वो किस्सा, माँ !

वो किस्सा, माँ !

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dineshkumar singh

28 Jul 20241 min read

Published in poetry

#mothersday2022

 

वो किस्सा, माँ !

हारे हुए थे हम, पर हमको लड़ना था

उनकी क्रोधाग्नि में हमें

खामोश जलना था।

 

हम लड़े माँ,

सही होकर भी

चुप रहे माँ।

 

याद है, जब मैं उसके पैरों पर

गिरा था?

जलते कोयले के अंगारो ने

मुझे छुआ था?

 

तू कितना छटपटाई थी माँ,

रात भर, आंसुओ से अपने,

मरहम लगाई थी माँ!

 

याद है, पर जब हमें

हमारी कोशिश का फल मिला,

जब दिन निकला,

तो लोग भी बदले, और

मौसम भी बदला?

 

तू कितना मुस्कराई थी माँ!।।2।।

 

याद करकर वो मुस्कुराहट,

मैं आज भी मुस्कराता हूँ माँ।

अब किसको बताऊं अपनी कहानी

खुद को ही सुनाता हूँ माँ।

 

 

रचयिता- दिनेश कुमार सिंह

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वो किस्सा, माँ !

हारे हुए थे हम, पर हमको लड़ना था

उनकी क्रोधाग्नि में हमें

खामोश जलना था।

 

हम लड़े माँ,

सही होकर भी

चुप रहे माँ।

 

याद है, जब मैं उसके पैरों पर

गिरा था?

जलते कोयले के अंगारो ने

मुझे छुआ था?

 

तू कितना छटपटाई थी माँ,

रात भर, आंसुओ से अपने,

मरहम लगाई थी माँ!

 

याद है, पर जब हमें

हमारी कोशिश का फल मिला,

जब दिन निकला,

तो लोग भी बदले, और

मौसम भी बदला?

 

तू कितना मुस्कराई थी माँ!।।2।।

 

याद करकर वो मुस्कुराहट,

मैं आज भी मुस्कराता हूँ माँ।

अब किसको बताऊं अपनी कहानी

खुद को ही सुनाता हूँ माँ।

 

 

रचयिता- दिनेश कुमार सिंह

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