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वो रुमाल
एक छोटा सा रुमाल, और ढेर सारे सवाल,
ज़ुबान पर आकर भी पूछ न सकी,
क्योंकि आँखों ने बहुत कुछ कह दिया,
सब्र का बाँध टूट पड़ा,
आखिर में पूछ ही पड़ी - क्या उनका था यह रूमाल?
सनम के हाथों में उनका, ये रुमाल...
दिल में एक अजीब सी चुभन दे गया...
सोच में पड़ गई, क्या आज भी उन्हें याद है - ये रुमाल ?
क्या आज भी वो कशिश, वो जज़्बात है ?
सवालों का सैलाब था- वो रूमाल !
कुछ अनसुनी कहानी थी, वो रुमाल,
कुछ खट्टी- मीठीं यादें थी, वो रुमाल !
आंखों में कोरापन की वजह थी, वह रूमाल,
आँखों में नमी की वजह थी, वह रूमाल !
ज़िंदगी में हम आगे तो बढ़ जाते हैं,
पर अनजाने ही टकरा जाते हैं - उन पुरानी यादों से,
जिन्हें सीने में कहीं दफना चुके हैं हम सब… कहीं, न कहीं,
क्या आपके भी ज़िंदगी में है ऐसे ही - एक रूमाल ?!
स्वेता गुप्ता
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