पंख होते तो उड़ जाते रे…..

पंख होते तो उड़ जाते रे…..

Avatar
arati samant

11 Aug 20241 min read

Published in poetry

पंख होते तो उड़ जाते रे…..

आकाश में उड़ते पंछियों को जब भी देखती हूं,
मन में बार-बार यही ख्याल आता है |
क्यों सिर्फ पंछी उड़ पाते हैं दूर गगन में,
और क्यों नहीं इंसान उन जैसी उड़ान भर पाता है।

काश उन जैसे पंख हमें भी होते,
कभी यहां कभी वहां हम
दूर देस का करते सफर।

ना किसी को अपना बनाने की चाह होती,
ना होती रोटी, कपड़ा और  मकान की फिकर।

बस उड़ते चलो पंख फैलाए नील गगन में दूर दूर 
नई जगह देखने की धुन और मन में उमंग भरपूर।

छू लूं नई ऊंचाइयां मन में बस  उड़ने का का जोश हो
कहां है जमीन और कहाँ फलक इसका न कोई होश हो।

नीला आकाश और सफेद बादल सब कुछ देखू ठीक से,
जिन जगहों पर जाने का ख्वाब देखा था उन्हें देख लेती नज़दीक से।

नदी बादल पर्वत झरने जंगल
सब होते मेरे बस में

ना समाज के कायदे कानून
ना इस दुनिया की रस्में।

जहां मन चाहे वहां उड़ पहुंच जाती झट से
जहां दिल करे वहाँ करती अपना बसेरा।

 ये इंसान ही है दौलत के पीछे अंधा हुआ जाता है
पंछियों की दुनिया में ना कुछ तेरा ना मेरा।

– आरती 

Comments (0)

Please login to share your comments.



Storyberrys — Discover & Share Creative Stories

Read short stories, poetry, art and more — from a community of storytellers, in English and Hindi.

© Copyright 2026 Storyberrys Digital Services LLP. All rights reserved.

पंख होते तो उड़ जाते रे…..

पंख होते तो उड़ जाते रे…..

Avatar
arati samant

11 Aug 20241 min read

Published in poetry

पंख होते तो उड़ जाते रे…..

आकाश में उड़ते पंछियों को जब भी देखती हूं,
मन में बार-बार यही ख्याल आता है |
क्यों सिर्फ पंछी उड़ पाते हैं दूर गगन में,
और क्यों नहीं इंसान उन जैसी उड़ान भर पाता है।

काश उन जैसे पंख हमें भी होते,
कभी यहां कभी वहां हम
दूर देस का करते सफर।

ना किसी को अपना बनाने की चाह होती,
ना होती रोटी, कपड़ा और  मकान की फिकर।

बस उड़ते चलो पंख फैलाए नील गगन में दूर दूर 
नई जगह देखने की धुन और मन में उमंग भरपूर।

छू लूं नई ऊंचाइयां मन में बस  उड़ने का का जोश हो
कहां है जमीन और कहाँ फलक इसका न कोई होश हो।

नीला आकाश और सफेद बादल सब कुछ देखू ठीक से,
जिन जगहों पर जाने का ख्वाब देखा था उन्हें देख लेती नज़दीक से।

नदी बादल पर्वत झरने जंगल
सब होते मेरे बस में

ना समाज के कायदे कानून
ना इस दुनिया की रस्में।

जहां मन चाहे वहां उड़ पहुंच जाती झट से
जहां दिल करे वहाँ करती अपना बसेरा।

 ये इंसान ही है दौलत के पीछे अंधा हुआ जाता है
पंछियों की दुनिया में ना कुछ तेरा ना मेरा।

– आरती 

Comments (0)

Please login to share your comments.



Storyberrys — Discover & Share Creative Stories

Read short stories, poetry, art and more — from a community of storytellers, in English and Hindi.

© Copyright 2026 Storyberrys Digital Services LLP.

All rights reserved.