सवाल आमदनी का

सवाल आमदनी का

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meenu yatin

16 Aug 20241 min read

Published in poetry

सवाल आमदनी का

चिलचिलाती धूप में
तपता है
सूरज सा वो
दिन भर जलता है
ऊक उम्रगुजर गई
फिर भी
वो सर पे
ईट गारों का बोझ उठाता है

रात में अक्सर
उसके झोपडी़ की छत
टपकती है
वो जो औरों के दिन भर
आशियां बनाता है

वो खींचता है
औरों का बोझ
उसे अपने घर पैसे
भेजने हैं
गाँव वाले समझते हैं
वो शहर में खूब कमाता है
वो नौजवान
पढ़ लिख कर
रिक्शा चलाता है

तुम्हें दिख जाएगें
आसपास ही अकसर
मुहँ में बीडी़ दबाए या
बच्चों को बाँधे पीठ पर या
सिर पर बोझ उठाए
उम्र का फर्क नहीं
न फर्क औरत आदमी का
सवाल पेट का है
और रोज की आमदनी का।

 

मीनू यतिन

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चिलचिलाती धूप में
तपता है
सूरज सा वो
दिन भर जलता है
ऊक उम्रगुजर गई
फिर भी
वो सर पे
ईट गारों का बोझ उठाता है

रात में अक्सर
उसके झोपडी़ की छत
टपकती है
वो जो औरों के दिन भर
आशियां बनाता है

वो खींचता है
औरों का बोझ
उसे अपने घर पैसे
भेजने हैं
गाँव वाले समझते हैं
वो शहर में खूब कमाता है
वो नौजवान
पढ़ लिख कर
रिक्शा चलाता है

तुम्हें दिख जाएगें
आसपास ही अकसर
मुहँ में बीडी़ दबाए या
बच्चों को बाँधे पीठ पर या
सिर पर बोझ उठाए
उम्र का फर्क नहीं
न फर्क औरत आदमी का
सवाल पेट का है
और रोज की आमदनी का।

 

मीनू यतिन

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