयोग और दुरुपयोग की चिंताओं में उलझ गए हैं।"

वे आगे बोले, "ईश्वर हमें अनगिनत चीज़ें देता है—वायु, जल, भोजन—लेकिन क्या वह कभी यह पूछता है कि हम इनका सही उपयोग कर रहे हैं या नहीं? ईश्वर का काम देना है, और वह बिना शर्त देता है। हमारा काम भी दान देना है, न कि उसके परिणामों पर चर्चा करना। संस्था का चयन सोच-समझकर करें, पर इसे विवाद का विषय न बनाएं। अधिक चर्चा करने से केवल समय और ऊर्जा व्यर्थ होती है।"

उनके शब्दों से सभा में सन्नाटा छा गया। सभी को एहसास हुआ कि वे अपने मूल उद्देश्य से भटक गए थे। फिर सभी ने सहमति से एक प्रतिष्ठित संस्था का नाम तय किया और दान राशि का निर्णय लिया।

यह कहानी हमें सिखाती है कि दान केवल धन देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह निस्वार्थता और समर्पण का प्रतीक है। दान देना एक ईश्वरीय कर्तव्य है, और इसे बिना किसी अपेक्षा के, निष्काम भाव से करना चाहिए।

"दान का असली धर्म यह है कि हम ईश्वर की दी हुई नियामतों को बिना किसी स्वार्थ के बांटें, न कि इस पर बहस करें।"  

धनेश परमार

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एक ठंडी शाम, नगर की एक प्रमुख संस्था के पदाधिकारी एक सभा में एकत्रित हुए। विषय था—दान और उसका सही उपयोग। सभी के मन में समाज सेवा की भावना थी, परंतु दान की दिशा को लेकर मतभेद थे। सभा का उद्देश्य था किसी ऐसी संस्था का चयन करना, जो दान राशि का सदुपयोग करे।

बैठक आरंभ हुई। पहला व्यक्ति एक संस्था का नाम सुझाता, तो दूसरा उसकी पारदर्शिता पर सवाल उठाता। तीसरा व्यक्ति किसी अन्य संस्था का नाम लेता, तो चौथा उसकी आलोचना करने लगता। धीरे-धीरे चर्चा व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप में बदल गई, और सभा में नकारात्मकता का माहौल बन गया।

तभी सभा के एक कोने में बैठे एक वृद्ध सज्जन, जो अब तक मौन थे, खड़े हुए। उनकी गंभीर मुद्रा और शांत, लेकिन प्रभावशाली आवाज़ ने सभी का ध्यान खींचा। 

उन्होंने कहा,"आप सभी समाज सेवा के लिए समर्पित हैं, लेकिन क्या आपने सोचा है कि दान क्यों दिया जाता है? दान का उद्देश्य है—ईश्वर की दी हुई नियामतों को बांटना। पर आप लोग यहाँ दान के उपयोग और दुरुपयोग की चिंताओं में उलझ गए हैं।"

वे आगे बोले, "ईश्वर हमें अनगिनत चीज़ें देता है—वायु, जल, भोजन—लेकिन क्या वह कभी यह पूछता है कि हम इनका सही उपयोग कर रहे हैं या नहीं? ईश्वर का काम देना है, और वह बिना शर्त देता है। हमारा काम भी दान देना है, न कि उसके परिणामों पर चर्चा करना। संस्था का चयन सोच-समझकर करें, पर इसे विवाद का विषय न बनाएं। अधिक चर्चा करने से केवल समय और ऊर्जा व्यर्थ होती है।"

उनके शब्दों से सभा में सन्नाटा छा गया। सभी को एहसास हुआ कि वे अपने मूल उद्देश्य से भटक गए थे। फिर सभी ने सहमति से एक प्रतिष्ठित संस्था का नाम तय किया और दान राशि का निर्णय लिया।

यह कहानी हमें सिखाती है कि दान केवल धन देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह निस्वार्थता और समर्पण का प्रतीक है। दान देना एक ईश्वरीय कर्तव्य है, और इसे बिना किसी अपेक्षा के, निष्काम भाव से करना चाहिए।

"दान का असली धर्म यह है कि हम ईश्वर की दी हुई नियामतों को बिना किसी स्वार्थ के बांटें, न कि इस पर बहस करें।"  

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