बेकसूर दिल

बेकसूर दिल

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namrata gupta

17 Aug 20241 min read

Published in poetry

बेकसूर दिल

क्यों जज्बातों के घेरों मे उलझ जाता है
क्यों अतीत के साए से लिपट जाता है
ए दिल तू न मुस्कुरा इतना
वरना तू कुछ खो देगा
पहले ही सह चुका बहुत कुछ तू
अबकी बार तू रो देगा
छलनी हो चूका है तेरा हर हिस्सा
जग में जाहिर हो चूका है तेरा किस्सा
तू हर वक्त खामोश था
बिना किसी शिकायत के
ऐसा तेरे साथ ही क्यों होता है?…
तू ही क्यों छुप-छुप के दिन रात रोता है ?
तू ही क्यों….?
बेकसूर दिल!

 

नम्रता गुप्ता

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17 Aug 20241 min read

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क्यों जज्बातों के घेरों मे उलझ जाता है
क्यों अतीत के साए से लिपट जाता है
ए दिल तू न मुस्कुरा इतना
वरना तू कुछ खो देगा
पहले ही सह चुका बहुत कुछ तू
अबकी बार तू रो देगा
छलनी हो चूका है तेरा हर हिस्सा
जग में जाहिर हो चूका है तेरा किस्सा
तू हर वक्त खामोश था
बिना किसी शिकायत के
ऐसा तेरे साथ ही क्यों होता है?…
तू ही क्यों छुप-छुप के दिन रात रोता है ?
तू ही क्यों….?
बेकसूर दिल!

 

नम्रता गुप्ता

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