डर

डर

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sweta gupta

17 Aug 20242 min read

Published in poetry

डर

यह डर ही तो हैं, जो सारे खेल रचाता हैं,
यह डर ही हैं, जो सारे उम्मीदों पर पानी फेर जाता हैं,
यह डर ही हैं, जो आगे बढ़ने से हमें रोक जाता हैं,
पिछले अनुभवों को बार-बार याद दिलाता हैं,
और भरोसे को अंदर से हिला जाता हैं,
इस डर ने क‌‌ई पक्के रिश्ते तोड़ डाले हैं,
दीमक की तरह भरोसे की नींव को तोड़ डाले हैं।

 

क्या हैं, कोई इलाज इस डर पर क़ाबू पाने का?
इस डर को ही खुद, डर का एहसास दिलाने का?
जानते हम सब हैं, कि यह सब दिमागी खेला हैं,
पर जब तक क़ाबू पाते हैं, हाथ में कुछ ना रह जाता हैं।

पूछा मैने भरोसे से तुम क्यों नहीं हावी हो जाती हो,
अपनी तेज़ तलवार से क्यों नहीं उस डर का धर अलग कर देती हो?
क्यों उन नाजुक रिश्तों को टूटने को छोड़ जाती हो?
बेबस और लाचारी का चोला पहन, क्यों रुदाली का नाच नचाती हो?

भरोसे ने फिर हिम्मत की ओर देखा,
कहां मुझे हिम्मत का साथ भी तो चाहिए,
फिर क्या था, उसने भी विश्वास की ओर इशारा किया,
क्षण भर में सब भीड़ गए एक दूसरे के साथ,
इस युद्ध को देख फिर डर ने हुंकार लगाई,
सबके मन में, मैं हूं राज करता,
मैं, अपनी राज का बजाता हूं डंका,
हैं कौन, जो मुझ अविनाशी को मार सकता हैं?
हैं कौन, जो अपने प्रेम को खोने से नहीं डरता हैं?
हैं कौन, जो अपनी मौत से नहीं डरता हैं?

तभी, सब ने शिव से गुहार लगाई,
प्रकट हो, हें महादेव !
फिर भी उस घमंडी डर ने, किया सब पर प्रहार,
तभी अपने त्रिशूल से शिव ने किया उसका संघार।
मची थीं जो प्रलय, वो अब धरती पर चित्त पड़ा था,
हाथ जोड़ सब जुट गए ,‌
किया फिर सब ने, जय जयकार ,
शिव बोले ‘मैं तुम सब में बसा हूं’,
अपनी दुनिया के, तुम खुद हो शिव!

तभी टिकट-टिकट की आवाज़ से खुली मेरी निद्रा,
बस स्टाप पर उतर खड़ी, मैं सोचने लगी,
यह क्या था, जो मैने आज हैं देखा?

 

रचयिता

स्वेता गुप्ता

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यह डर ही तो हैं, जो सारे खेल रचाता हैं,
यह डर ही हैं, जो सारे उम्मीदों पर पानी फेर जाता हैं,
यह डर ही हैं, जो आगे बढ़ने से हमें रोक जाता हैं,
पिछले अनुभवों को बार-बार याद दिलाता हैं,
और भरोसे को अंदर से हिला जाता हैं,
इस डर ने क‌‌ई पक्के रिश्ते तोड़ डाले हैं,
दीमक की तरह भरोसे की नींव को तोड़ डाले हैं।

 

क्या हैं, कोई इलाज इस डर पर क़ाबू पाने का?
इस डर को ही खुद, डर का एहसास दिलाने का?
जानते हम सब हैं, कि यह सब दिमागी खेला हैं,
पर जब तक क़ाबू पाते हैं, हाथ में कुछ ना रह जाता हैं।

पूछा मैने भरोसे से तुम क्यों नहीं हावी हो जाती हो,
अपनी तेज़ तलवार से क्यों नहीं उस डर का धर अलग कर देती हो?
क्यों उन नाजुक रिश्तों को टूटने को छोड़ जाती हो?
बेबस और लाचारी का चोला पहन, क्यों रुदाली का नाच नचाती हो?

भरोसे ने फिर हिम्मत की ओर देखा,
कहां मुझे हिम्मत का साथ भी तो चाहिए,
फिर क्या था, उसने भी विश्वास की ओर इशारा किया,
क्षण भर में सब भीड़ गए एक दूसरे के साथ,
इस युद्ध को देख फिर डर ने हुंकार लगाई,
सबके मन में, मैं हूं राज करता,
मैं, अपनी राज का बजाता हूं डंका,
हैं कौन, जो मुझ अविनाशी को मार सकता हैं?
हैं कौन, जो अपने प्रेम को खोने से नहीं डरता हैं?
हैं कौन, जो अपनी मौत से नहीं डरता हैं?

तभी, सब ने शिव से गुहार लगाई,
प्रकट हो, हें महादेव !
फिर भी उस घमंडी डर ने, किया सब पर प्रहार,
तभी अपने त्रिशूल से शिव ने किया उसका संघार।
मची थीं जो प्रलय, वो अब धरती पर चित्त पड़ा था,
हाथ जोड़ सब जुट गए ,‌
किया फिर सब ने, जय जयकार ,
शिव बोले ‘मैं तुम सब में बसा हूं’,
अपनी दुनिया के, तुम खुद हो शिव!

तभी टिकट-टिकट की आवाज़ से खुली मेरी निद्रा,
बस स्टाप पर उतर खड़ी, मैं सोचने लगी,
यह क्या था, जो मैने आज हैं देखा?

 

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